छिमेकी

know your neighbour

Archive for October, 2011

‘माओवादियों को अन्य संघर्षों से सबक लेना चाहिए’

Posted by chimeki on October 21, 2011

नई दिल्ली में डॉ बाबुराम भट्टाराई

चार दिवसीय भारत दौरे पर आये नेपाल के प्रधान मंत्री डॉ. बाबुराम भट्टाराई ने एक कार्यक्रम में कहा कि नेपाल को एक नए तरह के लोकतंत्र की जरूरत है. नेपाल में हम लोकतंत्र के नए मॉडल का निर्माण करना चाहते है. उन्होंने कहा कि एक मार्क्सवादी और माओवादी होने के नाते मै यह मानता हूँ कि हम मार्क्सवादी सामान्य तौर पर बहुत जड़सूत्रवादी और संकुचित विचार के होते है. हम अन्य प्रकार के आन्दोलनों से सबक नहीं लेते जबकि आज इस बात की जरूरत है कि हम दुनिया भर में चल रहे आंदोलन और खासतौर पर दक्षिण एशिया में चल रहे विभिन्न प्रकार के आंदोलन से सबक लें. हमें दक्षिण एशिया के विचारकों से सीखने की जरूरत है.

डॉ भट्टाराई ने कहा कि दक्षिण एशिया के संदर्भ में ‘जन सार्क’ के निर्माण की पहेल होनी चाहिए. जिसकी एक कोशिश उनकी पार्टी ने दस साल पहले की थी. उन्होंने आगे कहा कि भारत और नेपाल की जनता को एकताबद्ध होने की आवशकता है. और उसे उन लोगों से सतर्क रहना चाहिए जो दोनों के बीच दरार पैदा करना चाहते है. इस अवसर उन्होंने कहा कि एक मनुष्य के नाते वे सभी लोगों को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि वे हमेशा वर्ग, जातीय और लैंगिक अधिकारों के लिए चल रहे संघर्ष के साथ खड़े है.

इस कार्यक्रम का आयोजन साउथ एशियन फोरम फॉर पीपल्स इनिशिएटिव और समकालीन तीसरी दुनिया ने संयुक्त रूप से किया था. कार्यक्रम में बोलते हुए तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरुप वर्मा ने कहा कि डॉ बाबुराम भट्टाराई दुनिया भर की संघर्षशील जनता का प्रतिनिधित्व करते है. यह कर्यक्रम केवल प्रधान मंत्री भट्टाराई का स्वागत कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह नेपाल की क्रांतिकारी जनता का स्वागत कार्यक्रम है. उन्होंने कहा कि नेपाल एक भीषण संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और अभी तक वहां अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है. शांति और संविधान नेपाल की सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि वहां की प्रतिगामी शक्तियां नहीं चाहती कि नेपाल की सामाजिक स्थिति में आमूल परिवर्तन आये.

श्री वर्मा ने कहा कि आज का दौर पूँजीवाद के संकट का दौर है और जो आग अरब से शरू हुई थी वह आग यूरोप और अमरीका तक पहुँच गई है. और दक्षिण एशिया इससे अधिक दिनों तक अछूता नहीं रह सकेगा. उन्होंने कहा कि यदि नेपाल का संघर्ष अपने तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुँचता तो इसका असर सभी पर पड़ेगा इसलिए हम डॉ बाबुराम और उनके साथियों को बड़ी उम्मीद से देख रहे है.

कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए स्वामी अग्निवेश ने कहा कि हमे विश्वास है कि नेपाल में जल्द ही एक नया संविधान बनेगा और आप एक बार फिर प्रधान मंत्री बनेंगे लेकिन आपको हमेशा यह याद रखना चाहिए कि किसी भी देश की सरकार के लिए यह ठीक नहीं है कि वह बदलाव की आवाज को न सुने. नेपाल की आपकी सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नेपाल में हमेशा ‘स्टेट्स को’ न बना रहे. उन्होंने कहा कि नेपाल आज दक्षिण एशिया की जनता की आशा का केन्द्र है.

कार्यक्रम के अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि डॉ भट्टाराई के दौरे को दोनों देशों की जनता बड़े अरमानों के साथ देख रही है. जनता का अरमान है कि दोनों देशों के संबंध मजबूत हों. नेपाल में जो परिवर्तन आया है वह किसी एक पार्टी के जरिये नहीं आया है इसलिए सभी पार्टियों को मिलकर प्राप्त उपलब्धियों को बचाना होगा. उन्होंने कहा कि नेपाल की माओवादी पार्टी पर जनता ने भरोसा किया है और इसलिए इस धरोहर को बचाने की जिम्मेदारी माओवादी पार्टी की है. नेपाल की सभी पार्टियों की जिम्मेदारी है कि वे नेपाल की शांति प्रक्रिया का काम पूरा करें और जनता की बेचैनी को विराम दें.

कार्यक्रम का सञ्चालन साउथ एशियन फोरम फॉर पीपल्स इनिशिएटिव के संयोजक सुधीन्द्र भदोरिया ने किया और धन्यवाद प्रस्ताव के.सी. त्यागी ने पढ़ा.

Advertisements

Posted in Nepal | Tagged: , , , | Leave a Comment »

भूटान में भारतीय मुद्रा की कमी

Posted by chimeki on October 13, 2011

भूटान की अर्थव्यवस्था में भारतीय मुद्रा की कमी कोई नई बात नहीं है. 1990 से ही भूटान अपनी घरेलु आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारतीय मुद्रा को ब्याज पर उधार लेता रहा है. यह उधार भारत से, जो भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, मुख्य रूप से उपभोग सामग्री जैसे कपड़ा, अनाज, वाहन आदि आयात करने के काम में लाया जाता है.

भूटान में आयातीत 70% सामान भारत से आता है और इस कारण भारतीय मुद्रा की मांग हमेशा बनी रहती है. आर्थिक विकास के साथ इस मांग में और भी अधिक बढोतरी आई है. विधुतशक्ति (बिजली) के निर्यात से यह कर्ज चुकाया जाता है.

पिछले कुछ सालों से आयात नियंत्रण से बाहर हो गया है. एक बैंकर के अनुसार मुद्रा आपुर्ति की स्थिति बेहद खराब है और हालात बर्बादी की ओर जाते दिखाई दे रहे है. आज कर्ज पर सालाना चुकाया जाने वाला ब्याज उतना है जितना कि 1990 में कर्ज लिया जाता था. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि निवेश के लिए उधार न लेकर उपभोग के लिए उधार लेना चिंता का विषय है. दो बड़े देशों, चीन और भारत, के बीच स्थित विविधता की कमी वाले इस देश की अर्थव्यवस्था पर आने वाले सालों में इसका नकारात्मक असर पड़ेगा.

यह स्थिति क्यों बन रही है इसके कारणों से सभी वाकिफ है. भूटानी अर्थव्यवस्था अपनी आय से अधिक भारतीय मुद्रा व्यय कर रही है जिसका मतलब है कि इस समस्या को हल करने के लिए उसे और भी अधिक भारतीय मुद्रा जुटानी होगी.

2020 तक 10000 मेगा वॉट बिजली उत्पादन की योजना इस दिशा में सबसे बड़ा कदम है. चूँकि भारत अतिरिक्त बिजिली का खरीददार है इसलिए जरूरी भारतीय मुद्रा हांसिल हो सकेगी. एक पूर्वानुमान के अनुसार इससे भूटान को प्रतिवर्ष 40 बिलियन न्गल्त्रुम (भूटानी मुद्रा)की आय होगी. लेकिन इस आय का बहुत बड़ा हिस्सा उस कर्ज को चुकाने में लग जाएगा जो इस परियोजना के निर्माण के लिए लिया जाना है, जैसाकि ताला परियोजना के साथ हो रहा है. ताला परियोजना के जरिये हासिल होने वाली आय का आधे से अधिक कर्ज की सालाना किस्त अदा करने में खर्च हो जाता है.

इस का अर्थ यह हुआ कि बहुत बहुत सालों बाद ही विधुत परियोजना की पूरी आय भूटान को प्राप्त हो सकेगी.

तो ऐसे में क्या किया जाए? अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि घरेलु खाद्यान्न उत्पादन में सुधार किया जाना चाहिए ताकि आयात असंतुलन ठीक किया जा सके. लेकिन वे इस बात की भी चिंता दिखाते है कि विकास के लिए तेजी से कृषि योग्य जमीन को नष्ट किया जा रहा है.

तेजी से हो रही भारतीय मुद्रा की कमी का एक कारण बैंकों द्वारा अत्यधिक कर्ज देना भी है. लेकिन बैंकरों का मानना है कि विकसित होती अथव्यवस्था को इस प्रक्रिया की जरूरत है.

इस समस्या से निजाद का दूसरा तरीका है गैरजरूरी उपभोग को रोकना. कम कार खरीदें और अधिक पैदल चलें.

जबकि इस समस्य के समाधान के विकल्प तलाशे जा रहे है ऐसे में इसका तात्कालिक समाधान यही है कि और अधिक कर्ज लिया जाए.

कुएंसेलऑनलाइन से साभार

अनुवाद: विष्णु शर्मा

Posted in Bhutan | Tagged: , , | Leave a Comment »

क्या यह दूसरे जनयुद्ध की तैयारी है?

Posted by chimeki on October 13, 2011

सिमोन रोबिंस (बर्दिया, नेपाल)

माओवादी पार्टी के विभाजन को बहुत से लोग शांति के लिए उनकी प्रतिबद्धता की अंतिम परीक्षा मानते है और यह भी कि विभाजन प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टाराई के संकल्प और प्रभाव की परीक्षा भी है.

सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते माओवादी कार्यकर्ता

हालाँकि यह विश्व स्तरीय बहस संविधानसभा और उस राजनीती पर केन्द्रित है जहाँ धन और पद के लिए लंबे समय से नीतियों का व्यापर होता आया है. आपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए माओबादी पार्टी के एक गुट ने इस बहस को काठमांडू की गलियों में सीमित न रख कर इसे देश व्यापी बना दिया है. पिछले महीने माओबादी गुट के हार्डलाइनर माने जाने वाले ‘किरण’ गुट के निकट की सांस्कृतिक टोली ने देश भर में कर्यक्रम कर शांति प्रक्रिया की आलोचना की और और माओबादी पार्टी के नेतृत्व के दृष्टिकोण और ईमानदारी पर सवाल उठाये.

यह सभा वैसे ही आयोजित की गई जैसे ‘जनयुद्ध’ के समय की जाती थी, लाल तम्बू के भीतर, साउंड सिस्टम और हेडसेट और माइक्रोफोन ने इन कार्यक्रमों को और भी अधिक आकर्षक बना दिया था. ये प्रदर्शन उनकी प्राथमिकता को प्रष्ट करता है: एक पी.एल.ए. का नौजवान मंच के सामने है, कार्येक्रम मे पारंपरिक गीत गया,  नेपाल के संस्कृतिक नाच और नाटक का प्रदर्शन किया गया.

इन कार्यक्रमों में प्रस्तुत एक नाटक में बताया जाता है कि प्रचंड गुट का एक माओबादी सभासद  आजकल काठमांडू मे आपनी नव नवेली दुल्हन के साथ आराम से जी रहा है और बड़े व्यापारीयो से पैसे ले कर अपनी शाम शराबखानों में बिताता है. इस सभासद को पार्टी के आदर्शवादी सदस्यों, जो क्रांति की बात करते है, से नफरत है और वह उन गरीब गावं वालों का सम्मान  नहीं करता जिन्होंने उसे चुन कर भेजा है. ये गांव वाले आज भी गरीबी मे जीने के लिए मजबूर है,  और जनयुद्ध के समय की ‘जनसरकार’ को याद करते है. नाटक के आखिर से पहले वाला सीन सीधे तौर से उस घटना से सम्बंधित है जिसके चलते ‘किरण’ गुट को पार्टी नेतृत्व के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा: जन सेना के हथियारों के कंटेनर की चावी सरकार को सौप देने का मामला.

एक अनोखे नाच में जन सेना के लोग क्रांति का संकल्प लेते है और यह घोषित करते है कि वे हथियार  नहीं डालेंगे. उन लोगों मानना है की राज्य सत्ता हासिल करने के लिए बन्दुक ही एक मात्र साधन है. पूरे प्रभाव को देखा जाये तो यह कभी-कभी दक्षिण कोरिया के बोलीवुड का  नाटक लगता है, फिर भी यह नाटक लोगों का मनोरंजन करता है और साथ ही साथ उन्हें ‘बल’ देता है. इस कार्यक्रम के अंत मे पार्टी का एक नौजवान कार्यकर्ता अपने संविधान सभा के  सदस्य द्वारा उसके गुट का समर्थन करने के लिए दी जाने वाली रिश्वत लेने से इनकार कर देता और एक घायल जन सेना के  साथी के साथ घर लौट जाता है,  और अपने हथियार और जन सेना की वर्दी पहने हुए नारे लगता है ‘क्रांति जारी है’. सन्देश साफ़ है कि माओवादी पार्टी सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अभी भी ‘सशस्त्र क्रांति’ द्वारा ही राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है.

ये कार्यक्रम पार्टी के इमानदार कार्यकर्ता पर स्पष्ट रूप से लक्षित है. और पार्टी नेतृत्व को बदलने के लिए तैयार रहने अथवा उस नेतृत्व से अलग हो जाने का आहवान करता है जिसने राजनैतिक और नैतिक रूप से विचारो के साथ समझौता कर लिया है और जो शांति समझौता के पांच सालों में माओवादी एजेंडा को लागू करने में असफल हुआ हैं.

यह सन्देश स्पष्ट तौर से यह दिखलाना चाहता है, जो बहुत तकलीफदेह है, कि नेपाली राजनीति इतनी भ्रष्ट और अनैतिक हो चुकी है कि जो भी दल सत्ता के करीब पहुँचता है वह अपने आदर्श और विचारधारा को नकारते हुए समझौता कर लेता है और अपने फायदे वाली संरक्षण की राजनीति अपना लेता है. माओबादी नेतृत्व को भी इसी संरक्षण ने निगल लिया है और वह तीव्र गति से अपने आदर्शो से भटकती जा रही है. सच तो ये है की माओबादी पार्टी के हार्डलाइनर (किरण) गुट ने साबित कर दिया की पिछले पांच सालों के गतिरोध के चलते नेपाल के राजनीतिक सिस्टम मे इतनी ताकत ही नहीं है कि वो सामाजिक बदलाव ला सके, यहाँ तक कि वह एक प्रभावशाली शासन प्रणाली भी नहीं ला सकती.

सांस्कृतिक कार्यक्रम का राजनीतिक आधार वह विचार है जो बताता है कि गाँव मे रहने वाले आज भी बहुत गरीबी में जी रहे है और उन्हें हमेशा सामाजिक रूप से बहिष्कृत होना पड़ता है जिसके चलते ‘जनयुद्ध’ को गति मिली थी और जिन लोगों ने इस ‘जनयुद्ध’ मे सबसे ज्यादा बलिदान दिया उनके पास आज भी कुछ नहीं है. जिस गरीब समाज ने इस युद्ध मे दोनों पक्षों को योद्धा दिए, युद्ध की समाप्ति के पांच साल के बाद भी उनके जीवन मे कोई बदलाव नहीं आया है.

यदि माओबादी का हार्डलाइनर  गुट ‘दूसरे जनयुद्ध’ की शुरुआत करता है- जिसका सन्देश मिलने भी लागा है- तो इसके लिए जिम्मेदार बस वे लोग नहीं होंगे जो बन्दुक उठाएंगे बल्कि वे भी होंगे जो वर्तमान में जारी इस राजनीतिक पाखंड को बर्दास्त कर रहे हैं जहाँ केवल उन लोगों के लिए जगह है जो सत्ता के केन्द्र में है. ये चुनौती बाबुराम भट्टाराई की है कि वे जल्दी से यह सन्देश अपनी पार्टी के हार्डलाइनर और जनता को दें कि अब ‘दूसरे जनयुद्ध” की जरुरत नहीं है.

अनुवाद: कृष्ण प्रसाद भट्टराई

Posted in Nepal | Tagged: , , | Leave a Comment »

बाबुराम सरकार के खिलाफ मजदूर

Posted by chimeki on October 13, 2011

विंस्टन

संघर्ष करते मजदूर

नेपाल के कारखानों और सड़कों पर एक नए प्रकार का टकराव हो रहा है.

नेपाल का माओवादी आन्दोलन और उससे संबद्ध संगठन इस समय भविष्य की कार्ययोजना के सवाल पर जबरदस्त संघर्ष की स्थिति में है और इसका सबसे स्पष्ट रूप माओवादी के अखिल नेपाल ट्रेड यूनियन संघ (ए.एन.टी.यू.एफ.)में दिखाई दे रहा है. यह संघ दो हिस्सों में बंट गया है और प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच हिंसक टकराव हुए हैं. हाल में संघ के अध्यक्ष जम्मरकटेल (जो प्रचंड के करीबी कहे जाते है) के पक्ष पर संघ के ही किरण पक्ष के कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि उन्होंने उनके निचले कार्यकर्ताओं पर अपने गुंडों से हमले करवाए है.

किरण पक्ष ताकतवर है. तराई में मधेसी संगठनों के साथ मिल कर इसने हड़ताल करवाई जिसका असर नेपाल की सभी फेक्ट्रियों में हुआ- ये हड़ताल संस्थापन पक्ष की उस नीति की सीधे तौर पर अवेहलना थी जिस में उसने हड़ताल न करने का फेक्ट्री मालिकों के साथ समझौता किया था और किरण पक्ष का मानना है कि यह समझौता मालिकों को मजदूर वर्ग के ऊपर बहुत अधिक अधिकार देता है जबकि मजदूर के हितों को नुक्सान पहुंचाता है.

दस साल के संघर्ष और एक परिवार की हुकूमत को उखाड फैकने वाले नेपाल का श्रमिक वर्ग बेहद क्रांतिकारी है और उसे अपनी क्षमता का पूरा ज्ञान है. नेपाल में हड़ताल और बंद आम है और श्रमिक संगठन विभिन्न पार्टियों से संबद्ध है. ए.एन.टी.यू.एफ. सबसे बड़ा श्रमिक संगठन है और पिछले समय में यह सबसे अधिक क्रांतिकारी भी रहा है…लेकिन, अब इस संगठन के बहुत से लोग इसे इस तरह नहीं देखते.

ए.एन.टी.यू.एफ. के केन्द्रीय नेतृत्व ने अभी हाल में दक्षिणपंथी कांग्रेस और एमाले पार्टियों के साथ मिल कर कर एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है जिसके तहत वे आने वाले वर्षों में कारखानों और मालिकों के खिलाफ कोई काम नहीं करेंगे. इस समझौते को लागू कराना मुश्किल है लेकिन समझौते का सबसे विवादित पक्ष यह है कि इस संगठन के नेतृत्व ने अपने ही सदस्यों के लिए ‘काम नहीं तो पारिश्रमिक नहीं’ की नीति को मान लिया है. यह उस पुरानी मान्यता के खिलाफ है जब फेक्ट्रियों के मजदूर संगठन उस समय के लिए भी पारिश्रमिक की मांग करते थे जिस समय वे सडकों पर आंदोलन कर रहे होते थे या जब वे किसी पार्टी द्वारा घोषित बंद के दिन फेक्ट्री में नहीं आ पाते थे. पिछले समय में ‘काम नहीं तो पारिश्रमिक नहीं’ की नीति का जबरदस्त विरोध होता था लेकिन माओवादी संघ के केन्द्रीय नेतृत्व ने इस समय पारिश्रमिक बढ़ाएं जाने के एवज में इस नीति को मान लिया है.

‘दी हिमालयन टाईम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार नेपाल की एकीकृत कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) के उपाध्यक्ष बाबुराम भट्टराई ने उस मीटिंग की अध्यक्षता की थी जिसमे यह समझौता हुआ था. नेपाल से ही प्रकाशित होने वाले ‘दी रिपब्लिकन’ के अनुसार इस समझौते के तहत ‘हायर एंड फायर’ की नीति को भी मान लिया गया है.

ऐसा नहीं लगता की यह समझौता तुरंत लागू हो जाएगा. इस समझौते के खिलाफ 8 संगठनों का संयुक्त गठबंधन बना है जिसमे किरण पक्ष वाला संघ का धड़ा (जो अब खुद को ए.एन.टी.यू.एफ. कहता है) और मधेशी ट्रेड यूनियन शामिल है. इस गठबंधन ने समझौते की निंदा की है और इसके खिलाफ आंदोलन करने का ऐलान किया है. ‘दी हिमालयन टाईम्स’ के अनुसार गठबंधन का कहना है कि, ‘समिति का निर्णय मजदूरों के खिलाफ है और इसलिए ट्रेड यूनियन इसे नहीं मानेगी. ‘काम नहीं तो पारिश्रमिक नहीं’, ‘हायर एंड फायर’ जैसे नीति को लागू करना यह बताता है कि बाबुराम भट्टराई की सरकार मजदूरों के खिलाफ है.

हिमालयन टाईम्स के अनुसार मालिकों के संगठन ने सरकार से अपील की है कि वह विरोधी संगठनों के खिलाफ कार्रवाही करे और समझौते को अविलम्ब लागू करवाए. उनकी इस अपील के खिलाफ जबरदस्त प्रतिरोध हुआ है और मजदूरों के 8 संगठनों के गठबंधन ने दशहरा के बाद हड़ताल करने का निर्णय लिया है.

भट्टराई सरकार के खिलाफ वाम संगठनों के विरोध का यह पहला मामला नहीं है. इस पहले भी उनकी सरकार की उस नीति का वाम संगठनों ने विरोध किया था जिसमे सरकार ने यह फैसला लिया था कि वह जनयुद्ध के समय गरीब किसानों द्वारा सामंतो और जमींदारों से छिनी जमीन को लौटा देंगी.

अब जबकि मजदूर संगठन भी सरकार के विरोध में उतर आये है तो लगता है कि आने वाले दिन बाबुराम भट्टराई की सरकार के लिए कठिन साबित होंगे.

Posted in Nepal | Tagged: , , | Leave a Comment »

बाबुराम भट्टराई की मुस्तांग सवारी

Posted by chimeki on October 13, 2011

बाबुराम की मुस्तांग

नेपाल के प्रधान मंत्री का पद ग्रहण करने के तुरत बाद बाबुराम भट्टराई मुस्तांग गाड़ी पर सवार हुए और उस पुरानी नेपाली परंपरा पर ब्रेक लगा दिया जहां प्रधान मंत्री की सवारी गाड़ी एक आलिशान विदेशी कार होती थी. नेपाली मीडिया, जो हर बात को मसालेदार बना कर प्रस्तुत करने की कला में दुनिया भर के मिडिया में अव्वल है, ने आखों में परमानंद के आंसू और दिल में सुखद अहसास के साथ देश के ‘मसीहा’ का स्वागत किया. अखबार के पन्ने बिना ऐसी वाली मुस्तांग की खुली खिडकी से बाहर झांकते बाबुराम के फोटो से लद गए. फिर बाबुराम ने अपने ड्राइवर से कहा, ‘कामरेड, हमें पुष्पलाल श्रेष्ठ की समाधि ले चलो’. कट.

मुस्तांग पर चढ़ कर यदि बाबुराम ने नेपाल के बुर्जुआजी को यह एहसास दिलाया था कि वे उनके अपने है तो पुष्पलाल श्रेष्ठ की समाधि पर फूल डाल कर उन्होंने नेपाल की बहुसंख्यक वाम जनता को बताने की कोशिश की कि वे समाजवाद को भूले नहीं है जैसा कि उनके विरोधी बताने की कोशिश कर रहे है.

इसके बाद उन्होंने और भी बहुत से करतब दिखाए या दिखने की कोशिश की जैसे प्रधान मंत्री को विदेश भ्रमण के लिए मिलने वाले भत्ते को भूकंप राहत कोष में जमा करना, शांति प्रक्रिया को 45 दिन में पूरा करने का वादा करना (आज 45वा दिन है), एक साल तक किसी भी अधिकारी का तबादला न करने का आश्वासन देना (इसके बाद बहुत से अधिकारियों का तबादला हुआ), जनयुद्ध के दौरान सामंतो से कब्जाई जमीन लौटा देने की घोषणा करना (उनकी ही पार्टी के 12 संगठनों ने बयान जारी कर इस घोषणा का विरोध किया है), और जन सेना के हथियारों के कंटेनर की चावी को सरकार को सौप देने का निर्णय लेना (इस के बाद उनकी ही पार्टी के किरण और बादल ने प्रेस में बयान जरी कर इसका विरोध किया था और सरकार के खिलाफ मशाल जुलूस निकाला था). कट.

अब आइये बाबुराम के इन करतबों के भीतर के रहस्य को समझने की कोशिश करें:

मुस्तांग गाढ़ी: इस गाड़ी में चढ़ कर बाबुराम नेपाल के किस बुर्जुआजी वर्ग को खुश करना चाहते थे? क्या वास्तव में नेपाल में राष्ट्रीय बुर्जुआजी जैसा कोई वर्ग अस्तित्व में है? ऐसा नहीं है. नेपाल का बुर्जुआजी दलाल बुर्जुआजी है जो उत्पादन में नहीं बल्कि दलाली के धंदे में सर से पैर तक डूबा है. उसका काम भारतीय उत्पादों को नेपाल के बाजार तक लाना है. मुस्तांग गाड़ी इस प्रक्रिया का सर्वोतम उदाहरण है. इस गाड़ी का हर पुर्जा भारत के कारखानों में बनता है और नेपाल में इन्हे ‘असेम्बल’ किया जाता है ठीक उसी तरह जैसे भारत में अमरीकी कंप्यूटर को. एक पूरी गाड़ी को बाजार में लाने के लिए जितना कर देना पड़ता है उसका १/३ भाग देकर काठमांडू में मुस्तांग तैयार हो जाती है.

प्रतीकात्मक रूप से मुस्तांग नेपाल की राजनीती का अर्थपूर्ण प्रतीक भी है. जिस तरह साउथ ब्लाक में नेपाल की राजनीती का एजेंडा और नीति तय होती है और काठमांडू में इसे नेपाली थाली (इसके पीछे मेड इन चाइना का लेबल जरूर देख ले) में रख कर परोसा जाता है ठीक उसी तरह मुस्तांग नेपाल का ‘अपना’ उत्पाद होने का भ्रम देता है.

पुष्पलाल श्रेष्ठ: यह नाम नेपाल के समाजवादी आंदोलन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. पुष्पलाल श्रेष्ठ ने नेपाल में कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना की. इससे पहले वे कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे. बाद में वे अपने ‘मौलिक’ प्रयास के लिए बहुत बदनाम हुए. उनका ‘मौलिक’ प्रयास वही था जो आज बाबुराम और प्रचंड का घोषित कार्यक्रम है यानि बुर्जुआजी के साथ सहकार्य करना. पुष्पलाल श्रेष्ठ बहुत लंबे समय तक ‘गद्दार पुष्पलाल’ के नाम से भी जाने जाते रहे थे. मोहनविक्रम सिंह और किरण ने उनको पार्टी से निकाल दिया था क्योंकि दोनों का मानना था कि उनकी नीति समजवाद के आदर्शों के खिलाफ थी. बाद में जब नेपाल की माओवादी पार्टी ने जनयुद्ध को छोड संसदीय राजनीती में प्रवेश का मन बनाया तो पुष्पलाल श्रेष्ठ नायक के बतौर स्थापित किये गए.

सामंतो से कब्जाई जमीन लौटाना: दुनिया में जहां भी क्रांतियां हुईं- समाजवादी और बुर्जुआजी- वहां भूमि सुधार सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम रहा है. फ्रांस के बुर्जुआजी ने सामंतों से जमीन छीन कर गरीब और मध्यम किसानों को बांटी, अमरीका में जब अब्राहम लिंकन के नेतृत्व में गुलामों को मुक्त करने का युद्ध लड़ा गया तब मुक्त गुलामों को 40 एकड़ जमीन और घोड़े दिए गए. सोवियत संघ ने लेनिन द्वारा जारी अप्रैल थीसिस के तहत ‘जमीन जोतने वालों की’ का नारा दिया और कार्यक्रम को लागू किया, और चीन में भी क्रांतिकारी भूमि सुधार लागू किया गया. जहां जहां भूमि सुधार नहीं हुआ या बहुत कम हुआ वहां आज भी अस्थिरता बनी हुई है. भारत (यहाँ कम हुआ) और पकिस्तान (यहाँ लगभग नहीं ही हुआ) इसके उदहारण है.

लेकिन नेपाल के इस ‘पढ़े लिखे’ माओवादी नेता ने इतिहास से कोई सबक लेना जरूरी नहीं समझा और जिन कारणों से 1996 में जनयुद्ध शरू हुआ था उन्ही कारणों को ख़ारिज करते हुए इसने ऐलान किया कि 15 दिन के भीतर कब्जाई जमीन लौटा दी जायेगी! इसके लिए उन्होंने पुलिस को इन्तेजाम करने का भी आदेश दिया. बाबुराम शायद भूल गए कि एक एक इंच जमीन के लिए नेपाल की जनता ने अपना खून बहाया है और वो एक नीतिवान विद्वान नेता के ‘तर्कों’ से उस तरह प्रभावित नहीं होने वाली जैसा इन्टरनेट का शौक़ीन नेपाल का ‘मध्यम’ वर्ग होता है. जैसे ही बाबुराम ने यह घोषणा की वैसे ही गरीब किसानों के कई दल अपने अपने क्षेत्रों की पुलिस चौकियों में गए और उन्होंने पुलिस को समझा दिया कि वह बल प्रयोग की कोशिश न करे वर्ना इसका जबरदस्त प्रतिकार किया जायेगा. आज 45वा दिन है. जमीन किसानों के पास ही है.

जनसेना के हथियारों के कंटेनर की चावी को सरकार को सौपना: माओवादी पार्टी की स्थायी समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि जनसेना का नेपाली सेना में समायोजन और संविधान निर्माण का काम एक साथ पूरा किया जाये. इसी बैठक में जब प्रचंड ने कंटेनर की चावी सौपने का कार्यक्रम प्रस्तुत किया तो बहुसंख्यक सदस्यों ने इसे ख़ारिज कर दिया. लेकिन जैसे ही बाबुराम भट्टराई प्रधान मंत्री पद पर निर्वाचित हुए उन्होंने बिना किसी को जानकारी दिए चावी सरकार के हवाले कर दी.

बादल और किरण ने सरकार के इस कदम के खिलाफ बयान जरी किया और उसी शाम मशाल जुलुस निकाला गया. यह मामला केवल चावी को सौपने का तकनीकी मामला नहीं है बल्कि यह प्रचंड और बाबुराम की निरंकुश कार्यशैली से भी जुडा है. जबकि जनसेना की जिम्मेदारी बादल के पास है तो ऐसे में इसकी सूचना उन्हें नहीं देना प्रचंड की निरंकुश कार्यशैली को ही दर्शाता है.

इसके अलावा यह 2006 के शांति समझौते के भी खिलाफ है जहां यह तय किया गया था कि जनसेना का नेपाल की सेना में समायोजन और नेपाली सेना का लोकतांत्रिकरण कियाजायेगा. इस तरह यह बात और समझ आती है कि नेपाल की राजनीति में सही अर्थों में जनयुद्ध और माओवादी पार्टी का नेतृत्व कौन कर रहा है. प्रचंडा और बाबुराम जिस भाषा में अपने तर्क रखते है वे कोंग्रेस के करीब और माओवादी पार्टी से दूर नजर आते हैं.

2006 के शांति समझौते के अनुसार अन्यायपूर्ण ढंग से कब्ज़ा की गई जमीन को लौटने का प्रावधान है जबकि बाबुराम सरकार ने बिना किसानों को मुआवजा दिए पूर्ण रूप से जमीन लौटने का निर्णय किया है. इस तरह उनकी सरकार अपनी ही पार्टी की नीति के खिलाफ खुद को खड़ा करती है. दूसरी तरफ उद्योगपतियों से सरकार ने समझौता किया है कि आगामी ४ वर्षों तक पार्टी से संबद्ध ट्रेड यूनियन हड़ताल नहीं करेगा. यह भी एक समाजवादी पार्टी के कार्यक्रम के विपरीत नीति है. यानि उद्योगपति मनमानी करता रहे और मजदूर कोई आवाज नहीं उठाये!

इस सब से दो चीज़ साफ़ हो जाती है. पहली यह कि नेपाल में जनता और सत्ता में बैठे लोगों का ध्रुवीकरण पूरा हो गया है. जहां व्यापक जनता किरण-बादल समूह के साथ खड़ी है वही सामंतों और दलाल बुर्जुआजी के पक्ष में बाबुराम और प्रचंड ने खुद को सीधे तौर पर खड़ा कर लिया है. दूसरी यह कि नेपाल की जनता को बहुत जल्द ही एक शक्तिशाली संयुक्त दुश्मन से टकराना होगा जिसमे वे लोग भी शामिल होंगे जो कभी उसके साथ थे.

Posted in Nepal | Tagged: , , | Leave a Comment »

 
%d bloggers like this: