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क्या यह दूसरे जनयुद्ध की तैयारी है?

Posted by chimeki on October 13, 2011


सिमोन रोबिंस (बर्दिया, नेपाल)

माओवादी पार्टी के विभाजन को बहुत से लोग शांति के लिए उनकी प्रतिबद्धता की अंतिम परीक्षा मानते है और यह भी कि विभाजन प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टाराई के संकल्प और प्रभाव की परीक्षा भी है.

सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते माओवादी कार्यकर्ता

हालाँकि यह विश्व स्तरीय बहस संविधानसभा और उस राजनीती पर केन्द्रित है जहाँ धन और पद के लिए लंबे समय से नीतियों का व्यापर होता आया है. आपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए माओबादी पार्टी के एक गुट ने इस बहस को काठमांडू की गलियों में सीमित न रख कर इसे देश व्यापी बना दिया है. पिछले महीने माओबादी गुट के हार्डलाइनर माने जाने वाले ‘किरण’ गुट के निकट की सांस्कृतिक टोली ने देश भर में कर्यक्रम कर शांति प्रक्रिया की आलोचना की और और माओबादी पार्टी के नेतृत्व के दृष्टिकोण और ईमानदारी पर सवाल उठाये.

यह सभा वैसे ही आयोजित की गई जैसे ‘जनयुद्ध’ के समय की जाती थी, लाल तम्बू के भीतर, साउंड सिस्टम और हेडसेट और माइक्रोफोन ने इन कार्यक्रमों को और भी अधिक आकर्षक बना दिया था. ये प्रदर्शन उनकी प्राथमिकता को प्रष्ट करता है: एक पी.एल.ए. का नौजवान मंच के सामने है, कार्येक्रम मे पारंपरिक गीत गया,  नेपाल के संस्कृतिक नाच और नाटक का प्रदर्शन किया गया.

इन कार्यक्रमों में प्रस्तुत एक नाटक में बताया जाता है कि प्रचंड गुट का एक माओबादी सभासद  आजकल काठमांडू मे आपनी नव नवेली दुल्हन के साथ आराम से जी रहा है और बड़े व्यापारीयो से पैसे ले कर अपनी शाम शराबखानों में बिताता है. इस सभासद को पार्टी के आदर्शवादी सदस्यों, जो क्रांति की बात करते है, से नफरत है और वह उन गरीब गावं वालों का सम्मान  नहीं करता जिन्होंने उसे चुन कर भेजा है. ये गांव वाले आज भी गरीबी मे जीने के लिए मजबूर है,  और जनयुद्ध के समय की ‘जनसरकार’ को याद करते है. नाटक के आखिर से पहले वाला सीन सीधे तौर से उस घटना से सम्बंधित है जिसके चलते ‘किरण’ गुट को पार्टी नेतृत्व के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा: जन सेना के हथियारों के कंटेनर की चावी सरकार को सौप देने का मामला.

एक अनोखे नाच में जन सेना के लोग क्रांति का संकल्प लेते है और यह घोषित करते है कि वे हथियार  नहीं डालेंगे. उन लोगों मानना है की राज्य सत्ता हासिल करने के लिए बन्दुक ही एक मात्र साधन है. पूरे प्रभाव को देखा जाये तो यह कभी-कभी दक्षिण कोरिया के बोलीवुड का  नाटक लगता है, फिर भी यह नाटक लोगों का मनोरंजन करता है और साथ ही साथ उन्हें ‘बल’ देता है. इस कार्यक्रम के अंत मे पार्टी का एक नौजवान कार्यकर्ता अपने संविधान सभा के  सदस्य द्वारा उसके गुट का समर्थन करने के लिए दी जाने वाली रिश्वत लेने से इनकार कर देता और एक घायल जन सेना के  साथी के साथ घर लौट जाता है,  और अपने हथियार और जन सेना की वर्दी पहने हुए नारे लगता है ‘क्रांति जारी है’. सन्देश साफ़ है कि माओवादी पार्टी सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अभी भी ‘सशस्त्र क्रांति’ द्वारा ही राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है.

ये कार्यक्रम पार्टी के इमानदार कार्यकर्ता पर स्पष्ट रूप से लक्षित है. और पार्टी नेतृत्व को बदलने के लिए तैयार रहने अथवा उस नेतृत्व से अलग हो जाने का आहवान करता है जिसने राजनैतिक और नैतिक रूप से विचारो के साथ समझौता कर लिया है और जो शांति समझौता के पांच सालों में माओवादी एजेंडा को लागू करने में असफल हुआ हैं.

यह सन्देश स्पष्ट तौर से यह दिखलाना चाहता है, जो बहुत तकलीफदेह है, कि नेपाली राजनीति इतनी भ्रष्ट और अनैतिक हो चुकी है कि जो भी दल सत्ता के करीब पहुँचता है वह अपने आदर्श और विचारधारा को नकारते हुए समझौता कर लेता है और अपने फायदे वाली संरक्षण की राजनीति अपना लेता है. माओबादी नेतृत्व को भी इसी संरक्षण ने निगल लिया है और वह तीव्र गति से अपने आदर्शो से भटकती जा रही है. सच तो ये है की माओबादी पार्टी के हार्डलाइनर (किरण) गुट ने साबित कर दिया की पिछले पांच सालों के गतिरोध के चलते नेपाल के राजनीतिक सिस्टम मे इतनी ताकत ही नहीं है कि वो सामाजिक बदलाव ला सके, यहाँ तक कि वह एक प्रभावशाली शासन प्रणाली भी नहीं ला सकती.

सांस्कृतिक कार्यक्रम का राजनीतिक आधार वह विचार है जो बताता है कि गाँव मे रहने वाले आज भी बहुत गरीबी में जी रहे है और उन्हें हमेशा सामाजिक रूप से बहिष्कृत होना पड़ता है जिसके चलते ‘जनयुद्ध’ को गति मिली थी और जिन लोगों ने इस ‘जनयुद्ध’ मे सबसे ज्यादा बलिदान दिया उनके पास आज भी कुछ नहीं है. जिस गरीब समाज ने इस युद्ध मे दोनों पक्षों को योद्धा दिए, युद्ध की समाप्ति के पांच साल के बाद भी उनके जीवन मे कोई बदलाव नहीं आया है.

यदि माओबादी का हार्डलाइनर  गुट ‘दूसरे जनयुद्ध’ की शुरुआत करता है- जिसका सन्देश मिलने भी लागा है- तो इसके लिए जिम्मेदार बस वे लोग नहीं होंगे जो बन्दुक उठाएंगे बल्कि वे भी होंगे जो वर्तमान में जारी इस राजनीतिक पाखंड को बर्दास्त कर रहे हैं जहाँ केवल उन लोगों के लिए जगह है जो सत्ता के केन्द्र में है. ये चुनौती बाबुराम भट्टाराई की है कि वे जल्दी से यह सन्देश अपनी पार्टी के हार्डलाइनर और जनता को दें कि अब ‘दूसरे जनयुद्ध” की जरुरत नहीं है.

अनुवाद: कृष्ण प्रसाद भट्टराई

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