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बाबुराम भट्टराई की मुस्तांग सवारी

Posted by chimeki on October 13, 2011


बाबुराम की मुस्तांग

नेपाल के प्रधान मंत्री का पद ग्रहण करने के तुरत बाद बाबुराम भट्टराई मुस्तांग गाड़ी पर सवार हुए और उस पुरानी नेपाली परंपरा पर ब्रेक लगा दिया जहां प्रधान मंत्री की सवारी गाड़ी एक आलिशान विदेशी कार होती थी. नेपाली मीडिया, जो हर बात को मसालेदार बना कर प्रस्तुत करने की कला में दुनिया भर के मिडिया में अव्वल है, ने आखों में परमानंद के आंसू और दिल में सुखद अहसास के साथ देश के ‘मसीहा’ का स्वागत किया. अखबार के पन्ने बिना ऐसी वाली मुस्तांग की खुली खिडकी से बाहर झांकते बाबुराम के फोटो से लद गए. फिर बाबुराम ने अपने ड्राइवर से कहा, ‘कामरेड, हमें पुष्पलाल श्रेष्ठ की समाधि ले चलो’. कट.

मुस्तांग पर चढ़ कर यदि बाबुराम ने नेपाल के बुर्जुआजी को यह एहसास दिलाया था कि वे उनके अपने है तो पुष्पलाल श्रेष्ठ की समाधि पर फूल डाल कर उन्होंने नेपाल की बहुसंख्यक वाम जनता को बताने की कोशिश की कि वे समाजवाद को भूले नहीं है जैसा कि उनके विरोधी बताने की कोशिश कर रहे है.

इसके बाद उन्होंने और भी बहुत से करतब दिखाए या दिखने की कोशिश की जैसे प्रधान मंत्री को विदेश भ्रमण के लिए मिलने वाले भत्ते को भूकंप राहत कोष में जमा करना, शांति प्रक्रिया को 45 दिन में पूरा करने का वादा करना (आज 45वा दिन है), एक साल तक किसी भी अधिकारी का तबादला न करने का आश्वासन देना (इसके बाद बहुत से अधिकारियों का तबादला हुआ), जनयुद्ध के दौरान सामंतो से कब्जाई जमीन लौटा देने की घोषणा करना (उनकी ही पार्टी के 12 संगठनों ने बयान जारी कर इस घोषणा का विरोध किया है), और जन सेना के हथियारों के कंटेनर की चावी को सरकार को सौप देने का निर्णय लेना (इस के बाद उनकी ही पार्टी के किरण और बादल ने प्रेस में बयान जरी कर इसका विरोध किया था और सरकार के खिलाफ मशाल जुलूस निकाला था). कट.

अब आइये बाबुराम के इन करतबों के भीतर के रहस्य को समझने की कोशिश करें:

मुस्तांग गाढ़ी: इस गाड़ी में चढ़ कर बाबुराम नेपाल के किस बुर्जुआजी वर्ग को खुश करना चाहते थे? क्या वास्तव में नेपाल में राष्ट्रीय बुर्जुआजी जैसा कोई वर्ग अस्तित्व में है? ऐसा नहीं है. नेपाल का बुर्जुआजी दलाल बुर्जुआजी है जो उत्पादन में नहीं बल्कि दलाली के धंदे में सर से पैर तक डूबा है. उसका काम भारतीय उत्पादों को नेपाल के बाजार तक लाना है. मुस्तांग गाड़ी इस प्रक्रिया का सर्वोतम उदाहरण है. इस गाड़ी का हर पुर्जा भारत के कारखानों में बनता है और नेपाल में इन्हे ‘असेम्बल’ किया जाता है ठीक उसी तरह जैसे भारत में अमरीकी कंप्यूटर को. एक पूरी गाड़ी को बाजार में लाने के लिए जितना कर देना पड़ता है उसका १/३ भाग देकर काठमांडू में मुस्तांग तैयार हो जाती है.

प्रतीकात्मक रूप से मुस्तांग नेपाल की राजनीती का अर्थपूर्ण प्रतीक भी है. जिस तरह साउथ ब्लाक में नेपाल की राजनीती का एजेंडा और नीति तय होती है और काठमांडू में इसे नेपाली थाली (इसके पीछे मेड इन चाइना का लेबल जरूर देख ले) में रख कर परोसा जाता है ठीक उसी तरह मुस्तांग नेपाल का ‘अपना’ उत्पाद होने का भ्रम देता है.

पुष्पलाल श्रेष्ठ: यह नाम नेपाल के समाजवादी आंदोलन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. पुष्पलाल श्रेष्ठ ने नेपाल में कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना की. इससे पहले वे कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे. बाद में वे अपने ‘मौलिक’ प्रयास के लिए बहुत बदनाम हुए. उनका ‘मौलिक’ प्रयास वही था जो आज बाबुराम और प्रचंड का घोषित कार्यक्रम है यानि बुर्जुआजी के साथ सहकार्य करना. पुष्पलाल श्रेष्ठ बहुत लंबे समय तक ‘गद्दार पुष्पलाल’ के नाम से भी जाने जाते रहे थे. मोहनविक्रम सिंह और किरण ने उनको पार्टी से निकाल दिया था क्योंकि दोनों का मानना था कि उनकी नीति समजवाद के आदर्शों के खिलाफ थी. बाद में जब नेपाल की माओवादी पार्टी ने जनयुद्ध को छोड संसदीय राजनीती में प्रवेश का मन बनाया तो पुष्पलाल श्रेष्ठ नायक के बतौर स्थापित किये गए.

सामंतो से कब्जाई जमीन लौटाना: दुनिया में जहां भी क्रांतियां हुईं- समाजवादी और बुर्जुआजी- वहां भूमि सुधार सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम रहा है. फ्रांस के बुर्जुआजी ने सामंतों से जमीन छीन कर गरीब और मध्यम किसानों को बांटी, अमरीका में जब अब्राहम लिंकन के नेतृत्व में गुलामों को मुक्त करने का युद्ध लड़ा गया तब मुक्त गुलामों को 40 एकड़ जमीन और घोड़े दिए गए. सोवियत संघ ने लेनिन द्वारा जारी अप्रैल थीसिस के तहत ‘जमीन जोतने वालों की’ का नारा दिया और कार्यक्रम को लागू किया, और चीन में भी क्रांतिकारी भूमि सुधार लागू किया गया. जहां जहां भूमि सुधार नहीं हुआ या बहुत कम हुआ वहां आज भी अस्थिरता बनी हुई है. भारत (यहाँ कम हुआ) और पकिस्तान (यहाँ लगभग नहीं ही हुआ) इसके उदहारण है.

लेकिन नेपाल के इस ‘पढ़े लिखे’ माओवादी नेता ने इतिहास से कोई सबक लेना जरूरी नहीं समझा और जिन कारणों से 1996 में जनयुद्ध शरू हुआ था उन्ही कारणों को ख़ारिज करते हुए इसने ऐलान किया कि 15 दिन के भीतर कब्जाई जमीन लौटा दी जायेगी! इसके लिए उन्होंने पुलिस को इन्तेजाम करने का भी आदेश दिया. बाबुराम शायद भूल गए कि एक एक इंच जमीन के लिए नेपाल की जनता ने अपना खून बहाया है और वो एक नीतिवान विद्वान नेता के ‘तर्कों’ से उस तरह प्रभावित नहीं होने वाली जैसा इन्टरनेट का शौक़ीन नेपाल का ‘मध्यम’ वर्ग होता है. जैसे ही बाबुराम ने यह घोषणा की वैसे ही गरीब किसानों के कई दल अपने अपने क्षेत्रों की पुलिस चौकियों में गए और उन्होंने पुलिस को समझा दिया कि वह बल प्रयोग की कोशिश न करे वर्ना इसका जबरदस्त प्रतिकार किया जायेगा. आज 45वा दिन है. जमीन किसानों के पास ही है.

जनसेना के हथियारों के कंटेनर की चावी को सरकार को सौपना: माओवादी पार्टी की स्थायी समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि जनसेना का नेपाली सेना में समायोजन और संविधान निर्माण का काम एक साथ पूरा किया जाये. इसी बैठक में जब प्रचंड ने कंटेनर की चावी सौपने का कार्यक्रम प्रस्तुत किया तो बहुसंख्यक सदस्यों ने इसे ख़ारिज कर दिया. लेकिन जैसे ही बाबुराम भट्टराई प्रधान मंत्री पद पर निर्वाचित हुए उन्होंने बिना किसी को जानकारी दिए चावी सरकार के हवाले कर दी.

बादल और किरण ने सरकार के इस कदम के खिलाफ बयान जरी किया और उसी शाम मशाल जुलुस निकाला गया. यह मामला केवल चावी को सौपने का तकनीकी मामला नहीं है बल्कि यह प्रचंड और बाबुराम की निरंकुश कार्यशैली से भी जुडा है. जबकि जनसेना की जिम्मेदारी बादल के पास है तो ऐसे में इसकी सूचना उन्हें नहीं देना प्रचंड की निरंकुश कार्यशैली को ही दर्शाता है.

इसके अलावा यह 2006 के शांति समझौते के भी खिलाफ है जहां यह तय किया गया था कि जनसेना का नेपाल की सेना में समायोजन और नेपाली सेना का लोकतांत्रिकरण कियाजायेगा. इस तरह यह बात और समझ आती है कि नेपाल की राजनीति में सही अर्थों में जनयुद्ध और माओवादी पार्टी का नेतृत्व कौन कर रहा है. प्रचंडा और बाबुराम जिस भाषा में अपने तर्क रखते है वे कोंग्रेस के करीब और माओवादी पार्टी से दूर नजर आते हैं.

2006 के शांति समझौते के अनुसार अन्यायपूर्ण ढंग से कब्ज़ा की गई जमीन को लौटने का प्रावधान है जबकि बाबुराम सरकार ने बिना किसानों को मुआवजा दिए पूर्ण रूप से जमीन लौटने का निर्णय किया है. इस तरह उनकी सरकार अपनी ही पार्टी की नीति के खिलाफ खुद को खड़ा करती है. दूसरी तरफ उद्योगपतियों से सरकार ने समझौता किया है कि आगामी ४ वर्षों तक पार्टी से संबद्ध ट्रेड यूनियन हड़ताल नहीं करेगा. यह भी एक समाजवादी पार्टी के कार्यक्रम के विपरीत नीति है. यानि उद्योगपति मनमानी करता रहे और मजदूर कोई आवाज नहीं उठाये!

इस सब से दो चीज़ साफ़ हो जाती है. पहली यह कि नेपाल में जनता और सत्ता में बैठे लोगों का ध्रुवीकरण पूरा हो गया है. जहां व्यापक जनता किरण-बादल समूह के साथ खड़ी है वही सामंतों और दलाल बुर्जुआजी के पक्ष में बाबुराम और प्रचंड ने खुद को सीधे तौर पर खड़ा कर लिया है. दूसरी यह कि नेपाल की जनता को बहुत जल्द ही एक शक्तिशाली संयुक्त दुश्मन से टकराना होगा जिसमे वे लोग भी शामिल होंगे जो कभी उसके साथ थे.

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