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बाबुराम सरकार के खिलाफ मजदूर

Posted by chimeki on October 13, 2011


विंस्टन

संघर्ष करते मजदूर

नेपाल के कारखानों और सड़कों पर एक नए प्रकार का टकराव हो रहा है.

नेपाल का माओवादी आन्दोलन और उससे संबद्ध संगठन इस समय भविष्य की कार्ययोजना के सवाल पर जबरदस्त संघर्ष की स्थिति में है और इसका सबसे स्पष्ट रूप माओवादी के अखिल नेपाल ट्रेड यूनियन संघ (ए.एन.टी.यू.एफ.)में दिखाई दे रहा है. यह संघ दो हिस्सों में बंट गया है और प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच हिंसक टकराव हुए हैं. हाल में संघ के अध्यक्ष जम्मरकटेल (जो प्रचंड के करीबी कहे जाते है) के पक्ष पर संघ के ही किरण पक्ष के कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि उन्होंने उनके निचले कार्यकर्ताओं पर अपने गुंडों से हमले करवाए है.

किरण पक्ष ताकतवर है. तराई में मधेसी संगठनों के साथ मिल कर इसने हड़ताल करवाई जिसका असर नेपाल की सभी फेक्ट्रियों में हुआ- ये हड़ताल संस्थापन पक्ष की उस नीति की सीधे तौर पर अवेहलना थी जिस में उसने हड़ताल न करने का फेक्ट्री मालिकों के साथ समझौता किया था और किरण पक्ष का मानना है कि यह समझौता मालिकों को मजदूर वर्ग के ऊपर बहुत अधिक अधिकार देता है जबकि मजदूर के हितों को नुक्सान पहुंचाता है.

दस साल के संघर्ष और एक परिवार की हुकूमत को उखाड फैकने वाले नेपाल का श्रमिक वर्ग बेहद क्रांतिकारी है और उसे अपनी क्षमता का पूरा ज्ञान है. नेपाल में हड़ताल और बंद आम है और श्रमिक संगठन विभिन्न पार्टियों से संबद्ध है. ए.एन.टी.यू.एफ. सबसे बड़ा श्रमिक संगठन है और पिछले समय में यह सबसे अधिक क्रांतिकारी भी रहा है…लेकिन, अब इस संगठन के बहुत से लोग इसे इस तरह नहीं देखते.

ए.एन.टी.यू.एफ. के केन्द्रीय नेतृत्व ने अभी हाल में दक्षिणपंथी कांग्रेस और एमाले पार्टियों के साथ मिल कर कर एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है जिसके तहत वे आने वाले वर्षों में कारखानों और मालिकों के खिलाफ कोई काम नहीं करेंगे. इस समझौते को लागू कराना मुश्किल है लेकिन समझौते का सबसे विवादित पक्ष यह है कि इस संगठन के नेतृत्व ने अपने ही सदस्यों के लिए ‘काम नहीं तो पारिश्रमिक नहीं’ की नीति को मान लिया है. यह उस पुरानी मान्यता के खिलाफ है जब फेक्ट्रियों के मजदूर संगठन उस समय के लिए भी पारिश्रमिक की मांग करते थे जिस समय वे सडकों पर आंदोलन कर रहे होते थे या जब वे किसी पार्टी द्वारा घोषित बंद के दिन फेक्ट्री में नहीं आ पाते थे. पिछले समय में ‘काम नहीं तो पारिश्रमिक नहीं’ की नीति का जबरदस्त विरोध होता था लेकिन माओवादी संघ के केन्द्रीय नेतृत्व ने इस समय पारिश्रमिक बढ़ाएं जाने के एवज में इस नीति को मान लिया है.

‘दी हिमालयन टाईम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार नेपाल की एकीकृत कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) के उपाध्यक्ष बाबुराम भट्टराई ने उस मीटिंग की अध्यक्षता की थी जिसमे यह समझौता हुआ था. नेपाल से ही प्रकाशित होने वाले ‘दी रिपब्लिकन’ के अनुसार इस समझौते के तहत ‘हायर एंड फायर’ की नीति को भी मान लिया गया है.

ऐसा नहीं लगता की यह समझौता तुरंत लागू हो जाएगा. इस समझौते के खिलाफ 8 संगठनों का संयुक्त गठबंधन बना है जिसमे किरण पक्ष वाला संघ का धड़ा (जो अब खुद को ए.एन.टी.यू.एफ. कहता है) और मधेशी ट्रेड यूनियन शामिल है. इस गठबंधन ने समझौते की निंदा की है और इसके खिलाफ आंदोलन करने का ऐलान किया है. ‘दी हिमालयन टाईम्स’ के अनुसार गठबंधन का कहना है कि, ‘समिति का निर्णय मजदूरों के खिलाफ है और इसलिए ट्रेड यूनियन इसे नहीं मानेगी. ‘काम नहीं तो पारिश्रमिक नहीं’, ‘हायर एंड फायर’ जैसे नीति को लागू करना यह बताता है कि बाबुराम भट्टराई की सरकार मजदूरों के खिलाफ है.

हिमालयन टाईम्स के अनुसार मालिकों के संगठन ने सरकार से अपील की है कि वह विरोधी संगठनों के खिलाफ कार्रवाही करे और समझौते को अविलम्ब लागू करवाए. उनकी इस अपील के खिलाफ जबरदस्त प्रतिरोध हुआ है और मजदूरों के 8 संगठनों के गठबंधन ने दशहरा के बाद हड़ताल करने का निर्णय लिया है.

भट्टराई सरकार के खिलाफ वाम संगठनों के विरोध का यह पहला मामला नहीं है. इस पहले भी उनकी सरकार की उस नीति का वाम संगठनों ने विरोध किया था जिसमे सरकार ने यह फैसला लिया था कि वह जनयुद्ध के समय गरीब किसानों द्वारा सामंतो और जमींदारों से छिनी जमीन को लौटा देंगी.

अब जबकि मजदूर संगठन भी सरकार के विरोध में उतर आये है तो लगता है कि आने वाले दिन बाबुराम भट्टराई की सरकार के लिए कठिन साबित होंगे.

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