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भूटान में भारतीय मुद्रा की कमी

Posted by chimeki on October 13, 2011


भूटान की अर्थव्यवस्था में भारतीय मुद्रा की कमी कोई नई बात नहीं है. 1990 से ही भूटान अपनी घरेलु आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारतीय मुद्रा को ब्याज पर उधार लेता रहा है. यह उधार भारत से, जो भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, मुख्य रूप से उपभोग सामग्री जैसे कपड़ा, अनाज, वाहन आदि आयात करने के काम में लाया जाता है.

भूटान में आयातीत 70% सामान भारत से आता है और इस कारण भारतीय मुद्रा की मांग हमेशा बनी रहती है. आर्थिक विकास के साथ इस मांग में और भी अधिक बढोतरी आई है. विधुतशक्ति (बिजली) के निर्यात से यह कर्ज चुकाया जाता है.

पिछले कुछ सालों से आयात नियंत्रण से बाहर हो गया है. एक बैंकर के अनुसार मुद्रा आपुर्ति की स्थिति बेहद खराब है और हालात बर्बादी की ओर जाते दिखाई दे रहे है. आज कर्ज पर सालाना चुकाया जाने वाला ब्याज उतना है जितना कि 1990 में कर्ज लिया जाता था. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि निवेश के लिए उधार न लेकर उपभोग के लिए उधार लेना चिंता का विषय है. दो बड़े देशों, चीन और भारत, के बीच स्थित विविधता की कमी वाले इस देश की अर्थव्यवस्था पर आने वाले सालों में इसका नकारात्मक असर पड़ेगा.

यह स्थिति क्यों बन रही है इसके कारणों से सभी वाकिफ है. भूटानी अर्थव्यवस्था अपनी आय से अधिक भारतीय मुद्रा व्यय कर रही है जिसका मतलब है कि इस समस्या को हल करने के लिए उसे और भी अधिक भारतीय मुद्रा जुटानी होगी.

2020 तक 10000 मेगा वॉट बिजली उत्पादन की योजना इस दिशा में सबसे बड़ा कदम है. चूँकि भारत अतिरिक्त बिजिली का खरीददार है इसलिए जरूरी भारतीय मुद्रा हांसिल हो सकेगी. एक पूर्वानुमान के अनुसार इससे भूटान को प्रतिवर्ष 40 बिलियन न्गल्त्रुम (भूटानी मुद्रा)की आय होगी. लेकिन इस आय का बहुत बड़ा हिस्सा उस कर्ज को चुकाने में लग जाएगा जो इस परियोजना के निर्माण के लिए लिया जाना है, जैसाकि ताला परियोजना के साथ हो रहा है. ताला परियोजना के जरिये हासिल होने वाली आय का आधे से अधिक कर्ज की सालाना किस्त अदा करने में खर्च हो जाता है.

इस का अर्थ यह हुआ कि बहुत बहुत सालों बाद ही विधुत परियोजना की पूरी आय भूटान को प्राप्त हो सकेगी.

तो ऐसे में क्या किया जाए? अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि घरेलु खाद्यान्न उत्पादन में सुधार किया जाना चाहिए ताकि आयात असंतुलन ठीक किया जा सके. लेकिन वे इस बात की भी चिंता दिखाते है कि विकास के लिए तेजी से कृषि योग्य जमीन को नष्ट किया जा रहा है.

तेजी से हो रही भारतीय मुद्रा की कमी का एक कारण बैंकों द्वारा अत्यधिक कर्ज देना भी है. लेकिन बैंकरों का मानना है कि विकसित होती अथव्यवस्था को इस प्रक्रिया की जरूरत है.

इस समस्या से निजाद का दूसरा तरीका है गैरजरूरी उपभोग को रोकना. कम कार खरीदें और अधिक पैदल चलें.

जबकि इस समस्य के समाधान के विकल्प तलाशे जा रहे है ऐसे में इसका तात्कालिक समाधान यही है कि और अधिक कर्ज लिया जाए.

कुएंसेलऑनलाइन से साभार

अनुवाद: विष्णु शर्मा

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