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Archive for March, 2012

बढ़ती असहिष्णुता

Posted by chimeki on March 22, 2012

राष्ट्रीय और धार्मिक प्रतिबंधों के पीछे क्या है?
1980 के मध्य में, जब उस तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी अपने उस ‘‘हिन्दू समर्थन’’ को, जो उन्हे 1984 के बाद सिक्खों की हत्या के एवज में मिले थे, मजबूत करने की मंशा के चलते संघ परिवार के बढ़ते प्रतिरोध को तुष्ट करने में लगे थे उन्हांेने इसे संतुलित करने के लिए मुस्लिम कट्टरपंथियों को भी कुछ रियायतें दी। सबसे पहले उन्होंने शाह बानो मामले में मुस्लिम तलाकशूदा को मिलने वाले निर्वाह संबंधी सर्वोच्च अदालत के फैसले को प्रभावहीन किया, फिर सलमान रुश्दी के उपन्यास द सेटनिक वर्सेज के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। दो दशक बाद राजीव गांधी के पुत्र और प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता उसी विवाद को बना कर तैयार किया जा रहा। और इस काम में उन्हीं तरीकों का सहरा लिया जा रहा है।

इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि उत्तर प्रदेश का मदानी परिवार जिसके नियंत्रण में दारुल उलूम देओबंद है, और जिसने पहली बार जयपुर साहित्य महोत्सव (जेएलएफ) में रुश्दी की उपस्थिति को मुद्दा बनाया था पारंपरिक तौर पर कांग्रेस पार्टी के करीब रहा है और यह भी कि कांग्रेस शासित राजस्थान के एक अति वरिष्ठ अधिकारी ने ही रुश्दी पर गुंडे/आतंकी हमले की झूठी कहानी गढ़ी थी ताकि रुश्दी कार्यक्रम से किनारा कर लें। राज्य की वे संस्थाएं जो निर्पेक्ष कहलाती है का इस सीमा तक राजनीतिक भ्रष्टिकरण और उनके साथ उसकी मिलीभगत जिनके राजनीतिक उद्देश्य़ है हैरान करने वाली है। रुश्दी का मामला सुरक्षा का मामला न हो कर एक राजनीतिक संदेश है जो चुनाव होने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की जनता को कांग्रेस देना चाहती है यह तब स्पष्ट हो गया जब रुश्दी को इस बात की भी अनुमति नहीं दी गई कि वे वीडिओ काफ्रेंसिंग के जरिए लोगों को संबोधित करें।

यह घटना याद दिलाती है कि कैसे कांग्रेस ने हमेषा धार्मिक रूढि़वाद के सबसे खतरनाक रूप को चुनाव जीतने का औजार बनाया है। इस घटना ने जेएलएफ के आयोजकों पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है जिन्होने लगातार लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सौदा तकतवर और हिंसक प्रयोजको से किया।

सलमान रुश्दी के कार्यक्रम का न होना आजादी से विचार रखने और उन्हे व्यक्त करने के अधिकार के हनन के अनेक मामलों में एक है जो आजकल भारत में लगातार सामने आ रहे हैं। स्वतंत्र विचार के प्रति असहिष्णुता न केवल कट्टर समुदाय के स्वयंभू नेताओं में बल्कि राज्य और उसके निकायों में भी बढ़ रही है। चाहे तमाम वे घटनाएं हों जहां राज्य ने उन लोगों पर राजद्रोह का मुकदमा लगाया हो जिन्होने उस की नीति की आलाचना की हो या किसी विशेष पाठ्य पुस्तक को जो ‘‘भावनाओं को आहत’’ करती है, पाठयक्रम से हटा लेने की मांग हो, या फिर फिल्मों और किताबों को प्रतिबंधित करने या जलाने की घटनाएं हो, यह बढ़ ही रही है। सैयद अली शाह गिलानी से लेकर अरुणधति राय, संजय काक से लेकर एके रामानुजन, एमएफ हुसेन से तसलीमा नसरीन, जेम्स लेन से जोजफ लेलवील्ड यह सुची बहुत लंबी है और लगातार लंबी हो रही है।

अब न केवल धार्मिक समुदाय, जो अपने शक्ति के प्रतिकों पर होने वाले किसी भी हमले के प्रति अति संवेदनषील है बल्कि दूसरे समुदाय, जो खुद को समुदाय के रूप में देखते हैं -जैसे जाति और राष्ट्रीयता- भी बहुत तेजी से विचार, शब्दों और प्रतिनिधित्व के कारण ‘‘आहत’’ होने लगे हैं। समुदायों का इस तरह से आहत महसूस करने के पीछे दो कारण हो सकते है। यह तो इस तरह की आहत करने वालीं गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है अथवा ऐसी गतिविधियों को चुनौति न देने के चलते इन समुदायों को राजनीतिक नुक्सान उठाना पड़ा है। हमें संभवतः इसे उस प्रक्रिया की निरंतरता के रूप में समझना चाहिए- समुदाय को सीमा के अंदर रखना- जिसके चलते आॅनर किलिंग (प्रतिष्ठा के लिए हत्या) और जातिगत हिंसा होती है। समुदाय की सीमा की रक्षा करने का एक अर्थ यह भी है कि समुदाय के सदस्यों को समुदाय के शक्ति संबंधों और उसके उत्पीडक ढांचे को स्वीकार करने का अनुषासन सिखाया जाए।

इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि जब समुदाय के प्रतिनिधि समुदाय की मान्यताओं का उल्लंघन करने वालों को धमकाते है या उनके खिलाफ हिंसा का प्रयोग करते है तो उनका मकसद इन उल्लंघन कर्ताओं पर उपरी तौर पर हमला करना ही होता है। उनका असल मकसद तो अपने समुदाय के अपेक्षाकृत कमजोर, बेनाम सदस्यों को यह संदेश देना होता है कि वे प्रचलित शक्ति ढांचे पर सवाल खड़े न करें। रूढि़वादी ताकतों का निषाना सलमान रुष्दी या एमएफ हुसेन या तसलीमा नसरीन नहीं होते, उनका असल निषाना ’’सामान्य जन’’ है जो अपने जीवन में असंख्य बगावतों को रोजाना अंजाम देते हैं। यही कारण है कि ऐसे समय में जब मुल्लाह और महंत राजनीति में तेजी से हाशिए पर पहुंचते जा रहे है उतनी ही तेजी से उनका अधर्मियों के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा है।

यदि यह बात धार्मिक एवं अन्य समुदायों के लिए सही है तो यह उतनी ही सही भारतीय राष्ट्र के लिए भी है। सैयद अलि गिलानी या अरुणधति राय पर राजद्रोह के मुकदमों की धमकी उन सभी लोगों को डराने की कोशिश का हिस्सा है जो भारतीय राष्ट्र और उसके महंत और मुल्लाओं की अपने जीवन संघर्ष में प्रतिदिन अवज्ञा करते है। राजद्रोह की बात ही क्या, जिस तरह के कदम भारतीय राज्य ने देश पर विदेशी टीवी कार्यक्रम में मामूली चुटकुलों के खिलाफ उठाए है उससे साफ पता चलता है कि हमारा देष और राष्ट्र कितना दुर्बल और उसका आत्मविश्वस कितना कमजोर हुआ है। जैसा कि ताहमीमा अनम ने जेएलएफ में कहा था, ‘‘प्रतिबंध लगाना राज्य की दुर्बल अवस्था को उजागर करता है।’’ हम इस परिभाषा में धर्म को भी जोड़ सकते है।

संचार और सूचना के माध्यम में हुए जबर्दस्त विकास से यह साबित हो गया है कि राज्य और समुदाय अब शब्दों और उनके अर्थो पर उस तरह का नियंत्रण नहीं रख सकते जैस वे पहले कर पाते थे। आज लोग ऐसे विचार और दृष्टिकोण को सहजता से जान सकते है जिनकी जानकारी उन्हे पहले नहीं होती थी, लोगों के विचारों -भौगोलिक और विचारधारात्मक- के आदान-प्रदान की कोई तय सीमा नहीं रह गई है। ईश-निंदा का आरोप लगना इन धर्म, जाति और राष्ट्र जैसे कल्पित समुदायों के लिए अपनी रक्षा का अंतिम विकल्प है। लेकिन तब भी उन लोगों को जो इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में खुद को फंसा हुआ पाते हैं इस बात से अधिक तसल्ली नहीं मिलेगी। यह राज्य का कर्तव्य है कि वह व्यक्ति के अधिकारों की गारंटी करे। जाहिर है कि मौलिक अधिकारों की घोषण का उद्देश्य़ यही था कि राज्य और समुदाय की ज्यादतियों से व्यक्ति को बचाया जाए और यह भी कि ‘‘स्वतंत्रता हमेशा उन लोगों के लिए होती है जो अलग तरीके से सोचते विचारते है।’’ यदि हम उन लोगों के अभिव्यक्ति के अधिकारों की रक्षा नहीं करगें जिन्हे हम नहीं सुनना चाहते तो ऐसे में हम अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का ही गला घोंट रहे होंगे।

इकोनामिक एंड पोलिटिकल वीकली के 11 फरवरी, 2012 अंक का संपादकीय।

अनु: विष्णु शर्मा

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सोनी सोरी की न्यायिक सुरक्षा के लिए अपील

Posted by chimeki on March 21, 2012

(भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों के नाम एक खुला पत्र।)

सोनी सोरी

नागरिक होने के नाते हम आप लोगों, सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों, को इस आशा के साथ देखते है कि आप उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करेंगे जो अपने वर्ग, जाति, लिंग और राष्ट्रीयता के कारण शक्तिहीन बने हाशिए पर खड़े हैं।

मुख्य रूप से यह बात आदिवासी महिला सोनी सोरी के केस के संदर्भ में है जिसे छत्तीसगढ़ पुलिस की हिरासत में क्रूर यौन यातना झेलनी पड़ी। हमें बताने हुए बहुत दुख है कि सोनी सोरी की स्थिति लगातार नाजुक बनी हुर्इ है। यह सब इस के बावजूद कि उसने विभिन्न कोर्ट में अपनी सुरक्षा के लिए अर्जी लगार्इ हुर्इ है। हम आप से गुहार लगाते हैं कि विचाराधीन आदिवासी महिला के अधिकारों के हनन के बारे में गंभीरता से ध्यान दिया जाए। इस केस से जुड़े तथ्य और दस्तावेज सर्वोच्च न्यायालय के पास विचाराधीन है (रिट याचिका (सीआरएल) क्रमांक 2062011)।

संक्षेप में, सोनी सोरी एक 35 वर्षीय आदिवासी है जो उस वक्त तक, सितंबर 2011, जब तक कि उसे छत्तीसगढ़ पुलिस ने दंतेवाड़ा से भाग जाने के लिए मजबूर नहीं कर दिया एक सरकार द्वारा चलाए जा रहें आदिवासी विधार्थियों के स्कूल में षिक्षिका और वार्डन के पद पर काम कर रही थी। उस पर माओवादियों का सर्मथक होने के इलजाम के तहत कर्इ मुकदमें चलाए जा रहे हैं।

सोनी सोरी को 4 अक्टूबर 2011 के दिन दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। तब तक उसने छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा उसे फंसाए जाने के संबंध में बहुत से प्रमाण तहलका पत्रिका के सामने प्रस्तुत कर दिए थे। जिसमें एक केस इस्सार रिष्वत मामले से जुड़ा है (http://tehelka.com/story_main50.asp?filename=Ne151011coverstory)।

इस बात के भय से कि हिरासत में छत्तीसगढ़ पुलिस उससे इस खुलासे का बदला लेगी सोनी सोरी ने अपर प्रमुख महानगरीय मजिस्ट्रेट, सकेत जिला अदालत-दिल्ली, तथा दिल्ली उच्च न्यायालय से अपील की थी कि उसे दिल्ली में ही हिरास्त में रखा जाए और उस के मुकदमे की सुनवार्इ छत्तीसगढ़ से बाहर हो। लेकिन 7 अक्टूबर 2011 के दिन सोनी सोरी को छत्तीसगढ़ पुलिस को सौप दिया गया। इस निर्देष के साथ कि छत्तीसगढ़ पुलिस ”उपयुक्त प्रक्रिया का पालन करे।

यह सोनी सोरी का अपनी सुरक्षा के लिए पहला प्रयास था। यह अपील वह आज भी कर रही है जो अब आप की अदालत में है।

दिल्ली हाई कोर्ट  ने भी 8 अक्टूबर 2011 को दिए अपने आदेश में छत्तीसगढ़ पुलिस को 14 अक्टूबर 2011 तक सोनी सोरी की सुरक्षा के संबंध में उठाए कदमों के बारे में रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा था।

यह सोनी सोरी का न्यायायिक प्रक्रिया के तहत पुलिस से खुद के बचाव का दूसरा प्रयास था।

10 अक्टूबर 2011 को सोनी सोरी को दंतेवाड़ा के मजिस्ट्रेट की कोर्ट में प्रस्तुत किया गया। लेकिन सोनी सोरी, जो उस वक्त तक एकदम ठीक हालत में थी जब दिल्ली में उसे छत्तीसगढ़ पुलिस को सौपा गया था, की हालत इतनी खराब थी कि वह अपने पैरों में ठीक तरह से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। यहां तक कि वह पुलिस की गाड़ी से उतर कर कोर्ट तक नहीं पहुंच सकती थी। पुलिस ने दावा किया किया कि ”वह गुसलखाने में फिसल कर गिर गर्इ है और उस के सर पर चोट आर्इ है।

उस दिन सोनी सोरी मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत नहीं हो सकी। और न मजिस्ट्रेट ने उसे देखा। केवल कोर्ट का क्लर्क पुलिस के वाहन तक आया था लेकित तब भी गलत तरीके से कोर्ट शीट में यह दर्ज कर दिया गया कि उसे मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया गया था जिन्होने उसे 14 दिन की न्यायायिक हिरासत में भेजा है।

दंतेवाड़ा के जिला अस्पताल के निरिक्षक डाक्टर और जगदलपुर के सरकारी मेडिकल कालेज ने दर्ज किया है, ‘सोनी सोरी के अचेतन होने का इतिहास है और ‘वह कमर में दर्द के कारण अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती और उसके सर और कमर में चोट के निषान है तथा उसके पैरों के अंगूठे में काले निशान हैं जो इस बात का संकेत है कि उसे बिजली के करेंट दिए गए थे।

अपने परिचितों तथा वकील को दिए गए अपने बयानों में और सर्वोच्च न्यायालय को संबोधित पत्र में, सोनी सोरी ने हिरासत के दौर उसे दी गर्इ यातना के बारे में बताया है। उसने कहा है कि 8 और 9 अक्टूबर की रात को उसे दंतेवाड़ा पुलिस स्टेषन के सेल से जबरन बाहर निकाला गया और एसपी अंकित गर्ग के कक्ष में ले जाया गया। वहां उसे नंगा कर करेंट दिया गया और ”उसके गुप्तांगों में बैटन और पत्थर डाले गए।  जब वह दूसरे दिन जागी तो उसके शरीर में बहुत दर्द था, सबसे अधिक दर्द उसकी गर्दन, पीठ में था और उसके पेट के निचले हिस्से में तीव्र दर्द था। उसने अपने वकील को बताया (एफिडेविट की कापी सर्वोच्च न्यायालय के पास जमा है) कि उसकी यौनी में बहुत से पत्थर डाले गए थे जिसमें से कुछ को उसने किसी तरह निकाल लिया लेकिन सब को नहीं निकाल पार्इ।

सर्वोच्च अदालत ने माना कि सोनी सोरी पर लगे जख्म उतने साधारण नहीं है जितना राज्य सरकार बता रही है और अदालत ने कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कालेज अस्पताल में इस संबंध में स्वतंत्र जांच के आदेष दिए।

25 नवंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत मेडिकल रिर्पोट में बताया गया है कि सोनी सोरी की यौनी में गहरे में दो पत्थर पाए गए है और एक पत्थर उसके मलाषय में मिला है। एमआरआर्इ स्केन से यह भी पता चला है कि उसकी रीढ़ में गोल मांस फटने के निषान मौजूद है। यह सब हिरासत के दौरन उसे दी गर्इ यौन उत्पीड़न और हिंसा को प्रमाणित करता है।

इसके बावजूद 1 दिसंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेष दिया कि सोनी सोरी को अगले 55 दिनों के लिए, जब तक की अगली सुनवार्इ नहीं होती छत्तीसगढ़ राज्य की पुलिस हिरासत में रखा जाए। माओवादी मुददों की छाया वाले मामलों में हिंसा की संभावना की आषंका के चलते और मेडिकल परिक्षण की रिपोर्ट की रोशनी में हमें खेद है कि जिम्मेदार पुलिस अफसरों के खिलाफ किसी भी किस्म की तत्काल कार्यवाही नहीं की गर्इ और सोनी सोरी की सुरक्षा को अगली सुनवार्इ तक टाल दिया गया।

आखिरकार कोर्ट ही यौन उत्पीड़न से पीडि़त को उसके उत्पीड़क से बचा सकती है। तब तो यह और भी जरूरी हो जाता है जब गंभीर किस्म के आरोप वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर लगें हो। यह कोर्ट ही कर सकती थी कि वह इस बात को सुनिषिचत करें कि सोनी सोरी की हालत और अधिक कष्टकार्य न बन जाए जबकि उसने अपने ऊपर हुर्इ यातना के खिलाफ बातें रखी है। यह उसने उस हालत में किया जब कि उसे और उसके परिवार वालों को धमकियां दी जा रही है।

केवल न्यायालय ही स्पष्ट संकेत दे सकता है कि नागरिकों के अधिकारों की जाएगी, और जब पुलिस अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करेगी तो न्यायपालिका खमोश नहीं रहेगी। यह अदालत ही कर सकती है कि वह छत्तीसगढ़ पुलिस को कानून के अनुसार चलने के लिए बाध्य करे और यदि इसके बावजूद वह नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करती है तो उसे भी कानून के तहत जिम्मेदार ठहराया जाए और सजा दी जाएगी।

हमें आशा है कि सर्वोच्च न्यायालय इस बात को सुनिश्चित करेगी की इस विचाराधीन आदिवासी महिला को न्याय मिले और कोर्ट इस बात की मिसाल कायम करेगी कि नाजुक स्थितियों में खड़े लोगों की संविधान प्रदत्त कानूनी और मानव अधिकारों की रक्षा हो।

-उमा चक्रावर्ती, बि्रंदा करात, रोमिला थापर, मधु भादुड़ी, इमराना कादिर, फरहा नक्वी, वसंथ कन्नाबिरन, ललिता रामदास, गीता हरिहरन, सी सत्यमाला, मीरा शिवा, वीना शत्रुग्ना, जयती घोष, रोहनी हेन्समैन, संध्या श्रीनिवासन, वीना पूनाचा तथा 172 अन्य व्यक्ति और 109 संगठन 

 अनु. विष्णु शर्मा

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नेपाल के नए युवराज प्रकाश दहाल

Posted by chimeki on March 18, 2012

प्रकाश दहाल

वर्ष 2011 में वरिष्ठ भारतीय पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने नेपाल के माओवादी नेता प्रचण्ड के साक्षात्कारों की एक किताब का संपादन किया था ‘एवरेस्ट पर लाल झंडा।’ हम सबकी तरह शायद आनंद स्वरूप वर्मा भी प्रचण्ड से उम्मीद कर रहे थे कि वह दुनिया की छत ‘एवरेस्ट’ पर फिर से वह लाल झंडा फहराएंगे, जो बहुत पहले क्रिमलिन वाल से गिरा दिया गया था और कुछ दिन पहले चीन की दीवार से। लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ। अब सुनने में आ रहा है कि पुष्प कमल दहाल ‘प्रचण्ड’ पुत्र प्रकाश यह कारनामा करने जा रहे हैं। नेपाल में इस बात की खासी चर्चा है।

गौरतलब है कि जब बहुत कोशिशों के बाद भी नेपाल में संविधान नहीं बन पाया और शांति की संभावना क्षीण होने लगी तो प्रचण्ड के पुत्र प्रकाश ने एक दिन तैश में आकर अपने पिता से कहा, ‘हे कामरेड पिता! यदि आप आदेश दें तो मैं एवरेस्ट का आरोहण कर वह लाल झंडा फहरा आऊं, जिसे फहराने के लिए आपने दस वर्षीय महान जनयुद्ध का नेतृत्व किया था।’ पुत्र की बात सुन कामरेड पिता की आखों में अश्रु बहने लगे। उन्होंने शहीद के फोटो वाले रैक पर रखे लाल टीके से कामरेड पुत्र का तिलक किया और उन्हें नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय भेज दिया।

पूर्व प्रधानमंत्री ने ‘कामरेड’ युवराज को अपनी कुर्सी पर बिठाया और शांत मन से उनकी योजना सुनी। कामरेड युवराज ने उन्हें बताया कि वे और उनके साथी एवरेस्ट का आरोहण कर मार्क्सवाद की प्रासंगिकता को सिद्ध करना चाहते हैं और इस काम में वह सरकार का उदार सहयोग चाहते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वे उद्योगपतियों से सहयोग मांग सकते थे, लेकिन अभी हाल ही में उनकी सहायता से उनके कामरेड पिता ने बड़ी हवेली बनाई है और वे कमजोर राष्ट्रीय बुर्जुआ शक्ति, जिसे पार्टी के दस्तावेजो में मित्र शक्ति माना गया है, पर अधिक बोझ नहीं डालना चाहते। कामरेड प्रधानमंत्री को युवराज की बात जम गई।

नेपाल में कामरेड प्रधानमंत्री की साख एक ऐसे व्यक्ति की है जो सोच सकता है और समय-समय पर मार्क्सवाद के साथ प्रयोग कर उसे वर्तमान विश्व व्यवस्था के अनुरूप ढाल सकता है। अभी हाल में उनके बयान ‘हम मार्क्सवादी बहुत रूढ़ीवादी होते हैं’, ने उनके विशाल हृदय की विचारशीलता को प्रमाणित भी किया था। कामरेड प्रधानमंत्री को यह बात समझते देर न लगी कि प्रचंड पुत्र मार्क्सवाद पर एक नया प्रयोग करने का मन बना रहे हैं और ऐसे हर काम पर उदार सहयोग करना राष्ट्र धर्म है। उन्होंने तुरंत कामरेड युवराज को अर्थ मंत्रालय भेज दिया।

कामरेड अर्थमंत्री, जो इस स्थिति में कभी नहीं रहते कि वे कामरेड युवराज से कोई सवाल कर सकें, ने तुरंत ही दो करोड़ की रकम इस लक्ष्य के लिए सेंक्शन कर दी और कामरेड युवराज आरोहण की तैयारी में लग गए।

एक समाचार एजेंसी को कामरेड युवराज ने बताया ‘मैं बचपन से ही माउंट एवरेस्ट को फतह करने का सपना देखता आया हूं। हमें आशा है कि हम कम्युनिस्ट झंडा और जनमुक्ति सेना का झंडा चोटी पर फहराएंगे।’ उन्होंने कहा कि वे और उनके साथी बहुत समय से आरोहण का अभ्यास कर रहे हैं। प्रकाश ने 13 वर्ष पूर्व पार्टी की सदस्यता ली थी, लेकिन वे बताते हैं ‘चूंकि मेरे पिता एक भूमिगत पार्टी के अध्यक्ष थे इसलिए राजनीति मेरे खून में है’। प्रकाश आगे बताते हैं कि अपने पिता की ही तरह जनयुद्ध के क्रम में उन्होंने बहुत कुछ बलिदान किया है। वे कक्षा आठ में थे जब उन्हें अपने अध्ययन को विराम देना पड़ा, क्योंकि पुलिस दहाल उपनाम के छात्रों को खोज-खोज कर पूछताछ कर रही थी।

समाचार का दूसरा पहलू इस प्रकार है। नेपाल के लोग इस आरोहण को उस तरह नहीं देख पा रहे हैं जैसा कि कामरेड पिता, कामरेड पुत्र, कामरेड प्रधानमंत्री और कामरेड वित्तमंत्री उन्हें दिखाना चाहते हैं। वे पूछ रहे हैं कि क्या अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री कामरेड डॉ. बाबुराम भट्टराई को नहीं पता कि नेपाल की आर्थिक हालत क्या है? क्या उन्होंने अपने ही अर्थमंत्री द्वारा पेश किए वर्ष 2011-12 के घाटे वाले बजट को नहीं पढ़ा ? इससे आगे लोग इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि कामरेड पुत्र के एवरेस्ट विजय करने से नेपाल में शांति आ जाएगी।

एमाले पार्टी के छात्र संगठन, जिसे माओवादी पार्टी प्रतिक्रियावादी संगठन मानती है, ने एक प्रेस वार्ता में कहा है कि यदि सरकार 24 घंटे के अंदर अपने इस बेतुके फैसले को वापस नहीं लेती तो उनका संगठन आंदोलन करेगा। छात्र संगठन के महासचिव किशोर विक्रम मल्ल ने आरोप लगाया कि माओवादी पार्टी के शीर्ष नेता देशहित के लिए नहीं, बल्कि पार्टी के युवराज पर राष्ट्रीय धन खर्च कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रकाश को दूसरा पारस बनाने की ‘माओवादी’ योजना का हिस्सा है।

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चीन में सत्ता संघर्ष

Posted by chimeki on March 17, 2012

वेन जियाबाओ

चीन के लिए सबसे बड़ा खतरा अमेरिकी साम्राज्यवाद नहीं है जैसा कि वहां के नेता अपने लोगों को बताते रहते हैं, बल्कि चीनी माओवाद है। यह बात शायद चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ को समझ आ गई है। इसीलिए 14 मार्च की अपनी प्रेस वार्ता में उन्होंने चीनी जनता को माओ के शासन के दौरान हुई गलतियों से सबक लेने की सलाह देते हुए कहा, ‘गैंग आफ फोर को सत्ता से हटाने के बाद पार्टी ने बहुत से ऐतिहासिक मामलों में प्रस्ताव पारित किए थे और यह तय किया था कि चीन की व्यवस्था में सुधार लाए जाएं। अब तक चीन से सांस्कृतिक क्रांति और सामंतवाद की गलतियों को खत्म नहीं किया जा सका है।’

इसके बाद बिना देर किए चुंगकिंग शहर के उपमहापौर वांग लीजुन को गिरफ्तार कर लिया गया। तुरंत ही शहर के पार्टी प्रमुख और चीन की शक्तिशाली कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य बो शिलाई को शहर के सचिव के पद हटा दिया गया। अनुमान है कि वे पार्टी से भी जल्द ही बर्खास्त कर दिए जाएंगे और जैसाकि चीनी चलन है उन पर कई प्रकार के मुकदमे चलेंगे। यह भी हो सकता है कि उन्हें ताउम्र नजरबंद रहना पड़े।

गौरतलब है कि इस वर्ष नवंबर माह में चीन में नेतृत्व परिवर्तन होने जा रहा है। यदि घटनाक्रम से कुछ सबक मिल रहा है तो वह यह कि हर बार की तरह इस बार का भी सत्ता परिवर्तन सहज नहीं होगा। चीन के इतिहास को जानने वाले समझते हैं कि सत्ता का नेतृत्व वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ आने के बाद से आज तक देश में परिवर्तन कभी भी सीधा-सपाट नहीं रहा। माओ के निधन के बाद देंग शओपिंग समर्थकों और गैंग आफ फोर के बीच हुए सत्ता संघर्ष का अंत रक्तरंजित था। गैंग आफ फोर के सभी सदस्यों को तत्कालीन नेतृत्व ने जेल में डाल दिया था। इसके बाद देंग द्वारा ‘घोषित’ उत्तराधिकारी जाओ जियांग के वर्ष 1989 में अपदस्थ होने के बाद जियांग जेमिन ने चीन की बागडोर संभाली थी। जाओ जियांग 15 वर्षों तक नजरबंद रहे।

माना जाता है कि वर्तमान राष्ट्रपति हू जिंटाओ की ताजपोशी ही संघर्षपूर्ण इतिहास में एकमात्र अपवाद था। इसके बाद यह दावा किया जाने लगा था कि सत्ता के लिए संघर्ष इतिहास की बात हो चुकी है और आने वाले बहुत से सालों का रोडमैप चीन के नेतृत्व ने तैयार कर लिया है, लेकिन ताजा घटनाक्रम चीनी नेतृत्व के इस दावे को झुठलाता है।

बो शिलाई कौन है?

बो शिलाई

बो शिलाई चीनी कम्युनिष्ठ पार्टी की पांचवी पीड़ी के नेता है। बो शिलाई के पिता बो यीबो देंग के समय के एक प्रभावशाली नेता माने जाते है। सांस्कृतिक क्रांति के दौरान बो यीबो पर गाज गिरी तो बो शिलाई को भी शारिरिक श्रम करने के लिए गांवों में जाना पड़ा था। लेकिन जो सबसे हैरान करने वाली बात है वह यह कि बो शिलाई अन्य ‘सताए’ गए नेताओं की तरह सांस्कृतिक क्रांति को ‘गंभीर गलती’ नहीं मानते बल्कि उन्होने समय समय पर एक बार फिर सास्कृतिक क्रांति की आवश्यकता पर जोर दिया है। चुंगकिंग शहर का सचिव नियुक्त होने के बाद भ्रष्टाचार और संगठित अपराध के खिलाफ उनके अभियान ने उन्हें शहर की जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया था।

इसके अलावा बो शिलाई ने चुंगकिंग शहर के विकास में ‘माओवादी’ सिद्धांत को लागू किया और माओकाल के बहुत से कार्यक्रमों जैसे गांव चलो मुहिम और लाल गीत के गायन आदि को बढ़ावा दिया। समय-समय पर बो शिलाई शहर की जनता को एसएमएस के जरिए माओ की लाल किताब के उद्धरण भी भेजते रहे। साथ ही चीन के अन्य प्रमुख नेताओं से अलग उन्होंने अपनी छवि मुस्कुराते हुए नेता की बनाई, जो चीन के नेतृत्व में बिरला ही देखने को मिलता है। शायद आखिरी बार लोगों ने माओ को ही हंसते देखा था। बो शिलाई मीडिया से भी खुलकर चर्चा करते हैं और उनकी शक्तिशाली पोलित ब्यूरो की नौ सदस्यीय स्टैंडिग कमिटी में पहुंचने की इच्छा भी किसी से छिपी नहीं है।

चीन में इस तरह की छवि राजनीतिक भविष्य के लिए खतरनाक हो सकती है। तेजी से ‘विकास’ कर रही चीनी अर्थव्यवस्था के लिए माओ विचार को सबसे घातक संकट माना जाता है। चीन ने आर्थिक विकास की कीमत भी चुकाई है। जहां एक वर्ग तेजी से धनवान हुआ है, वहीं किसान और मजदूरों में असंतोष बढ़ा है। माओ के समय विकास कम था और असंतोष लगभग नहीं के बराबर।

भारत की तरह ही चीन का विकास किसानों की कीमत पर हो रहा है। पिछले बर्ष दिसंबर 2011 में भूमि अधिग्रहण के सवाल पर वूकन गांव के लोग चीनी सरकार के विरोध में उतर आए थे और बहुत सालों बाद पहली बार सरकार को पीछे हटना पड़ा था। विकास के चीनी माडल ने देश में असंतोष को इस हद तक बढ़ा दिया है कि माओ के शब्दों में ‘एक छोटी चिंगारी पूरे जंगल को खाक कर सकती है।’ यही वह डर है जिसने बो शिलाई को पार्टी के अंदर अप्रिय बना दिया था। ऐसा भी नहीं है कि असंतोष केवल चीन में है, लेकिन अन्य जगह चुनाव है, पार्टियां हैं। चीन में ऐसा नहीं है। वहां परिवर्तन का मतलब क्रांति ही होता है।

चुंगकिंग शहर के उपमेयर वांग लीजुन भ्रष्टाचार और संगठित अपराध के खिलाफ बो शिलाई की मुहिम के प्रमुख साझेदार को 2 फरवरी 2012 को पद से हटा दिया गया। संभावना है कि ऐसा बो शिलाई की मंजूरी के बाद ही हुआ होगा। बो शिलाई वांग लीजुन से उस समय से खफा चल रहे थे, जबसे अनुशासन कमीशन ने वांग को पद के दुरुपयोग का दोषी पाया था।

बाद में वांग ने खुद को बचाने के लिए बो शिलाई के खिलाफ सबूत होने का दावा अनुशासन कमीशन से किया था। इसी ‘सबूत’ को आधार बनाकर कल यानि पिछले माह 15 फरवरी को बो शिलाई को पदमुक्त कर दिया गया। हालाँकि अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि वे सिर्फ चुंगकिंग शहर के सचिव के पद से हटाए गए हैं या उन्हे पार्टी के पोलित ब्यूरो से भी हटा दिया जाएगा।

सबक

चीन एक अलग ही किस्म का देश है। यह न तो समाजवादी है और न ही पूरी तरह से पूंजीवादी। वर्ष 1980 से आर्थिक सुधार लागू होने के बाद से चीन ने विकास के जिस माडल को अपनाया उससे एक बड़ा मध्यम वर्ग पैदा हुआ, लेकिन राजनीतिक व्यवस्था में किसी भी प्रकार का उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं किया गया। जिसके चलते फलते-फूलते मध्यम वर्ग और सत्ता पर मजबूती से पकड़ बनाए बैठे नेताओं के वर्ग के बीच लगातार तनाव बढ़ता जा रहा है।

मध्यम वर्ग सत्ता में अपनी हिस्सेदारी मांग रहा है और नेताओं का वर्ग इसमें किसी भी प्रकार को कोई समझौता नहीं करना चाहता। इसका प्रमाण है कि पार्टी की 17वीं केंद्रीय कमिटी के सबसे शक्तिशाली 9 सदस्यीय पोलित ब्यूरो में 5 सदस्य चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व सदस्यों की संतानें हैं।

इस तरह की उलझी हुई व्यवस्था के बीच चीन जिस भी रास्ते जाए, नेताओं के इस वर्ग को नुकसान ही होगा। यही कारण है कि दोनों ही किस्म के -समाजवादी और पूंजीवादी परिवर्तन से यह वर्ग घबराता है। पूंजीवादी सुधारों की मांग करने वाले ल्यू शियाबो (वर्ष 2011 के नोबल पुरस्कार सम्मानित राजनीतिक कार्यकर्ता) चीन में कैद हैं और समाजवाद की ओर लौटने की वकालत करने वाले लोग भी। बो शिलाई दूसरी श्रेणी में आते हैं।

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‘भारत की रखैल है नेपाल’

Posted by chimeki on March 12, 2012

नेपाली प्रगतिशील साहित्य में दिलचस्पी रखने वालों के लिए निभा शाह एक जाना-पहचाना नाम है। वे कवि होने के साथ-साथ माओवादी पार्टी की कैडर भी हैं। वर्ष  2002 में निभा को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था और गिरफ्तारी के अगले दिन नेपाल पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया। वह नौ महीने तक जेल में रहने के बाद 2003 में रिहा हुयीं। निभा रचनाकर्म और क्रांतिकारी राजनीति को अलग अलग करके नहीं देखतीं। उन्हें जनवादी सृजन के लिए नेपाल के चार महत्वपूर्ण साहित्य सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें  से प्रमुख  पारिजात सृजनशील सम्मान और साझा गरिमा सम्मान प्रमुख हैं। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले के दौरान भारत आयीं निभा से नेपाल की राजनीति और साहित्य पर लंबी बातचीत हुई, पेश है मुख्य अंश- 

 नेपाली कवि निभा शाह से बातचीत

निभा शाह एक कवि हैं या राजनीतिक कार्यकर्ता?

क्या राजनीतिक कर्म और साहित्यिक सृजन अलग-अलग हो सकते हैं? मैं नेकपा माओवादी की कैडर ही हूं। शांतिकाल में पार्टी के शहर में आने के बाद याने 12 सूत्रीय समझौते के बाद के एक-दो वर्षों तक मैंने सक्रिय होकर काम किया। उसके बाद जब मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि पार्टी गलत दिशा की ओर जा रही तो मैंने खुद को लेखन की ओर अधिक सक्रिय कर लिया। अभी मैं पार्टी में बहुत सक्रिय नहीं हूं, लेकिन नेकपा (माओवादी) की सदस्य हूं और साहित्यिक यात्रा भी जारी है।

जनयुद्ध के समय के जनवादी साहित्य और आज के साहित्य में क्या अंतर देखती हैं?

जब चीजें सहज रूप से आगे बढ़ रही होती हैं तो धारा का अनुमान लगाना मुश्किल होता है, लेकिन जब कठिन दौर आता है तो जनवादी प्रतिबद्धता को बचाए रखना कठिन हो जाता है। यदि साहित्य की बात करें तो जनयुद्ध के समय बहुत जनवादी साहित्य का सृजन हुआ। ऐसा होना स्वभाविक भी था। जनता को पहली बार अपनी आवाज मिली थी और वह सृजन की आवश्यकता महसूस कर रही थी। शांतिकाल आने के बाद ‘जनवादी’ साहित्य की बाढ़ आ गई। साहित्यकार अपनी कृतियाँ छपवा रहे थे। बाजार साहित्य से भर गया, लेकिन अब जबकि नेपाली क्रांति का सबसे कठिन दौर चल रहा है जनवादी साहित्य का सृजन बहुत कम हो गया है।

क्या साहित्य के विकास के लिए जरूरी नहीं है कि साहित्य किसी पार्टी विशेष की राजनीति से दूर रहे?

इस वर्गीय समाज में कोई स्वतंत्र नहीं रह सकता। एक किस्म की वर्गीय पक्षधरता तो लेखक की होगी ही। ऐसे भी लेखक होते हैं  जो किसी पार्टी विशेष के साथ नहीं जुड़े होते, लेकिन तब भी वे किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व तो करते ही हैं। ऐसा भी नहीं है कि प्रायोजित साहित्यकार नहीं होते, लेकिन प्रायोजित साहित्यकार अधिक समय तक रचनाकर्म में नहीं लगा रह सकता। नेपाली भाषा में एक कहावत है कि दूसरों की पीठ पर सवार कुत्ता बहुत दिनों तक शिकार नहीं कर सकता। ऐसे रचनाकार का स्थायित्व नहीं रहता।

माओवादी आंदोलन के दौरान और बाद में भी नेपाल में ऐसे साहित्य का सृजन हुआ जो शांति की बात करता था ?

आज शांति के पक्ष में वही लेखक लिख सकता है जिसने सर्वहारा वर्ग को आत्मसात नहीं किया है। आज की हालत में असल साहित्यकार शांति की बात नहीं लिख सकता। कैसी शांति… मुर्दा शांति… जहां जनता का चूल्हा नहीं जलता, वहां शांति की बात कोई कैसे कर सकता है। यदि कोई खुद को जनवादी कवि मानता है और नेपाल की स्थिति में शांति की बात करता है तो उससे बड़ा भ्रम कोई नहीं है। आज की आवश्यकता क्रांति की बात लिखने की है, लेकिन आज क्रांति की बात लिखने वाले बहुत कम लोग बचे हैं। स्वयं माओवादी पार्टी से आए लेखक भी अब शांतिवादी हो चले हैं।

यह कैसे हुआ?

यह नेतृत्व का प्रतिबिंब भी है। माओवादी पार्टी के नेतृत्व का एक तबका स्वयं माओवाद से बुद्धवाद की ओर पलायन कर चुका है। आज बहुत थोड़े जनपक्षधर कवि बचे हैं- उनमें माइला लामा, खुशीराम पाख्रि, पूर्ण विराम, रोशन जनकपुरी, राजकुमार कुंवर और झंकर बुड़ा हैं। मैं मानती हूं कि एक समय तक तो कोई भी क्रांतिकारी रह सकता है, लेकिन सबसे जरूरी बात है कि कौन निरंतर क्रांतिकारी रह सकता है।  कल तक असंख्य क्रांतिकारी रचनाकर्मी थे,  आज एकदम कम हैं। आज जनता की पक्षधरता का कोई अहसास नहीं रह गया है, बल्कि एक समूह विशेष की पक्षधरता महत्वपूर्ण हो गई है। इतिहास ने बार-बार साबित किया है कि एक दौर में क्रांतिकारी होना सरल होता है, लेकिन असल बात निरंतर क्रांतिकारी बने रहने की है। एक दौर में झापाली भी क्रांतिकारी थे। कोई आठ महीने के लिए क्रांतिकारी रहा, कोई 12 साल के लिए और कोई बीस साल के लिए। जनपक्षधरता की सही कसौटी है कि कौन लेखक जीवनभर कामरेड रह सकता है।

माओवाद के प्रति आपके  झुकाव का क्या कारण रहा ?

बचपन से ही मेरा स्वभाव विद्रोही किस्म का था। मैं हमेशा से किसी भी प्रकार की मान्यता को बिना जांचे अपना लेने के पक्ष में नहीं रही। मुझे लगता है कि यह मैंने अपनी दादी से सीखा।  विद्रोह के  बोध ने मेरा झुकाव मार्क्सवाद की ओर मोड़ दिया। वर्ष1996 में मैं दिल्ली पढ़ने आ गई। इसी वर्ष नेपाल में जनयुद्ध शुरु हुआ था। दिल्ली में मेरी मित्रता कम्युनिस्ट विचार वाले साथियों से हुई। इत्तफाक से मेरे मामा भी पुराने समय में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय सदस्य रह चुके हैं। मेरी मां भी कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थीं। जब मैं छोटी थी तो वह मुझे चिनिया काजी, माओ, लेनिन, के बारे में बताती थीं। मेरी मां राणा खानदान से हैं। वह बताती हैं कि उनके पिताजी ने घर की दीवार पर स्टालिन की तस्वीर लगा रखी थी और वह कहा करते थे कि हम लोगों को इस आदमी को सम्मान देना चाहिए, न कि राणाओं को।

क्या आपको लगता है कि नेपाल में संविधान बन सकेगा?

28 मई 2012 को संविधान सभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है। एक न एक किस्म का संविधान तो बन ही जाएगा, लेकिन सबसे अहम बात है कि कैसा संविधान बनेगा। यदि 12 सूत्रीय समझौते से लेकर अब तक की राजनीतिक यात्रा देखें तो यह बात समझ आ जाती है कि नेपाल में संविधान जरूर बनेगा। यह संविधान ऊपरी तबके के लिए होगा। यह नेपाल की सर्वहारा जनता के लिए खोखला संविधान होगा। यह ऐसा होगा जो भारतीय विस्तारवाद, साम्राज्यवाद, नौकरशाही को संरक्षण करेगा। आज नेपाल को देखें तो साफ दिखता है कि यह भारत के एक उपनिवेश की हैसियत का देश है। यह भारत की रखैल जैसा है। इसी प्रकार संविधान कैसा बनेगा, यह बात इस तरह से समझी जा सकती है कि कल तक कामरेड प्रचण्ड जमीन कब्जा करने की बात करते थे, आज वे कामरेड कृष्णा सिटौला की पीठ पर चढ़कर बर्दिया पहुँचते हैं और जनता से कहते हैं कि जमीन लौटा दो। ऐसा कहने वाले नेतृत्व की सरकार कैसा संविधान बनाएगी, इस पर अधिक चर्चा करना समय की बर्बादी है।लेकिन खुद

आपकी पार्टी के कुछ केन्द्रीय सदस्य मानते हैं कि संविधान नहीं बनेगा?

जो पार्टी के सदस्य ऐसा कह रहे हैं उनसे पूछना चाहिए कि फिर संविधान सभा को क्यों बना कर रखा है।

लेकिन जब वे जनविद्रोह की बात करते हैं तो उसका मतलब तो यही है कि संविधान नहीं बनेगा?

वर्तमान नेतृत्व का एक समूह जब जनविद्रोह की बात करता है तो मुझे आश्चर्य होता है। दो-तीन वर्ष पहले जनविद्रोह करने के लिए लोगों ने आंदोलन किया था। उस वक्त यही नेतृत्व समूह राज्य सत्ता कब्जा करने की बात कर रहा था, लेकिन फिर आंदोलन को वापस ले लिया। ये लोग स्वयं दिल्ली के साउथ ब्लॉक के कब्जे में आ गए। तो ऐसा नेतृत्व जो साउथ ब्लॉक के कब्जे में है, वह कैसे जनविद्रोह कर सकता है। 15 हजार लोगों ने जनयुद्ध के समय कुर्बानी दी। यह सब ऐसे संविधान के लिए नहीं था जो जनता के अधिकार को कम करने की बात करता हो। जो जनता की जमीन छीनने की बात करता हो। कृष्ण सेन इच्छुक, चुनु गरुंग, दिल बहादुर रमतेल के बलिदान ने जनयुद्ध का निर्माण किया और आज इनकी फोटो पर फूल चढ़ाने वाले खुद इन शहीदों के सपनों को कुचल रहे हैं। इस तरह की ‘डबल पर्सनालिटी’ वाला नेतृत्व जनविद्रोह नहीं कर सकता।

किरण समूह जिस प्रकार से नेतृत्व की आलोचना कर रहा था उससे लग रहा था कि पार्टी जल्द टूट जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्या पार्टी पंक्ति का विश्वास आज भी नेतृत्व के साथ है?

नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है। इसे इस तरह समझना ठीक होगा कि युद्धकाल के समय किरण कहा करते थे ‘प्रचण्ड का मतलब मुक्तिराम दहाल का बेटा नहीं है, वह तो एक विचार है।’ किरण उस कालखण्ड में इस तरह से प्रचण्ड की प्रशंसा करते थे। आज वह खुद अपने उस विश्लेषण से स्तब्ध हैं। वह स्वीकारते हैं कि प्रचण्ड को समझने में उनसे भूल हुई। लेकिन फिर यह जरूरी बात भी आती है कि क्यों उन्होंने प्रचण्ड को समझने का प्रयास किया, न कि विचार को। मुख्य सवाल व्यक्ति को समझने का नहीं होता, बल्कि विचार को समझने का होता है। नेपाल के क्रांतिकारी इतिहास का यह एक सुखद पहलू है कि वहां, जैसा कि कहा जाता है, देर है अंधेर नहीं। आज जो काम किरण कर रहे हैं या विपल्व कर रहे हैं वह महत्वपूर्ण है। लेकिन जब मैं ऐसा कहती हूं तो मैं एक देवता को छोड़ दूसरे देवता को पकड़ने की बात नहीं करती, बल्कि मेरा मानना है कि यदि यह काम कामरेड किरण या विप्लव नहीं करते तो कोई और जरूर करता। उन्होंने यह बात देर से समझी, पर सही समझी कि प्रचण्ड  के नेतृत्व में नेपाल में क्रांति नहीं हो सकती। दूसरी बात, जैसा कि आपने सवाल किया कि इस समझ के बावजूद पार्टी में एकता क्यों है, तो यह एकता सिर्फ प्रवधिक एकता है। यह विचार की एकता नहीं है। एक तबका टोटल शांति, मुर्दा शांति की बात करता है। ऐसे तबके के साथ कैसे एकता बनी रह सकती है। मुझे लगता है कि जब संविधान बन जाएगा, यही खोखला संविधान तब यह माओवादी पार्टी एक नहीं रह सकेगी। उसके बाद या तो किरण-विपल्व या कोई और विचार समूह बनाकर पार्टी से अलग हो जाएगा। और यही तबका विचार को बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है। तुरंत बंदूक नहीं उठेगी, लेकिन विचार का विखंडन थमेगा। वर्तमान नेतृत्व ने तो माओवाद को साउथ ब्लॉक की आहुति में समर्पित कर दिया है, लेकिन किरण-विपल्व इसके खिलाफ लगातार संघर्ष कर रहे हैं। यही उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इसलिए मुझे लगता है कि पार्टी टूटेगी, लेकिन संविधान बन जाने के बाद।

तो क्या नेपाल की जनता वर्तमान नेतृत्व पर विश्वास नहीं करती?

मेरे ऐसा कहने से अधिक अच्छा होगा कि आप खुद रोल्पा जाकर इसे देखें। रोल्पा से ही जनयुद्ध की शुरुआत हुई थी। वहां की जनता कहती है कि इस क्रांति ने प्रचण्ड और बाबुराम को प्रधानमंत्री बनाने के अलावा किसी का भला नहीं किया। हमारे लिए यह धोखा है। हमसे वर्ग संघर्ष की बात की गई थी। हमने इतना बलिदान किया। हम तो अभी भी लड़ने के लिए तैयार थे, लेकिन इन लोगों ने ही हमें धोखा दिया। वहां की जनता पूछती है कि हमारी समस्या तो बनी हुई है तो वे लोग कैसे कह सकते हैं कि क्रांति पूरी हो गई। जो नेता हैं उनके लिए तो क्रांति सफल हो गई, क्योंकि वे लोग तो बिल गेट्स बन गए। इसलिए मुझे लगता है कि रोल्पा की जनता एक बार फिर उठ खड़ी होगी। जब तक माओवादी पार्टी के प्रचण्ड नेतृत्व के पास विजन था, तब तक जनता पार्टी के साथ थी। आज आप रोल्पा जाकर देखिए लोग पार्टी की आलोचना करते हैं। रुकुम के चुंवाग में पार्टी के एक पुराने साथी हैं राजकुमार बिष्ट। जनयुद्ध के सिलसिले में वे 12 साल तक जेल में रहे। वे आज मजदूरी कर रहे हैं। कभी वे गिट्टी तोड़ते हैं, कभी बोझा ढोते हैं। मैंने उनसे यह सवाल किया कि क्या क्रांति हो गई कामरेड! तो उनका जवाब था ‘माओवाद को इन लोगों ने वेश्यावाद बना दिया है।’ रोल्पा की जनता कहती है कि हम लोगों ने इतना बड़ा संघर्ष नवसामंतों को जन्म देने के लिए नहीं किया। कामरेड बिष्ट भी यही कहते हैं कि क्या नवसामंतों को पैदा करने के लिए उन्होंने12 साल जेल में काटे। क्या 15 हजार जनता का बलिदान इन नवसामंतों के लिए है। नेपाल में आज 40 हजार लोग अपंग हैं।

लेकिन संक्रमणकाल में तो ऐसी समस्याएं रहेंगी?

देखिए, सुबह का सूरज दिन का अहसास करा देता है। यह कोई संक्रमणकाल नहीं है। जनता के लिए ही यह संक्रमणकाल क्यों है। यदि यह संक्रमणकाल है, तो नेताओं के लिए भी रहना चाहिए था। 40 हजार घायल और अपंग घिसट रहे हैं और वह बलैरो में चल रहे हैं।

तो क्या नेपाल में माओवादी भी संसदीय दलदल में फंस गए हैं?

यह विचलन अवसरवाद का परिणाम है। उन्होंने क्रांतिकारी विचार को समझने में गंभीर गलती की। उसका परिणाम यह हुआ कि यह विचार सत्ता में जाने का साधन मात्र बनकर रह गया। मेरे विचार में वर्ष 2000 तक इस पार्टी में विचलन नहीं दिखता। पहली बार विचलन 2000 के बाद उस वक्त सामने आया जब प्रचण्ड और बाबुराम के बीच का संघर्ष सामने आया। उस वक्त प्रचण्ड ने बाबुराम को पहली बार ‘भारत परस्त’ कहा था और इसके जवाब में बाबुराम ने प्रचण्ड को ‘दरबार परस्त।’ यानि दोनों नेता एक दूसरे के विचलन को समझ रहे थे। हमें लगता है कि ठीक यहीं भारत और दरबार की घुसपैठ नेपाली क्रांति में हुई। इसलिए मैं ऐसा मानती हूं कि एक झटके से नेतृत्व विचलन का शिकार नहीं होता और यदि कोई यह मानता है कि नेतृत्व शांतिकाल में आकर विचलन का शिकार हुआ, तो यह गलत मान्यता होगी। प्रचण्ड ने बाबुराम का विचलन देखा और बाबुराम ने प्रचण्ड का, लेकिन पार्टी ने इन दोनों का विचलन नहीं देखा। यदि देख पाते तो आज यह स्थिति नहीं होती। आज दोनों विचलनों का फ्यूजन हो गया है, इसलिए नेपाल की क्रांति का यह चरण यहीं खत्म हो गया। यह नेतृत्व क्रांति करेगा ऐसा जनता नहीं सोचती। मेरी एक कविता है ‘रामसाइली’ उसके माध्यम से मैं नेपाल के माओवादी आंदोलन के वर्तमान नेतृत्व को इस तरह देखती हूं :

माओवाद जिंदाबाद कहते हुए
प्रचण्ड पथ के गुब्बारे जब ऊपर उड़ने लगे
तब रामसाइली ने अपना नाम रखा लालसाइली
हां, वही रामसाइली आज अपने गुमे हुए हाथ-पैरों को खोज रही है
कहां हैं रामसाइली के पैर
कहीं दिखे तुम्हें, मिले तुम्हें?
देखा जिन्होंने कहा उन्होंने
प्रचण्डपथ बलैरो के पहिए हैं
रामसाइली के पैर
इधर रामसाइली घिसट की घिसट रही है
उधर बलैरो दोड़ पे दौड़ लगा रहा है
हां, यही रामसाइली अपने गुमे हुए हाथ ढूंढ रही है
कहां गुमे रामसाइली के हाथ?
कहीं दिखे तुम्हें, कहीं मिले तुम्हें?
देखने वालों ने कहा
दीपापथ प्लेन के पंख हैं रामसायली के हाथ
इधर प्लेन उड़ान पे उड़ान भर रहा है
और उधर रामसाइली कुंजिए की कुंजिए है
हां, इन्हीं रामसायली के जीवन की आजकल केंटोंमैंट नीलामी हो रही है
5 लाख, 6 लाख, 7 लाख
इसी नीलामी की बोली के बीच
रामसायली सोचती है
यह नीलामी की बोली माओवाद है कि वेश्यावाद

लेकिन बहुत से लोग मानते हैं कि नेपाल का माओवादी आंदोलन सही दिशा में आगे बढ़ रहा है?

इस सवाल के जवाब में भी मैं अपनी एक कविता प्रस्तुत करना
चाहूंगी :
जब माओवादी बिल गेट्स बन गए
तो झोपड़ी ने कहा यह तो खून की होली है
पर महलों ने कहा यही तो दिवाली है
जब लेनिन खु्रश्चेव हो गए
तो नोरा ने कहा, यह विश्वासघात है, लेकिन रेगन ने कहा यही तो मार्क्सवाद है

नेपाल के संदर्भ में कामरेड किरण की क्या भूमिका है? 

नेपाल की जनता के लिए किरण विचार समूह डूबते को तिनके का सहारा जैसा है। कभी-कभी तिनका पार भी लगा देता है।

दक्षिण एशिया खासकर भारत में आप माओवादी आंदोलन का क्या भविष्य देखती हैं?

जहां दमन होता है, वहां प्रतिरोध होता है। जहां प्रतिरोध होता है, वहां ध्वंस होता है और जहां ध्वंस होता है वहां निर्माण होता है। भारत की बहुसंख्य जनता उत्पीड़ित है और उत्पीड़ित जनता कहीं की भी हो, वह विद्रोह करती है। भारत की जनता भी क्रमिक रूप में उठेगी। वह उठ भी रही है।

जैसा कि आपने कहा वर्तमान नेतृत्व ने नेपाल की जनता को धोखा दिया है, तो क्या जनता में इसकी निराशा है?

जिस तरह नेपाल की क्रांति धराशाई हुई, उससे सब लोग स्तब्ध हैं। नेपाल में आशा की बात बहुत कम सुनाई देती है।  मेरी एक कविता है : सपनों का कब्रिस्तान नहीं होता

मरे कहे गए सपने
ज्वालामुखी लेकर आते हैं।
सपनों का डुबान नहीं होता
डूबे कहे गए सपने
सुनामी लेकर आते हैं।
सपनों का राख नहीं होता
बुझे कहे गए सपने
आग लेकर आते हैं।
सपने का मृत्युबीज नहीं होता
बांझ कहे गए सपने नई सृष्टि लेकर आते हैं।
मुझे लगता है कि इतिहास के एक कालखंड में जनता के नायक यदि खलनायक बन भी जाते हैं तो जनता फिर अपने नायक पैदा करती है और नए सपने देखती है। शहीद का बलिदान रक्तबीज पैदा करने वाली कोख है, जो नए नायक पैदा करती रहेगी। जब तक जनता मुक्त नहीं होती, तब तक उसके सपने नहीं मरेंगे।

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विश्व पुस्तक मेला की जापानी गुड़िया

Posted by chimeki on March 8, 2012


दोस्तों, मैं विदेशी प्रकाशकों का हॉल नंबर 7 घूम आया. प्रकाशकों से मुलाकात की, बात की और थोड़ी आप लोगों की (इस देश की जनता की) बुराई भी कर डाली. मैनें वही कहा जो आप लोग हमेशा आपस मेंकहते रहते हो. जैसे, गंभीर पुस्तकें कोई पढ़ना नहीं चाहता, लोग किताबों पर पैसा खर्च नहीं करते, भारतीय लोग में एक प्रकार का जेनोफोबिया है इसलिए हॉल में प्रवेश करते से घबराते है, आदि .

देखिए, यह सारी बात मैने अकेले नहीं की बल्कि एक बतूने अंकल किसी प्रकाशक से कह रहे थे और मैने ज्ञान बघारने के लिए अंतिम वाक्य जोड़ दिया. इसके बावजूद मैने वहां से सिर्फ एक ही किताब खरीदी. तो हुआ न मैं आप लोगों में से एक . 20वें नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में इस बार 30 विदेशी प्रकाशक भाग ले रहे है जिनमें पाकिस्तान के सबसे अधिक प्रकाशक है. हॉल नंबर 7 में थीम पवेलियन से सटे इस हॉल में बहुत कम लोग ही दिख रहे हैं.

हॉल नंबर सात का प्रमुख आकर्षण है गणतंत्र ईरान का स्टॉल. यहां आप ईरान के आधुनिक संस्थापक आयातोल्लाह खमेनी के बारे में जानकारी देने वाली बहुत सी किताबों को देख सकते है. यहीं मुझे पता चला कि ईरानी क्रांति के बाद ईरान ने प्रकाशन के क्षेत्र में बहुत उन्नति की है. आज ईरान में 11 हजार से अधिक लायसंस प्राप्त प्रकाशक है जो हर साल 65 हजार से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन कर रहे हैं. यह संख्या क्रांति पूर्व की कुल संख्या से 30 गुना अधिक है.

यदि आप काएदे आजम जिन्ना के 17 खंडों वाली संकलित रचनाओं को पढ़ना चाहते है तो आप इसी हॉल में स्टॉल लगाए एक पाकिस्तानी प्रकाशक से इसे खरीद सकते हैं. पाकिस्तान के एक स्टॉल में मुझे माओ त्से तुंग से संबंधित किताब भी दिखाई दी और जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बारे में बताती किताब भी. हैरानी यह जानकर हुई कि लेखक ने तीनों की प्रशंसा की है. यह देख कर मुझे याद आया कि हमारे यहां तो जिन्ना की तारीफ करने वाले को पार्टी ही जोड़नी पड़ती है.
लेकिन जिस स्टॉल पर मुझे सबसे अधिक आनंद आया वह था जापान फाउंडेशन का हॉल . इस स्टॉल में मुझे मिली एक गुडि़या जापान की. उसका नाम था जूको यामानोई. इस खूबसूरत लड़की ने मुझे बताया कि उनके फाउंडेशन का मकसद जापानी साहित्य के बारे में भारतीय पाठकों को जानकारी देना है और भारत के बाजार में इसे प्रवेश दिलाना है. फिलहाल यह फाउंडेशन बच्चों के लिए किताब (मुख्यतः कॉमिक ) लेकर बाजार में उतर रहा है.

बातों बातों में फिल्मों पर भी चर्चा हुई. मैंने बताया कि भारत में कुरसोवा के बहुत प्रशंसक है तो उसे बहुत अच्छा लगा. इसके बाद उसने मुझे किसी और फिल्म के बारे में पूछा. इत्तीफाक से मैंने उसे हाल में ही देखा था तो मेरी प्रतिष्ठा और बढ़ गई. इसके बाद तो क्या कहने. उसने मुझे ढूंढ-ढूंढ कर मुफ्त में बांटने वाली सामग्री उपहार में दे दी. मेरा झोला ही भर गया.

हॉल में तुर्की, जर्मनी, इजरायल, सउदी अरब, नेपाल तथा अन्य देशों के प्रकाशक भी हैं . जहां जर्मनी के स्टॉल में होम्योपैथी संबंधी जानकारी मिल रही है वहीं इजरायल का लक्ष्य भारतीय पर्यटकों को आकर्षित करना है. नेपाल के प्रकाशक का मकसद विशुद्ध रूप से पुस्तकें बेचना है. हेरिटेज पब्लिशर नेपाल के बाबूराम गौतम ने बताया कि 2007 के बाद नेपाल के प्रकाशन उद्योग ने गति पकड़ी है और जैसे जैसे राजनीतिक अस्थिरता का दौर खत्म हो रहा है वैसे-वैसे इस उद्योग के विकास करने के अवसर बन रहे है.

दोस्तों, इस हॉल में प्रवेश करने के बहुत से और भी फायदे है. यह ऐसा हॉल है जहां आप किलो भर सामग्री मुफ्त हासिल कर सकते है. हर स्टॉल के पास कई-कई पुस्तिकाएं हैं जो वे लोगों को उपहार स्वरूप देने के लिए लाए हैं. वल्र्ड बैंक के स्टॉल में मुझे कई तरह कि आर्थिक और सामाजिक रिपोर्ट मिली और डायचे वेले के स्टॉल से एक पैन, एक नोट पैड और एक चावी का छल्ला. एक जरूरी सूचना इस स्टॉल में एक क्विज प्रतियोगिता भी आयोजित की गई है. इसमें भाग लेकर और एक साधारण से सवाल का मामूली सा जवाब देकर आप जीत सकते है विदेशी जैकिट, थरमस, फोन एवं अन्य उपहार. और मैं किस काम का यदि आप लोगों को उस सवाल का उत्तर न बता सकूं. तो लिख लीजिए. उस प्रश्न का उत्तर है, ‘विज्ञान’. देखिए डायचे वेले की मिस भाटिया को मत बताइएगा कि यह जवाब मैने आप को बताया है.

साथियों आज के लिए बस इतना ही. कल फिर मेले की खबर के साथ आप से मुलाकात का वादा करता हूं.

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विश्व पुस्तक मेले में एक दिन और

Posted by chimeki on March 8, 2012


दोस्तो, मैं कल एक बार फिर पुस्तक मेला गया था। जैसा कि मैंने कहा था कल 11 नंबर हाल में घूम आया। मैंने किताबें खरीदीं भी और बिखेरीं भी। कुल मिलाकर अच्छा काम किया। 11 नंबर हाल हिंदी भाषा को समर्पित है। हिंदी के जाने माने प्रकाशक अपनी पुस्तकों के साथ यहां मौजूद हैं। यदि भीड़ से सफलता को नापा जाए तो कहना होगा कि हिंदी सफल रही। हिन्दी की किताबों के प्रति लोगों का रुझान काफी अच्छा है और लोग किताबों पर पैसे खर्च कर रहे हैं।

संवाद प्रकाशन पिछले सालों के मुकाबले अधिक फैला है यानी गति पकड़ रहा है। पिछले सालों के मुकाबले इस बार उसे मेले में अधिक सम्मानित जगह मिली है। वह सहज दिख जाता है और किताबें भी अच्छी-खासी बढ़ी हैं। कह सकते हैं कि आने वाले समय में संवाद मेले का एक आकर्षण बन सकता है। इसी स्टाल में हर बार की तरह एक कोना इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान लाल बहादुर वर्मा का भी है। उनके द्वारा अनुदित बहुत सी किताबों के साथ वे अपनी बहुचर्चित दाढ़ी और लम्बे केसों के साथ वहां मौजूद हैं।

आप उनसे इस स्टॉल में मिल सकते हैं। यदि आप चाहे तो उनकी हाल की पकिस्तान यात्रा पर भी चर्चा कर सकते हैं। यदि वे चाहें तो आपको जवाब भी दे सकते हैं। उनकी एक किताब जो मुझे वहां नहीं दिखी, वह है इतिहास के बारे में। यह उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है, ऐसा मेरा मानना है। इसके अलावा उन्होंने जॉन होलोवे की किताब ‘चेंज द वर्ल्ड विदाउट टेकिंग पावर’ का हिंदी अनुवाद भी हाल के दिनों में किया है। इस किताब को उन्होंने नाम दिया है ‘चीख’। मेरा मानना है कि यदि वे इस किताब को उसके असली नाम से प्रकाशित करते और नीचे पुछल्ला लगा देते ‘हिंदी में’ तो यह पुस्तक लोगों को और अधिक आकर्षित करती।

अपनी वामपंथी प्रतिबद्धता के लिए इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज करा चुके गार्गी प्रकाशन के स्टॉल पर जाना पुराने दिनों को याद करने का सुनहरा अवसर है। गार्गी प्रकाशन ने एक बार फिर दो साल बाद अपने गोदाम का ताला खोला है और पुरानी किताबों को बेचने के लिए कमर कस ली है। इस प्रकाशन में नया कम और पुराना बहुत अधिक है। जैसा कि हम जानते हैं वामपंथ की महान यात्रा में रोज नए लोग जुड़ते-बिछड़ते रहते हैं इसलिए लोग यहां भी आ रहे हैं और किताबें खरीद रहे हैं।

गार्गी प्रकाशन के स्टाल के ठीक सामने महान हिंदू संस्कृति के एक ठेकेदार/पहरेदार गीता बुक हाउस का भव्य स्टॉल है। गेरूए रंग की जैकिट में हिंदू धर्म की असंख्य किताबें और उन्हें पूरी श्रद्धा से खरीदते सैकड़ों श्रद्धालु इस स्टॉल में देखे जा सकते हैं। खरीददारों का उत्साह ऐसा कि देखकर गुरुजी की आंखों से अश्रु ही टपक पड़ते।

इसके साथ ही इस्लामी किताबों का भी एक स्टॉल है। स्टॉल की खूबी यह है कि यहां गैर-मुसलमानों को कुरान की एक प्रति, पैगंबर मौहम्मद की जीवनी और इस्लाम पर प्रकाश डालती एक किताब मुफ्त दी जा रही है और मुसलमान भाइयों से प्रति सेट रुपए 300 मांगे जा रहे हैं। प्रकाशक इस्लाम के बारे में गैर मजहबियों को जानकारी देना चाहते हैं। शायद उनका मानना है कि मोदी, विनय कटियार या फिर स्वामी जैसे लोग जो कहते-करते हैं वह अज्ञानतावश करते हैं और यदि वे ये किताबें पढ़ लें तो उनका ह्रदय परिवर्तन हो जाएगा। हमारी शुभकामना।

इसके ठीक सामने ग्रंथशिल्पी का अड्डा है। सफेद जैकिट वाली ढेरों किताबों की दुकान। हर बार की तरह इस बार भी राय साहब बहुत सी नई किताबों के साथ गप्पे लड़ाते मौजूद हैं। यहां दर्शक तो हैं, पर खरीददार नहीं। कारण है किताबों का महंगा होना। हम सबकी तरह राय साहब का भी यह मानना है कि शराब जितनी पुरानी हो, उतनी ही कीमती होती है और किताब पढ़ना भी तो एक नशा है।

राय साहब फैलोशिप देकर किताबें लिखवाते तो नहीं हैं, पर फोन करके अनुवाद जरूर करवा लेते हैं। किताबें भी ऐसी जिन पर रायल्टी का कोर्इ झंझट नहीं होता। फिदेल कास्त्रो के भाषण, चे ग्वारा की डायरी, रोजा लुग्जंबर की किताब और हाल में उनके द्वारा प्रकाशित नेपाल के माओवादी नेता प्रचण्ड के साक्षत्कारों का संग्रह। फिर भी राय साहब को महान हस्तियों का सम्मान करना बहुत अच्छी तरह आता है। कहने का मतलब यह कि जितना बड़ा नाम उतने ऊंचे दाम।

राजकमल प्रकाशन का स्टॉल लोगों से खचाखख भरा है। किताबें बेशुमार हैं और लोगों के बजट में। 40-50 रुपए में भी पाठकों को अच्छी किताबें मिल रही हैं। सआदत हसन मंटो की संस्मरण-कृति ‘मीना बाजार’ और फणीश्वरनाथ रेणु की ‘नेपाल क्रांति-कथा’ संग्रहणीय किताबें हैं। इसके अलावा अन्य किताबें भी हैं। दिलीप मंडल की ‘मीडिया का अंडरवर्ल्ड’ का पेपरबैक संस्करण भी पाठकों के लिए सस्ते में उपलब्ध है।
इससे बाहर आते ही आपके सामने होगा नेशनल बुक ट्रस्ट का भारतीय भाषाओं का स्टॉल। हमेशा की तरह इस बार भी बिना कुछ लिए मैं बाहर नहीं आ सका। मैंने खरीदी 35 रुपए मूल्य की ‘तालाब’।

तो यह था कल के पुस्तक मेला भ्रमण का मेरा आंखों देखा हाल। मेरी योजना मेले में एक-दो बार और जाकर मेले के अन्य पहलुओं के बारे में आप लोगों को जानकारी देने की है। तब तक के लिए आपके सेवक को दीजिए इजाजत।

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सिनेमा पर केंद्रित 20वां विश्व पुस्तक मेला

Posted by chimeki on March 8, 2012


नेशनल बुक ट्रस्ट के आयोजन में 20वां नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला प्रगति मैदान में 25 फरवरी 2012 से 4 मार्च 2012 जारी है. इस बार पुस्तक मेला भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष विषय पर केन्द्रित है. मेले में इस वर्ष 1300 प्रकाशक भाग ले रहे है जिनमें 30 विदेशी प्रकाशक है. विदेशों से आने वाले में सब से अधिक प्रकाशक पाकिस्तान से है.

आयोजकों के अनुसार 80 बड़े प्रकाशकों द्वारा अंग्रेजी व अन्य भारतीय भाषाओं में थीम विषय (सिनेमा) पर प्रकाशित 300 पुस्तकों को प्रदर्शित किया जाएगा. इस आयोजन के लिए हॉल नंबर 7 को थीम पावेलियन बनाया गया है जहां नियमित रूप से फिल्मों का मंचन भी किया जा रहा है. साथ ही भारतीय फिल्मों पर विमर्श में फारूख शेख, जुवैर रिजवी तथा अन्य जाने माने लोग भाग लेंगे.

हॉल नंबर 7 में कल साहब, बीबी और गुलाम का मंचन किया गया. आज 1981 की फिल्म उमराव जान का प्रदर्शन  होगा.

हर बार की तरह इस बार भी पुस्तक मेले में लोगों की अच्छी खासी भीड़ है. बातचीत के दौरान एक प्रकाशक ने बताया कि दिल्ली पुस्तक मेला भारत के आधुनिक त्यौहारों में एक है. यह पुस्तकों के दिवानों का कुम्भ है. 45 हजार वर्ग मीटर में फैले इस मेले में लगे 2500 से अधिक स्टॉल को देख कर उनकी बात पर यकीन हो जाता है.

इतने सारे प्रकाशकों के होने के बावजूद सब से अधिक भीड़ एक नंबर हॉल के नेशनल बुक ट्रस्ट के स्टॉल में ही देखने को मिली. आप की दिलचस्पी चाहे जिस भी विषय में हो इस स्टॉल में आप को एक या दो पसंद की किताब मिल ही जाएंगी. ग्राम्शी के ऑर्गैनिक बुद्धिजीवियों यानी वे पाठक जो सब कुछ इसी जन्म में पढ़ लेना चाहते है उनके लिए तो यह स्टॉल कुबेर का खजाना है.

यकीन मानिए मैने इतनी किताबे खरीदी की मेरे सारे पैसे इसी स्टॉल में खत्म हो गए. (उन लोगो ने मेरी किसी भी चीज को गिरवी रखने से मना कर दिया.)  इतिहास, खेल, संगीत, नाट्य, देश-विदेश, स्वास्थ्य, बच्चों की रूचि वालीं किताबें आदि अनेक विषयों पर रोचक किताबें इस स्टॉल पर उपलब्ध है. और सबसे जरूरी बात ये किताबें सस्ती है.

पाठकों के लिए एक जरूरी सूचना. यदि आप इस खबर को पढ़ कर हॉल नंबर एक में दाखिल होने की सोच रहे है तो यह अच्छा होगा कि आप इसी हॉल में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के स्टॉल पर भी हो आइए. इस स्टॉल में बहुत ही जरूरी पुस्तक लगभग मुफ्त मिल रही है (लगभग शब्द पर ध्यान दीजिए). 2003 तक प्रकाशित मंत्रालय की तमाम पुस्तकों पर 50 फीसदी की छूट है.

ये किताबें औसतत 30 से 50 रुपए मूल्य की है. यानि आप को 15 से 25 रुपए में मोटी-माटी पुस्तकें मिल जाएंगी. ये पुस्तके संदर्भ सामग्री के लिए अच्छी है. मैनें यहां से खरीदी शहीदों के खत, भारत का जन इतिहास, डोक्यूमेंट्री फिल्म, श्री अरबिंदो की जीवनी, इंदिरा गांधी की जीवनी, भारत और खेल जगत, मौलाना आजाद के संकलित भाषण, मिजोरम, हिमाचल प्रदेश आदी. मैनें मोटी-माटी 18 किताबें 499 रुपए और 80 नए पैसों में खरीदी.

खरिदारी के बाद में हॉल नंबर 7 (थीम हॉल) चला गया जहां 1962 की फिल्म साहब, बीबी और गुलाम दिखाई जा रही थी. इतनी पुरानी फिल्म को बड़े पर्दे पर देखना बहुत ही मनोरंजक था.

आज फिर मैं पुस्तक मेला जा रहा हूं. आज की मेरी योजना मुख्य तौर पर हिन्दी भाषा के हॉल (हॉल नंबर 11) में तफरी करने की है. देखते है वहां क्या मिलता है?

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