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विश्व पुस्तक मेले में एक दिन और

Posted by chimeki on March 8, 2012



दोस्तो, मैं कल एक बार फिर पुस्तक मेला गया था। जैसा कि मैंने कहा था कल 11 नंबर हाल में घूम आया। मैंने किताबें खरीदीं भी और बिखेरीं भी। कुल मिलाकर अच्छा काम किया। 11 नंबर हाल हिंदी भाषा को समर्पित है। हिंदी के जाने माने प्रकाशक अपनी पुस्तकों के साथ यहां मौजूद हैं। यदि भीड़ से सफलता को नापा जाए तो कहना होगा कि हिंदी सफल रही। हिन्दी की किताबों के प्रति लोगों का रुझान काफी अच्छा है और लोग किताबों पर पैसे खर्च कर रहे हैं।

संवाद प्रकाशन पिछले सालों के मुकाबले अधिक फैला है यानी गति पकड़ रहा है। पिछले सालों के मुकाबले इस बार उसे मेले में अधिक सम्मानित जगह मिली है। वह सहज दिख जाता है और किताबें भी अच्छी-खासी बढ़ी हैं। कह सकते हैं कि आने वाले समय में संवाद मेले का एक आकर्षण बन सकता है। इसी स्टाल में हर बार की तरह एक कोना इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान लाल बहादुर वर्मा का भी है। उनके द्वारा अनुदित बहुत सी किताबों के साथ वे अपनी बहुचर्चित दाढ़ी और लम्बे केसों के साथ वहां मौजूद हैं।

आप उनसे इस स्टॉल में मिल सकते हैं। यदि आप चाहे तो उनकी हाल की पकिस्तान यात्रा पर भी चर्चा कर सकते हैं। यदि वे चाहें तो आपको जवाब भी दे सकते हैं। उनकी एक किताब जो मुझे वहां नहीं दिखी, वह है इतिहास के बारे में। यह उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है, ऐसा मेरा मानना है। इसके अलावा उन्होंने जॉन होलोवे की किताब ‘चेंज द वर्ल्ड विदाउट टेकिंग पावर’ का हिंदी अनुवाद भी हाल के दिनों में किया है। इस किताब को उन्होंने नाम दिया है ‘चीख’। मेरा मानना है कि यदि वे इस किताब को उसके असली नाम से प्रकाशित करते और नीचे पुछल्ला लगा देते ‘हिंदी में’ तो यह पुस्तक लोगों को और अधिक आकर्षित करती।

अपनी वामपंथी प्रतिबद्धता के लिए इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज करा चुके गार्गी प्रकाशन के स्टॉल पर जाना पुराने दिनों को याद करने का सुनहरा अवसर है। गार्गी प्रकाशन ने एक बार फिर दो साल बाद अपने गोदाम का ताला खोला है और पुरानी किताबों को बेचने के लिए कमर कस ली है। इस प्रकाशन में नया कम और पुराना बहुत अधिक है। जैसा कि हम जानते हैं वामपंथ की महान यात्रा में रोज नए लोग जुड़ते-बिछड़ते रहते हैं इसलिए लोग यहां भी आ रहे हैं और किताबें खरीद रहे हैं।

गार्गी प्रकाशन के स्टाल के ठीक सामने महान हिंदू संस्कृति के एक ठेकेदार/पहरेदार गीता बुक हाउस का भव्य स्टॉल है। गेरूए रंग की जैकिट में हिंदू धर्म की असंख्य किताबें और उन्हें पूरी श्रद्धा से खरीदते सैकड़ों श्रद्धालु इस स्टॉल में देखे जा सकते हैं। खरीददारों का उत्साह ऐसा कि देखकर गुरुजी की आंखों से अश्रु ही टपक पड़ते।

इसके साथ ही इस्लामी किताबों का भी एक स्टॉल है। स्टॉल की खूबी यह है कि यहां गैर-मुसलमानों को कुरान की एक प्रति, पैगंबर मौहम्मद की जीवनी और इस्लाम पर प्रकाश डालती एक किताब मुफ्त दी जा रही है और मुसलमान भाइयों से प्रति सेट रुपए 300 मांगे जा रहे हैं। प्रकाशक इस्लाम के बारे में गैर मजहबियों को जानकारी देना चाहते हैं। शायद उनका मानना है कि मोदी, विनय कटियार या फिर स्वामी जैसे लोग जो कहते-करते हैं वह अज्ञानतावश करते हैं और यदि वे ये किताबें पढ़ लें तो उनका ह्रदय परिवर्तन हो जाएगा। हमारी शुभकामना।

इसके ठीक सामने ग्रंथशिल्पी का अड्डा है। सफेद जैकिट वाली ढेरों किताबों की दुकान। हर बार की तरह इस बार भी राय साहब बहुत सी नई किताबों के साथ गप्पे लड़ाते मौजूद हैं। यहां दर्शक तो हैं, पर खरीददार नहीं। कारण है किताबों का महंगा होना। हम सबकी तरह राय साहब का भी यह मानना है कि शराब जितनी पुरानी हो, उतनी ही कीमती होती है और किताब पढ़ना भी तो एक नशा है।

राय साहब फैलोशिप देकर किताबें लिखवाते तो नहीं हैं, पर फोन करके अनुवाद जरूर करवा लेते हैं। किताबें भी ऐसी जिन पर रायल्टी का कोर्इ झंझट नहीं होता। फिदेल कास्त्रो के भाषण, चे ग्वारा की डायरी, रोजा लुग्जंबर की किताब और हाल में उनके द्वारा प्रकाशित नेपाल के माओवादी नेता प्रचण्ड के साक्षत्कारों का संग्रह। फिर भी राय साहब को महान हस्तियों का सम्मान करना बहुत अच्छी तरह आता है। कहने का मतलब यह कि जितना बड़ा नाम उतने ऊंचे दाम।

राजकमल प्रकाशन का स्टॉल लोगों से खचाखख भरा है। किताबें बेशुमार हैं और लोगों के बजट में। 40-50 रुपए में भी पाठकों को अच्छी किताबें मिल रही हैं। सआदत हसन मंटो की संस्मरण-कृति ‘मीना बाजार’ और फणीश्वरनाथ रेणु की ‘नेपाल क्रांति-कथा’ संग्रहणीय किताबें हैं। इसके अलावा अन्य किताबें भी हैं। दिलीप मंडल की ‘मीडिया का अंडरवर्ल्ड’ का पेपरबैक संस्करण भी पाठकों के लिए सस्ते में उपलब्ध है।
इससे बाहर आते ही आपके सामने होगा नेशनल बुक ट्रस्ट का भारतीय भाषाओं का स्टॉल। हमेशा की तरह इस बार भी बिना कुछ लिए मैं बाहर नहीं आ सका। मैंने खरीदी 35 रुपए मूल्य की ‘तालाब’।

तो यह था कल के पुस्तक मेला भ्रमण का मेरा आंखों देखा हाल। मेरी योजना मेले में एक-दो बार और जाकर मेले के अन्य पहलुओं के बारे में आप लोगों को जानकारी देने की है। तब तक के लिए आपके सेवक को दीजिए इजाजत।

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