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‘भारत की रखैल है नेपाल’

Posted by chimeki on March 12, 2012


नेपाली प्रगतिशील साहित्य में दिलचस्पी रखने वालों के लिए निभा शाह एक जाना-पहचाना नाम है। वे कवि होने के साथ-साथ माओवादी पार्टी की कैडर भी हैं। वर्ष  2002 में निभा को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था और गिरफ्तारी के अगले दिन नेपाल पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया। वह नौ महीने तक जेल में रहने के बाद 2003 में रिहा हुयीं। निभा रचनाकर्म और क्रांतिकारी राजनीति को अलग अलग करके नहीं देखतीं। उन्हें जनवादी सृजन के लिए नेपाल के चार महत्वपूर्ण साहित्य सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें  से प्रमुख  पारिजात सृजनशील सम्मान और साझा गरिमा सम्मान प्रमुख हैं। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले के दौरान भारत आयीं निभा से नेपाल की राजनीति और साहित्य पर लंबी बातचीत हुई, पेश है मुख्य अंश- 

 नेपाली कवि निभा शाह से बातचीत

निभा शाह एक कवि हैं या राजनीतिक कार्यकर्ता?

क्या राजनीतिक कर्म और साहित्यिक सृजन अलग-अलग हो सकते हैं? मैं नेकपा माओवादी की कैडर ही हूं। शांतिकाल में पार्टी के शहर में आने के बाद याने 12 सूत्रीय समझौते के बाद के एक-दो वर्षों तक मैंने सक्रिय होकर काम किया। उसके बाद जब मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि पार्टी गलत दिशा की ओर जा रही तो मैंने खुद को लेखन की ओर अधिक सक्रिय कर लिया। अभी मैं पार्टी में बहुत सक्रिय नहीं हूं, लेकिन नेकपा (माओवादी) की सदस्य हूं और साहित्यिक यात्रा भी जारी है।

जनयुद्ध के समय के जनवादी साहित्य और आज के साहित्य में क्या अंतर देखती हैं?

जब चीजें सहज रूप से आगे बढ़ रही होती हैं तो धारा का अनुमान लगाना मुश्किल होता है, लेकिन जब कठिन दौर आता है तो जनवादी प्रतिबद्धता को बचाए रखना कठिन हो जाता है। यदि साहित्य की बात करें तो जनयुद्ध के समय बहुत जनवादी साहित्य का सृजन हुआ। ऐसा होना स्वभाविक भी था। जनता को पहली बार अपनी आवाज मिली थी और वह सृजन की आवश्यकता महसूस कर रही थी। शांतिकाल आने के बाद ‘जनवादी’ साहित्य की बाढ़ आ गई। साहित्यकार अपनी कृतियाँ छपवा रहे थे। बाजार साहित्य से भर गया, लेकिन अब जबकि नेपाली क्रांति का सबसे कठिन दौर चल रहा है जनवादी साहित्य का सृजन बहुत कम हो गया है।

क्या साहित्य के विकास के लिए जरूरी नहीं है कि साहित्य किसी पार्टी विशेष की राजनीति से दूर रहे?

इस वर्गीय समाज में कोई स्वतंत्र नहीं रह सकता। एक किस्म की वर्गीय पक्षधरता तो लेखक की होगी ही। ऐसे भी लेखक होते हैं  जो किसी पार्टी विशेष के साथ नहीं जुड़े होते, लेकिन तब भी वे किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व तो करते ही हैं। ऐसा भी नहीं है कि प्रायोजित साहित्यकार नहीं होते, लेकिन प्रायोजित साहित्यकार अधिक समय तक रचनाकर्म में नहीं लगा रह सकता। नेपाली भाषा में एक कहावत है कि दूसरों की पीठ पर सवार कुत्ता बहुत दिनों तक शिकार नहीं कर सकता। ऐसे रचनाकार का स्थायित्व नहीं रहता।

माओवादी आंदोलन के दौरान और बाद में भी नेपाल में ऐसे साहित्य का सृजन हुआ जो शांति की बात करता था ?

आज शांति के पक्ष में वही लेखक लिख सकता है जिसने सर्वहारा वर्ग को आत्मसात नहीं किया है। आज की हालत में असल साहित्यकार शांति की बात नहीं लिख सकता। कैसी शांति… मुर्दा शांति… जहां जनता का चूल्हा नहीं जलता, वहां शांति की बात कोई कैसे कर सकता है। यदि कोई खुद को जनवादी कवि मानता है और नेपाल की स्थिति में शांति की बात करता है तो उससे बड़ा भ्रम कोई नहीं है। आज की आवश्यकता क्रांति की बात लिखने की है, लेकिन आज क्रांति की बात लिखने वाले बहुत कम लोग बचे हैं। स्वयं माओवादी पार्टी से आए लेखक भी अब शांतिवादी हो चले हैं।

यह कैसे हुआ?

यह नेतृत्व का प्रतिबिंब भी है। माओवादी पार्टी के नेतृत्व का एक तबका स्वयं माओवाद से बुद्धवाद की ओर पलायन कर चुका है। आज बहुत थोड़े जनपक्षधर कवि बचे हैं- उनमें माइला लामा, खुशीराम पाख्रि, पूर्ण विराम, रोशन जनकपुरी, राजकुमार कुंवर और झंकर बुड़ा हैं। मैं मानती हूं कि एक समय तक तो कोई भी क्रांतिकारी रह सकता है, लेकिन सबसे जरूरी बात है कि कौन निरंतर क्रांतिकारी रह सकता है।  कल तक असंख्य क्रांतिकारी रचनाकर्मी थे,  आज एकदम कम हैं। आज जनता की पक्षधरता का कोई अहसास नहीं रह गया है, बल्कि एक समूह विशेष की पक्षधरता महत्वपूर्ण हो गई है। इतिहास ने बार-बार साबित किया है कि एक दौर में क्रांतिकारी होना सरल होता है, लेकिन असल बात निरंतर क्रांतिकारी बने रहने की है। एक दौर में झापाली भी क्रांतिकारी थे। कोई आठ महीने के लिए क्रांतिकारी रहा, कोई 12 साल के लिए और कोई बीस साल के लिए। जनपक्षधरता की सही कसौटी है कि कौन लेखक जीवनभर कामरेड रह सकता है।

माओवाद के प्रति आपके  झुकाव का क्या कारण रहा ?

बचपन से ही मेरा स्वभाव विद्रोही किस्म का था। मैं हमेशा से किसी भी प्रकार की मान्यता को बिना जांचे अपना लेने के पक्ष में नहीं रही। मुझे लगता है कि यह मैंने अपनी दादी से सीखा।  विद्रोह के  बोध ने मेरा झुकाव मार्क्सवाद की ओर मोड़ दिया। वर्ष1996 में मैं दिल्ली पढ़ने आ गई। इसी वर्ष नेपाल में जनयुद्ध शुरु हुआ था। दिल्ली में मेरी मित्रता कम्युनिस्ट विचार वाले साथियों से हुई। इत्तफाक से मेरे मामा भी पुराने समय में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय सदस्य रह चुके हैं। मेरी मां भी कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थीं। जब मैं छोटी थी तो वह मुझे चिनिया काजी, माओ, लेनिन, के बारे में बताती थीं। मेरी मां राणा खानदान से हैं। वह बताती हैं कि उनके पिताजी ने घर की दीवार पर स्टालिन की तस्वीर लगा रखी थी और वह कहा करते थे कि हम लोगों को इस आदमी को सम्मान देना चाहिए, न कि राणाओं को।

क्या आपको लगता है कि नेपाल में संविधान बन सकेगा?

28 मई 2012 को संविधान सभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है। एक न एक किस्म का संविधान तो बन ही जाएगा, लेकिन सबसे अहम बात है कि कैसा संविधान बनेगा। यदि 12 सूत्रीय समझौते से लेकर अब तक की राजनीतिक यात्रा देखें तो यह बात समझ आ जाती है कि नेपाल में संविधान जरूर बनेगा। यह संविधान ऊपरी तबके के लिए होगा। यह नेपाल की सर्वहारा जनता के लिए खोखला संविधान होगा। यह ऐसा होगा जो भारतीय विस्तारवाद, साम्राज्यवाद, नौकरशाही को संरक्षण करेगा। आज नेपाल को देखें तो साफ दिखता है कि यह भारत के एक उपनिवेश की हैसियत का देश है। यह भारत की रखैल जैसा है। इसी प्रकार संविधान कैसा बनेगा, यह बात इस तरह से समझी जा सकती है कि कल तक कामरेड प्रचण्ड जमीन कब्जा करने की बात करते थे, आज वे कामरेड कृष्णा सिटौला की पीठ पर चढ़कर बर्दिया पहुँचते हैं और जनता से कहते हैं कि जमीन लौटा दो। ऐसा कहने वाले नेतृत्व की सरकार कैसा संविधान बनाएगी, इस पर अधिक चर्चा करना समय की बर्बादी है।लेकिन खुद

आपकी पार्टी के कुछ केन्द्रीय सदस्य मानते हैं कि संविधान नहीं बनेगा?

जो पार्टी के सदस्य ऐसा कह रहे हैं उनसे पूछना चाहिए कि फिर संविधान सभा को क्यों बना कर रखा है।

लेकिन जब वे जनविद्रोह की बात करते हैं तो उसका मतलब तो यही है कि संविधान नहीं बनेगा?

वर्तमान नेतृत्व का एक समूह जब जनविद्रोह की बात करता है तो मुझे आश्चर्य होता है। दो-तीन वर्ष पहले जनविद्रोह करने के लिए लोगों ने आंदोलन किया था। उस वक्त यही नेतृत्व समूह राज्य सत्ता कब्जा करने की बात कर रहा था, लेकिन फिर आंदोलन को वापस ले लिया। ये लोग स्वयं दिल्ली के साउथ ब्लॉक के कब्जे में आ गए। तो ऐसा नेतृत्व जो साउथ ब्लॉक के कब्जे में है, वह कैसे जनविद्रोह कर सकता है। 15 हजार लोगों ने जनयुद्ध के समय कुर्बानी दी। यह सब ऐसे संविधान के लिए नहीं था जो जनता के अधिकार को कम करने की बात करता हो। जो जनता की जमीन छीनने की बात करता हो। कृष्ण सेन इच्छुक, चुनु गरुंग, दिल बहादुर रमतेल के बलिदान ने जनयुद्ध का निर्माण किया और आज इनकी फोटो पर फूल चढ़ाने वाले खुद इन शहीदों के सपनों को कुचल रहे हैं। इस तरह की ‘डबल पर्सनालिटी’ वाला नेतृत्व जनविद्रोह नहीं कर सकता।

किरण समूह जिस प्रकार से नेतृत्व की आलोचना कर रहा था उससे लग रहा था कि पार्टी जल्द टूट जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्या पार्टी पंक्ति का विश्वास आज भी नेतृत्व के साथ है?

नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है। इसे इस तरह समझना ठीक होगा कि युद्धकाल के समय किरण कहा करते थे ‘प्रचण्ड का मतलब मुक्तिराम दहाल का बेटा नहीं है, वह तो एक विचार है।’ किरण उस कालखण्ड में इस तरह से प्रचण्ड की प्रशंसा करते थे। आज वह खुद अपने उस विश्लेषण से स्तब्ध हैं। वह स्वीकारते हैं कि प्रचण्ड को समझने में उनसे भूल हुई। लेकिन फिर यह जरूरी बात भी आती है कि क्यों उन्होंने प्रचण्ड को समझने का प्रयास किया, न कि विचार को। मुख्य सवाल व्यक्ति को समझने का नहीं होता, बल्कि विचार को समझने का होता है। नेपाल के क्रांतिकारी इतिहास का यह एक सुखद पहलू है कि वहां, जैसा कि कहा जाता है, देर है अंधेर नहीं। आज जो काम किरण कर रहे हैं या विपल्व कर रहे हैं वह महत्वपूर्ण है। लेकिन जब मैं ऐसा कहती हूं तो मैं एक देवता को छोड़ दूसरे देवता को पकड़ने की बात नहीं करती, बल्कि मेरा मानना है कि यदि यह काम कामरेड किरण या विप्लव नहीं करते तो कोई और जरूर करता। उन्होंने यह बात देर से समझी, पर सही समझी कि प्रचण्ड  के नेतृत्व में नेपाल में क्रांति नहीं हो सकती। दूसरी बात, जैसा कि आपने सवाल किया कि इस समझ के बावजूद पार्टी में एकता क्यों है, तो यह एकता सिर्फ प्रवधिक एकता है। यह विचार की एकता नहीं है। एक तबका टोटल शांति, मुर्दा शांति की बात करता है। ऐसे तबके के साथ कैसे एकता बनी रह सकती है। मुझे लगता है कि जब संविधान बन जाएगा, यही खोखला संविधान तब यह माओवादी पार्टी एक नहीं रह सकेगी। उसके बाद या तो किरण-विपल्व या कोई और विचार समूह बनाकर पार्टी से अलग हो जाएगा। और यही तबका विचार को बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है। तुरंत बंदूक नहीं उठेगी, लेकिन विचार का विखंडन थमेगा। वर्तमान नेतृत्व ने तो माओवाद को साउथ ब्लॉक की आहुति में समर्पित कर दिया है, लेकिन किरण-विपल्व इसके खिलाफ लगातार संघर्ष कर रहे हैं। यही उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इसलिए मुझे लगता है कि पार्टी टूटेगी, लेकिन संविधान बन जाने के बाद।

तो क्या नेपाल की जनता वर्तमान नेतृत्व पर विश्वास नहीं करती?

मेरे ऐसा कहने से अधिक अच्छा होगा कि आप खुद रोल्पा जाकर इसे देखें। रोल्पा से ही जनयुद्ध की शुरुआत हुई थी। वहां की जनता कहती है कि इस क्रांति ने प्रचण्ड और बाबुराम को प्रधानमंत्री बनाने के अलावा किसी का भला नहीं किया। हमारे लिए यह धोखा है। हमसे वर्ग संघर्ष की बात की गई थी। हमने इतना बलिदान किया। हम तो अभी भी लड़ने के लिए तैयार थे, लेकिन इन लोगों ने ही हमें धोखा दिया। वहां की जनता पूछती है कि हमारी समस्या तो बनी हुई है तो वे लोग कैसे कह सकते हैं कि क्रांति पूरी हो गई। जो नेता हैं उनके लिए तो क्रांति सफल हो गई, क्योंकि वे लोग तो बिल गेट्स बन गए। इसलिए मुझे लगता है कि रोल्पा की जनता एक बार फिर उठ खड़ी होगी। जब तक माओवादी पार्टी के प्रचण्ड नेतृत्व के पास विजन था, तब तक जनता पार्टी के साथ थी। आज आप रोल्पा जाकर देखिए लोग पार्टी की आलोचना करते हैं। रुकुम के चुंवाग में पार्टी के एक पुराने साथी हैं राजकुमार बिष्ट। जनयुद्ध के सिलसिले में वे 12 साल तक जेल में रहे। वे आज मजदूरी कर रहे हैं। कभी वे गिट्टी तोड़ते हैं, कभी बोझा ढोते हैं। मैंने उनसे यह सवाल किया कि क्या क्रांति हो गई कामरेड! तो उनका जवाब था ‘माओवाद को इन लोगों ने वेश्यावाद बना दिया है।’ रोल्पा की जनता कहती है कि हम लोगों ने इतना बड़ा संघर्ष नवसामंतों को जन्म देने के लिए नहीं किया। कामरेड बिष्ट भी यही कहते हैं कि क्या नवसामंतों को पैदा करने के लिए उन्होंने12 साल जेल में काटे। क्या 15 हजार जनता का बलिदान इन नवसामंतों के लिए है। नेपाल में आज 40 हजार लोग अपंग हैं।

लेकिन संक्रमणकाल में तो ऐसी समस्याएं रहेंगी?

देखिए, सुबह का सूरज दिन का अहसास करा देता है। यह कोई संक्रमणकाल नहीं है। जनता के लिए ही यह संक्रमणकाल क्यों है। यदि यह संक्रमणकाल है, तो नेताओं के लिए भी रहना चाहिए था। 40 हजार घायल और अपंग घिसट रहे हैं और वह बलैरो में चल रहे हैं।

तो क्या नेपाल में माओवादी भी संसदीय दलदल में फंस गए हैं?

यह विचलन अवसरवाद का परिणाम है। उन्होंने क्रांतिकारी विचार को समझने में गंभीर गलती की। उसका परिणाम यह हुआ कि यह विचार सत्ता में जाने का साधन मात्र बनकर रह गया। मेरे विचार में वर्ष 2000 तक इस पार्टी में विचलन नहीं दिखता। पहली बार विचलन 2000 के बाद उस वक्त सामने आया जब प्रचण्ड और बाबुराम के बीच का संघर्ष सामने आया। उस वक्त प्रचण्ड ने बाबुराम को पहली बार ‘भारत परस्त’ कहा था और इसके जवाब में बाबुराम ने प्रचण्ड को ‘दरबार परस्त।’ यानि दोनों नेता एक दूसरे के विचलन को समझ रहे थे। हमें लगता है कि ठीक यहीं भारत और दरबार की घुसपैठ नेपाली क्रांति में हुई। इसलिए मैं ऐसा मानती हूं कि एक झटके से नेतृत्व विचलन का शिकार नहीं होता और यदि कोई यह मानता है कि नेतृत्व शांतिकाल में आकर विचलन का शिकार हुआ, तो यह गलत मान्यता होगी। प्रचण्ड ने बाबुराम का विचलन देखा और बाबुराम ने प्रचण्ड का, लेकिन पार्टी ने इन दोनों का विचलन नहीं देखा। यदि देख पाते तो आज यह स्थिति नहीं होती। आज दोनों विचलनों का फ्यूजन हो गया है, इसलिए नेपाल की क्रांति का यह चरण यहीं खत्म हो गया। यह नेतृत्व क्रांति करेगा ऐसा जनता नहीं सोचती। मेरी एक कविता है ‘रामसाइली’ उसके माध्यम से मैं नेपाल के माओवादी आंदोलन के वर्तमान नेतृत्व को इस तरह देखती हूं :

माओवाद जिंदाबाद कहते हुए
प्रचण्ड पथ के गुब्बारे जब ऊपर उड़ने लगे
तब रामसाइली ने अपना नाम रखा लालसाइली
हां, वही रामसाइली आज अपने गुमे हुए हाथ-पैरों को खोज रही है
कहां हैं रामसाइली के पैर
कहीं दिखे तुम्हें, मिले तुम्हें?
देखा जिन्होंने कहा उन्होंने
प्रचण्डपथ बलैरो के पहिए हैं
रामसाइली के पैर
इधर रामसाइली घिसट की घिसट रही है
उधर बलैरो दोड़ पे दौड़ लगा रहा है
हां, यही रामसाइली अपने गुमे हुए हाथ ढूंढ रही है
कहां गुमे रामसाइली के हाथ?
कहीं दिखे तुम्हें, कहीं मिले तुम्हें?
देखने वालों ने कहा
दीपापथ प्लेन के पंख हैं रामसायली के हाथ
इधर प्लेन उड़ान पे उड़ान भर रहा है
और उधर रामसाइली कुंजिए की कुंजिए है
हां, इन्हीं रामसायली के जीवन की आजकल केंटोंमैंट नीलामी हो रही है
5 लाख, 6 लाख, 7 लाख
इसी नीलामी की बोली के बीच
रामसायली सोचती है
यह नीलामी की बोली माओवाद है कि वेश्यावाद

लेकिन बहुत से लोग मानते हैं कि नेपाल का माओवादी आंदोलन सही दिशा में आगे बढ़ रहा है?

इस सवाल के जवाब में भी मैं अपनी एक कविता प्रस्तुत करना
चाहूंगी :
जब माओवादी बिल गेट्स बन गए
तो झोपड़ी ने कहा यह तो खून की होली है
पर महलों ने कहा यही तो दिवाली है
जब लेनिन खु्रश्चेव हो गए
तो नोरा ने कहा, यह विश्वासघात है, लेकिन रेगन ने कहा यही तो मार्क्सवाद है

नेपाल के संदर्भ में कामरेड किरण की क्या भूमिका है? 

नेपाल की जनता के लिए किरण विचार समूह डूबते को तिनके का सहारा जैसा है। कभी-कभी तिनका पार भी लगा देता है।

दक्षिण एशिया खासकर भारत में आप माओवादी आंदोलन का क्या भविष्य देखती हैं?

जहां दमन होता है, वहां प्रतिरोध होता है। जहां प्रतिरोध होता है, वहां ध्वंस होता है और जहां ध्वंस होता है वहां निर्माण होता है। भारत की बहुसंख्य जनता उत्पीड़ित है और उत्पीड़ित जनता कहीं की भी हो, वह विद्रोह करती है। भारत की जनता भी क्रमिक रूप में उठेगी। वह उठ भी रही है।

जैसा कि आपने कहा वर्तमान नेतृत्व ने नेपाल की जनता को धोखा दिया है, तो क्या जनता में इसकी निराशा है?

जिस तरह नेपाल की क्रांति धराशाई हुई, उससे सब लोग स्तब्ध हैं। नेपाल में आशा की बात बहुत कम सुनाई देती है।  मेरी एक कविता है : सपनों का कब्रिस्तान नहीं होता

मरे कहे गए सपने
ज्वालामुखी लेकर आते हैं।
सपनों का डुबान नहीं होता
डूबे कहे गए सपने
सुनामी लेकर आते हैं।
सपनों का राख नहीं होता
बुझे कहे गए सपने
आग लेकर आते हैं।
सपने का मृत्युबीज नहीं होता
बांझ कहे गए सपने नई सृष्टि लेकर आते हैं।
मुझे लगता है कि इतिहास के एक कालखंड में जनता के नायक यदि खलनायक बन भी जाते हैं तो जनता फिर अपने नायक पैदा करती है और नए सपने देखती है। शहीद का बलिदान रक्तबीज पैदा करने वाली कोख है, जो नए नायक पैदा करती रहेगी। जब तक जनता मुक्त नहीं होती, तब तक उसके सपने नहीं मरेंगे।

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