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चीन में सत्ता संघर्ष

Posted by chimeki on March 17, 2012


वेन जियाबाओ

चीन के लिए सबसे बड़ा खतरा अमेरिकी साम्राज्यवाद नहीं है जैसा कि वहां के नेता अपने लोगों को बताते रहते हैं, बल्कि चीनी माओवाद है। यह बात शायद चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ को समझ आ गई है। इसीलिए 14 मार्च की अपनी प्रेस वार्ता में उन्होंने चीनी जनता को माओ के शासन के दौरान हुई गलतियों से सबक लेने की सलाह देते हुए कहा, ‘गैंग आफ फोर को सत्ता से हटाने के बाद पार्टी ने बहुत से ऐतिहासिक मामलों में प्रस्ताव पारित किए थे और यह तय किया था कि चीन की व्यवस्था में सुधार लाए जाएं। अब तक चीन से सांस्कृतिक क्रांति और सामंतवाद की गलतियों को खत्म नहीं किया जा सका है।’

इसके बाद बिना देर किए चुंगकिंग शहर के उपमहापौर वांग लीजुन को गिरफ्तार कर लिया गया। तुरंत ही शहर के पार्टी प्रमुख और चीन की शक्तिशाली कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य बो शिलाई को शहर के सचिव के पद हटा दिया गया। अनुमान है कि वे पार्टी से भी जल्द ही बर्खास्त कर दिए जाएंगे और जैसाकि चीनी चलन है उन पर कई प्रकार के मुकदमे चलेंगे। यह भी हो सकता है कि उन्हें ताउम्र नजरबंद रहना पड़े।

गौरतलब है कि इस वर्ष नवंबर माह में चीन में नेतृत्व परिवर्तन होने जा रहा है। यदि घटनाक्रम से कुछ सबक मिल रहा है तो वह यह कि हर बार की तरह इस बार का भी सत्ता परिवर्तन सहज नहीं होगा। चीन के इतिहास को जानने वाले समझते हैं कि सत्ता का नेतृत्व वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ आने के बाद से आज तक देश में परिवर्तन कभी भी सीधा-सपाट नहीं रहा। माओ के निधन के बाद देंग शओपिंग समर्थकों और गैंग आफ फोर के बीच हुए सत्ता संघर्ष का अंत रक्तरंजित था। गैंग आफ फोर के सभी सदस्यों को तत्कालीन नेतृत्व ने जेल में डाल दिया था। इसके बाद देंग द्वारा ‘घोषित’ उत्तराधिकारी जाओ जियांग के वर्ष 1989 में अपदस्थ होने के बाद जियांग जेमिन ने चीन की बागडोर संभाली थी। जाओ जियांग 15 वर्षों तक नजरबंद रहे।

माना जाता है कि वर्तमान राष्ट्रपति हू जिंटाओ की ताजपोशी ही संघर्षपूर्ण इतिहास में एकमात्र अपवाद था। इसके बाद यह दावा किया जाने लगा था कि सत्ता के लिए संघर्ष इतिहास की बात हो चुकी है और आने वाले बहुत से सालों का रोडमैप चीन के नेतृत्व ने तैयार कर लिया है, लेकिन ताजा घटनाक्रम चीनी नेतृत्व के इस दावे को झुठलाता है।

बो शिलाई कौन है?

बो शिलाई

बो शिलाई चीनी कम्युनिष्ठ पार्टी की पांचवी पीड़ी के नेता है। बो शिलाई के पिता बो यीबो देंग के समय के एक प्रभावशाली नेता माने जाते है। सांस्कृतिक क्रांति के दौरान बो यीबो पर गाज गिरी तो बो शिलाई को भी शारिरिक श्रम करने के लिए गांवों में जाना पड़ा था। लेकिन जो सबसे हैरान करने वाली बात है वह यह कि बो शिलाई अन्य ‘सताए’ गए नेताओं की तरह सांस्कृतिक क्रांति को ‘गंभीर गलती’ नहीं मानते बल्कि उन्होने समय समय पर एक बार फिर सास्कृतिक क्रांति की आवश्यकता पर जोर दिया है। चुंगकिंग शहर का सचिव नियुक्त होने के बाद भ्रष्टाचार और संगठित अपराध के खिलाफ उनके अभियान ने उन्हें शहर की जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया था।

इसके अलावा बो शिलाई ने चुंगकिंग शहर के विकास में ‘माओवादी’ सिद्धांत को लागू किया और माओकाल के बहुत से कार्यक्रमों जैसे गांव चलो मुहिम और लाल गीत के गायन आदि को बढ़ावा दिया। समय-समय पर बो शिलाई शहर की जनता को एसएमएस के जरिए माओ की लाल किताब के उद्धरण भी भेजते रहे। साथ ही चीन के अन्य प्रमुख नेताओं से अलग उन्होंने अपनी छवि मुस्कुराते हुए नेता की बनाई, जो चीन के नेतृत्व में बिरला ही देखने को मिलता है। शायद आखिरी बार लोगों ने माओ को ही हंसते देखा था। बो शिलाई मीडिया से भी खुलकर चर्चा करते हैं और उनकी शक्तिशाली पोलित ब्यूरो की नौ सदस्यीय स्टैंडिग कमिटी में पहुंचने की इच्छा भी किसी से छिपी नहीं है।

चीन में इस तरह की छवि राजनीतिक भविष्य के लिए खतरनाक हो सकती है। तेजी से ‘विकास’ कर रही चीनी अर्थव्यवस्था के लिए माओ विचार को सबसे घातक संकट माना जाता है। चीन ने आर्थिक विकास की कीमत भी चुकाई है। जहां एक वर्ग तेजी से धनवान हुआ है, वहीं किसान और मजदूरों में असंतोष बढ़ा है। माओ के समय विकास कम था और असंतोष लगभग नहीं के बराबर।

भारत की तरह ही चीन का विकास किसानों की कीमत पर हो रहा है। पिछले बर्ष दिसंबर 2011 में भूमि अधिग्रहण के सवाल पर वूकन गांव के लोग चीनी सरकार के विरोध में उतर आए थे और बहुत सालों बाद पहली बार सरकार को पीछे हटना पड़ा था। विकास के चीनी माडल ने देश में असंतोष को इस हद तक बढ़ा दिया है कि माओ के शब्दों में ‘एक छोटी चिंगारी पूरे जंगल को खाक कर सकती है।’ यही वह डर है जिसने बो शिलाई को पार्टी के अंदर अप्रिय बना दिया था। ऐसा भी नहीं है कि असंतोष केवल चीन में है, लेकिन अन्य जगह चुनाव है, पार्टियां हैं। चीन में ऐसा नहीं है। वहां परिवर्तन का मतलब क्रांति ही होता है।

चुंगकिंग शहर के उपमेयर वांग लीजुन भ्रष्टाचार और संगठित अपराध के खिलाफ बो शिलाई की मुहिम के प्रमुख साझेदार को 2 फरवरी 2012 को पद से हटा दिया गया। संभावना है कि ऐसा बो शिलाई की मंजूरी के बाद ही हुआ होगा। बो शिलाई वांग लीजुन से उस समय से खफा चल रहे थे, जबसे अनुशासन कमीशन ने वांग को पद के दुरुपयोग का दोषी पाया था।

बाद में वांग ने खुद को बचाने के लिए बो शिलाई के खिलाफ सबूत होने का दावा अनुशासन कमीशन से किया था। इसी ‘सबूत’ को आधार बनाकर कल यानि पिछले माह 15 फरवरी को बो शिलाई को पदमुक्त कर दिया गया। हालाँकि अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि वे सिर्फ चुंगकिंग शहर के सचिव के पद से हटाए गए हैं या उन्हे पार्टी के पोलित ब्यूरो से भी हटा दिया जाएगा।

सबक

चीन एक अलग ही किस्म का देश है। यह न तो समाजवादी है और न ही पूरी तरह से पूंजीवादी। वर्ष 1980 से आर्थिक सुधार लागू होने के बाद से चीन ने विकास के जिस माडल को अपनाया उससे एक बड़ा मध्यम वर्ग पैदा हुआ, लेकिन राजनीतिक व्यवस्था में किसी भी प्रकार का उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं किया गया। जिसके चलते फलते-फूलते मध्यम वर्ग और सत्ता पर मजबूती से पकड़ बनाए बैठे नेताओं के वर्ग के बीच लगातार तनाव बढ़ता जा रहा है।

मध्यम वर्ग सत्ता में अपनी हिस्सेदारी मांग रहा है और नेताओं का वर्ग इसमें किसी भी प्रकार को कोई समझौता नहीं करना चाहता। इसका प्रमाण है कि पार्टी की 17वीं केंद्रीय कमिटी के सबसे शक्तिशाली 9 सदस्यीय पोलित ब्यूरो में 5 सदस्य चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व सदस्यों की संतानें हैं।

इस तरह की उलझी हुई व्यवस्था के बीच चीन जिस भी रास्ते जाए, नेताओं के इस वर्ग को नुकसान ही होगा। यही कारण है कि दोनों ही किस्म के -समाजवादी और पूंजीवादी परिवर्तन से यह वर्ग घबराता है। पूंजीवादी सुधारों की मांग करने वाले ल्यू शियाबो (वर्ष 2011 के नोबल पुरस्कार सम्मानित राजनीतिक कार्यकर्ता) चीन में कैद हैं और समाजवाद की ओर लौटने की वकालत करने वाले लोग भी। बो शिलाई दूसरी श्रेणी में आते हैं।

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