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सोनी सोरी की न्यायिक सुरक्षा के लिए अपील

Posted by chimeki on March 21, 2012


(भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों के नाम एक खुला पत्र।)

सोनी सोरी

नागरिक होने के नाते हम आप लोगों, सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों, को इस आशा के साथ देखते है कि आप उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करेंगे जो अपने वर्ग, जाति, लिंग और राष्ट्रीयता के कारण शक्तिहीन बने हाशिए पर खड़े हैं।

मुख्य रूप से यह बात आदिवासी महिला सोनी सोरी के केस के संदर्भ में है जिसे छत्तीसगढ़ पुलिस की हिरासत में क्रूर यौन यातना झेलनी पड़ी। हमें बताने हुए बहुत दुख है कि सोनी सोरी की स्थिति लगातार नाजुक बनी हुर्इ है। यह सब इस के बावजूद कि उसने विभिन्न कोर्ट में अपनी सुरक्षा के लिए अर्जी लगार्इ हुर्इ है। हम आप से गुहार लगाते हैं कि विचाराधीन आदिवासी महिला के अधिकारों के हनन के बारे में गंभीरता से ध्यान दिया जाए। इस केस से जुड़े तथ्य और दस्तावेज सर्वोच्च न्यायालय के पास विचाराधीन है (रिट याचिका (सीआरएल) क्रमांक 2062011)।

संक्षेप में, सोनी सोरी एक 35 वर्षीय आदिवासी है जो उस वक्त तक, सितंबर 2011, जब तक कि उसे छत्तीसगढ़ पुलिस ने दंतेवाड़ा से भाग जाने के लिए मजबूर नहीं कर दिया एक सरकार द्वारा चलाए जा रहें आदिवासी विधार्थियों के स्कूल में षिक्षिका और वार्डन के पद पर काम कर रही थी। उस पर माओवादियों का सर्मथक होने के इलजाम के तहत कर्इ मुकदमें चलाए जा रहे हैं।

सोनी सोरी को 4 अक्टूबर 2011 के दिन दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। तब तक उसने छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा उसे फंसाए जाने के संबंध में बहुत से प्रमाण तहलका पत्रिका के सामने प्रस्तुत कर दिए थे। जिसमें एक केस इस्सार रिष्वत मामले से जुड़ा है (http://tehelka.com/story_main50.asp?filename=Ne151011coverstory)।

इस बात के भय से कि हिरासत में छत्तीसगढ़ पुलिस उससे इस खुलासे का बदला लेगी सोनी सोरी ने अपर प्रमुख महानगरीय मजिस्ट्रेट, सकेत जिला अदालत-दिल्ली, तथा दिल्ली उच्च न्यायालय से अपील की थी कि उसे दिल्ली में ही हिरास्त में रखा जाए और उस के मुकदमे की सुनवार्इ छत्तीसगढ़ से बाहर हो। लेकिन 7 अक्टूबर 2011 के दिन सोनी सोरी को छत्तीसगढ़ पुलिस को सौप दिया गया। इस निर्देष के साथ कि छत्तीसगढ़ पुलिस ”उपयुक्त प्रक्रिया का पालन करे।

यह सोनी सोरी का अपनी सुरक्षा के लिए पहला प्रयास था। यह अपील वह आज भी कर रही है जो अब आप की अदालत में है।

दिल्ली हाई कोर्ट  ने भी 8 अक्टूबर 2011 को दिए अपने आदेश में छत्तीसगढ़ पुलिस को 14 अक्टूबर 2011 तक सोनी सोरी की सुरक्षा के संबंध में उठाए कदमों के बारे में रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा था।

यह सोनी सोरी का न्यायायिक प्रक्रिया के तहत पुलिस से खुद के बचाव का दूसरा प्रयास था।

10 अक्टूबर 2011 को सोनी सोरी को दंतेवाड़ा के मजिस्ट्रेट की कोर्ट में प्रस्तुत किया गया। लेकिन सोनी सोरी, जो उस वक्त तक एकदम ठीक हालत में थी जब दिल्ली में उसे छत्तीसगढ़ पुलिस को सौपा गया था, की हालत इतनी खराब थी कि वह अपने पैरों में ठीक तरह से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। यहां तक कि वह पुलिस की गाड़ी से उतर कर कोर्ट तक नहीं पहुंच सकती थी। पुलिस ने दावा किया किया कि ”वह गुसलखाने में फिसल कर गिर गर्इ है और उस के सर पर चोट आर्इ है।

उस दिन सोनी सोरी मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत नहीं हो सकी। और न मजिस्ट्रेट ने उसे देखा। केवल कोर्ट का क्लर्क पुलिस के वाहन तक आया था लेकित तब भी गलत तरीके से कोर्ट शीट में यह दर्ज कर दिया गया कि उसे मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया गया था जिन्होने उसे 14 दिन की न्यायायिक हिरासत में भेजा है।

दंतेवाड़ा के जिला अस्पताल के निरिक्षक डाक्टर और जगदलपुर के सरकारी मेडिकल कालेज ने दर्ज किया है, ‘सोनी सोरी के अचेतन होने का इतिहास है और ‘वह कमर में दर्द के कारण अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती और उसके सर और कमर में चोट के निषान है तथा उसके पैरों के अंगूठे में काले निशान हैं जो इस बात का संकेत है कि उसे बिजली के करेंट दिए गए थे।

अपने परिचितों तथा वकील को दिए गए अपने बयानों में और सर्वोच्च न्यायालय को संबोधित पत्र में, सोनी सोरी ने हिरासत के दौर उसे दी गर्इ यातना के बारे में बताया है। उसने कहा है कि 8 और 9 अक्टूबर की रात को उसे दंतेवाड़ा पुलिस स्टेषन के सेल से जबरन बाहर निकाला गया और एसपी अंकित गर्ग के कक्ष में ले जाया गया। वहां उसे नंगा कर करेंट दिया गया और ”उसके गुप्तांगों में बैटन और पत्थर डाले गए।  जब वह दूसरे दिन जागी तो उसके शरीर में बहुत दर्द था, सबसे अधिक दर्द उसकी गर्दन, पीठ में था और उसके पेट के निचले हिस्से में तीव्र दर्द था। उसने अपने वकील को बताया (एफिडेविट की कापी सर्वोच्च न्यायालय के पास जमा है) कि उसकी यौनी में बहुत से पत्थर डाले गए थे जिसमें से कुछ को उसने किसी तरह निकाल लिया लेकिन सब को नहीं निकाल पार्इ।

सर्वोच्च अदालत ने माना कि सोनी सोरी पर लगे जख्म उतने साधारण नहीं है जितना राज्य सरकार बता रही है और अदालत ने कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कालेज अस्पताल में इस संबंध में स्वतंत्र जांच के आदेष दिए।

25 नवंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत मेडिकल रिर्पोट में बताया गया है कि सोनी सोरी की यौनी में गहरे में दो पत्थर पाए गए है और एक पत्थर उसके मलाषय में मिला है। एमआरआर्इ स्केन से यह भी पता चला है कि उसकी रीढ़ में गोल मांस फटने के निषान मौजूद है। यह सब हिरासत के दौरन उसे दी गर्इ यौन उत्पीड़न और हिंसा को प्रमाणित करता है।

इसके बावजूद 1 दिसंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेष दिया कि सोनी सोरी को अगले 55 दिनों के लिए, जब तक की अगली सुनवार्इ नहीं होती छत्तीसगढ़ राज्य की पुलिस हिरासत में रखा जाए। माओवादी मुददों की छाया वाले मामलों में हिंसा की संभावना की आषंका के चलते और मेडिकल परिक्षण की रिपोर्ट की रोशनी में हमें खेद है कि जिम्मेदार पुलिस अफसरों के खिलाफ किसी भी किस्म की तत्काल कार्यवाही नहीं की गर्इ और सोनी सोरी की सुरक्षा को अगली सुनवार्इ तक टाल दिया गया।

आखिरकार कोर्ट ही यौन उत्पीड़न से पीडि़त को उसके उत्पीड़क से बचा सकती है। तब तो यह और भी जरूरी हो जाता है जब गंभीर किस्म के आरोप वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर लगें हो। यह कोर्ट ही कर सकती थी कि वह इस बात को सुनिषिचत करें कि सोनी सोरी की हालत और अधिक कष्टकार्य न बन जाए जबकि उसने अपने ऊपर हुर्इ यातना के खिलाफ बातें रखी है। यह उसने उस हालत में किया जब कि उसे और उसके परिवार वालों को धमकियां दी जा रही है।

केवल न्यायालय ही स्पष्ट संकेत दे सकता है कि नागरिकों के अधिकारों की जाएगी, और जब पुलिस अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करेगी तो न्यायपालिका खमोश नहीं रहेगी। यह अदालत ही कर सकती है कि वह छत्तीसगढ़ पुलिस को कानून के अनुसार चलने के लिए बाध्य करे और यदि इसके बावजूद वह नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करती है तो उसे भी कानून के तहत जिम्मेदार ठहराया जाए और सजा दी जाएगी।

हमें आशा है कि सर्वोच्च न्यायालय इस बात को सुनिश्चित करेगी की इस विचाराधीन आदिवासी महिला को न्याय मिले और कोर्ट इस बात की मिसाल कायम करेगी कि नाजुक स्थितियों में खड़े लोगों की संविधान प्रदत्त कानूनी और मानव अधिकारों की रक्षा हो।

-उमा चक्रावर्ती, बि्रंदा करात, रोमिला थापर, मधु भादुड़ी, इमराना कादिर, फरहा नक्वी, वसंथ कन्नाबिरन, ललिता रामदास, गीता हरिहरन, सी सत्यमाला, मीरा शिवा, वीना शत्रुग्ना, जयती घोष, रोहनी हेन्समैन, संध्या श्रीनिवासन, वीना पूनाचा तथा 172 अन्य व्यक्ति और 109 संगठन 

 अनु. विष्णु शर्मा

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