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बढ़ती असहिष्णुता

Posted by chimeki on March 22, 2012


राष्ट्रीय और धार्मिक प्रतिबंधों के पीछे क्या है?
1980 के मध्य में, जब उस तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी अपने उस ‘‘हिन्दू समर्थन’’ को, जो उन्हे 1984 के बाद सिक्खों की हत्या के एवज में मिले थे, मजबूत करने की मंशा के चलते संघ परिवार के बढ़ते प्रतिरोध को तुष्ट करने में लगे थे उन्हांेने इसे संतुलित करने के लिए मुस्लिम कट्टरपंथियों को भी कुछ रियायतें दी। सबसे पहले उन्होंने शाह बानो मामले में मुस्लिम तलाकशूदा को मिलने वाले निर्वाह संबंधी सर्वोच्च अदालत के फैसले को प्रभावहीन किया, फिर सलमान रुश्दी के उपन्यास द सेटनिक वर्सेज के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। दो दशक बाद राजीव गांधी के पुत्र और प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता उसी विवाद को बना कर तैयार किया जा रहा। और इस काम में उन्हीं तरीकों का सहरा लिया जा रहा है।

इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि उत्तर प्रदेश का मदानी परिवार जिसके नियंत्रण में दारुल उलूम देओबंद है, और जिसने पहली बार जयपुर साहित्य महोत्सव (जेएलएफ) में रुश्दी की उपस्थिति को मुद्दा बनाया था पारंपरिक तौर पर कांग्रेस पार्टी के करीब रहा है और यह भी कि कांग्रेस शासित राजस्थान के एक अति वरिष्ठ अधिकारी ने ही रुश्दी पर गुंडे/आतंकी हमले की झूठी कहानी गढ़ी थी ताकि रुश्दी कार्यक्रम से किनारा कर लें। राज्य की वे संस्थाएं जो निर्पेक्ष कहलाती है का इस सीमा तक राजनीतिक भ्रष्टिकरण और उनके साथ उसकी मिलीभगत जिनके राजनीतिक उद्देश्य़ है हैरान करने वाली है। रुश्दी का मामला सुरक्षा का मामला न हो कर एक राजनीतिक संदेश है जो चुनाव होने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की जनता को कांग्रेस देना चाहती है यह तब स्पष्ट हो गया जब रुश्दी को इस बात की भी अनुमति नहीं दी गई कि वे वीडिओ काफ्रेंसिंग के जरिए लोगों को संबोधित करें।

यह घटना याद दिलाती है कि कैसे कांग्रेस ने हमेषा धार्मिक रूढि़वाद के सबसे खतरनाक रूप को चुनाव जीतने का औजार बनाया है। इस घटना ने जेएलएफ के आयोजकों पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है जिन्होने लगातार लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सौदा तकतवर और हिंसक प्रयोजको से किया।

सलमान रुश्दी के कार्यक्रम का न होना आजादी से विचार रखने और उन्हे व्यक्त करने के अधिकार के हनन के अनेक मामलों में एक है जो आजकल भारत में लगातार सामने आ रहे हैं। स्वतंत्र विचार के प्रति असहिष्णुता न केवल कट्टर समुदाय के स्वयंभू नेताओं में बल्कि राज्य और उसके निकायों में भी बढ़ रही है। चाहे तमाम वे घटनाएं हों जहां राज्य ने उन लोगों पर राजद्रोह का मुकदमा लगाया हो जिन्होने उस की नीति की आलाचना की हो या किसी विशेष पाठ्य पुस्तक को जो ‘‘भावनाओं को आहत’’ करती है, पाठयक्रम से हटा लेने की मांग हो, या फिर फिल्मों और किताबों को प्रतिबंधित करने या जलाने की घटनाएं हो, यह बढ़ ही रही है। सैयद अली शाह गिलानी से लेकर अरुणधति राय, संजय काक से लेकर एके रामानुजन, एमएफ हुसेन से तसलीमा नसरीन, जेम्स लेन से जोजफ लेलवील्ड यह सुची बहुत लंबी है और लगातार लंबी हो रही है।

अब न केवल धार्मिक समुदाय, जो अपने शक्ति के प्रतिकों पर होने वाले किसी भी हमले के प्रति अति संवेदनषील है बल्कि दूसरे समुदाय, जो खुद को समुदाय के रूप में देखते हैं -जैसे जाति और राष्ट्रीयता- भी बहुत तेजी से विचार, शब्दों और प्रतिनिधित्व के कारण ‘‘आहत’’ होने लगे हैं। समुदायों का इस तरह से आहत महसूस करने के पीछे दो कारण हो सकते है। यह तो इस तरह की आहत करने वालीं गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है अथवा ऐसी गतिविधियों को चुनौति न देने के चलते इन समुदायों को राजनीतिक नुक्सान उठाना पड़ा है। हमें संभवतः इसे उस प्रक्रिया की निरंतरता के रूप में समझना चाहिए- समुदाय को सीमा के अंदर रखना- जिसके चलते आॅनर किलिंग (प्रतिष्ठा के लिए हत्या) और जातिगत हिंसा होती है। समुदाय की सीमा की रक्षा करने का एक अर्थ यह भी है कि समुदाय के सदस्यों को समुदाय के शक्ति संबंधों और उसके उत्पीडक ढांचे को स्वीकार करने का अनुषासन सिखाया जाए।

इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि जब समुदाय के प्रतिनिधि समुदाय की मान्यताओं का उल्लंघन करने वालों को धमकाते है या उनके खिलाफ हिंसा का प्रयोग करते है तो उनका मकसद इन उल्लंघन कर्ताओं पर उपरी तौर पर हमला करना ही होता है। उनका असल मकसद तो अपने समुदाय के अपेक्षाकृत कमजोर, बेनाम सदस्यों को यह संदेश देना होता है कि वे प्रचलित शक्ति ढांचे पर सवाल खड़े न करें। रूढि़वादी ताकतों का निषाना सलमान रुष्दी या एमएफ हुसेन या तसलीमा नसरीन नहीं होते, उनका असल निषाना ’’सामान्य जन’’ है जो अपने जीवन में असंख्य बगावतों को रोजाना अंजाम देते हैं। यही कारण है कि ऐसे समय में जब मुल्लाह और महंत राजनीति में तेजी से हाशिए पर पहुंचते जा रहे है उतनी ही तेजी से उनका अधर्मियों के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा है।

यदि यह बात धार्मिक एवं अन्य समुदायों के लिए सही है तो यह उतनी ही सही भारतीय राष्ट्र के लिए भी है। सैयद अलि गिलानी या अरुणधति राय पर राजद्रोह के मुकदमों की धमकी उन सभी लोगों को डराने की कोशिश का हिस्सा है जो भारतीय राष्ट्र और उसके महंत और मुल्लाओं की अपने जीवन संघर्ष में प्रतिदिन अवज्ञा करते है। राजद्रोह की बात ही क्या, जिस तरह के कदम भारतीय राज्य ने देश पर विदेशी टीवी कार्यक्रम में मामूली चुटकुलों के खिलाफ उठाए है उससे साफ पता चलता है कि हमारा देष और राष्ट्र कितना दुर्बल और उसका आत्मविश्वस कितना कमजोर हुआ है। जैसा कि ताहमीमा अनम ने जेएलएफ में कहा था, ‘‘प्रतिबंध लगाना राज्य की दुर्बल अवस्था को उजागर करता है।’’ हम इस परिभाषा में धर्म को भी जोड़ सकते है।

संचार और सूचना के माध्यम में हुए जबर्दस्त विकास से यह साबित हो गया है कि राज्य और समुदाय अब शब्दों और उनके अर्थो पर उस तरह का नियंत्रण नहीं रख सकते जैस वे पहले कर पाते थे। आज लोग ऐसे विचार और दृष्टिकोण को सहजता से जान सकते है जिनकी जानकारी उन्हे पहले नहीं होती थी, लोगों के विचारों -भौगोलिक और विचारधारात्मक- के आदान-प्रदान की कोई तय सीमा नहीं रह गई है। ईश-निंदा का आरोप लगना इन धर्म, जाति और राष्ट्र जैसे कल्पित समुदायों के लिए अपनी रक्षा का अंतिम विकल्प है। लेकिन तब भी उन लोगों को जो इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में खुद को फंसा हुआ पाते हैं इस बात से अधिक तसल्ली नहीं मिलेगी। यह राज्य का कर्तव्य है कि वह व्यक्ति के अधिकारों की गारंटी करे। जाहिर है कि मौलिक अधिकारों की घोषण का उद्देश्य़ यही था कि राज्य और समुदाय की ज्यादतियों से व्यक्ति को बचाया जाए और यह भी कि ‘‘स्वतंत्रता हमेशा उन लोगों के लिए होती है जो अलग तरीके से सोचते विचारते है।’’ यदि हम उन लोगों के अभिव्यक्ति के अधिकारों की रक्षा नहीं करगें जिन्हे हम नहीं सुनना चाहते तो ऐसे में हम अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का ही गला घोंट रहे होंगे।

इकोनामिक एंड पोलिटिकल वीकली के 11 फरवरी, 2012 अंक का संपादकीय।

अनु: विष्णु शर्मा

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