छिमेकी

know your neighbour

Archive for May, 2012

नेपालः संविधान की ओर बढ़ते कदम

Posted by chimeki on May 21, 2012


नेपाल में संविधान निर्माण की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण की ओर अग्रसर है। संविधान सभा की चार बड़ी पार्टियां और उसके 12 शीर्ष नेताओं ने संघियता के मुद्दे पर सहमती बना ली है। गणतंत्र नेपाल में अब 11 राज्य होंगे। पिछले दिनों माओवादी लड़ाकों की कमान सरकार के हाथ में आने के बाद केवल संघियता ही ऐसा मुद्दा था जिस पर विवाद बना हुआ था। 15 मई को 11 प्रदेश पर इन दलों और नेताओं के बीच बनी सहमती ने इस आखरी गांठ को भी सुलझा दिया है। इस के साथ नेपाली कांग्रेस और एमाले के सरकार में शामिल होने से बाबुराम भट्टाराई की सरकार राष्ट्रीय सहमती की सरकार में बदल गई है। यह जरूरी नहीं की 28 मई को संविधान पास हो ही जाए लेकिन इसका पहला ड्राफ्ट पेश होना तय हो गया है और इसके आधार में दल संविधान सभा को एक बार फिर कुछ महीने बढ़ाने को राजी हो सकते हैं।

2006 के जनआंदोलन ने नेपाल से राजतंत्र का अंत कर दिया था। 2008 में एक अंतरिम संविधान के तहत संविधान सभा का चुनाव हुआ था। संविधान सभा के बनने के बाद से हाल तक यह सभा कम और नेताओं के अहं के टकराव का अखाड़ अधिक नजर आती थी। अपने चार साल के कार्यकाल में इस सभा ने नेपाल को चार प्रधानमंत्री और सैंकड़ो मंत्री दिए हैं। संविधान सभा की सबसे बड़ी पार्टी एकिकृत नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड गणतंत्र नेपाल के पहले प्रधानमंत्री बने। उनका कार्यकाल 8 महीने का रहा। नेपाली सेना के तत्कालीन अध्यक्ष जनरल रुकमंगत कटवाल के साथ हुए विवाद और समर्थक पार्टियों के असहयोग के चलते प्रचण्ड को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एमाले) के माधव नेपाल ने नेपाली कांग्रेस और मधेशी मोर्चा के समर्थन में प्रधानमंत्री पद की शपत ली। माओवादी पार्टी ने माधव नेपाल की सरकार को कठपुतली सरकार कह कर सरकार में शामिल होने से इंकार कर दिया। जिस दिन संविधान सभा का कार्यकाल पहली बार बढ़ाया गया उस दिन, माओवादी पार्टी के दवाब में, माधव नेपाल ने प्रधानमंत्री पद छोड़ देने की घोषणा की। इसके बाद झलनाथ खनाल प्रधान मंत्री बने और कुछ माह बाद बाबुराम भट्टराई।

बाबुराम भट्टराई के पद संभालने के बाद संविधान निर्माण ने गति पकड़ी। अकादमिक पृष्ठ भूमि के बाबुराम भट्टराई को समर्थक पार्टियों और माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड का भरपूर सहयोग मिला। उनका कार्यकाल ही ऐसा कार्यकाल रहा जहां संविधान निमार्ण के ऐजेंडे पर प्रमुख दल चिंतित नजर आए। ‘एक कदम आप, एक कदम हम’ की शैली में दलों ने एक दूसरे से सहयोग किया। जहां माओवादियों ने जनयुुद्ध के दौरान कब्जा की जमीन लौटाने और माओवादी सेना को नेपाली सेना के हवाले करने की पहल कदमी ली वहीं नेपाली कांग्रेस ने 7 प्रदेश की अपनी जिद्द को छोड़ते हुए 11 प्रदेश पर सहमती जताई। साथ ही यह भी तय कर लिया गया कि नेपाल की शासन प्रणाली मिश्रित होगी तथा इसमें प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति और संसद से अनुमोदित प्रधान मंत्री होगा। दोनों के अपने अपने कर्तव्य-कार्यक्षेत्र होंगे।

संविधान निर्माण की प्रक्रिया को यहां तक पहुंचाने में बाबुराम भट्टराई की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। प्रचण्ड के कार्यकाल में राजनीतिक दलों के बीच विश्वास की जो कड़ी टूटी थी उसे जोड़ने में डाॅ भट्टराई कामयाब हुए। माओवादी पार्टी के अध्यक्ष प्रचण्ड ने भी इस प्रयास में बाबुराम भट्टराई का यथाशक्ति सहयोग किया। जनयुद्ध के दौरान जो जमीन भूमिहीन किसानों को माओवादी पार्टी ने बांटी थी उसे लौटाने या माओवादी लड़ाकों को सेना के नियंत्रण में रखने जैसे कठिन फैसलें हो, बाबुराम भट्टराई ने इसे लागू करने में सफलता पाई। यह सब इस के बावजूद की खुद माओवादी पार्टी का एक बड़ा हिस्सा इसके पक्ष में नहीं है और वह इन फैसलों को वापस लेना का हर संभव दवाब पार्टी पर डाला रहा है।

प्रधान मंत्री के रूप में बाबुराम भट्टराई की सफलता का प्रमुख कारण नेपाल के अंदर और बाहर उनकी स्वीकारिता है। उनकी छवी एक ऐसे नेता की है जो सब को साथ ले कर चल सकता है और ’प्रेक्टिकल’ हो कर सोच सकता है। माओवादी पार्टी में डाॅ भट्टराई ही एक मात्र ऐसे नेता है जो 2003 से ही गणतंत्र नेपाल और नए संविधान को माओवादी आंदोलन का अंतिम लक्ष्य बताते आए हैं। दूसरी ओर माओवादी पार्टी के अन्य नेता हाल तक संविधान सभा को साम्यवादी क्रांति संपन्न करने के साधन के रूप में ही देखते थे। इसके अलावा डाॅ भट्टराई में पड़ोसी देश भारत एक भरोसेमंद सहयोगी देखता है। नेपाल की राजनीति में यह जरूरी है! जनयुद्ध के समय से ही डाॅ भट्टराई राजतंत्र के खिलाफ भारत का समर्थन लेने के पक्षधर रहे थे। अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही वे मानते रहे हैं कि नेपाल की मूल समस्या पड़ोसी देश भारत का दखल न हो कर राजतंत्र है और पार्टी को संसदीय दलों के साथ सहकार्य कर राजतंत्र के खिलाफ आंदोलन करना चाहिए। इस लाइन का समर्थन करने के चलते ही 2005 में माओवादी पार्टी ने उन्हे नजरबंद कर दिया था। उस समय पार्टी के अंदर यह विचार प्रबल था कि माओवादी पार्टी को राजा ज्ञानेंद्र के साथ सहयोग कर भारत और नेपाली संसदीय दलों के खिलाफ मोर्चा बंदी करनी चाहिए।

उल्लेखित कारणों के चलते डाॅ बाबुराम भट्टराई में एक ऐसे ‘पुंज’ का निमार्ण हुआ जिसने नेपाल की राजनीति में जमी बर्फ को पिघला दिया। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि जो राजनीतिक गतिरोध बाबुराम भट्टराई तोड़ने में सफल नजर आ रहे है वह मुख्य रूप से राजनीतिक दलों के बीच का गतिरोध है। नेपाल की राजनीति का गतिरोध अभी टूटना बांकी है।

Advertisements

Posted in Nepal | Tagged: , , , , | Leave a Comment »

काले धन से मुक्ति

Posted by chimeki on May 16, 2012

विष्णु शर्मा

देर से ही लेकिन विश्व समुदाय कर चोरी और काले धन के प्रति जागा है। अमरीका, फ्रंास और जमर्नी ने इस मामले में पहल कदमी लेते हुए अपने देशों के बड़े उद्योगपतियों पर कार्यवाही शरू कर दी है वहीं भारत में जनदवाब के चलते सरकार को इस संबंध में कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

लगातार मंदी की शिकार अर्थव्यवस्था ने दुनिया भर के विकसित देशों को कर चोरी और काले धन को आश्रय देने वाले देशों पर दवाब डालने पर मजबूर कर दिया है। हाल में युरोपीय संघ की संसद में एक प्रताव पारित हुआ है जिसका सार है कि संघ के देशों और उसके प्रभाव वाले देशों में दवाब बनाया जाना चाहिए कि वे अपने यहां की बैंकिंग व्यवस्था को पारदर्शी बनाए और कर चोरी करने वालों पर कार्यवाही करने में सहयोग करें। प्ररित प्रस्ताव के अनुसार ऐसा न कर पाने के चलते दुनिया भर में युरोपीय संघ की विदेश नीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इससे पहले 2009 में अमरीका ने स्विसजरलैंड के सबसे बड़े बैंक यूएसबी पर कार्यवाही की थी और 75 अरब डाॅलर का जुर्मना लगाया था। अमरीकी सरकार का आरोप था कि बैंक अमरीकी नागरिकों द्वारा कर की चोरी में मदद देता है। अमरीका की इस कार्यवाही ने स्विस सरकार को मजबूर किया है कि वह अपनी बैंकिग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की पहल करे। अक्टूबर 2010 को स्विस सरकार ने ‘अवैध संपत्ति के प्रत्यर्पण कानून’ को मंजूरी दी। यह फरवरी 2011 से देश में लागू हो गया है। इस कानून के लागू होने से आशा की जा रही है कि अवैध तौर पर जमा धन को संबंधित देशों में वापस लाया जा सकेगा। स्विस बैंकर संघ के अनुसार स्विसजरलैंड के बैंको में निजी विदेशी ग्राहकों का 20 खरब डाॅलर से अधिक का धन जमा है। जिसमें से 15 खरब डाॅलर अफ्रिका और मध्य पूर्व के देशों से आया है।

नोर्वे की एक संस्था एंटी-करप्शन रिसोर्स सेंटर के अनुसार कर चोरी से अफ्रिकी मुल्कों को हर साल अपने सकल घरेलू उत्पादन का 25 फिसदी खोना पड़ता है। यह सारा धन एक ओर इन देशों की विकास की संभावना को क्षिण करता है वही काले धन के आश्रय वाले देशों को बिना उत्पादन के पूंजी प्रदान करता है जो उनकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखता है।

कर चोरी और काले धन को आश्रय देने का इतिहास पुराना है। इस मामले में स्विजरलैंड सबसे आगे है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया भर में विदेशों में रखे काले धन का 30 फिसदी स्विजरलैंड के बैंकों में रखा है।

दूसरे विश्व युद्ध के शुरूआती समय में स्विजरलैंड की सरकार ने खुद को निष्पक्ष देश घोषित करवाने में सफलता हासिल कर ली। हालांकि वह कितना निष्पक्ष था इससे समझा जा सकता है कि जमर्नी से जान बचा कर देशा में प्रवेश करने वालें यहूदियों को इसने अपनी जमीन से बाहर कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप हजारों यहूदियों को अपनी जान गवानी पड़ी।
द्वितीय विष्व युद्ध के दौरान स्विस सरकार ने अपने बैंकिग कानून को सख्त किया और जमाकर्ता की पहचान जाहिर करने को दंडनीय अपराध बना दिया। परिणाम स्वरूप विदेशी लोगों को युद्धकाल में अपने धन को सुरक्षित रखने की सुविधा हासिल हो गई। युद्ध के बाद यह काले धन के आश्रय देश के रूप में विकसित होता गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्विस सरकार पर कर चोरी करने वालों और भ्रष्ट नागरिकों के नामों का खुलासा करने का दवाब बनाना एक महत्वपूर्ण कदम है लेकिन इससे अधिक आशा नहीं करनी चाहिए। सबसे पहली बात तो यह कि स्विजरलैंड ही ऐसा एक मात्र देश नहीं है बल्कि अमरीका और ब्रिटेन भी काले धन को आश्रय देने वाले देशों में आते है। अमरीका में लैटिन अमरीकी नागरिकों का पैसा बे रोकटोक प्रवेश करता हैै। उसके डेलेवेयर और नवेडा राज्यों के कानून कर चोरी और काले धन के महत्वपूण आश्रय स्थल है। ब्रिटेन में यह काम चैनल द्विपों में होता है। ये सरकारें तब तक ही अन्य आश्रय देने वाले देशों पर दवाब बनाती हैं जब तक मामला इनके अपने देशों में कर चोरी से जुड़ा होता है। इसलिए जरूरी है कि इसे रोकने का प्रयास संबंधित देशों में ही किया जाए। यदि विकासशाील देश अपने यहां की पूंजी के निर्यात को रोकना चाहते है तो उन्हें इस संबंध में विकसित मुल्कों से सहयोग की बहुत आशा नहीं करनी चाहिए और स्वयं पहल करनी चाहिए। इसके लिए सबसे पहला कदम होगा अपने देश के राजनीतिक ढांचे को दुरुस्त करना। बिना राजनीतिक ढांचे को ठीक किए काले धन के रूप में निर्यात होने वाली पूंजी को रोका नहीं जा सकता।

दूसरी और सिंगापोर जैसे देश हंै जो स्विस सरकार पर बढ़ते दवाब का फायदा लेने की तैयारी में है। सिंगापोर की सरकार ने हाल में ऐसे कानून बनाए है जो जमाकर्ता की पहचान छिपाने में स्विस कानूनों से भी कठोर है। इस वजह से बहुत से स्विस बैंकों के अपने व्यवसाय को सिंगापोर स्थानांतरित कर लिया है। जहां वर्ष 2000 में सिंगापोर में केवल 20 बहुराष्ट्रीय बैंक थे वहीं 2011 में इनकी संख्या बड़ कर 106 हो गई है।

इसके अलावा स्विस बैंकर अब अस्थिर और गरीब देशों के धनी ग्राहकों को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। बैंकरों का मानना है कि स्थिर देशों की सरकारें इस हालत में नहीं रहती की वह काले धन की पुनः प्राप्ति का दवाब बना सके। कुल मिलाकर इन देशों के लिए अफ्रिकी और एशियाई देशों में अस्थिरता जरूरी है।

Posted in India | Tagged: , , | Leave a Comment »

यह बीबीसी हिंदी है

Posted by chimeki on May 16, 2012


वर्ष 2012 में भारत की संसद ने 60 साल पूरे किए और बीबीसी विश्व सेवा भी अपनी 80वीं वर्षगांठ धूमधाम से मना रही है. मेरे एक मित्र जो बीबीसी हिंदी सेवा के साथ लंबे समय तक जुड़े हुए थे, बीबीसी की इस उपलब्धि पर उन लोगों से अधिक प्रसन्न हैं जो आज भी बीबीसी से जुड़े हुए हैं. बीबीसी से उनका जुड़ाव ऐसा है कि उनके लिए इंटरनेट का मतलब ही बीबीसी है.

उनकी बीबीजी (वे अपनी पत्नी को इसी अंदाज से बुलाते हैं) बताती हैं कि दफ्तर से घर लौटते ही सीधे बीबीसी का ‘पहला पन्ना’ खोल कर बहुत देर तक उसे घूरते रहते हैं. फिर एक ऐसी खबर खोज लेते हैं जो और किसी वेबसाइट में नहीं होती. पूरे गर्व के साथ उसे चटकाते  हुए कहते हैं, ‘ये बीबीसी है’.

हालांकि वे दूसरी वेबसाइट और ब्लॉगों के चक्कर भी कभी-कभी काट लेते हैं,  लेकिन सिर्फ इसलिए कि देख सकें कि ‘उनमें जहालत की कौन सी नई उंचाइयां-निचाईयां छुई जा रही हैं.’ और एक मैं हूं कि जिसे बीबीसी ने कभी इतना उत्साहित नहीं किया कि बिना उनके आग्रह के वेबसाइट खोलूं. हां जब नरेलाजी बीबीसी की किसी खबर को अपनी फेसबुक वॉल पर चस्पा करते है तो उसे जरूर देख लेता हूं. बस इतना ही.

अपने उस मित्र की यात्रा से अलग, जो बीबीसी से फेसबुक की ओर बढ़ती है, मैं फेसबुक से बीबीसी की ओर जाता हूं. कभी-कभी मेरी इस लापरवाही पर मेरे मित्र गुस्सा भी हो जाते हैं. हांलाकि वे जनपक्षधर हैं और वैकल्पिक मीडिया के बहुत बड़े हिमायती भी, लेकिन सोशल मीडिया पर उनके विचार कपिल सिब्बल और काटजू के करीब होते हैं. एक बार मुझसे कहने लगे, ‘तुम उस्तरा पकड़ू बंदर हो. कुंए के मेंढक  हो. दुअन्नी छाप ब्लॉग पर अपनी भड़ास निकालते हो. ऐसे बनोगे बड़े पत्रकार?’

जब मैं तब भी नहीं माना तो उन्होंने  मुझे मेरी औकात बता दी. कहने लगे, तुम ‘हिंदी के कुंठित, अयोग्य, अपनी उचक्की करतूतों के कारण बेरोजगार किंतु ब्लॉग  के जरिए काम मिलने तक येन-केन प्रकारेण चर्चा में बने रहने को उत्सुक, नाना प्रकार की चालाक निंदा-स्तुति करते हुए इर्ष्यावश हमला करने वाले गिरोह के सक्रिय सदस्य हो. जिस दिन कुछ पा जाओगे ‘तो तत्काल ब्लॉगबाजी छोड़ कर अफसरों, संपादकों या मालिकों के सामने फुल-टाइम दुम हिलाने’ लगोगे. तुम्हारी जगह तुम्हारे जैसे नए ‘स्ट्रगलर्स’ ले लेंगे.’

बस फिर क्या था? उनकी बात मुझे लग गई. मैंने सोच लिया कि इंटरनेट पर बैठते ही सबसे पहले दुअन्नी छाप वेबसाइटें नहीं, बस बीबीसी ही देखूंगा. मुझे नहीं रहना नाबदान, पीकदान या थूकदान में . मैं बीबीसी पढ़कर बनूंगा महान. वैसे रखा क्या है इन दुअन्नी छाप वेबसाइटों में लिंगाराम कोड़ोपी और सोनी सोरी के सिवा?

जैसे ही मैंने बीबीसी का ‘पहला पन्ना’ खोला मेरी तो दुनिया ही बदल गई. मैं सीधा ब्रिटेन की एक दुकान के सामने पहुंच गया जहां मिल रही थी, ‘रानी की चड्डी’ (शुक्रवार, 11 मई). दुकान के इधर-उधर झांकने पर पता चला कि  ‘एक डॉक्टर को महंगा पड़ा मरीज के स्तनों को ‘ज्यादा घूरना’ (शनिवार, 12 मई). और यह भी पता चला कि अमरीका में ‘स्तनपान वाली तस्वीर पर विवाद’ (शुक्रवार, 11 मई) हो गया है.

बीबीसी पढ़ने पर मेरे अंदर एक और परिवर्तन आया है. मैं अब स्तनों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया हूं. हर रोज बीबीसी में स्तन संबंधी एक खबर जरूर होती है और वह हमेशा सबसे अधिक पढ़ी गई खबर होती है. आज मुझे पता है कि ’स्तन में सिलिकॉन लगाया जाना सुरक्षित है’ और फ्रांस ने अपनी 30 हजार महिलाओं को ‘ब्रेस्ट इमप्लांट’ हटाने को कहा है. इस संबंध में जो सबसे बड़ी खोज बीबीसी के खोजी पत्रकारों ने की है वह यह है कि औरतें ’सीने में बम’ लेकर चलती हैं. मेरा सुझाव है कि भारत सरकार को बस, ट्रेन और संवेदनशील स्थानों के साथ साथ औरतों के ब्लाउजों पर भी लिख देना चाहिए, ‘औरतों के पास बैठनें से पहले उनके ब्लाउज में झांक लें वहां बम हो सकता है.’

यह बीबीसी की जानकारी का नतीजा है कि आज मैं यह जानता हूं कि ब्राजील की महिलांए बहुत हिम्मत वाली होती है और वे बिकनी पहन कर पुल पर कैटवाक कर सकती हैं. और यह भी कि जर्मनी के लोग सरकार की नीतियों पर विचार विमर्श कर (जैसाकि हम लोग अपने ब्लॉगों में करते रहते हैं) अपना समय खराब नहीं करते बल्कि वे लोग नग्नता जैसे गंभीर मुद्दों पर बातचीत करते हैं. मुझे यह भी पता है कि पेरू में लोगों ने सड़क सुरक्षा के लिए नग्न होकर साइकिल की सवारी की. इससे पहले मेरे लिए पेरू का मतलब शायनिंग पाथ (वहां का माओवादी आंदोलन) और कामरेड गंजेलो था.

तो दोस्त, कैसी लगी दुनिया की खबरों की मेरी जानकारी? अब तो मैं नाबदान नहीं हूं. अब तो तुम मुझे उस्तरा पकड़ू बंदर नहीं कहोगे? तुम्हें पूरी तरह यकीन आ जाए इसलिए आज की सबसे बड़ी खबर तुम्हें सुनाए देता हूं. आज बीबीसी ने बताया है कि ‘दिल के दौरे के बाद सेक्स खतरनाक नहीं होता’. तो मजे करो .

Posted in India | Tagged: , , , | Leave a Comment »

 
%d bloggers like this: