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काले धन से मुक्ति

Posted by chimeki on May 16, 2012


विष्णु शर्मा

देर से ही लेकिन विश्व समुदाय कर चोरी और काले धन के प्रति जागा है। अमरीका, फ्रंास और जमर्नी ने इस मामले में पहल कदमी लेते हुए अपने देशों के बड़े उद्योगपतियों पर कार्यवाही शरू कर दी है वहीं भारत में जनदवाब के चलते सरकार को इस संबंध में कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

लगातार मंदी की शिकार अर्थव्यवस्था ने दुनिया भर के विकसित देशों को कर चोरी और काले धन को आश्रय देने वाले देशों पर दवाब डालने पर मजबूर कर दिया है। हाल में युरोपीय संघ की संसद में एक प्रताव पारित हुआ है जिसका सार है कि संघ के देशों और उसके प्रभाव वाले देशों में दवाब बनाया जाना चाहिए कि वे अपने यहां की बैंकिंग व्यवस्था को पारदर्शी बनाए और कर चोरी करने वालों पर कार्यवाही करने में सहयोग करें। प्ररित प्रस्ताव के अनुसार ऐसा न कर पाने के चलते दुनिया भर में युरोपीय संघ की विदेश नीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इससे पहले 2009 में अमरीका ने स्विसजरलैंड के सबसे बड़े बैंक यूएसबी पर कार्यवाही की थी और 75 अरब डाॅलर का जुर्मना लगाया था। अमरीकी सरकार का आरोप था कि बैंक अमरीकी नागरिकों द्वारा कर की चोरी में मदद देता है। अमरीका की इस कार्यवाही ने स्विस सरकार को मजबूर किया है कि वह अपनी बैंकिग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की पहल करे। अक्टूबर 2010 को स्विस सरकार ने ‘अवैध संपत्ति के प्रत्यर्पण कानून’ को मंजूरी दी। यह फरवरी 2011 से देश में लागू हो गया है। इस कानून के लागू होने से आशा की जा रही है कि अवैध तौर पर जमा धन को संबंधित देशों में वापस लाया जा सकेगा। स्विस बैंकर संघ के अनुसार स्विसजरलैंड के बैंको में निजी विदेशी ग्राहकों का 20 खरब डाॅलर से अधिक का धन जमा है। जिसमें से 15 खरब डाॅलर अफ्रिका और मध्य पूर्व के देशों से आया है।

नोर्वे की एक संस्था एंटी-करप्शन रिसोर्स सेंटर के अनुसार कर चोरी से अफ्रिकी मुल्कों को हर साल अपने सकल घरेलू उत्पादन का 25 फिसदी खोना पड़ता है। यह सारा धन एक ओर इन देशों की विकास की संभावना को क्षिण करता है वही काले धन के आश्रय वाले देशों को बिना उत्पादन के पूंजी प्रदान करता है जो उनकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखता है।

कर चोरी और काले धन को आश्रय देने का इतिहास पुराना है। इस मामले में स्विजरलैंड सबसे आगे है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया भर में विदेशों में रखे काले धन का 30 फिसदी स्विजरलैंड के बैंकों में रखा है।

दूसरे विश्व युद्ध के शुरूआती समय में स्विजरलैंड की सरकार ने खुद को निष्पक्ष देश घोषित करवाने में सफलता हासिल कर ली। हालांकि वह कितना निष्पक्ष था इससे समझा जा सकता है कि जमर्नी से जान बचा कर देशा में प्रवेश करने वालें यहूदियों को इसने अपनी जमीन से बाहर कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप हजारों यहूदियों को अपनी जान गवानी पड़ी।
द्वितीय विष्व युद्ध के दौरान स्विस सरकार ने अपने बैंकिग कानून को सख्त किया और जमाकर्ता की पहचान जाहिर करने को दंडनीय अपराध बना दिया। परिणाम स्वरूप विदेशी लोगों को युद्धकाल में अपने धन को सुरक्षित रखने की सुविधा हासिल हो गई। युद्ध के बाद यह काले धन के आश्रय देश के रूप में विकसित होता गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्विस सरकार पर कर चोरी करने वालों और भ्रष्ट नागरिकों के नामों का खुलासा करने का दवाब बनाना एक महत्वपूर्ण कदम है लेकिन इससे अधिक आशा नहीं करनी चाहिए। सबसे पहली बात तो यह कि स्विजरलैंड ही ऐसा एक मात्र देश नहीं है बल्कि अमरीका और ब्रिटेन भी काले धन को आश्रय देने वाले देशों में आते है। अमरीका में लैटिन अमरीकी नागरिकों का पैसा बे रोकटोक प्रवेश करता हैै। उसके डेलेवेयर और नवेडा राज्यों के कानून कर चोरी और काले धन के महत्वपूण आश्रय स्थल है। ब्रिटेन में यह काम चैनल द्विपों में होता है। ये सरकारें तब तक ही अन्य आश्रय देने वाले देशों पर दवाब बनाती हैं जब तक मामला इनके अपने देशों में कर चोरी से जुड़ा होता है। इसलिए जरूरी है कि इसे रोकने का प्रयास संबंधित देशों में ही किया जाए। यदि विकासशाील देश अपने यहां की पूंजी के निर्यात को रोकना चाहते है तो उन्हें इस संबंध में विकसित मुल्कों से सहयोग की बहुत आशा नहीं करनी चाहिए और स्वयं पहल करनी चाहिए। इसके लिए सबसे पहला कदम होगा अपने देश के राजनीतिक ढांचे को दुरुस्त करना। बिना राजनीतिक ढांचे को ठीक किए काले धन के रूप में निर्यात होने वाली पूंजी को रोका नहीं जा सकता।

दूसरी और सिंगापोर जैसे देश हंै जो स्विस सरकार पर बढ़ते दवाब का फायदा लेने की तैयारी में है। सिंगापोर की सरकार ने हाल में ऐसे कानून बनाए है जो जमाकर्ता की पहचान छिपाने में स्विस कानूनों से भी कठोर है। इस वजह से बहुत से स्विस बैंकों के अपने व्यवसाय को सिंगापोर स्थानांतरित कर लिया है। जहां वर्ष 2000 में सिंगापोर में केवल 20 बहुराष्ट्रीय बैंक थे वहीं 2011 में इनकी संख्या बड़ कर 106 हो गई है।

इसके अलावा स्विस बैंकर अब अस्थिर और गरीब देशों के धनी ग्राहकों को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। बैंकरों का मानना है कि स्थिर देशों की सरकारें इस हालत में नहीं रहती की वह काले धन की पुनः प्राप्ति का दवाब बना सके। कुल मिलाकर इन देशों के लिए अफ्रिकी और एशियाई देशों में अस्थिरता जरूरी है।

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