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मणिपुर की जनता और ईरोम का ‘संघर्ष’

Posted by chimeki on November 22, 2012


इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल की हर बरसी पर भारतीय लोकतंत्र के चरित्र पर सवाल उठाने का चलन है. पुराने दौर में होली के दिन सामंतों को गाली देने का चलन था. ‘बुरा न मानो होली है’ कहने से उत्पीड़ित समुदाय को संतोष मिलता था और अगले एक साल तक सामंतों को दमन करने की छूट!

ईरोम शर्मिला की भूख हड़ताल की बरसी भी ऐसा ही एक तीज है. छात्र प्रदर्शन करते हैं, कार्यकर्ता ज्ञापन सौंपते हैं और एनजीओ आर्ट पेपर पर रंगीन पोस्टर छपवाते हैं. इसके बाद साल भर नथुनों से, सांस के साथ सरकता जीवन जल देह को जिंदा रखता है. सरकारी बजट में इसका कितना अतिरिक्त भार पड़ता होगा इसके लिए आरटीआई की सुविधा है, लेकिन यह रकम मोंटेक सिंह अहलूवालिया के शौचालय की मरम्मत में होने वाले खर्च से कम ही होगी, ऐसा कह सकते हैं.

सीधे शब्दों में ईरोम का संघर्ष बेतुका, बेकार और बेअंजाम है. ऐसा कोई कारण नहीं है कि उन्हें इसे यहीं खत्म नहीं कर देना चाहिए. 12 साल की ‘तपस्या’ के बाद भी यदि ईरोम को अपने आंदोलन की निष्फलता का अहसास नहीं हो रहा है तो यह उनकी चिंतन प्रक्रिया पर सवाल खड़े करने के लिए एक आधार देता है.

दिल्ली के जंतर-मंतर में 16 साल से एक व्यक्ति भारत में समाजवाद स्थापित करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठा है. हाथ से लिखे प्लेकार्ड पर ऊलजलूल नारे लिखे हैं. ‘भारत और विश्व से पूंजीवाद का नाश करो’, ‘भारत और विश्व में समाजवाद लाओ’ समेत इसी तरह के और भी कई नारे. इस व्यक्ति को क्या समझा जाना चाहिए? यदि उसके ‘ऐंगल’ से चीजों को देखें तो वह खुद को क्रांतिकारी नहीं तो एक संत जरूर मानता होगा. लेकिन सदिच्छा से तो समाज नहीं बदलता न. वह व्यक्ति किसी मानसिक रोग से ग्रसित नहीं होगा, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है.

मणिपुर की जनता को एक लाचार ईरोम नहीं चाहिए. वह चाहती है कि ईरोम कम से कम इस लोकतंत्र को एक मजाक कहने का साहस दिखाएं. उनमें रतन टाटा और राबर्ट वाढरा जितना ‘साहस’ होना ही चाहिए कि वे भारतीय राज्य को एक ‘बनाना’ गणतंत्र कहें.

दक्षिण अफ्रीका में अहिंसक संघर्ष चला रहे नेलसन मंडेला को भी कहना पड़ा था कि गांधीवादी रास्ता नस्लभेदी सरकार के लिए नहीं है. इसके बाद वे बीस साल तक जेल में रहे, लेकिन उन्होंने अपनी जनता को रास्ता दिखाया था. लेकिन ईरोम इसके ठीक उलट अपनी जनता को, भूख हड़ताल को जारी रखते हुए भारतीय बुर्जुआ लोकतंत्र पर विश्वास करते रहने की सीख देती हैं. जिस तरह सरकार जीवनजल के जरिए उन्हें जिंदा रखती है, उसी तरह वे इस लोकतंत्र के नथुनों में जीवनजल डालती हैं. उसे जिंदा रखती हैं. वे लोकतंत्र की चुनौती नहीं है, वे लोकतंत्र की जरुरत हैं. वह लोकतंत्र का चेहरा है, उसका पहिया है जो कभी आगे नहीं बढ़ता, बल्कि वहीं घूमता हुआ आगे बढ़ने का झांसा देता है.

उनकी एक सूत्रीय मांग है कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को खत्म किया जाए. यानी वे मानती हैं कि मणिपुर की जनता भारतीय शासन तंत्र को स्वीकार करती है. लेकिन यह अवधारणा कितनी सही है?

आजादी के बाद भारत में विलय हुए उत्तर पूर्व के अन्य राज्यों की तरह ही मणिपुर का भारत के साथ संबंध ब्रिटिश उपनिवेशकाल की विरासत है. ब्रिटिश शासन के अंत के बाद भारत ने पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंधों में किसी किस्म का परिवर्तन नहीं किया, बल्कि कई मामलों में उसने शासक-शासित के संबंधों को अधिक कठोरता से लागू किया. मसलन जहां इन राज्यों या तत्कालीन देशों को औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश शासन से कुछ रियायतें प्राप्त थीं, भारत द्वारा उन्हें छीनकर जबरन भारतीय ‘मुख्यधारा’ से जोड़ने का प्रयास किया गया.

मणिपुर की जनता की सामूहिक चेतना में एक ‘दंतकथा’ का प्रमुख स्थान है. वह कितनी सच है यह तो शोध का विषय है/ लेकिन इस ‘कथा’ के अनुसार 1949 में भारत सरकार ने मणिपुर के महाराज बोधचंद्रा को बातचीत के लिए शिलांग आमंत्रित किया और धोखे से उन्हें कैद कर जबरन विलय संधि पर हस्ताक्षर करवा लिए थे. इससे पहले महाराज अपने राज्य तक ‘पहुंचते’ भारतीय सेना ने वहां कब्जा जमा कर लिया. जाहिर है, इस अपमानजनक विलय का विरोध होना ही था. कई साल तक चले बेनतीजा शांतिपूर्ण आंदोलन की परिणति 1964 में उल्फा के सशस्त्र संघर्ष में हुई. इसने जो राह दिखाई उससे कई अन्य सशस्त्र समूह पैदा हुए. इस बीच कई समूह विघटित भी हुए जिनका स्थान अन्य ने लिया. कुल मिलाकर मणिपुर की जनता का संघर्ष जारी रहा.

वर्ष 2000 में इरोम शर्मिला ने इस संघर्ष में प्रवेश किया. इरोम के आंदोलन का तरीका -शांतिपूर्ण भूख हड़ताल, नागरिक असहयोग आदि- जितना प्रबुद्ध दिखता है उतना ही यह प्रतिक्रियावादी है. इरोम मणिपुर की जनता के संघर्ष को 1964 की स्थिति में और कई मायनों में 1949 के पहले की स्थिति में वापस ढकेल देती हैं. यही वजह है कि भारतीय मध्यम वर्ग उन्हें इतना ’सम्मान’ देता है.

भारतीय सत्ता तंत्र का एक मनोवैज्ञानिक विकार यह भी है कि उसे दान-पुण्य करना अच्छा लगता है. भिखारी को भीख देना वह अपना धर्म समझता है, लेकिन अधिकार की बात करने वाले उसे नापसंद हैं. इरोम के साथ हमदर्दी से एक याचक के प्रति स्नेह के उसके कर्तव्य को तुष्टि मिलती है.

संघर्ष के रूप की तरह ही इसकी अंतर्वस्तु भी प्रतिक्रियावादी है. अन्य उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं की तरह, मणिपुर की जनता को एक स्वतंत्र राष्ट्र चाहिए. फिर यह कोई नया मसला भी नहीं है. वर्ष 1949 से पहले तक उनके पास एक राष्ट्र था. भारत में विलय के बाद जितने भी संघर्ष हुए उन सबके केन्द्र में यही मांग थी. ऐसे में केवल विशेषाधिकार कानून को समाप्त करने की मांग तक अपने आंदोलन को सीमित करने का क्या मतलब है?

इस प्रकार इरोम न केवल मणिपुर की जनता के साथ, बल्कि तमाम उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के साथ विश्वासघात करती हैं. ऐसा वह कोई मासूमियत में करतीं तो एक अलग बात हो सकती थी, लेकिन राष्ट्रीयता आंदोलनों के घोर विरोधी और अंध राष्ट्रवाद के पैरोकार अण्णा हजारे से अभीभूत होकर सहायता की अपील करना उनके आंदोलन के दिवालियेपन को उजागर करता है.

इसमें कोई शक नहीं कि इरोम 12 साल से लगातार संघर्ष कर रही हैं और तमाम तरह के शारीरिक और मानसिक कष्ट सह रही हैं. यह अपने आप में एक मिसाल है, लेकिन यह अनुसरणीय बिल्कुल भी नहीं है. इस तरह के संघर्ष करने का दावा धीरूभाई अंबानी, अमिताभ बच्चन और सचिन तेंडूलकर भी कर सकते हैं. इ रोम का यह संघर्ष उन्हें नोबेल पुरस्कार दिला सकता है, विशेषाधिकार कानून को राज्य से हटवा सकता है, यूंरोप-अमेरिका भ्रमण के अवसर दे सकता, लेकिन मणिपुर की जनता के संघर्ष को उसके तार्किक अंजाम तक नहीं पहुंचा सकता.

वि. श.

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