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समीक्षा: ‘उसका नाम वासु नहीं’

Posted by chimeki on December 25, 2012


vasuपत्रकार शुभ्रांशु चौधरी की किताब ‘उसका नाम वासु नहीं’ माओवादी आंदोलन पर केन्द्रित है. लेखक माओवाद प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ से लंबे समय से जुड़े रहे हैं. उनके द्वारा शुरू किया गया विश्व का पहला मोबाईल कम्युनिटी सूचना तंत्र ‘सीजी नेट स्वर’ आदिवासियों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है, जो वहां की जनता को ‘मुख्यधारा’ से जोड़ने के लिए प्रयासरत है.

किताब में सलवा जुडूम पर महत्वपूर्ण सामग्री है. दिल्ली में इसका खाका तैयार करने से लेकर छत्तीसगढ़ में इसके प्रयोग तक शुभ्रांशु ने बारीकी से चीजों को पेश किया है. शुभ्रांशु की रिपोर्टिंग से यह निष्कर्ष निकलता है कि सलवा जुडूम सर्वोच्च न्यायालय में दलील देकर खत्म नहीं हुआ, बल्कि जनता ने संघर्ष कर उसे हराया है.किताब लिखने के लिए शुभ्रांशु चौधरी ने छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित क्षेत्र की लम्बी यात्राएं की हैं. उन्होंने वहां लड़ रहे दोनों पक्षों से बातचीत की. लेखक स्वीकार करते हैं कि वे दोनों पक्षों को तटस्थ रह कर जांचना-समझना चाहते हैं. इसलिए खुद बहुत अधिक नहीं बताते, बल्कि जिनसे उन्हें जानकारी मिलती है, वे उन्हीं के शब्दों में वहां की स्थिति से पाठकों को अवगत कराने का प्रयास करते हैं.

‘उसका नाम वासु नहीं’ का सबसे कमजोर पक्ष, हालांकि लेखक इसे पुस्तक का सबसे मजबूत पक्ष बताते हैं, लेखक का तटस्थ रहने का कैलकुलेटड प्रयास है. जब बात माओवादी आंदोलन के संदर्भ में होती है, तो तटस्थ का गणित हमेशा सत्ता पक्ष के दावों को ही मजबूत करता है.

सबसे पहला सवाल है कि सत्ता इस आंदोलन को कैसे देखती है. वामपंथी लेखक सरोज गिरी के मुताबिक सत्ता माओवादियों और इस क्षेत्र की जनता, जिसे सुविधा के लिए आदिवासी कहा जाता है, को दो अलग-अलग इकाई की तरह देखती है. इसलिए उसका मकसद माओवादियों को आदिवासियों से पृथक करना होता है. इसके लिए वह प्रलोभन और भय दोनों का इस्तेमाल करती है. वह माओवादियों को एक आयातित समस्या के रूप में स्वीकारती है. शुभ्रांशु भी सत्ता की इस दलील को बिना जांचे-परखे स्वीकार करते हैं.

ऐसे में यदि विचारधारा को हटा कर देखा जाए तो माओवादियों और तेंदुपत्ता ठेकेदारों में बहुत अंतर नहीं रह जाता और जनता अचेतन समूह की तरह प्रस्तुत होती है. जनता का मकसद दो जून की रोटी पाना है, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह उसे माओवादी दिलाते हैं या बजरंगी या फिर टाटा. बोली लगाइए और ले जाइए. अभी माओवादियों की बोली अधिक आकर्षक है.

बावजूद इसके कि माओवादी पार्टी का हर सदस्य परिवर्तन, समाजवाद और साम्यवाद की बात करता है. लेखक को लगता है कि ‘बात कुछ और है’, क्योंकि वहां की जनता के घरों में बुकशैल्फ नहीं है, जहां वह सोवियत साहित्य रख सके. इसलिए समाजवाद लक्ष्य नहीं हो सकता.

माओवादी आन्दोलन पर किताब लिख चुके राहुल पंडिता और अरुंधति रॉय की तरह शुभ्रांशु चौधरी भी समाजवाद को पूंजीवाद के विकल्प की तरह नहीं देखते. दोनों लेखकों की तरह वे ‘लोकतंत्र’ में सुधार कर इस व्यवस्था को ‘स्वर्ग’ बना देना चाहते हैं. उनकी भी दलील है कि जनता को आवाज दो वह ‘समाजवाद’ कहना छोड़ देगी. चिदंबरम की तरह ही तीनों को गोंडी नहीं आती और वे दुभाषियों के जरिए इस क्षेत्र को समझते हैं. इसलिए मुख्य मुद्दा अनुवाद में गुम हो जाता है. कुल मिलाकर माओवादी आंदोलनों पर काम करने वाले इन लेखकों ने समाजवाद को अपने शब्दकोष से गायब ही कर दिया है. वे माओवाद को समाजवाद का पर्याय मानने की जगह उसे ‘लोकतंत्र’ का ‘डिसेंट’ बना देते हैं. इसलिए सत्ता की ओर से पेश विमर्श से आगे नहीं जा पाते.

सच तो यह है कि विकास और लोकतंत्र की तमाम घोषणाओं के बावजूद पूंजीवाद अंततः पर्यावरण और मानवता का संकट है. इस व्यवस्था से मुक्ति ही मानव जाति के बचे रहने की एकमात्र गारंटी है. इसलिए माओवाद को व्यवस्था के ‘डिसेंट’ के रूप में स्थापित करने से अधिक इसे वर्तमान व्यवस्था के विकल्प के रूप में पहचानना जरूरी है. माओवादी आंदोलन से जुड़ी जनता को इस तरह पेश करना की वह आत्मरक्षा के लिए लड़ रही है, न कि मानवजाति के उद्धार के लिए, एकदम कमजोर समझदारी है.

माओवादी आंदोलन का विस्तार इसलिए नहीं हुआ कि यहां ‘डिसेंट’ है, बल्कि माओवादी आंदोलन ने ही क्रांतिकारी ‘डिसेंट’ को जन्म दिया है और इसे आगे ले जा रहा है. इसी तरह यह भी कहा जा सकता है कि यदि जनता को जमीन का स्वामी बना देने से समाजवाद के प्रति उसका आकर्षण कम हो सकता तो सरकार ऐसा करने में एक दिन भी नहीं लगाती. सरकार संसाधनों की लूट के लिए वहां नहीं पहुंची है बल्कि उसने संसाधनों का लालच देकर टाटा-एस्सार को इस युद्ध में अपने पक्ष में कर लिया है. हिमांशु कुमार की तरह यह मानना कि टाटा ही सरकार है, भारतीय संदर्भ में एक गलत समझदारी है. भारत में अभी तक सरकार एक स्वायत्त संस्था के रूप में बची हुई है. यदि ऐसा नहीं होता तो अन्ना आंदोलन भी जन्म नहीं लेता.

माओवाद/समाजवाद सरकार के प्रति जनता की निराशा का परिणाम नहीं है, बल्कि यह जनता की सामुदायिकता की भावना से पैदा होने वाला अनिवार्य परिणाम है. जहां कहीं भी जनता व्यक्तिवादी मानसिकता से मुक्त होगी, वहां माओवाद अपने आप ही पनपने लगेगा. ऐसी मानसिकता में पूंजीवाद और हिन्दुत्व पैदा नहीं हो सकता. हिंदुत्व केवल गुजराती जमीन में ही फल-फूल सकता है.

वि. श.

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