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Archive for February, 2013

नेपाल का माओवादी आन्दोलन और जातीय मुक्ति का प्रश्न

Posted by chimeki on February 22, 2013

Photo courtesy: International Dalit Solidarity Network

Photo courtesy: International Dalit Solidarity Network

अभी हाल तक नेपाल में जातीय और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था. आम अवधारणा यह थी कि जातीय मुक्ति के प्रश्न को निरंकुश राजतंत्र विरोधी संघर्ष के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए और निरंकुश तंत्र के खात्मे के साथ संवैधानिक सुधार के जरिए इसे हल किया जाना चाहिए.

धरती के जिस भूभाग में वर्तमान नेपाल अवस्थित है वहा हिंदु धर्म का संस्थागत विस्तार/विकास 18वीं सदी में शुरू हुआ. भारत में इस्लामी शासन से आक्रांत हिदु राजाओं ने हिमालय में आश्रय लिया और अपने लिए रियासतों को संगठित किया. एक लंबे अंतराल बाद, जब मुगल सत्ता विखंडित होना शुरू हई, तो नेपाल की इन रियासतों ने विस्तार करने का आत्मविश्वास प्राप्त कर लिया. 18वीं सदी के मध्य में पृथ्वी नारायण शाह ने इस भूभाग की कई छोटी बड़ी रियासतों को एक कर वर्तमान नेपाल का स्वरूप दिया. पृथ्वी नारायण शाह ने ही नेपाल में हिंदु धर्म को संस्थागत किया.

शुरू में नेपाल के हिंदुकरण का स्वरूप प्रशासनिक था लेकिन बाद में इसे, राजनीतिक कारणों से, पहचान के साथ जोड़ कर देखा जाने लगा. इससे नेपाल के शासक को यह फायदा था कि वह अंग्रेजों के सामने स्वयं को हिंदुस्तान के अंग्रेज विरोधी मुस्लिम शासकों से अलग दिखा कर एक सहयोगी की तरह प्रस्तुत कर सकता था.

नेपाली भूभाग में जनता का हिंदुकरण मुख्यतः 1768 और 1950 के बीच हुआ. पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल को सबसे पहले हिंदु फ्रेम में डालने का प्रयास किया. अपने ‘दिव्यउपदेश’ में, जो आगे चल कर नेपाल के प्रशासनतंत्र का आधार बना, पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल को ‘चार वर्णों और 36 जाति की फुलवारी’ कहा. इसी ‘दिव्यउपदेश’ में अपनी जनता को उन्होनें ‘भारतीय’ लोगों के संपर्क न बनाने की हिदायत भी दी और नेपाल को ‘असली’ हिंदोस्तान कहा. 1854 में जातीय विभाजन को कानूनी रूप दे दिया गया. ये संयोग ही है कि जब भारत में जातीय शोषण को ज्योतिबा फुले चुनौती दे रहे थे तब उसके उत्तर में इसे संस्थागत किया जा रहा था.

1950 में नेपाल में राणाशाही का अंत हुआ लेकिन इसने राज्य सत्ता के ढांचे को यथावत रखा. ये दौर नेपाल के इतिहास का उथलपुथल का दौर भी था. इस दौर में लोकतंत्रवादी शक्तियां, जिसका नेतृत्व मुख्यतः कांग्रेस पार्टी कर रही थी, और राजावादी शक्तियों के बीच जबर्दस्त टकराव हुआ. सांमती मानसिकता में जकड़ा कांग्रेसी नेतृत्व नेपाल के बहुसंख्यक जनता को गोलबंद करने में पूरी तरह नाकाम रहा जिसने राजतंत्र शक्तिशाली होने का अवसर दिया. महज दस वर्ष के बहुदलीय प्रयोग के बाद राजा महेंद्र ने लोकतांत्रिक दलों को प्रतिबंध करते हुए बहुदलीय व्यवस्था के अंत की घोषणा के साथ निरंकुश पंचायत राज की शुरूआत कर दी. पंचायति राज में हिंदुकरण को राजकीय प्रशय दिया गया. 1962 के संविधान में नेपाल को हिंदु राष्ट्र घोषित कर दिया गया. 1990 में नेपाल में एक बार फिर से आंदोलन भड़का और नेपाल को पुनः बहुदलीय राजतंत्र घोषित कर दिया गया.

नेपाल के इतिहास का संक्षिप्त परिचय देने का उद्देश्य यह बताना है कि नेपाल में 1996 में शुरू इुए माओवादी आंदोलन से पहले किसी भी आंदोलन में दलित और अन्य उत्पीड़ीत जातियों/राष्ट्रीताओं का सवाल राजनीति के केंद्र में नहीं रहा. नेपाल के संसाधनों में सर्वण सामंती जातियों का अधिकार एक लंबे समय तक बना रहा/है.

माओवादी आंदोलन और जातीय सवाल

1996 में शुरू हुए माओवादी आंदोलन, जिसका प्रमुख राजनीतिक स्वरूप सशस्त्र संघर्ष था, ने जातीय मुक्त के सवाल को नेपाल की राजनीति के केंद्र में ला दिया. ‘भूमि जोतने वालो की’ की मान्यता के तहत इसने लोगों का ध्रुवीकरण किया. माओवादी आंदोलन की सफलता यह थी कि इसने लोगों में विश्वास पैदा किया कि नेपाल का स्वतंत्र अस्तित्व हिंदुवादी सामंती राजतंत्र के बिना भी बचा रह सकता है. अन्य पार्टियों के बरअक्स, कांग्रेस-एमाले, इसने नेपाल के अस्तित्व के लिए हिंदु राजतंत्र की अनिवार्यता को ही सिरे से खारिज कर दिया और जातीय और वर्गीय आधार पर लोगों को एक करने का सफल प्रयोग किया. इसी के परिणाम स्वरूप नेपाल में इस आंदोलन ने अपना विस्तार तेजी किया. लंबे समय तक राजनीति से बेदखल लोगों की मांग को माओवादी आंदोलन नेपाली राजनीति के केंद्र में ला कर राजतंत्र को चुनौती दी. इसने ग्रामीण क्षेत्रों से सामंतवाद की जड़ों को काटा और उत्पीडि़त जाति/राष्ट्रीयता की स्वायत्त सरकार का निमार्ण कर प्रशासनिक कार्य करने, निणर्य लेने का आत्मविश्वास दिया. 2006 में नेपाल में राजतंत्र के अंत के साथ उत्पीडि़त जातियों के संघर्ष के दूसरे चरण की शरूआत हो चुकी है. 2006 के बाद जातिय आंदोलन पारंपरिक पार्टियों के प्रश्रय से मुक्त हो कर अपनी स्वतंत्र पहलकदमी लेने लगे हैं. जातिय आधार पर संघियता की मांग नेपाल में आज एक प्रमुख मांग बन गई है और इसकी अवहेलना करने वाली पार्टीयों को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

यह सारा विकास नेपाल की माओवादी आंदोलन की सफलता का परिणाम है. 2008 में गठित संविधान सभा में 49 दलित प्रतिनिधि थे. नेपाल के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व परिघटना है. इससे पहले शायद एक ही बार कोई दलित संसदीय चुनाव में विजयी हुआ था. माओवादी पार्टी के संविधान सभा में 21 दलित सांसद थे जिसमें में से सात निर्वाचित सदस्य थे और 14 मनोनीत. अन्य पार्टियों से एक भी निर्वाचित सांसद नहीं था.

अंत में इस बात को दावे के साथ कहा जा सकता है कि नेपाल में जातिय आंदोलन ने अपना एक चरण पूरा कर दूसरे चरण में प्रवेश कर लिया है. हाल में माओवादी पार्टी में हुआ विभाजन इस बात का साफ संकेत है. जहां एक और प्रचण्ड के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी ने आंदोलन को तिलांजलि देकर संसदीय राजनीति को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया है वही किरण के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी ने जातीय और वर्गीय मुक्ति के सवाल को जनवाद के साथ जोड़ कर आगे बढ़ने का फैसला किया है. भारत के साठ सालों का अनुभव से नेपाल की उत्पीडि़त जातियां सबक ले सकती है. उन्हें यह समझना चाहिए कि संवैधानिक सुधार पूर्ण मुक्ति का रास्ता नहीं है और संसदीय बर्जुआ राजनीति, जातीय उत्पीड़न को खत्म नहीं करती बल्कि यह जातीय प्रश्न को सत्ता के साथ ‘बारगेन’ करने का साधन बना देती है. और जातीय मुक्ति का प्रश्न वर्गीय मुक्ति के साथ अनिवार्यतः जुड़ हुआ है.

वि.श.

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Vinod Mehta: A Memoir

Posted by chimeki on February 1, 2013

Vinod Mehta (right) Tarun TejpalPhoto: V.S.

Vinod Mehta (right) with Tarun Tejpal
Photo: V.S.

Really speaking, I had not imagined that I would meet Vinod Mehta like that. I liked his writing but ever since I had read his memoir Lucknow Boy I started adoring him. In a way, I thought I had found an ideal journalist. A journalist I could follow as an example. But ironically he never was a journalist. He was a born editor.

For Shakespeare, some people were born great; some achieved greatness and some had greatness thrust upon them. He, however, forgot to see that some don’t realize they are great until told or at least until their memoirs are published and praised. I tag Vinod Mehta on the latter category. Although he was an editor nevertheless all his life he struggled to become a writer. He wanted to be known not by what he chose but by what he wrote. Initially, he tried to copy George Orwell and later romanced with VS Naipaul. To learn the art of writing, he offered to pay VS Naipaul’s expensive bills in Five Star hotels. Vinod was kicked out of the job many times but he felt Naipaul was one who ‘was insecure’! So he arranged conveyance for him when the ‘poor’ genius wished to correct India by writing a book or two on it. For conveyance and luxury food was free, Naipaul wrote three.

I met Vinod last year in Jaipur Literature Festival. He had a session where he was to speak on his book. The organizers had arranged the session at Darbar Hall but sensing the anticipation they moved it to Mugal Tent, a huge shamiyana at the lawn of Diggi Palace. For the first time that year they looked wise. People thronged the Tent to see the Lucknow boy. I had taken the first seat at the Darbar Hall so I obviously became the last to reach the new venue. Before I could reach, the Tent was jam-packed. There was no chance I could cut across the crowd and get in, so I decided to become one with many standing there. The moderator of the session Tarun Taijpal had already taken his seat and was shouting at the top of his voice for Vinod. He was saying, ‘we have heard Mr. Vinod Mehta has reached here. Please make way for him.’ Nobody moved. He again screamed. This time people giggled.

Then suddenly I found Vinod Mehta struggling beside me to find his way. There was enough light on the dais to make the lawn darker. His eyes were blinded and he struggled to keep his feet grounded. Once on someone’s toes then on someone’s head. One lady called him drunk and pushed him away. He caught my arm and survived. He was saying, ‘let me go’ to which the people said, ‘he has not come yet.’ ‘I have come’, he answered. The crowed answered back, ‘so have we’. I yelled, ‘he is Vinod Mehta, for God sake’. ‘Then tell him to keep shut for the Lucknow boy has not yet come’, the crowed threatened. I decided to play an old trick of my school days. I threw myself on the crowd. The crowd dismembered but I lost control and fell flat on the ground. Vinod, hurriedly jumped over me and climbed the stage. Though he didn’t look back but he thanked me in style. The session turned out to be the most entertaining event of the festival. People laughed to death. Later, he remembered the session on his Dairy but forgot to mention me. Didn’t Shivaji too forget Madari Mehtar as soon as he crossed the Yamuna.

V.S.

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