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Archive for March, 2014

क्यों हारे माओवादी

Posted by chimeki on March 8, 2014

Courtesy: BBC News

Courtesy: BBC News

नेपाल संविधान सभा चुनाव 2013 के अब तक आए परिणामों से यह बात तय है कि पिछली संविधान सभा की सबसे बड़ी पार्टी एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ेगा. हालांकि माओवादी पार्टी अपनी ‘हार’ को स्वीकार करने से कतरा रही है, लेकिन अब वह उस स्थिति में नहीं है कि दवाब डालकर कोई समझौता करने के लिए दूसरी बड़ी पार्टियों नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) को मजबूर कर सके.

चुनाव में धांधली का आरोप लगाकर हार के गम को गटका तो जा सकता है, लेकिन पार्टी के भविष्य को लेकर उठने वाले सवालों से बचा नहीं जा सकता. यदि धांधली का उसका दावा सही भी है, तो भी कम से कम माओवादी पार्टी को परिणाम को खारिज करने को कोई नैतिक अधिकार नहीं है. इस बार के संविधान सभा चुनाव की जल्दबाजी माओवादी पार्टी को थी. पार्टी के प्रधानमंत्री ने पिछली संविधान सभा को भंग किया, पार्टी के ही अध्यक्ष ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में चुनावी सरकार के गठन में सबसे अहम भूमिका निभाई. यहां तक कि इस सरकार के गठन का प्रस्ताव प्रचण्ड का ही था. इसी पार्टी ने चुनाव बहिष्कार करने वाले समूह की हर मांग की अनदेखी कर उन्हें चुनाव में शामिल होने से रोका. पार्टी की मान्यता यह रही कि यदि मोहन वैद्य ‘किरण’ के नेतृत्व वाली पार्टी ने चुनाव में हिस्सा लिया, तो उसके वोट प्रतिशत में सेंध लगेगी.

चुनाव परिणाम को जितना अप्रत्याशित दिखाने का प्रयास किया जा रहा है, उतना अप्रत्याशित वह है नहीं. माओवादी पार्टी की आंतरिक बैठकों में बार-बार यह बात होती रही कि पार्टी पहाड़ी क्षेत्रों में अपने पुराने प्रदर्शन को नहीं दोहरा पाएगी. पार्टी कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय किया गया कि पहाड़ी क्षेत्र से अधिक तराई पर केन्द्रित होकर चुनाव लड़ा जाए. इसकी वजह यह थी कि पिछले पांच सालों में तराई का मधेस आंदोलन छिन्न-भिन्न हो गया था या कहें कर दिया गया था और पार्टी खुद को मधेसी आंदोलन का जायज उत्तराधिकारी मानकर चल रही थी. पार्टी के कई दिग्गज नेताओं ने पुराने क्षेत्र को अलविदा कहकर तराई से नामाकंन भरा.

अति उत्साह में वह भूल गई कि 1990 से तराई नेपाली कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है और मधेस आंदोलन के अधिकांश नेता कांग्रेस से ही निकलकर आए हैं. जनयुद्ध के काल में भी तराई में माओवादी पार्टी अपनी तमाम कोशिश के बावजूद कभी पैर नहीं जमा सकी थी. इसलिए मधेस आंदोलन के खत्म हो जाने पर वहां कि जनता ने पुरानी परखी हुई पार्टी को ही वोट देना उचित समझा.

उधर पहाड़ी क्षेत्र में जो जनयुद्ध का आधार था, माओवादी पार्टी की लोकप्रियता तेजी के साथ कम हुई. जनयुद्ध के क्रम में शहादत देने वाली इस क्षेत्र की जनता ने बहुत जल्द ही यह समझ लिया कि पार्टी का नेतृत्व नेपाली क्रांति को संविधान सभा से आगे ले जाना नहीं चाहता. पांच सालों में पार्टी के नेतृत्व ही जो तस्वीर उस के सामने बनी वह उस तस्वीर से बिलकुल अलग थी जो उसने जनयुद्ध के समय देखी थी.

साथ चलने, खाने और हंसने-रोने वाला नेतृत्व जनता के समीप जाने से भी कतराने लगा था. नेता सिर्फ उन्ही दुर्गम क्षेत्रों में जाते थे, जहां तक उनका हेलिकाॅप्टर उन्हें ले जाता. अपने संसदीय क्षेत्रों से अधिक नेताओं ने विदेशी भ्रमण किए, जहां वे हमेशा सपरिवार ही जाते थे. इसी जनता ने ऐसा दवाब बनाया कि पार्टी दो हिस्सों में विभाजित हो गई.

जनयुद्ध के लक्ष्य को हासिल करने के दावे के साथ पार्टी के एक बड़े हिस्से ने प्रचण्ड की अध्यक्षता वाली पार्टी को त्याग दिया. इस विभाजन ने पहाड़ी क्षेत्र से एकीकृत माओवादी पार्टी के पैर उखाड़ दिए. पुराने दौर में पार्टी का गढ़ माने जाने वाले रोल्पा के थवाग गांव में एक भी मत न पड़ना पार्टी के कमजोर हो जाने का सबसे बड़ा सबूत है.

इन दो कारणों के अलावा पार्टी की हार का एक और कारण भी है. पिछले समय में पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था. पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णय दक्षिण के पड़ोसी को ध्यान में लेकर लिए जा रहे थे. प्रधानमंत्री पद पर बाबुराम भट्टराई के कार्यकाल में भारत और अन्य देशों के साथ ऐसे समझौते हुए, जो खुद पार्टी की लाइन के विपरीत थे. ये सभी समझौते पार्टी में बिना चर्चा किए लिए गए. कई निर्णयों का पार्टी की मीटिंगों में व्यापक विरोध भी हुआ. जनसेना के शिविरों को नेपाली सेना को सौपें जाने के निर्णय के खिलाफ तो स्वयं पार्टी के कार्यकताओं में मशाल जुलूस निकालकर विरोध किया था.

चुनाव से ऐन पहले पार्टी के टिकट बंटवारे की प्रक्रिया में भी पार्टी के नियमों का पालन नहीं किया गया. पुराने कार्यकर्ताओं की कीमत पर पैसे और रसूख वाले नए लोगों को टिकट दिए गए. सैकड़ों पार्टी कार्यकर्ताओं को चुनाव से पहले ही पार्टी ने नाराज हो गए और चुनाव में किसी भी तरह की सक्रिय भूमिका से खुद को अलग कर लिया.

साथ ही टिकट बंटवारे की अलोकतांत्रिक प्रक्रिया ने पार्टी के अंदर तमाम गुट-उपगुट को पैदा किया, जो अन्य पार्टी के प्रत्याशी से अधिक अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी को हराने के लिए उत्सुक थे. पार्टी नेतृत्व यह भूल गया कि नेपाल में कार्यकर्ता वोट देता है, जनता नहीं. नेपाल का बहुसंख्य वोटर किसी न किसी पार्टी का सदस्य होता है, इसलिए कार्यकर्ता को नाराज करना हमेशा महंगा पड़ता है.

दूसरी तरफ इस बार के चुनाव परिणाम भारत की कूटनीतिक विफलता भी है. प्रचण्ड के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी के कमजोर होने से मोहन वैद्य ‘किरण’ की लाइन ‘स्वतः’ सही साबित हो जाएगी. नेपाल की राजनीति में हाल में कमजोर हुआ भारत विरोधी स्वर एक बार फिर मुखर हो जाएगा और जल्द ही प्रचण्ड एक बार फिर घोर भारत विरोधी नारों के साथ कार्यकताओं को सम्बोेधित करते नजर आयेंगे. इसके अलावा भारत के माओवादियों को भी इस परिणाम से वैचारिक साहस अवश्य प्राप्त होगा. इस पार्टी के अंदर भी वे आवाजें हाशिए पर चली जाएंगी, जो नेपाल का हवाला देकर संसदीय राजनीति की प्रासंगिकता को साबित करने में लगी थीं. बहुत मुमकिन है कि प्रचण्ड समर्थक इस हार का ठीकरा बाबुराम भट्टराई के सर पर फोड़ें और उन्हे पार्टी से चलता होना पड़े.

थोड़ा सा पीछे जाकर देखें कि संविधान सभा का विघटन बाबुराम के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए हुआ था और इसे बहाना बनाकर हार के लिए उन्हें दोषी ठहराया जा सकता है. बाबुराम के जाने से पार्टी के अंदर भारत समर्थक पक्ष कमजोर हो जाएगा. सबसे दिलचस्प बात है कि किरण समूह के पार्टी से अलग होने के बाद बाबुराम पहले से ही कमजोर हैं. पिछले समय में वैचारिक स्तर पर भीषण मतांतर के बावजूद किरण ने हमेशा बाबुराम के खिलाफ किसी भी कार्रवाही का विरोध किया था. अब जबकि उनके खेमे के लोग चुनाव में हार चुके होंगे, तो उनका वैसे भी कोई खास उपयोगिता पार्टी के लिए नहीं होगी.

मोहन वैद्य ‘किरण’ के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी के बारे में जिन लोगों को यह लग रहा है कि चुनाव का बहिष्कार करने के चलते नेपाल की यह माओवादी पार्टी अप्रासंगिक हो जाएगी, उन्हें एक बार फिर सोचने की जरूरत है. उदार लोकतंत्र का सबसे जरूरी सबक यह है कि विरोधी का सबसे अच्छा स्थान संसद है. संसद से बाहर विरोधी अधिक ताकतवर साबित होता है.

किरण माओवादी पार्टी को निषेध कर चुनाव करने के फलस्वरूप नेपाल की राजनीति में वह सबसे बड़ी ताकत बन गई है. साथ ही, आने वाले दिनों में प्रचण्ड से टूटकर इस पार्टी में शामिल होने की प्रक्रिया को तीव्रता मिलेगी और लोकतांत्रिक बदलाव के तमाम दावों की हवा निकल जाएगी. प्रचण्ड की हार वास्तव में भारत की कूटनीति की एक और पराजय है. ऐसा लगता है कि भारत को गलती करने में मजा आता है. फिर दक्षिण एशिया में तो उसने जहां कहीं भी हाथ डाला है, चीजों को बुरी तरह फंसा दिया है. श्रीलंका, मालद्वीव, बांगलादेश और अब नेपाल भारत की कूटनीति के दिवालियेपन के सबूत हैं.

प्रचण्ड के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए आगे का रास्ता लगभग बंद है. वह लौटकर फिर से जनयुद्ध का रास्ता नहीं ले सकती और न ही इस पराजय के बाद खुद को एक रख सकती है. जैसा कि जीत के अतिविश्वास में पार्टी ने अपने ही काडरों को टिकट नहीं दिया और 2008 के बाद पार्टी से जुड़े अधिकांश रसूखदार लोगों को अपने ही कार्यकर्ताओं को विश्वास में लिए बिना टिकट दिया गया.

अब जबकि परिणाम आ गए हैं पार्टी में विद्रोह की आशंका बन रही है. जल्द ही पार्टी कई टुकड़ों में बंट सकती है, लेकिन इससे भी पहले वे लोग जो जीत की आशा के साथ पार्टी में शामिल हुए थे वे पार्टी को अलविदा कह सकते हैं. साथ ही, यदि प्रचण्ड पर हार की नैतिक जिम्मेदारी डालने का प्रयास होता है, तो हो सकता है वे ऐसी मांग करने वालों को पार्टी से खुद ही अलग कर दें.

नेपाल के राजनीतिक भविष्य का अनुमान लगाना हमेशा से ही जोखिम भरा रहा है, लेकिन एक बात तय है कि आने वाले दिनों में वहां का राजनीतिक संकट और गहराएगा. एक बड़ी पार्टी का इस तरह कमजोर होना नेपाल के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए भले ही अच्छा संकेत न हो, लेकिन सामाजिक बदलाव की राजनीति करने वालों के ध्रुवीकरण करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

एकीकृत माओवादी पार्टी की हार ने नेपाली जनता के सामने फिर एक बार स्पष्ट कर दिया है कि आमूल परिवर्तन के उसके लक्ष्य के लिए संसदीय रास्ता बहुत दूर तक साथ नहीं दे सकता है और जब तक नेपाल में भारत परस्त पार्टियों का दबदबा है, तब तक बदलाव की उसकी आशा रेगिस्तान में मृग-मरिचिका के समान है. हर बार आधे अधूरे बदलाव ने उसे वहीं लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से वह शुरुआत करती है. 1950 से लोकतंत्र और सार्वभौमिकता की लड़ाई लड़ रही नेपाल की एक बार फिर छली गई. यह पराजय संघर्ष की उसकी जीजिविषा को खत्म करती है या तेज यह तो भविष्य तय करेगा, लेकिन यह बात तय है कि उसकी लड़ाई का अगला अध्याय एकीकृत माओवादी पार्टी की हार के साथ आरंभ हो गया है.

(23 नवंबर 2013 को जनपथ और जनज्वार में प्रकाशित )

वि.श.

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Migrant Pakistani Hindus remain in India’s twilight zone

Posted by chimeki on March 8, 2014

Photo: V.S.

Photo: V.S.

Man can forgive atrocity of any kind but take away his right to last rituals he will rebel. This is not a formulation based on theories taught in sociology classes, but the reality that has forced lacs of Hindus to leave their ancestral home in Pakistan. In rural Pakistan, dalit Hindus and the people of Bheel communities are not allowed to cremate their dead ones. They are compelled to bury them against their tradition. While government treats all citizens as equal, the social discrimination is so sharp that these people either have to follow what the majority wants from them or leave.

India and Pakistan, partitioned in 1947, are yet to learn to mind their own businesses. Atrocities meted out in one country on its minorities results in numerous repetitions in another. The lines drawn to separate them have, ironically, joined their minorities’ fate thoroughly. The narrator of the Amitav Ghosh’s The Shadow Lines rightly describes the situation as, “they had drawn their border, hoping perhaps that once they had etched their borders upon the map, the two bits of land would sail away from each other like the shifting tectonic plates of the prehistoric Gondwanaland. They discovered that they had created not a separation but there had never been a moment in the 4000-year-old history of that map when the places we know as Dhaka and Calcutta were more closely bound to each other than after they had drawn their lines”

Recently in Delhi some of Pak Hindu migrants staged a protest demanding citizenship or at least refugee status and other rights. Some of them came to India more than ten years ago. Some were just ten years then. In these years, they have grown old and adults but their fate still hangs in uncertainty.

Rajkumar moved to India from Jhol, a small town in Sanghar District of Sindh province some eight months ago. Sanghar has around 20 per cent Hindu population. His brother, who was a driver, was murdered. For months he knocked every possible door for justice or at least a hearing. After failing to secure even an assurance, he decided to leave. He says, ‘people who were arrested on his report were released within hours’. He still carries his dead brother’s photograph in his mobile. In the photo his brother is chained around the neck, suggesting signs of torture before being slit. He agreed to narrate his story provided he was not photographed. He feared for the lives of his people he left behind. A month back his younger brother too crossed the border and joined him.

Rajkumar works in a mine near Jodhpur. In Pakistan he was a farm labourer. He hopes to get at least a work permit so that he can move beyond the limits set by Indian authorities and find work in a farm.

Dinesh (name changed on request) was only ten year old when he came to India with his parents from Rahim Yar Khan, a city in Punjab province of Pakistan. He studied in a school run by the Rajasthan government and two years ago completed B.Tech. He cannot get a regular job for his status is a ‘Pakistani on pilgrimage’. Like others, he too is forced to work in a quarry. There are many like Dinesh. Educated but cannot work.

Hindu Singh Sodha, himself a migrant, has been working for more than two decades for the rights of these people. He says, ‘although people had been coming to India since the 1965-1972 but the exodus became regular after the demolition of the Babri Maszid in 1990. There are nearly eight lac Hindu migrants in India.’

Hari Ram had a dream to make his son a policeman. But an incident knocked him down from the dreamland to the rocky surface of reality. His cousin who was able to join the police was killed. Later his people were warned not to try their luck beyond the socially accepted role of farm labourers. Few days after he asked his jagirdaar for a month leave so that he could take his family for a pilgrimage in India. After 13 years of arrival he is still in India. Dinesh, B. Tech, is his son. He doesn’t ask for more than refugee status for his son so that he is excused from working in the mines.

If they thought their problems would end in India, they realized how wrong they were. India, who is hailed as a model for its refugee policy has turned a deaf ear for these people. Hindu Singh says, ‘this group is left excluded from almost all the surveys and refugee developmental plans/projects undertaken by various national and international segments in India.’ For this reason, the United States Committee for Refugees and Immigrants didn’t incorporate this group as migrant/refugee in India in its World Refugee report 2008.

In 2013 Government of India passed the Citizenship (Amendment) Bill, 2011 which paved the way for registration of Overseas Indian Cardholders (OIC). Barring few exceptions the OIC holders can enjoys all the rights of naturalized citizens. However, the people belonging to Pakistan and Bangladesh were exempted from this amendment!

India fears that, given the current circumstances, large number of people might like to come from these two countries. However a rough calculation of the number of people who are eligible to apply for OIC comes near to 35 crores! On the one had India is ready to accommodate 35 crore people who have never seen India and on the other hand it refuses to help these people who were once a part of it.

Explaining the nature of their status, Goverdhan, a migrant, says, ‘here we don’t have votes so nobody wants to hear us. The Congress party thinks being Hindu, harassed in Pakistan, we will never vote for it. The BJP thinks, it need not do anything for we are by default their supporters! Sometimes democracy is just a calculation.

(First published in the Citizen on 27 Feb 2014. Click here to read the article as it was published)

V.S.

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