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डाॅ. तुलसी राम : व्यक्तित्व

Posted by chimeki on February 22, 2015


dr-tulsiramडाॅ. तुलसी राम ने अपने विचारों से बहुत से लोगों को प्रभावित किया। वे एक ऐसी शख्सियत थे जिनके साथ चंद पलों की मुलाकात लोगों के जीवन को ऐसे प्रभावित कर देती थी जैसा प्रभाव बहुत थोड़े लोग ही डाल पाते हैं। अब जब वे नहीं रहे तो उन्हे याद करते हुए मुझे 2003-2004 का जाड़ा याद आ रहा है जब मैंने उन्हें पहली बार सुना था। मैं काॅलेज में था और ‘संवाद’ नाम की एक संस्था में नौकरी भी करता था। वह मेरी पहली नौकरी थी। नौकरी का आकर्षण था कि मुझे अक्सर बाहर घूमने को मिलता था।

2002 में गुजरात में हुए मुस्लिम हत्याकाण्ड के बाद हमारी पीढ़ी के लिए भी, जिसने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद के उन्माद को नहीं देखा था, सांप्रदायिकता महत्वपूर्ण विषय बन गया था। इस संदर्भ में दिल्ली की ‘अनहद’ संस्था द्वारा एक वर्कशाॅप का आयोजन किया गया था जिसमें ‘संवाद’ की ओर से मैं शामिल हुआ था। दिल्ली में किसी वर्कशाॅप का यह मेरा पहला अनुभव था। इससे पहले भी यहां आना हुआ था लेकिन केवल रैली और काॅलेज के प्रायोजित भ्रमणों में। यह वर्कशाॅप निजामुद्दीन के पास एनसीसी ग्राउण्ड में आयोजित की गई थी।

वर्कशाॅप में तमाम वक्ताओं में डाॅ तुलसी राम ही थे जिनकी बातों ने मेरे अंदर कौतूहल पैदा किया जो लंबे समय तक साथ रहा। उनका व्याख्यान दूसरे या तीसरे दिन के किसी सत्र में था लेकिन वह मेरे मस्तिष्क में हमेशा के लिए एक निशान बना गया। इसका कारण था कि उन्होंने बहुत ही साफ शब्दों में बता दिया था कि हिन्दू होते हुए किसी का इंसान बने रहना नामुमकिन है।

मुझे यह याद आता है कि सत्र के अंत में मैंने डाॅ अंबेडकर और समाजवाद के बीच के अंतर्विरोध पर जानना चाहा था। उन्होने धैर्य के साथ बताया कि अंबेडकर ने अपना राजनीतिक जीवन समाजवादियों के साथ ही आरंभ किया था और उस समय के समाजवादियों की वैचारिक कमजोरियों के कारण उनसे अलग हो गए थे। बाद में उन्होंने एक अलग मार्ग तलाशते हुए राजनीति की लेकिन समाजवाद की आधारभूत मान्यताओं से वे आजीवन सहमत रहे। उन्होंने यह भी समझाया कि अंबेडकर भारत में जनवादी आंदोलन की वह बुनियाद है जिस पर समाजवाद की इमारत को खड़ा किया जाना है।

इसके अलावा जो बात मेरे दिमाग में बैठ गई वह यह कि तमाम अनर्गल दावों के बावजूद सच्चाई यह है कि हिंदू धर्म और हिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बिना हिंसा के हिंदू धर्म का अस्तित्व मात्र नहीं रह सकता। यह एक ऐसी बात थी जो ‘गुड हिन्दु-बैड हिन्दु’ वाले सरलीकरण के उलट थी। हिंदू धर्म और हिन्दुत्व एक ही है- मेरी यह समझदारी डाॅ. तुलसी राम की देन है।

डाॅ तुलसी राम ने हिंदू धर्म के प्रतीकों, ग्रंथों तथा मान्यताओं के हवाले से उस दिन मेरे आगे यह स्पष्ट कर दिया था कि इस धर्म में ईश्वर के आगे तक लोग बराबर नहीं है, कि इस धर्म के ईश्वरों और रक्षकों का सुख आधुनिक सभ्यता की तमाम मान्यताओं से विपरीत के कृत्यों में है और इस धर्म के ईश्वर असमानता के सबसे बड़े संरक्षक है।

इस भेंट से पहले मेरे विचार बहुत ही कांट्राडिक्ट्री अथवा अंतर्विरोधी थे। मैं सभी धर्मो में अंततः अच्छाई को स्वीकारता था और धर्म को अफीम भी कहता था। पुराने संस्कार रट लिए गए भौतिकवाद पर भारी थे। बाद के दिनों में क्रमशः भौतिकवादी दृष्टिकोण मजबूत हुआ। क्योंकि अभी तक कोई मनौवैज्ञानिक संकट उत्पन्न नहीं हुआ है इसलिए अभी भी आत्मपरीक्षण बांकी है। मेरे न जाने कितने दोस्त जीवन में संकट आते ही अपनी शिक्षा को संस्कारों के हवनकुण्ड में डाले जा रहे हैं और इन्हें देख कर मैं भी भयभीत रहता हूं कि कहीं मैं भी ‘सामाजिक’ और ‘आध्यात्मिक’ ‘दबाव’ की दुहाई देकर ऐसा कुछ न कहने-करने लगूं। लेकिन यह बाद की बात है।

दिल्ली से जबलपुर लौटते हुए और डाॅ. तुलसी राम को बार बार दोहराते हुए मैं ओशो, विवेकानंद, महात्मा गांधी, राधाकृष्णन और तमाम पाखण्डों से मुक्त हो चुका था। अचानक मेरे जीवन में गणेश रायबोले सबसे अधिक जरूरी मित्र हो गए थे क्योंकि दुनिया को देखने का उनका नजरिया भी डाॅ. तुलसी राम की तरह है। इसके बाद गणेश रायबोले से मेरी दोस्ती पक्की हो गई और सीखने-समझने का क्रम चालू है। डाॅ. तुलसी राम दोस्ती भी कराते थे।

तो डाॅ. तुलसीराम के जरिए मैंने सीखा कि हिंदू होते हुए इंसान नहीं रहा जा सकता है। हिंदू धर्म एक अर्थ में जातिवाद का धार्मिक आवरण है जो जातिवाद को (अ)नैतिकता प्रदान करता है। ऐसे में हिंदू होते हुए किसी का काॅमरेड बने रहने का दावा पाखण्ड से अधिक कुछ नहीं हो सकता। आज भी जब तमाम दोस्त हिंदू धर्म की आलोचना को पर्सनल लेने लगते हैं, जब हिंदुओं की क्रूरताओं को मुस्लिम प्रतिरोध के साथ बैलेंस करते हैं, जब आदिवासियों और दलित समुदाय के बीच ईसाइयत के प्रसार को औपनिवेशिकरण कहते हुए ‘फोर्स्‍ड कन्वरज़न’ को रोके जाने की मांग करते हैं तो उनकी मूर्खता पर हंसी नहीं गुस्सा आता है। इस्लाम और ईसाइयत स्वीकारना यदि किसी पीडि़त समूदाय को राहत देता है तो इसे प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिए। हिंदू धर्म को त्यागना उत्पीडि़त जनता का साहसिक विद्रोह है। कम से कम ‘हिंदू मरेंगे तो नहीं।’ हिंदू धर्म में पैदा होना न होना किसी के वश में नहीं है लेकिन हिंदू रहना, हिंदू जीना और हिंदू मर जाना देश की उत्पीडि़त जनता के साथ विश्वासघात है।

डाॅ. तुलसी राम सिखाते हैं कि भारत में सामाजिक बराबरी के लिए हिंदू धर्म के संस्कारों और विचारों का नाश जरूरी शर्त है। इसकी शुरूआत प्रगतिशीलों से होनी चाहिए। सिर्फ सेल्फ-सर्टिफाई करने से काम नहीं चलेगा। एक काॅमरेड के लिए सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि, ‘मैं जाति में विश्वास नहीं करता, मैं धर्म को नहीं मानता’ बल्कि व्यापक जनसमुदाय के साथ एकता के बारे में यदि वे गंभीर हैं तो उन्हें साबित करना ही होगा कि वे हिंदू नहीं हैं। वर्ना ऐसे कितने प्रगतिशील काॅमरेड हमारे साथ ही हैं जो कुण्डली मिलाकर ही अपने बच्चों की शादी करते हैं और जब कभी किसी काॅमरेड का प्रेम विवाह होता है तो किसी ‘दैवीय हस्ताक्षेप’ से उनका जीवनसाथी उनकी ही जाति का होता है। जाति और हिन्दू धर्म के मुक्त होने से ही भारत में अंतरवर्गीय एकता का आधार निर्माण होगा जो श्रमजीवी जनता के विभाजन कोे रोकेगा क्योंकि जाति, श्रम का ही नहीं ‘श्रमिकों का भी विभाजन है।’

वि.श.

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