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Archive for the ‘India’ Category

तैमूर नाम पर विवाद क्यों ?

Posted by chimeki on December 23, 2016

timurसैफ अली खान और करीन कपूर ने अपने बेटे का तैमूर रखा तो भारत में कोहराम मच गया। विवादास्पद लेखक तारिक फतह ने करीन और सैफ की यह कह कर आलोचना की कि इस नाम से भारतीय भावनाएं आहत होती हैं। कारण: तैमूर एक क्रूर सम्राट था जिसने लाखों लोगों का कत्ल किया। तारिक के लिए भारत का अर्थ एक खास धर्म के लोगों से है जिसे ‘समझदार’ लोगों ने तुरत पकड़ लिया। लोग यह भी कहते हैं कि तैमूर विजित लोगों को मार कर नरकंकालों का पिरामिड बनाता है। यह कितना सच है इस बात की कोई खास जानकारी कम से कम इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है। जो उपलब्ध है वह दुष्प्रचार याने प्रोपोगेण्डा है।

प्रोपोगेण्डा का राजनीति मकसद होता है। यह विवेकहीन कुतर्को पर आधारित होता जिसका मकसद लोागों को भ्रमित कर राजनीतिक लाभ हासिल करना होता है। तो भी सवाल उठता है कि तैमूर से संबंधित सही इतिहास का पता कैसे चल सकता है जबकि कोई खास लिखत प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

उज्बेकिस्तान में तैमूर राष्ट्रीय हीरो है। यूरोप के पुनर्जागरण काल में कई प्रसिद्ध लेखको ने तैमूर को नायक का दर्जा दिया। उसकी खास वजह यह थी कि यूरोप के राजा उसे अपना सहयोगी मानते थे क्योंकि उसने अधिकतर मुस्लिम सम्राज्यों को पराजित किया था।

भारत में हाल तक तैमूर को मुगल राजाओं के पूर्वज के रूप में ही याद किया जाता है और दिल्ली में तैमूर नगर भी है। बीबीसी हिन्दी के लिए एक लेख में इतिहासकार राजीव लोचन का दवा है कि तैमूर ने ”हिन्दुओं को ढूंढ ढूंढ कर कत्ल करने का आदेश दिया’। इस के बावजूद उपलब्ध सामग्री तैमूर के कत्लेआम का कोई ठोस प्रमाण नहीं देती। राजीव लोचन के लेख में संदर्भ नहीं हैं। विद्वानों का कहना है कि हिन्दू शब्द नया है। धर्मग्रंथों में इसका उल्लेख तक नहीं है। इसलिए ‘हिन्दुओं को ढूंढ ढूंढ कर कत्ल करने’ का आदेश देने की बात सतही लगती है। और यदि ऐसा है भी तो उस समय सिंधु नदी के पार रहने वालों को हिन्दू कहा जाता था तो यह किसी धर्म विशेष के कत्लेआम का आदेश तो नहीं ही होगा।

तैमूर की जो पेंटिंग इंटरनेट पर उपलब्ध है उनमें उसके आसपास कोई भी कंकालों का मकबरा नहीं दिखाई taimur1देता। किसी पेंटिंग में वह दिवाभोज का आयोजक है और कहीं दिवाने खास में गुफ्तगू में व्यस्त और कहीं कहीं युद्ध की झांकी। चंगेज खान और कुछ हद तक स्टालीन की तरह ही तैमूर का इतिहास भी उसके विरोधियों ने अधिक लिखा इसलिए थोड़ी नाइंसाफी का स्पेस भी रह जाता है। कहा जाता है कि उसने भी एक आत्मकथा जैसा कुछ लिखा था लेकिन उसे प्रमाणिक नहीं माना जाता। तो ऐसे में तैमूर नाम पर विवाद खड़ा करना और सैफ या करीना को कठघरे में खड़ा करना एक पाखंड से अधिक कुछ नहीं है।

पत्रकार अरविन्द शेष ने एक जगह टिप्पणी की है कि तैमूर नाम को एक खास पूर्वाग्रह के साथ जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। उसका एक अर्थ लौहा भी होता है।

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पत्रकारिता के खिलाफ पत्रकार

Posted by chimeki on November 18, 2016

journalism2002 नेपाल के एक साप्ताहिक अखबार जनादेश के संपादक कृष्णसेन इच्छुक की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई। दूसरे दिन तमाम नेपाली अखबारों ने इस हत्या के विरोध में अपने संपादकीय पृष्ठ को कोरा छोड़ दिया। ऐसा कर सभी अखबारों और पत्रकारों ने राजनीतिक विचारधारा उठ कर पेशे की एकता का परिचय दिया था। उनके इस कदम का मतलब यह था कि माओवादियों और सरकार की टकराहट में उनका पक्ष जो भी हो लेकिन पत्रकारिता पेशे की एकता सर्वोपरि है।

कृष्णसेन इच्छुक की हत्या के विरोध जो व्यापक विरोध हुआ उसने तत्कालीन सत्ता पक्ष को यह एहसास दिला दिया कि उसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार पर हस्ताक्षेप नहीं करना चाहिए। और उसके बाद माओवादी जनयुद्ध को कवर करने वाले पत्रकारों की हत्या अथवा उनके दमन की कोई बढ़ी खबर नेपाल में देखने को नहीं मिली। और वो भी एक निरंकुष राजतंत्र में। यहां तक कि माओवादी पार्टी का मुखपत्र माने जाने वाले जनादेश में काम करने वाले भूमिगत पत्रकारों की हत्या नहीं हुई। लेकिन जो कुछ आज के लोकतांत्रिक भारत में देखने को मिल रहा है उससे चेतना बहुत जरूरी है। रिपोटर्स विदाउट बाडर्स् की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार भारत पत्रकारिता के पेशे के लिए तीसरा सबसे खतरनाक देश है। एशियाई देशों में ये अव्वल है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान एवं इराक से भी पहले।

हाल के वर्षो में खासकर पिछले दो वर्षों में भारत में मूल पत्रकारिता का दायरा बहुत छोटा होता जा रहा है। 2014 तक भारत में पत्रकारिता में सत्ता विरोधी स्वर प्रमुख था। पिछली सरकार के जनविरोधी फैसलों को उजागर करने में पत्रकारिता का बड़ा योगदान रहा। लेकिन वर्तमान सरकार में पत्रकारिता सत्ता पक्ष की प्रोपोगेण्डा मशीन बन गई है। जो कुछ भी सरकोर वाली पत्रकारिता दिखाइ दे रही है वह ब्लाग अथवा सामाजिक संजाल जैसे ट्वीटर या फेसबुक में सिमटा दी गई है। 2011 के जनगणना की माने तो भारत में मात्र 4 प्रतिशत लोगों के पास इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटर की सुविधा है। इसी तरह मोबाइल इंटरनेट, जो अभी भी काफी मंहगा है, के जरिए फेसबुक अथवा अन्य इंटरनेट सुविधाओं का उपभोग करने वालों की संख्या अभी भी बहुत कम है। अधिकांश लोग टीवी अथवा रेडियो या समाचारपत्र जैसे पारंपरिक माध्यमों पर ही सूचना के लिए आश्रित हैं। ये माध्यम ही दुनयावी जानकारी के लिए बहुसंख्यक आबादी के स्रोत हैं।

लेकिन पिछले दो सालों में ये माध्यम तेजी से सरकारी प्रोपोगेण्डा मशीन बन गए हैं और पत्रकारिता के सरोकारों को भुला दिया है।

नोटबंदी के सरकारी फैसले के बाद जिस तरह की अराजकता और परेशानी व्याप्त है उसे सामने लाना और सरकार को इस बात के प्रति चेताना हाल में पत्रकारिता का प्रमुख कार्यभार है। लेकिन सभी समाचारपत्रों और चैनलों ने अपने इस कर्तव्यों से किनारा कर लिया है। जो एक या दो समाचारपत्र या टीवी चैनल इसे दिखा रहे हैं उन पर हमले हो रहे है। अभी पांच दिन पहले कारंवा पत्रिका के पत्रकार पर हमला हुआ। और परसों और कल फील्ड से रिपोर्टिंग कर रहे रवीश कुमार और उनकी टीम को डराने की कोशिश की गई। जिन लोगों ने यह किया वे एक पार्टी के समर्थक थे। और वे ऐसा ही करते हैं और करेंगे। ऐसे लोग बस या मेट्रों पर भी होते हैं लेकिन हम यह मानते हैं कि इन्हे सरकारी संरक्षण प्राप्त नहीं होगा इसलिए हम प्रतिवाद करते हैं, उनकी सुनते हैं अपनी सुनाते हैं। लेकिन पिछले दिनों में यह आभास हो रहा है कि पत्रकारों पर इनके हमले के खिलाफ अन्य मीडिया संस्थानों का खामोश रहना अनिष्ठ का संकेत है।

सुधीर चैधरी का डीएनए क्या इनता विकृत हो गया है कि अपने ही पेशे पर हो रहे इस अशलील आक्रमण के खिलाफ एक लाइन तक नहीं कह सकते। वे जिस कदम को ठीक मानते हैं उसके प्रति उनका पुर्वाग्रह रखना कोई गलत बात नहीं है। लेकिन अपने पेशे के प्रति इस कदर उदासीन रहना उनकी बड़ी भूल है। अर्णव गोस्वामी या दीपक चौरसिया जो भारत पर आने वाले तमाम खतरों को दूर से ही भांप लेते हैं क्या लोकतंत्र पर मंडरा रहे इस खतरे को नहीं समझ पा रहे। पिछले दिनों कारंवा के पत्रकार और इन दिनों रवीश और उनकी टीम पर हो रहे हमले दरअसल पत्रकारिता पर हमले हैं। और इसलिए भी यह वक्त पत्रकारों को अपनी विचारधारा से उठ कर सोचने का है। रवीश पर खतरा एक व्यक्ति विशेष का मामला नहीं है ये पत्रकारिता के पेशे पर दवाब है। साथ ही यह फेसबुक और ट्वीटर के पत्रकारों पर भी हमला है। इसलिए पेशे को बचाने की लड़ाई बेहद जरूरी हो गई है। विचारधारा इसके बाद।

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भारतीय मध्यम वर्ग और पाकिस्तानी कलाकार

Posted by chimeki on October 6, 2016

पाकिस्तान में सिनेमा हॉल में भारतीय फिल्म

पाकिस्तानी सिनेमा हॉल में भारतीय फिल्म

भारत में पाकिस्तानी कलाकारों पर चल रही बहस ने एक बार फिर भारत के मध्यम वर्ग के कनफ्यूजन को सामने ला दिया है। आजादी के बाद से अब तक यह वर्ग अपनी गति को समझ पाने में नाकाम रहा है। पुरानी घड़ी के पेन्डोलम की तरह भारतीय मध्यम वर्ग दांय-बांय हिलता रहा लेकिन कहीं ठहर नहीं पाया।

उसके सपने का भारत आर्थिक रूप से संपन्न है लेकिन दूसरी ओर उसने संस्कृति के नाम एक ऐसे अलगाववादी रास्ते को पकड़ लिया है जो भारत में उपलब्ध संसाधनों को देखते हुए उसे समृद्धि की चकाचौंद दिखाने के लिए अपर्याप्त है।

वर्तमान समय में राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि का जरिया वैश्विक व्यापार है। इसके बिना आर्थिक समृद्धि की कल्पना मात्र असंभव है। लेकिन भारतीय मध्यम वर्ग जो दुनिया का सबसे निर्धनतम मध्यम वर्ग है एक खतरनाक अलगाववादी विचारधारा की जकड़ में कैद है। धर्म आधारित राष्ट्रवाद राष्ट्रीय समृद्धि के लिए आवश्यक वैश्विक संबंधों के लिए बड़ा खतरा है और इस कारण तमान देशभक्तिीपूर्ण नारों के बावजूद यह राष्ट्रीय हित के विपरीत एक राष्ट्रघाती विचारधारा है। विश्व में जहां कहीं इसका प्रयोग हुआ वहां आर्थिक समृद्धि के पैमाने पर यह प्रयोग बुरी तरह असफल रहा। यह बात ईरान के मुल्लाओं से लेकर म्यंमार के जून्टा शासन को भी समझ आ चुकी है। लेकिन भारतीय मध्यम वर्ग अभी भी इसे अपने हित में मान कर चल रहा है।

पाकिस्तानी कलाकारों का भारतीय फिल्मों में काम करना पाकिस्तान से अधिक भारतीय अर्थतंत्र के लिए फायदेमंद है। पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों के प्रचार के लिए इन कलाकारों का होना ज़रूरी है। उनकी बदोलत ये फिल्में पाकिस्तान में अच्छा व्यापार करती है और यह देश के फिल्म उद्योग के लिए फयदेमंद सौदा है।

अंग्रेजी समाचार पत्र इण्यिन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल पाकिस्तान में हर साल 50 के आसपास बॉलीवुड pakistan_indian_2फिल्मों का प्रदर्शन होता है। ये फिल्में करोड़ो का व्यापार करती है। पाकिस्तान, भारतीय फिल्मों का दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार है। 2006 में लगभग 40 साल बाद पाकिस्तान ने भारतीय फिल्मों पर लगे प्रतिबंद को हटाया। आमिर खान अभिनीत ‘थ्री इडीअट’ ने पाकिस्तान में 5 करोड़ का व्यापार किया, शाहरूख खान की ‘माई नेम इज़ खान’ ने 5.25 करोड़ का और सलमान खान की फिल्म ‘बॉडीगार्ड’ ने 6 करोड़ का व्यापार किया। इसके बाद आईं तमाम फिल्मों ने भी अच्छा व्यापार किया। वर्ष 2007 में प्रतिबंध के बाद पाकिस्तान में पहली फिल्म जॉन अब्राहम की ‘गोल’ थी जो 7 स्क्रीन में दिखाई गई। बाद की ‘थ्री इडीअट’ 22 स्क्रीन में और ‘डॉन टू’ 38 स्क्रीन में।

भारतीय फिल्मों ने भी पाकिस्तान फिल्म उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण काम किया। अच्छी फिल्मों ने दर्शकों में फिल्म देखने की आदत का विकास किया और 2006 से अब तक पाकिस्तानी फिल्म उद्योग 300 गुणा बढ़ा।

ऐसा नहीं है कि मात्र पाकिस्तानी कलाकार ही भारतीय सिनेमा में काम करते है। भारत के कई नामी सिने कलाकार भी पाकिस्तानी फिल्मों में काम पा रहे है। एक तरह से ये आदान प्रदान दोनों ही देशों के अर्थिक हित में है।

इसलिए यह आवश्यक है कि भारतीय मध्यम वर्ग अपनी आँखों में लगे धर्माधारित राष्ट्रवादी चश्में को हटा कर देश की आर्थिक उन्नती पर विचार करे क्योंकि देश की आर्थिक समृद्धि उसके हित में है। यह उसकी बढ़ती अनिश्चितता और तनाव के अंत की पहली शर्त है।

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Narendra Modi in Nepal

Posted by chimeki on April 29, 2015

Courtesy: Business Standart

Courtesy: Business Standart

It takes centuries to build a national identity and less than few months to lose it completely. This is a lesson that the people of Nepal are to learn very soon. Nepal, because of its geo-political location, has been always a place of political and diplomatic maneuverings for the regional powers but never before was it done so openly and brazenly as it is being done now.

Under Narendra Modi India has become dangerously assertive in Nepal. Since he took over as the prime minister of India he had made it clear that India would actively involve itself in the affairs of South Asia. The method would vary country-wise. In Nepal, he is trying to launch a powerful assault on the Nepali identity by evoking the Hindu identity. Interestingly, there is a complete lack of concern among the Nepali politicians and academia who, until recently, would jump the gun over anything they perceived as a threat to Nepal’s sovereignty and nationality.

While he talks Gandhi and secularism to his Western audience, his regular conjuration of the Hindu identity in Nepal has become a matter of serious deliberation among the concerned Nepal watchers. Post 2002 Gujarat communal carnage, Mr Modi projected himself as the man of development in India and abroad, but for Nepali people, he has become a religious zealot, a crusader who felt it his duty to make them conscious of their religion.

Mr Modi has betrayed his obsession with Nepal quite often in the last few months. His fixation with Nepal is hardly a secret now. In his first visit to Bhutan he mistakenly referred the Bhutanese parliamentarians as the Nepali law makers. Later he praised Nepal in his maiden Independence Day speech to the nation.

In between these two references he toured Nepal and offered prayers in the Pashupatinath temple. The photograph where his forehead is smeared in the temple’s holy ash created a sensation in the country. Even the hardcore nationalists saw it as a signal from India to have a good relationship. When he spoke in the Nepal’s Constitution Assembly, the first head of any state to do it in recent memories, he repeatedly evoked shared Hindu identity by the people of the two countries.

Taking the step further, he planned a road trip to Nepal in November this year to attend the 18th SAARC Summit. Thankfully it didn’t happen. Mr Modi’s itinerary included Janakpur, a town considered to be the birth place of Ramayan’s Sita, Muktinath and Lumbani. He had plans to address the people in all the three places.

Nepal and Identity:

Birth of Nepal as a nation-state coincided with the expansion of the British Raj in India. In the south of Nepal, the two powers constantly disputed over trade and border issues in the last and the first decades of the 18th and 19th centuries. Finally, in 1814 the more than two-decade-long tension culminated in a fully fledged war. The Anglo Nepalese War of 1814-16 in which Nepal suffered a humiliating defeat sealed the fate of Nepal for more than a century and a half. That defeat also made Nepal extremely conscious of its existence. Over the years Nepal’s foreign policy and relationship were moulded with a specific aim of protecting its existence. That was the reason, many believe, Nepal whole heartedly supported all British moves in Asia and the world.

During the first war of Independence in India in 1857, Nepal played a very crucial role in reestablishing English supremacy in the region. Then Prime Minister of Nepal Jung Bahadur Rana, who established the Rana autocracy or Ranacracy in Nepal, personally led the Gurkha army to crush the armed uprising in Lucknow and other parts of Northern India. Karl Marx called Jung Bahadur Rana ‘the English dog-man’. Even after the rebellion was thoroughly crushed, the Rana regime continued to aid the British establishment in India. Thereafter, the Ranas would not allow any anti-British activities from Nepal. In the following years Nepal was the source of a large number of Gurkha recruits and slaves for the English rulers. The successive Rana rulers continued to aid the British with Gurkha soldiers in the missions in Burma, Afghanistan, China, Malta, Cyprus, Malaya and Tibet. In the two world wars more than 2 lakh Gurkha soldiers fought along the British lines. During World War II there were 112000 Gurkha soldiers in the British Army, the highest ever.

Post British rule in Asia, precisely after India got freedom, when India’s new rulers set the task of assimilating as many independent states as possible into India’s fold, Nepal had to wake up to the new political reality. The hastily concluded Peace and Friendship Treat of 1950 with the new Indian government has signs of a desperate attempt by the then Nepali rulers to switch loyalty. Although the Rana rule ended soon after the treaty was signed, the treaty remained in effect. It still is. Since then this treaty is the core around which Nepali politics moves. The political trend in Nepal is that every political party would criticize the treaty when she is in opposition or leading an armed movement and go mum as soon as it would come to power or become part of the system.

The suspicion for India grew after Sikkim became the 22nd state of India in 1975. Many in Nepal saw it as a forceful annexation. This event added a new word in the Nepali political lexis, Sikkimikaran or Sikkimization. The merger made Nepali people more attached to their Nepali identity.

In the coming years, this attachment to identity first developed into cynicism and then transformed into socialism. The socialists in Nepal become the flag bearer of sovereignty and Nepali identity. This transformation happened due to the recognition and support Nepal got from the socialist China. China offered Nepal an olive branch to stand on its own, for itself against its mighty southern neighbor which, for many Nepalese, had followed the British legacy of expansionism and assertion.

Since 1950, there have been many attempts, deliberate or unintentional, to dilute the Nepali identity by the Hindu fundamentalists from the both sides of the border. Like today many Indian leaders had tried to influence Nepali masses by evoking common religious belief in the past too. However, Nepal for long remained unmoved from these assaults. In the last 60 years, Nepal has successful defied the Hindutva agenda of blending Nepali identity with the larger Hindu identity. Nepali people had always challenged the hegemonic rhetoric of its southern neighbor. Also, whenever they felt that the leaders or the kings couldn’t be trusted in safeguarding the sovereignty of the country they had come out to protest. Often these protests have led to big political changes.

On the other hand, the kings too found it necessary for their own survival to keep the Nepali identity separate from the broader Hindu identity. Often they fuelled nationalistic sentiments to check growing Indian interventions in the country’s sovereign affairs. The first king of Nepal Prithvi Narayan Shah warned his subjects from crossing the border and mixing with the Indian population. Later, the Rana rulers consciously chose not to be seen as an extension of India. However, from the second half of the 20th century, the idea of state-sponsored Nepali nationalism was challenged by the new and more inclusive form of nationalism i.e. socialist nationalism.

Nationalism(s) in Nepal

From 1950, there emerged contesting views of nationalism in Nepal. One view reflected the state sponsored top-down nationalism based on national pride centered on the Shah Monarchy and Hindu (not Hindutva) ideals while other view advocated bottom-up nationalism based on class unity of the marginalized and toiling masses. The former was intrinsically anti-woman, anti-dalit, anti-religious minorities and also against the people of Tarai (plains) known generally as the Madheshi. The latter view defined nationalism in Nepal’s context as the unity of all the exploited people and demanded restructuring of Nepal based on the principles of socialism and democracy.

After a prolonged struggle the people of Nepal succeeded in uprooting the monarchy in 2008. The first Constituent Assembly saw the largest number of representation of hitherto suppressed minorities, nationalities, gender and castes. It looked as if Nepal was on the threshold of resolving the contradictions it had been in since the emergence of modern Nepal. However the first Constitutional Assembly failed to write a constitution in the stipulated time and had to be dissolved. The second Constitutional Assembly, which came into existence in November last year, is not as representative as the first. The number of women, dalits, Madheshis and other marginalized communities and minorities has come down to one third of the previous number. Nevertheless, the people still hoped for a better Constitution than they had previously.

However, things have been changing fast in Nepal since the Baratiya Janta Party came to power in India. This has also coincided with the weakening of the nationalist consciousness among the Nepali people. Nationalistic feeling subsided because people feel cheated by the nationalist leaders. There is a feeling that the leaders cultivate nationalistic sentiments to further their self interests. It is not long ago when the Maoists were seen as the watchdog of national sovereignty. But they too proved to be the same old wine with a new label. It was during the premiership of the Maoist leader Dr Baburam Bhattarai that Nepal signed the worst bilateral trade agreement, the Bilateral Investment Promotion and Protection Agreement (BIPPA), with India. Several studies have already proved that these agreements have always harmed the interests of the weaker economies. Besides, the Maoists have shown reluctance to speak on India’s growing intervention in Nepal. In the name of pragmatism, they dared not offend India’s goodwill.

Not long ago the Maoists would stop Indian motor vehicles from crossing to Nepal calling it the right of sovereign people. There were nationalists who burnt posters of Indian film stars and politicians they thought had hurt the Nepali sentiments. These leaders are now completely silent over the most ill-timed intervention by the head of India. The passivity is bound to cost Nepal very much.

The question of nationality is still relevant for the neo-colonized countries and nationalities. Although, it is considered an obsolete idea to emphasize on nationality and identity at the cost of the larger class question nevertheless the weakening of socialist movements across the world and rising assault of capitalist imperialism has made it inevitable to fall back to the Marxist line which, along with the class question, addresses the question of nationalism in the newly colonized or neo-colonized countries of the world. For these nationalities, as Lenin would see in various forms of struggles, the nationalist or identity struggle is a process of crystallizing the class struggle. In the last decades of the last century, the socialists in many countries of the world creatively blended the Marxist class line with the issue of nationalism and were not only able to win over the large masses of people but also sustain their power for a longer period.

The Maoists in Nepal must remember Lenin’s warning when he said, “The bourgeoisie ‘want’ to curtail the class struggle, to distort and narrow the conception and blunt its sharp edge.”  Narendra Modi seems to be doing exactly this. He is trying to blunt the edges of the volatile class struggle in India and Nepal with a narrow nationalistic sentiment based on Hindu supremacy. The nationalists in Nepal, including the Maoists, must remember that nationalism is ultimately an idea. It cannot be saved, by stopping foreign goods and vehicles from crossing the border, shutting cinema halls playing foreign movies and other such rituals, useless the idea itself is saved.

V.S.

(Published at Sanhati.com on December 13, 2014)

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गुडगांव की गौरव इंटरनेशनल में तोड़फोड़ : रिपोर्ट

Posted by chimeki on March 3, 2015

अस्पताल में भर्ती समीचन्द के साथ पत्नी सान्जा

अस्पताल में भर्ती समीचन्द के साथ पत्नी सान्जा

14 फरवरी 2015 के दिन गुडगांव के उद्योग विहार स्थित गौरव इंटरनेशनल, रिचा ग्लोबल एवं अन्य गारमेंट कंपनियों के 5 हजार से अधिक श्रमिकों ने कंपनी के प्रबंधन के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन किया। अपने एक साथी समीचंद पर प्रबंधन के लोगों द्वारा किए गए जानलेवा हमले के विरोध में हुए इस स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन को दबाने के लिए पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा जिससे इलाके में भगदड़ मच गई। पुलिस का दावा है कि श्रमिकों ने 100 से अधिक वाहनों से तोड़फोड़ की, जला दिया और आसपास की कंपनियों को भरी नुक्सान पहुंचाया। वहीं फैक्ट्री के मजदूरों का कहना है कि प्रबंधन के लोगों ने अपने कृत्य को छिपाने के लिए खुद के गुंडों से तोड़फोड़ कराई है ताकि श्रमिकों को फंसा कर समीचंद पर हुए कातिलाना हमले को छिपाया जा सके।

बहुत ही कम अखबारों की सुर्खी बने इस मामले ने गुडगांव प्रशासन को पूरी तरह से हिला कर रख दिया है। स्थानीय पुलिस से लेकर सीआईडी, सभी हिंसा के कारण तलाशने में जुट गए हैं। यह रिपोर्ट लिखे जाने तक पुलिस ने समीचंद के साथ हुई मारपीट में शामिल 7 लोगों को हिरासत में ले था और मुख्य आरोपी कंपनी का पर्सनल मैनेजर आर. एस. यादव ने अग्रिम जमानत ले ली है।

समीचंद पर हमला और उसके बाद

10 फरवरी की सुबह जब सारा देश दिल्ली चुनाव के नतीजों का बेसब्री से इंतजार कर रहा था और रुझान आने लगे थे ठीक उसी वक्त गौरव इंटरनेशल कंपनी में काम करने वाला समीचंद अपनी शिफ्ट के लिए घर से निकला था। पिछले दो दिन से उसे बुखार था इसलिए वह धीरे धीरे चला रहा था। उसकी पत्नी सान्जा जो उसी कंपनी में काम करती है उसके साथ ही निकली थी लेकिन बिमार समीचंद पीछे छूट गया था।  कंपनी पहुंचने पर गेट पर तैनात गार्ड ने समीचंद को भीतर आने से रोक दिया। वह कोई 5 मिनट लेट था। समीचंद का कहना है कि वह पहली बार देर से पहुंचा था इसलिए उसने अपने फिनिंशिग मैनेजर राठौड से बात करने की कोशिश की। जब गार्ड ने उसे ऐसा नहीं करने दिया तो उसने मांग की कि या तो वह उसका लेट लगा दे या मैनेजर को बुला कर उसका हिसाब करवा दे। उसके ऐसा कहते ही गार्ड उसके साथ गालीगलौज करने लगा।

समीचंद और गार्ड की तकरार देख कर गार्ड सुपरवाईजर धर्मवीर और गार्ड संतोष भी गेट पर पहुंच गए और समीचंद को घर वापस चले जाने की धमकी देने लगे। कंपनी का पर्सनल मैनेजर आर.एस. यादव जो अपने कैबिन से यह सब देख-सुन रहा था बाहर आ गया और चिल्लाते हुए गार्ड से कहने लगा, ’इसे अंदर ले चलो अभी इसका हिसाब कर देते हैं’। गार्ड रूम के अंदर आर.एस. यादव, धर्मवीर, अनिल, संतोष और ड्रायवर प्रह्लाद ने समीचंद की तब तक पिटाई की जब तक कि वह बेहोश नहीं हो गया। वह चीखता रहा कि उसके चार बच्चे हैं और उसे जाने दिया जाए पर पीटनों वालों पर इस बात का कोई असर नहीं हुआ। इस दौरान सान्जा को किसी ने बताया कि उसके पति को गार्ड रूम लोग मार रहे है तो वह भी वहां पहुंच गई और दरबाजा खटखटाने लगी। जब समीचंद बेहोश हो गया तो आर.एस. यादव और अन्य समीचंद और उसकी बीवी उनके घर कापसहेड़ा छोड़ आए। सान्जा बताती है कि वह रो रो कर उन लोगों से अस्पताल ले जाने की मांग करती रही लेकिन वे लोग नहीं माने।

गौरव इंटरनेशनल और रिचा ग्लोबल गुड़गांव की रिचा ग्रुप की कंपनिया है जो इस क्षेत्र की सबसे बड़ी गारमेन्ट (कपड़ा) कंपनी है। यहां हजारों मजदूर काम करते हैं और अमरीका, युरोप, आॅस्ट्रेलिया एवं कनाडा की सभी बड़े ब्रांड रिचा ग्रुप से से माल खरीदते हैं। यह कंपनी उप्पल परिवार द्वारा संचालित है।

समीचंद पर इस हमले के बाद जो खेल शुरू हुआ उसकी मिसाल सिर्फ गुड़गांव में ही देखने को मिल सकती है। कानून, पैसा और मीडिया समीचंद की जान की कीमत में अपना अपना हिस्सा तलाशने लगे।

समीचंद का भाई शेखर बेहोश समीचंद को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले गया। जहां कुछ देर बाद कुछ समय के लिए समीचंद को होश आ गया। डाक्टर की रिपोर्ट में पसली के टूटने और आंतरिक स्त्राव बताए जाने के बावजूद उसे दर्द की दवा देकर रात 11 बजे अस्पताल से छुट्टी कर दी गई। रात भर समीचंद दर्द से तड़पता रहा। सुबह 5 बजे शेखर समीचंद को फिर सफदरजंग ले गया और उसे भर्ती करवाया।

शेखर बताता है कि 11 फरवरी के दिन समीचंद को देखने आर.एस. यादव, मोहन, धर्मवीर और प्रह्लाद अस्पताल आए थे और रू. 15000 ले कर समझौता करने की धमकी दी थी। वह बताता है कि आर.एस. यादव का सहायक मोहन उसे बार बार धमकी देता रहा कि समझौता कर लो वर्ना गुड़गांव में काम करना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन शेखर ने भाई की जान पर समझौता करने से इंकार कर दिया।

12 फरवरी की सुबह शेखर तड़पते हुए समीचंद को आॅटो में लेकर गुड़गांव के उद्योग विहार थाने गया। शेखर का कहना है कि वहां मौजूद एक पुलिस वाले ने फोन कर कंपनी के कुछ लोगों को बुला लिया और यह कहता हुआ बाहर चला गया कि ‘आपस में निपट लो’। शेखर वहां से निकल कर निकल आया और समीचंद को गुड़गांव के ईएसआईएस अस्पताल में भर्ती कर दिया। पुलिस ने शेखर को यह नहीं बताया कि उसने उसकी शिकायत का क्या किया।

इस बीच 12 फरवरी के ही दिन गौरव इंटरनेशनल और आसपास की कंपनियों के मजदूरों को जब दो दिन तक समीचंद की कोई खबर नहीं मिली तो वे भड़क गए। कंपनी गेट के सामने प्रबंधन के खिलाफ मजदूरों ने धर्ना दिया और आर.एस. यादव के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। उनकी मांग थी कि प्रबंधन समीचंद की स्थिति की सही जानकारी मजदूरों को दे।

कंपनी के प्रबंधन ने मजदूरों की जायज मांग नहीं मानी बल्कि उल्टा पुलिस को बुला लिया। पुलिस ने आते ही बिना किसी चेतावनी के मजदूरों को पीटना शुरू कर दिया। अचानक हुई पुलिस कर्रवाही से मजदूर सकते में आए गए और चारो तरफ अफरातफरी मच गई। पुलिस ने बेरहमी से स्त्री-पुरुष मजदूरों को पीटा। कई मजदूर घायल हुए और उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ति करवाया गया। अस्पताल में भर्ति एक मजदूर ने बताया कि पुलिस ने क्षेत्र को चारो तरफ से बंद कर दिया था जिससे मजदूरों निकल नहीं पाए।

बताया जा रहा है कि 12 फरवरी के दिन समीचंद की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने कंपनी के दो गार्डो को गिरफ्तार किया था लेकिन रिचा ग्रुप के प्रसर्नल मैनेजर डागर ने उन्हे शाम को ही छुड़ा लिया।

दूसरे दिन अखबारों ने इस घटना को पुलिस और प्रबंधन के पक्ष से ऐसे प्रकाशित किया मानों कंपनी और आसपास हुई तोड़फोड़ के लिए समीचंद और उसकी बीवी ही जिम्मेदार हैं। यहां तक कि जब लोगों को लग रहा था कि समीचंद की मौत हो गई है तो किसी भी अखबार ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि सच्चाई क्या हैं। जो खबर पुलिस उन्हे दे रही थी वहीं समाचार अखबारों में प्रकाशित हो रहा था।
जब 14 फरवरी को गुड़गांव के मजदूर एकता मंच के कार्यकर्ताओं ने पुलिस पर दवाब बनाया तो पुलिस ने एफआईआर लिखे जाने की सूचना दी और कार्यवाही का आश्वासन दिया है। पुलिस ने आर.एस. यादव, धर्मवीर और अनिल के खिलाफ दफा 323, 342 और 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज की है जो अपराध को देखते हुए बहुत मामूली धाराएं हैं। अब खबर यह आ रही है कि पुलिस इन्हीं कार्यकर्ताओं से पूछताछ कर रही है।

ज्ञात हो कि गौरव इंटरनेशलन में मारपीट का यह पहला मामला नहीं है। इस पहले भी मजदूरों के साथ मारपीट, महिला कर्मचारी के साथ अनुचित व्यवहार की खबरें प्रकाश में आती रहीं हैं।

समकालीन तीसरी दुनिया के मार्च 2015 अंक में प्रकाशित

वि.श.

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डाॅ. तुलसी राम : व्यक्तित्व

Posted by chimeki on February 22, 2015

dr-tulsiramडाॅ. तुलसी राम ने अपने विचारों से बहुत से लोगों को प्रभावित किया। वे एक ऐसी शख्सियत थे जिनके साथ चंद पलों की मुलाकात लोगों के जीवन को ऐसे प्रभावित कर देती थी जैसा प्रभाव बहुत थोड़े लोग ही डाल पाते हैं। अब जब वे नहीं रहे तो उन्हे याद करते हुए मुझे 2003-2004 का जाड़ा याद आ रहा है जब मैंने उन्हें पहली बार सुना था। मैं काॅलेज में था और ‘संवाद’ नाम की एक संस्था में नौकरी भी करता था। वह मेरी पहली नौकरी थी। नौकरी का आकर्षण था कि मुझे अक्सर बाहर घूमने को मिलता था।

2002 में गुजरात में हुए मुस्लिम हत्याकाण्ड के बाद हमारी पीढ़ी के लिए भी, जिसने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद के उन्माद को नहीं देखा था, सांप्रदायिकता महत्वपूर्ण विषय बन गया था। इस संदर्भ में दिल्ली की ‘अनहद’ संस्था द्वारा एक वर्कशाॅप का आयोजन किया गया था जिसमें ‘संवाद’ की ओर से मैं शामिल हुआ था। दिल्ली में किसी वर्कशाॅप का यह मेरा पहला अनुभव था। इससे पहले भी यहां आना हुआ था लेकिन केवल रैली और काॅलेज के प्रायोजित भ्रमणों में। यह वर्कशाॅप निजामुद्दीन के पास एनसीसी ग्राउण्ड में आयोजित की गई थी।

वर्कशाॅप में तमाम वक्ताओं में डाॅ तुलसी राम ही थे जिनकी बातों ने मेरे अंदर कौतूहल पैदा किया जो लंबे समय तक साथ रहा। उनका व्याख्यान दूसरे या तीसरे दिन के किसी सत्र में था लेकिन वह मेरे मस्तिष्क में हमेशा के लिए एक निशान बना गया। इसका कारण था कि उन्होंने बहुत ही साफ शब्दों में बता दिया था कि हिन्दू होते हुए किसी का इंसान बने रहना नामुमकिन है।

मुझे यह याद आता है कि सत्र के अंत में मैंने डाॅ अंबेडकर और समाजवाद के बीच के अंतर्विरोध पर जानना चाहा था। उन्होने धैर्य के साथ बताया कि अंबेडकर ने अपना राजनीतिक जीवन समाजवादियों के साथ ही आरंभ किया था और उस समय के समाजवादियों की वैचारिक कमजोरियों के कारण उनसे अलग हो गए थे। बाद में उन्होंने एक अलग मार्ग तलाशते हुए राजनीति की लेकिन समाजवाद की आधारभूत मान्यताओं से वे आजीवन सहमत रहे। उन्होंने यह भी समझाया कि अंबेडकर भारत में जनवादी आंदोलन की वह बुनियाद है जिस पर समाजवाद की इमारत को खड़ा किया जाना है।

इसके अलावा जो बात मेरे दिमाग में बैठ गई वह यह कि तमाम अनर्गल दावों के बावजूद सच्चाई यह है कि हिंदू धर्म और हिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बिना हिंसा के हिंदू धर्म का अस्तित्व मात्र नहीं रह सकता। यह एक ऐसी बात थी जो ‘गुड हिन्दु-बैड हिन्दु’ वाले सरलीकरण के उलट थी। हिंदू धर्म और हिन्दुत्व एक ही है- मेरी यह समझदारी डाॅ. तुलसी राम की देन है।

डाॅ तुलसी राम ने हिंदू धर्म के प्रतीकों, ग्रंथों तथा मान्यताओं के हवाले से उस दिन मेरे आगे यह स्पष्ट कर दिया था कि इस धर्म में ईश्वर के आगे तक लोग बराबर नहीं है, कि इस धर्म के ईश्वरों और रक्षकों का सुख आधुनिक सभ्यता की तमाम मान्यताओं से विपरीत के कृत्यों में है और इस धर्म के ईश्वर असमानता के सबसे बड़े संरक्षक है।

इस भेंट से पहले मेरे विचार बहुत ही कांट्राडिक्ट्री अथवा अंतर्विरोधी थे। मैं सभी धर्मो में अंततः अच्छाई को स्वीकारता था और धर्म को अफीम भी कहता था। पुराने संस्कार रट लिए गए भौतिकवाद पर भारी थे। बाद के दिनों में क्रमशः भौतिकवादी दृष्टिकोण मजबूत हुआ। क्योंकि अभी तक कोई मनौवैज्ञानिक संकट उत्पन्न नहीं हुआ है इसलिए अभी भी आत्मपरीक्षण बांकी है। मेरे न जाने कितने दोस्त जीवन में संकट आते ही अपनी शिक्षा को संस्कारों के हवनकुण्ड में डाले जा रहे हैं और इन्हें देख कर मैं भी भयभीत रहता हूं कि कहीं मैं भी ‘सामाजिक’ और ‘आध्यात्मिक’ ‘दबाव’ की दुहाई देकर ऐसा कुछ न कहने-करने लगूं। लेकिन यह बाद की बात है।

दिल्ली से जबलपुर लौटते हुए और डाॅ. तुलसी राम को बार बार दोहराते हुए मैं ओशो, विवेकानंद, महात्मा गांधी, राधाकृष्णन और तमाम पाखण्डों से मुक्त हो चुका था। अचानक मेरे जीवन में गणेश रायबोले सबसे अधिक जरूरी मित्र हो गए थे क्योंकि दुनिया को देखने का उनका नजरिया भी डाॅ. तुलसी राम की तरह है। इसके बाद गणेश रायबोले से मेरी दोस्ती पक्की हो गई और सीखने-समझने का क्रम चालू है। डाॅ. तुलसी राम दोस्ती भी कराते थे।

तो डाॅ. तुलसीराम के जरिए मैंने सीखा कि हिंदू होते हुए इंसान नहीं रहा जा सकता है। हिंदू धर्म एक अर्थ में जातिवाद का धार्मिक आवरण है जो जातिवाद को (अ)नैतिकता प्रदान करता है। ऐसे में हिंदू होते हुए किसी का काॅमरेड बने रहने का दावा पाखण्ड से अधिक कुछ नहीं हो सकता। आज भी जब तमाम दोस्त हिंदू धर्म की आलोचना को पर्सनल लेने लगते हैं, जब हिंदुओं की क्रूरताओं को मुस्लिम प्रतिरोध के साथ बैलेंस करते हैं, जब आदिवासियों और दलित समुदाय के बीच ईसाइयत के प्रसार को औपनिवेशिकरण कहते हुए ‘फोर्स्‍ड कन्वरज़न’ को रोके जाने की मांग करते हैं तो उनकी मूर्खता पर हंसी नहीं गुस्सा आता है। इस्लाम और ईसाइयत स्वीकारना यदि किसी पीडि़त समूदाय को राहत देता है तो इसे प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिए। हिंदू धर्म को त्यागना उत्पीडि़त जनता का साहसिक विद्रोह है। कम से कम ‘हिंदू मरेंगे तो नहीं।’ हिंदू धर्म में पैदा होना न होना किसी के वश में नहीं है लेकिन हिंदू रहना, हिंदू जीना और हिंदू मर जाना देश की उत्पीडि़त जनता के साथ विश्वासघात है।

डाॅ. तुलसी राम सिखाते हैं कि भारत में सामाजिक बराबरी के लिए हिंदू धर्म के संस्कारों और विचारों का नाश जरूरी शर्त है। इसकी शुरूआत प्रगतिशीलों से होनी चाहिए। सिर्फ सेल्फ-सर्टिफाई करने से काम नहीं चलेगा। एक काॅमरेड के लिए सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि, ‘मैं जाति में विश्वास नहीं करता, मैं धर्म को नहीं मानता’ बल्कि व्यापक जनसमुदाय के साथ एकता के बारे में यदि वे गंभीर हैं तो उन्हें साबित करना ही होगा कि वे हिंदू नहीं हैं। वर्ना ऐसे कितने प्रगतिशील काॅमरेड हमारे साथ ही हैं जो कुण्डली मिलाकर ही अपने बच्चों की शादी करते हैं और जब कभी किसी काॅमरेड का प्रेम विवाह होता है तो किसी ‘दैवीय हस्ताक्षेप’ से उनका जीवनसाथी उनकी ही जाति का होता है। जाति और हिन्दू धर्म के मुक्त होने से ही भारत में अंतरवर्गीय एकता का आधार निर्माण होगा जो श्रमजीवी जनता के विभाजन कोे रोकेगा क्योंकि जाति, श्रम का ही नहीं ‘श्रमिकों का भी विभाजन है।’

वि.श.

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That wasn’t funny Mr Modi

Posted by chimeki on September 1, 2014

modi_japanMy friend Laxman knew better than most of us what bullying was. His father worked in Pahalwaan’s fields, a small time landlord of our town with a penchant for bullying people dependent on him or weaker. Pahalwaan also ran a tea shop. The tea shop was the place, where grown up people of our locality met and talked.

When Laxman was 13, Pahalwaan asked his father to send him to work in his shop after school. Laxman’s work was to wash dishes and server tea. Seldom, we would go to the shop to meet Laxman. Due to the work, he had become irregular in the playground where we used to play in the evenings.

Many a time, we saw Pahalwaan and other bullying Laxman. Pahalwaan would hold his ears and role them. ‘ye dekho Ganapati ka chuha’, one day we heard him mocking Laxman. Often, we too would become part of that regular dose of fun. We were too young to understand how Laxman was taking it. Later, we too started doing the same with Laxman. The tallest and the heaviest of us would caught hold of Laxman’s ears and make him Ganapati. We would laugh holding our pants. Those giggles cost Laxman too much. He started avoiding us. One Monday, the day Pahalwaan kept his shop closed, Laxman didn’t come to play. For he was the most sought-after player, the curiosity was obvious.

When his absence became regular, we knew something was wrong. One Monday we went to meet him in his house. We found him playing with his sisters. He couldn’t convincingly tell us why he stopped coming to play. He just said that he had lost interest. Sometimes after, he left school too. His father told our teacher that Laxman cried every time he was told to go to school.

Soon we forgot Laxman. I don’t know how is he now but I know that it was bullying of Pahalwaan and us that took him away from us. Who knows what he would have become had we not bullied him? After all he wasn’t lacking anything. Only thing that had saved us from suffering the fate of Laxman, perhaps, was that we survived Pahalwaan’s bullying. By bullying Laxman, Pahalwaan had set a trend. He had made Laxman a clown for others too. Now there is no Laxman in our town but Ganapati. Often people see him dancing in the processions against crowd cheering, ‘wah Ganapati, shabash’.

I have lived and relived Laxman a thousand times. His fate is a realization for me what bullying can do. It breaks children’s confidence. In India, there are many Laxmans who are bullied every minute for sadist pleasure of mentally sick people. When PM Modi, held the ears of the boy in a temple in Japan and made fun of him I was taken back in time. I saw myself standing in front of Pahalwaal’s shop watching Laxman being bullied. Although, it was happening seven seas far, I could recognize everyone there. I saw Raju chacha, Hari bhaiya, Vinod, Abhishek and I laughing aloud. Laxman too was laughing but has tears in his eyes. I know, like then, this time too he won’t forgive me.

V.S.

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In Nepal PM Modi failed to break with the past

Posted by chimeki on August 6, 2014

Courtesy: Business Standart

Courtesy: Business Standard

Despite beginning his speech in Nepali, acknowledging Lumbini as Gautam Buddha’s birthplace and reuniting Jeet Bahadur with his family, Prime Minister Narendra Modi’s Nepal visit was an absolute failure in terms of everything India wanted to see him achieve. People in India as well as Nepal expected from PM Modi that he would break with the old tradition in India-Nepal relationship where Nepal always has to play younger brother role and usher it in an era of equality opportunity. Sadly, as at home he couldn’t deliver abroad.

His maiden speech in the Constituent Assembly of Nepal was worst ever speech by a visiting head of any country in any host country. It was more of a sermon than a clear cut diplomatic statement, which every one rightly expected.

PM Modi was expected to fill the holes which consecutive Indian governments had dig in in Indo-Nepal relationship but he, like his predecessor Dr. Manmohan Singh, ended up adding more!

Narendra Modi did well to begin his speech in Nepali but failed to keep the momentum. Initially it appeared that he was one who was free of big brother syndrome, which Indian leaders generally carry, but two-three sentence later he shed his mask of humility and started coaching Nepali parliamentarians on his favorite topics: religion, history, management and mostly importantly himself!

What India badly needed in Nepal was an image makeover. For whatever India does in Nepal is always seen with suspicion. Suspecting everything India does in Nepal is the default setting in a Nepali mind. So PM would have done better if he would have come out of his election mode and talked business. After all he wasn’t there to influence voters!

The first blunder that Modi made was to unnecessarily evoke gods to describe Nepal’s relevance. Doing that, he ignored the feelings of non-Hindu population of that country. He wasted many minutes of his 45-minute long speech to explain how his coming from Somnath and winning election from Kashi (Varanasi) brought him closer to Pashupati (Nepal)! Further he wrongly claimed that 125 crore Indians want to visit Pashupatinath temple!

In his enthusiasm to impress or impress upon Nepali parliamentarians, half of whom are Communists, he forgot to minus Muslims, Christians, Sikhs, Dalits and other minorities of India and Nepal from that number who are barred from entering the elite temple. In the gate of the temple it is written in bold, ‘Non-Hindus are not allowed inside the temple premise’! Moreover, even Nepalis do not relate themselves to Pashupatinath. It is Gautam Buddha who is the real national symbol in Nepal. Ask any Nepali there, the first thing he would like a tourist to see in Nepal is Lumbini, the birth place of Buddha. PM Modi would have done better by congratulating Nepal on becoming a secular democratic country.

It is again a diplomatic blunder to try teaching leaders of host countries what they should be doing. In half of his speech he did this. To add on to it, he told the members of the Constituent Assembly that they didn’t know what they were actually doing! He spoke as if those men and women didn’t understand the meaning of constitution writing. Once he even said, ‘you think you are doing this but actually you are doing that’.

The PM would have really done well had he talked about the process of Indian constitution writing. It was an opportune moment to remember Dr BR Ambedkar, the architect of Indian Constitution, and the challenges he had to overcome to write it. And, also what features of Indian constitution played important role to keep India stable and on the path of social justice. It would have definitely given the Nepali law makers some food for thought. But our PM ignorantly mixed modern constitution with the ancient Hindu texts! Rather suggesting them to have saintly and priestly mind, he could have suggested them to have scientific and rational attitude.

It makes one wonder if our PM really don’t know anything beyond the Ganges, gods, Hindu religion and of course himself. He didn’t once mention any great Nepali leader or literary figure. Compare his speech with the US President Barak Obama’s in the Indian Parliament and readers can easily spot the differences. President Obama spoke about Mahatma Gandhi and Rabindranath Tagore. He evoked both to highlight the importance of equality, human dignity and social justice. In contrast PM Modi could only stereotype Nepalis as shedding blood in India’s wars and belonging to the country of Lord Pashupatinath. President Obama genuinely recalled the roles of his predecessors in building relationship with India. PM Modi, in contrast, negated the roles played by the likes of Jawaharlal Nehru, Indira Gandhi, IK Gujral and others in bringing India and Nepal closer. It wouldn’t have left bad a taste had he talked about Jayaprakash Narayan, Chandra Shekhar, VP Singh and other Indian leaders who always associated themselves with Nepal’s democratic movements and who Nepali people still fondly remember. But no, Modi can’t do this. His ego is too big to see anything beyond himself. With this attitude, Modi will never achieve what he intends to achieve. He can never be the South Asia’s leader he aims to become and who the region badly needs.

V.S.

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Holiday: Disappointment, Thy Name is Akshay

Posted by chimeki on July 12, 2014

Holiday_-_A_Soldier_Is_Never_Off_DutyA.R. Murugadoss’s Holiday: A Soldier is Never Off Duty is one perfect example of mindless people creating a hopeless cinema. Its success in the box office is another proof of Indians’ low IQ who are adamant about beating their own record every second day. One day they castigate Maria Sharapova for not knowing Sachin Tendulkar, the next day they cheer Rail and Union Budgets as ‘unprecedented’.

It chocks my throat to call Holiday a cinema. Believe me it is not. It is an IB propaganda film. Its message: all Muslims are either terrorists or collaborators. The film doesn’t even leave small children.

So this guy Akshay Kumar as Virat is a soldier who can think like terrorists and can really terrorize (the audience) more than terrorists. Accidently or in khel khel me he discovers that a sleeper cell is active in Mumbai and is about to attack Mumbai by planting bombs and explosive in twelve places on a same day. He recruits his twelve friends to follow these terrorists and asks them to shoot them point blank. He is sure that there is no point arresting them. He is also a new age patriot who is ready to use his sister as bait to hunt down terrorists! When sister asks why, he lectures her on nationalism, duty towards nation etc. very shamelessly. It is not understood why he doesn’t use his heroine Sonakshi Sinha in his sister’s place. Anyway she has no important role in the movie. The only reason I can guess was that he had a dance number with her just after that ‘intense’ scene.

Akshay is very consistent in delivering nonsense movies but this one beats his previous all. And no surprise it is his highest earning film. From his accent, dance steps to his un-dramatic act he touches his all time low. His Boss made me run out of theatre half way. This one gave me a shock too hard to move my legs. Next time, I am firm, I will never step in the hall that plays Akashy. By god he is a dolt.

Bollywood has learnt: the more the film is senseless the more its collection. It perfectly understands that to make that sort of movies it has to look beyond the West. So it has turned South. Mark my words our South is not letting it down. Out of all the hits in recent years most of the movies are either remake of South Indian cousins or their directors are South Indians.

V.S.

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Indian electoral results will impact on minorities in South Asia

Posted by chimeki on June 10, 2014

saarcWith Narendra Modi’s ascendance to power in India the long feared political transformation of South Asian politics is complete. South Asia today is in the grip of majoritarianism. Most of the eight SAARC countries are governed by political parties that do not have a good record of safeguarding minorities’ rights.

Only Nepal and Bangladesh can be said to be not openly aligning with their countries’ majoritarian politics, however, the change in the biggest neighbor can drift the political pendulums of these countries too to the extreme right. A situation has emerged where there is no place in the South Asian region where the rights of its minorities are not prone to tampering. This is a dangerous phenomenon in a region as diverse as South Asia.

Like a double-edged sword, in South Asia, the Modi victory in India will work two ways. In Bangladesh, Pakistan and Sri Lanka fundamentalists will get further  justification for consolidation on religious lines.

In Nepal, it will boost the morale of religious chauvinists who were feeling defeated and dejected in Republic Nepal. The BJP, in the past, had openly supported the Monarchy in Nepal hence monarchists and fundamentalists will certainly try and renew channels of communication with New Delhi. Even before Narendra Modi was sworn in , voices seeking a referendum on monarchy and the declaration of Nepal as a secular country have started making noises.

Nepal had benefitted economically during the previous BJP led NDA government, and as a corollary rightist parties and godmen had enjoyed considerable clout in Nepal. During that period the RSS affiliated Vishwa Hindu Parishad (VHP) had become hyperactive in the Himalayan country. Even after King Gyanendra suspended the Nepal government on February 1 2003, VHP supremo Ashok Singhal was instrumental in giving the coup legitimate cover. In return, Gyanendra allowed the VHP to propagate its communal agenda. At the time the government of India fully supported the VHP in Nepal.  In September that year Nepal saw the first ever communal riot in the capital city of Kathmandu after 12 Nepali nationals were killed in Iraq by Islamic militants. Religious zealots attacked mosques and properties of Muslims.

Today, Nepal is passing through a very critical time. It is writing a constitution which will guide its future actions. However, religious zealots in Nepal clearly see an opportunity in the Indian election results to place obstacles in the way of efforts to establish Nepal as a secular and democratic nation.The change has already started showing. Two days after the Indian Lok Sabha results were announced the Nepal government accepted the demand of the Pashupatinath Temple priests for 17 per cent share from the income generated by special offerings in the temple. The priests had been agitating for a month for this.

Moreover, the royalist and religious forces have considerable presence in the present Constituent Assembly. The Rashtriya Prajatantra Party – Nepal and the Rashtriya Prajatantra Party have emerged as the 4th and the 6th largest parties with 37 seats in 601 member assembly. In the last Constituent Assembly together they held only eight seats.

Under Modi, the BJP may play wise by not openly supporting the disreputable monarchy but it can certainly, like the previous NDA government, use its ‘Gandhi’ Ramdev and other RSS backed affiliations to work on that direction. Ramdev enjoys a considerable popularity amongst the monarchists in Nepal. In India his Bharat Swabhiman Trust has been working with people of Nepali origin for many years. The trust has been successful in depoliticizing the Nepalese and blunting aspirations for secularism amongst them.

V.S.

(First published in the Citizen on 25 May 2014.)

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