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Nepal’s Bhattarai Set To Form New Party, More Splits In UCPNM Expected

Posted by chimeki on October 5, 2016

baburamThe Resignation of Dr Baburam Bhattarai from the United Communist Party of Nepal (Maoist), UCPNM, has not come as a real surprise for the readers of the Citizen. The break was delayed because the prolonged constitution drafting process Baburam’s intentions were visible on his face during his farewell press conference yesterday. His voice betrayed an excitement of a leader who is ready to explore new possibilities, and is clearly set to form a new political party.

The two main architects of the Maoist insurgency, Prachanda and Baburam, in Nepal were never able to come to terms with each other. Even during their underground days, they usually stood in opposite camps on many vital issues concerning the party’s ideological and political line. From the start of the civil war until it lasted there was hardly a year in ten years when news of their rivalry, threatening the existence of the movement, didn’t surface.

Prachanda’s loyalists often blamed Baburam of brewing ambition to oust him, at least ideologically. Prachanda, a shrewd politician knew that he needed Baburam on his side to make the struggle look more than an armed conflict. Baburam’s presence, a Ph.D from JNU, gave the party a facade to win over the middle class, which Prachanda believed was necessary for the movement to grow. Although he never tried to put a stop to the anti-Baburam campaign in the party he never seriously wanted to lose Baburam. He even allowed Baburam to write some of the important political documents during and after the insurgency. For Baburam, playing second to Prachanda, even when he was being humiliated was compulsion. He knew that without Prachanda it would be impossible for him to convince the party leadership to accept ‘bourgeoisie’ democracy as the goal of the movement.

Like the unity, the break too was a compulsion for Baburam who has been burning the midnight oil to carve an independent path for himself for long. In the last three years he has projected himself as a leader of a new age. He is the most active Nepali leader on Facebook and his idea of politics, corruption free, transparency, austerity, finds resonance among young Nepalis who are exposed to, thanks to smartphones, the state of politics in the world. Since 2012, he has been advocating ‘leadership of a new type’ for Nepal and consciously belittling Prachanda’s style of politics. Baburam, known for hardhearted reasoning, knows that shedding his ‘Maoist’ legacy is now necessary to win over youth in the changed politics of his country.

The move is obvious so is the outcome. Within days, several leaders will join Baburam’s bandwagon and leave Prachanda sulking. Prachanda, who was once described by the Time of India as a ‘Fidel Castro of South Asia’ seems set to outlive his utility.

(Published in the Citizen, 27 September 2015)

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आईएसआईएस का आकर्षण

Posted by chimeki on August 3, 2015

isis1980 के दशक से शुरू हुए भूमण्डलीकरण ने बहुत तेजी से असामनता को जन्म दिया है और साथ ही इस असामनता ने विद्रोह की बड़ी संभावनाओं को पैदा किया। अमेरिका और युरोप में मध्यम वर्ग तेजी से कमजोर हुआ और वैसी ही स्थिति फिर से पैदा हुई जिसने युरोप को पिछली सदी में पहले और दूसरे विश्व यु़द्ध की ओर डकेल दिया था।

दूसरी ओर भूमण्लीकरण ने दुनिया भर के देशों को आपस में अभूतपूर्व रूप से जोड़ दिया है। आज एक देश में होने वाली मामूली से मामूली घटना भी अन्य देशों में कहीं व्यापक रूप से असर डालती है। ऐसे में विश्व स्तर में जन उभार की संभावनाएं पूराने विद्रोहों से बहुत बड़ी हो जाती है। यह जरूरी हो जाता है कि विश्व स्तर में ही एक ऐसा महौल बनाया जाए जो यथास्थिति को ही बनाए रखने के लिए जनता को मानसिक रूप से तैयार रखे।

1990 के बाद अमेरिका और युरोप में तेजी से नए प्रकार के आंदोलनों का सिलसिला आरंभ हुआ। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की योजनाओं के खिलाफ लोग सड़को में उतर आए। युरोप, लातिनी अमेरिका और अन्य देशों में वे राजनीतिक दल मजबूत हुए जो भूमण्डलीकरण की खिलाफत कर रहे थे। साथ ही कई दलों ने अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए अपने कार्यक्रम में बदलाव किए और जनता को यह जताने की कोशिश की कि वे अमेरिका द्वारा प्रयोजित भूमण्डलीकृत अर्थव्यवस्था के खिलाफ हैं। रूस और चीन ने भूमण्डलीकरण के विकल्प के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

ऐसे में ये जरूरी था कि जनता को किसी ऐसे खतरे का एहसास कराया जाए जिससे वो इसी व्यवस्था और ‘लोकतंत्र’ को बनाए रखने के लिए ‘सहमत’ रहे। इसी योजना के तहत पहले अल कायदा और अब आईएसआईएस यानि इस्लामिक स्टेट आॅफ ईराक एण्ड सीरिया दुनिया के क्षितिज में उभर कर आएं।

इसका मतलब यह कहना नहीं है कि आईएस और अलकायदा पूरी तरह से सम्राज्यवादी देशों के षड़यत्र के परिणाम हैं। और यह भी नहीं कि इन संगठनों की अपनी कोई राजनीतिक समझ नहीं है। यदि ऐसा होता तो यह एक छोटे दायरे में ही सिमट कर रह जाते और जनता को अपनी ओर आकर्षित करने में असमर्थ हो जाते। बल्कि जहां ये समूह शुरू में सक्रिय हुए वहां ऐतिहासिक कारणों से ऐसे अंतरविरोध मौजूद थे जिनसे अमेरिका और युरोप के साम्राज्यवादी देशों को आंतरिक मामलों में हस्ताक्षेप का मौका दिया।

हांलाकि कि ये संगठन अपने सार में घोर प्रतिकृयावादी ही हैं जो इतिहास के चक्र को किसी ’सुनहरे’ अतीत की ओर मोड़ देना चाहते हैं लेकिन इन संगठनों ने खुद को अमेरिकी और युरोपीय साम्राज्यवाद के शत्रु की तरह दिखा पाने में सफलता प्राप्त की है। यही वह प्रमुख कारण भी है जिसने विश्व भर के युवाओं को इन संगठनों की ओर तेजी से आकर्षित भी किया है। हाल में जो खबरे आईं हैं उनसे यह साफ है कि जो लोग आईएस से जुड़े हैं उनका मकसद ऐसे समाज के निर्माण में अपनी भागीदारी देना है जो न्यायपूर्ण है। ऐसे युवाओं का बहुसंख्यक हिस्सा ऐसे देशों से है जहां वे अलगाव महसूस करते हैं।

आईएस की राजनीति के बारे में स्पष्ट सूचना का आभाव है। लेकिन यह बात अब बहुत साफ है कि अमेरिका और इजरायल ने अपने युरोपीय सहयोगी देशों की सहमति में ही आईएस को सीरिया की असद सरकार के खिलाफ युद्ध के लिए प्रोत्साहन दिया ताकि वे ईराक, सीरिया और आसपास के अन्य देशों में अपनी विरोधी शक्तियों को काबू में कर सकें।

दार्शनिक हिगेल ने बहुत पहले ही कहा था कि इतिहास का सबसे बड़ा सबक यह है कि इतिहास से कोई सबक नहीं लेता। साम्राज्यवाद की सबसे बड़ी कमजोरी होती है कि उसमें दूरदृष्टि का आभाव होता है। यही कारण है कि वह समय को अपने इर्दगिर्द रोके रखना चाहता है। अल कायदा और आईएस का गठन और विस्तार के पीछे छिपे कारण जो भी हों लेकिन दोनों ही संगठन खुद को अमेरिकी और युरापीय साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रस्तुत करते हैं। इसलिए वे तब तक तो साथ चल सकते हैं जब तक उनके और उनको समर्थन देने वाले देशों के आपसी हित में कोई टकराव नहीं होता। लेकिन जैसे ही साझा हित पूरा हो जाता है दोनों अलग अलग खेमों में विभाजित हो जाते हैं। यही इस प्रक्रिया की तार्किक परिणीती भी हैं।

हर संगठन अपने विकास में लगातार स्वायत्त होने की प्रक्रिया में रहता है। बिना स्वायत्ता के वह अपने अस्तित्व की आवश्यकता को स्थापित नहीं कर सकता है। स्वयं हमारे देश भारत में ही सत्ता कई बार अंतरविरोधों को हल करने के लिए जिन उपायों को प्रस्तुत करती है वे एक समय बाद स्वायत्त होने की प्रक्रिया में क्रमशः अपने ‘जन्मदाता’ के विरोध में खड़े होते जाते हैं। पंजाब में भिण्डरवाला के नेतृत्व में खालिस्तान आंदोलन अकालियों को कमजोर करने का एक उपाय था और श्री लंका में लिट्टे के नेतृत्व वाला आंदोलन भी ऐसे ही कारणों से आगे बढ़ा। लेकिन दोनों ही की कीमत अंततः भारत को चुकानी पड़ी थी। अमेरिका को भी देर सबेर अपने कृत की ऐसी ही कीमत चुकानी पड़ेगी और उसे अपनी राजनीति को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

दूसरी ओर आईएस और अलकायदा की राजनीति में जो प्रतिक्रियावादी तत्व आज प्रमुख हैं उनका एक प्रक्रिया में गौण होना भी उतना ही स्वभाविक है। आने वाले दिनों में इनके भीतर मौजूद साम्राज्यवाद विरोधी तत्व इसकी दिशा को आवश्यक रूप से प्रगतिशील राजनीति की ओर मोड़ेंगे। और इस बात की संभावना से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता कि यह क्षेत्र 21वीं सदी में समाजवादी आधार क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत नहीं होगा।

वि.श.

(दस्तक के जून-जुलाई अंक में प्रकाशित)

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युक्रेनः नारंगी क्रांति से रूसी बंसत तक

Posted by chimeki on June 29, 2014

Courtesy: China Daily

Courtesy: China Daily

युक्रेन का संकट 20वीं सदी में अपने प्रभाव को स्थापित करने के लिए युरोपीय देशों में होने वाले राजनीतिक उठापटक का वर्तमान संस्करण है। इस संकट ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान एकाधिकारवादी पूंजीवाद अथवा साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था अपने अंतर्विरोधों को तथाकथित राजनयिक लोकाचार एवं वार्ता के जरिए हल करने में असफल हो चुकी है। अंततः 19वीं और 20वीं सदी की उसी युद्ध उन्माद और भाषा का सहारा लेना पड़ रहा है जिसके अस्तित्व को नकारना पिछले दो दशक और खास तौर पर 2002 के बाद अकादमिक और राजनीतिक विमर्श में एक फैशन था।

पिछले दो दशकों में अफगानिस्तान और ईराक में अमेरिका के नेतृत्व वाले उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के हमले और बलात् सत्ता परिवर्तन एवं युरोप, अफ्रिका एवं एशिया के देशों में उसके द्वारा प्रायोजित ‘रंगीन’ क्रांतियां और ‘बसंत’ का हवाला देकर न जाने कितनी बार यह दिखाया-बताया जाता रहा था कि अंतर साम्राज्यवादी होड़ या प्रतिस्पर्धा अतीत की बात है और यह दौर ‘मिलाकर’ चलने का है। लेकिन युक्रेन के घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पूंजीवादी व्यवस्था अपने अंतर्विरोधों को शांतिपूर्ण तरीके से हल करने में असमर्थ है। यह व्यवस्था अपने मूल में अंतर्विरोधों का एक ऐसा सामूच्य है जहां संतुलन अप्रकृत है और टकराव नैसर्गिक।

1951 में जोसफ स्टालिन ने ‘सोवियत संघ की आर्थिक समस्याएं’ में जिस बात को बड़े साफ तौर पर लिखा था युक्रेन का घटनाक्रम उस बात की शानदार पुष्टि है। स्टालिन ने लिखा थाः ‘(विश्व युद्ध के बाद) बाहर से देखने में लगता है कि ‘सब कुछ ठीक चल रहा है’, अमेरिका पश्चिम युरोप, जपान और अन्य पूंजीवादी देशों को पाल रहा है, जर्मीनी(पश्चिमी), ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और जपान उसकी गिरफ्त में हैं और वे उसके हर आदेश को मानने के लिए विवश हैं। परंतु ऐसा मानना भूल होगी कि ‘अनन्त काल’ तक ‘सब कुछ ठीक चलता’ रहेगा और ये देश अमेरिका के प्रभुत्व और उत्पीड़न बर्दाशत करते रहेंगे।’

युक्रेन में जारी संकट और उसके समानंतर चलते घटनाक्रम स्टालिन की ‘भविष्यवाणी’ के दिन के करीब आ जाने के है। क्राइमिया में रूस के कदम पर भले ही युरोप में अमेरिका के सहयोगी नाटो देशों ने विरोध जताया हो लेकिन रूस के खिलाफ अमेरिका द्वारा सुझाए ‘कड़े’ कदमों को न अपना अथवा अपना में देर कर युरोप के देशों ने यह साफ कर दिया है कि युरोप के अंतरिक मामलों में अमेरिका की दखलअंदाजी के दिन लद गए हैं और युरोप अमेरिका से मुक्त होने के लिए रूस से कार्यगत एकता करने को भी तैयार है। युक्रेन के संकट का तत्कालिक समाधान जो भी निकले दीर्घकालीन तौर पर यह युरोप के भूराजनीतिक मंच से अमेरिका की विदाई का ही संकेत है।

युक्रेन का वर्तमान संकट, जो वहां की निर्वाचित सरकार की बेदखली से आरंभ हुआ, एक तरह से नवंबर 2004 और जनवरी 2005 के मध्य में हुई ‘नारंगी’ क्रांति की तार्किक परिणीती ही है। 21 नवंबर 2004 को राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों की घोषणा से ठीक पहले युक्रेन में विरोध प्रदर्शन आरंभ हो गए थे। प्रदर्शनकारियों का मानना था कि रूस के पक्षधर माने जाने वाले विकटर यानूकोविच के पक्ष में चुनाव में बड़े पैमाने में धांधली की गई है। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व युरोपीय संघ के प्रति नर्म रुख रखने वाले और रूस के विरोधी माने जाने वाले विकटर यूशचेन्को कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों के दवाब में 26 दिसंबर 2004 को युक्रेन की सर्वोच्च अदालत ने पुनः मनगणना का आदेश दिया और 52 प्रतिशत मतों के साथ विकटर यूशचेन्को राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित कर दिए गए। इस के साथ ही युक्रेन की ‘नारंगी’ क्रांति का भी अंत हो गया।

नवंबर 2004 में जब सरकार विरोधी प्रदर्शन व्यापक हुए तो लग रहा था कि युक्रेन में विदेशी तकतों मुख्य रूप से रूस के प्रभाव के अंत की शुरूआत है। रूस के लिए यह उस खतरे की आहट थी जिसे वह लालच और भय का प्रयोग कर सोवियत संघ के विघटन के बाद से अब तक टालता रहा था। 1990 में सोवियत संघ के विभाजन के बाद स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आने वाला युक्रेन रूस के लिए युरोप का सेतु है जिस पर से युरोपीय बाजार में रूस प्रकृतिक गैस का व्यापार करता है। इस सुविधा के लिए रूस युक्रेन को न केवल सस्ता गैस उपलब्ध कराता है बल्कि वहां के शासक वर्ग धन मुहैया करा कर अपने पक्ष में बनाए भी रखता है। दूसरी और युक्रेन सामरिक एवं रणनीतिक दृष्टी से भी रूस के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण देश है। क्राइमिया में रूस का प्रसिद्ध बैल्क फ्लीट समुद्री बेढ़ा है जिसे रूस द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अपने क्षेत्र में नाटो के प्रभाव के विस्तार को रोकने के लिए आवश्यक मानता आया है।  ठीक इसी तरह युक्रेन नाटो के लिए ऐसा क्षेत्र है जिसे अपने प्रभाव में करने से वहां रूस पर पूरी तरह हावी हो सकता है। युक्रेन में अपने प्रभाव का विस्तार कर वह रूस के व्यापारिक मार्ग पर अपना कब्जा जमाने की मंशा रखता है।

1990 के बाद पूर्व सोवियत देशों-गणराज्यों में नाटो के तेजी से विस्तार किया है। यह उस आश्वासन के खिलाफ है जो नाटो देशों ने सोवियत संघ विघटन के बाद रूस को दिया था जिसमें यह सहमति व्यक्त की गई थी कि नाटो ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जो क्षेत्र में रूस के प्रभाव एवं स्वतंत्र अस्तित्व के लिए खतरा हो। यह एक प्रकार से तर्कपूर्ण भी था क्योकि तब यह माना जा रहा था कि सोवियत संघ के विघटन के बाद युरोप में नाटो की भूमिका भी स्वतः कम हो जाएगी। 1949 में इस संगठन के निर्माण का मकसद युरोप एवं अन्य युरोप और अमेरिका के प्रभाव वाले देशों में सोवियत संघ के विस्तार को रोकना था। लेकिन 1990 के बाद जल्द ही यह बात साफ हो गई कि सोवियत संघ के विघटन के बाद भी नाटो अपने प्रभाव क्षेत्र को विस्तार देने की मंशा रखता है। यह बात नाटो के लिए इसलिए भी जरूरी थी कि वह सोवियत संघ का विघटन मात्र न चाह कर रूस को ही पूरी तरह कमजोर कर देना चाहता था ताकि भविष्य में उसे इस देश से किसी भी तरह की चुनौती न मिल सके। पिछले समय में रूस की नाराजगी के बावजूद, विघटन के बाद स्वतंत्र अस्तित्व में आए 14 देशों में से तीन देशों एस्टोनिया, लाटविया और लुथानिया, ने नाटो की सदस्यता ली।

पिछले कुछ समय से युरोप में नाटो और युरोपीय संघ के विस्तार को रोकने के लिए रूस ने युरेशिया आर्थिक संगठन को गठन किया और इसे मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। इस संगठन का घोषित लक्ष्य पूर्व सोवियत संघ देशों को एक मंच में लाना है। रूस में प्रकृतिक गैस की प्रचुरता और तेल के भण्डार रूस के इस प्रयोग की सफलता की गारंटी है। पिछले दशक में गैस और तेल की ताकत के सहारे रूस ने न सिर्फ नए क्षेत्रों जैसे चीन और लातिन अमेरिका में अपना विस्तार किया है बल्कि विघटन के बाद उसकी पकड़ से दूर हो चुके देशों को भी अपने करीब लाने में सफलता पाई है। इस कारण युरेशिया आर्थिक संगठन न केवल युरोपीय संघ बल्कि नाटो के लिए भी एक चुनौती है। एशिया एवं अफ्रिका के देशों में इस के विस्तार की आशंका-संभावना ने अमेरिका के विश्व प्रभुत्व के मंसूबों को ही कमजोर कर दिया है। युक्रेन को अपने साथ मिला कर नाटो को एक बड़ी जीत की उम्मीद थी।

वर्ष 2004 से युक्रेन में तेजी से बदलते घटनाक्रम ने रूस के लिए यह स्पष्ट कर दिया था कि जल्द ही युक्रेन भी नाटो के साथ मिल जाएगा। युक्रेन 15 स्वतंत्र देशों में रूस के बाद सबसे बड़ा देश है। 1990 में स्वतंत्र होने के साथ ही युक्रेन की सत्ता की बागडोर आलगार्क अथवा ऐसे समुदाय के हाथ में आई जिन्होने सोवयितकालीन उद्योग को अपने राजनीतिक प्रभाव के जरिए हासिल किया था और रातोरात हजारों करोड़ की सम्पत्ति के वारिस बन गए थे। सोवियत विभाजन के बाद स्वतंत्र अस्तिव में आए 15 देशों में यह आम है। राजनीति इस समुदाय के लिए अपनी पूंजी को सुरक्षित रखने और देश की लूट को जारी रखने का जरिया है। इस वर्ग ने युक्रेन के भूराजनीतिक महत्व का अपने हितों को साधने में बखूबी इस्तेमाल किया। कभी युरोपीय संघ की और झुक कर तो कभी रूस से हाथ मिला कर अपने हितों को साधने के लिए युरोप भर में युक्रेन का आलगार्क समुदाय बदनाम है।

पिछले कुछ वर्षो में युक्रेन के इस शासन वर्ग के भीतर के अंतर्विरोध सतह पर आने लगे थे और वह रूस के पक्षधर और युरोपिय युनियन के पक्ष धरों के बीच में बंट गया था। यह बटवारा किसी प्रकार के ‘देश प्रेम’ प्ररित नहीं था और न ही यह राष्ट्रीय और दलाल पूंजीपतियों के बीच का अंतर्विरोध था। बल्कि यह युक्रेन के रूस और युरोपिय संघ एवं नाटो के दलालों का अंतर्विरोध है। इस अंतर्विरोध ने युरोपिय संघ और अमेरिका को देश की राजनीति में सक्रिय दखल की जमीन प्रदान की।

हालांकि वर्ष 2005 की ‘नारंगी क्रांति’ युक्रेनी लोगों के अपने शासक वर्ग के प्रति रोष की अभिव्यक्ति थी लेकिन विकल्पहीनता के दौर में इसका नेतृत्व युरोपीय संघ के पक्षधरों के हाथ में ही रहा। उसने लोगों के भीतर इस बात का संप्रेष्ण करने में सफलता पाई की युक्रेन की समस्याओं का समाधान युरोपीय संघ में शामिल होने में है। 2005 में नए शासक वर्ग ने सत्ता हाथ में लेते ही युरोपीय संघ की में शामिल होने की इच्छा प्रकट की और युरोपीय संघ ने इस बात का समर्थन किया। रूस ने तभी यह स्पष्ट कर दिया था कि युक्रेन का यह कदम क्षेत्र में रूसी हितों के खिलाफ है और अपने हितों की रक्षा के लिए वह सक्रिय हस्तक्षेप का विकल्प खुला रखेगा। इसके बाद दवाब बनाने के लिए रूस ने युक्रेन पर गैस को बाजार मुल्य पर खरीदने, जो उसके द्वारा अदा किए जाने वाले मूल्य से दुगना था, और बकाया रकम पर जुर्माना लगाने की बात की। युक्रेन को अपने साथ करने की जल्दबाजी में युरोपीय संघ ने इस कर्ज को पटाने की जिम्मेदारी अपने उपर ले ली। युरोपीय संघ ने उस पर ऐसी शर्ते मानने का दवाब भी बनाया जोे युक्रेन को ग्रीस की तरह बना देता और वहां की जनता को मिलने वाली सुविधाओं को आॅस्टेरिटी अथवा मितव्ययिता के नाम पर खत्म कर देता।

युरोप की इस योजना पर उस वक्त पानी फिर गया जब 2010 के चुनाव में युक्रेन की जनता ने युरोपीय संघ की पक्षधर पार्टी को  पराजित कर दिया। यह युरोपीय संघ और खास कर अमेरिका के लिए बड़ा जटका था। इस के बाद साम-दाम का ऐसा खेल आरंभ हुआ जिसने हाल तक आते आते युक्रेन के टुकडे़ कर दिए। इन चार वर्षो में विश्व के शक्तिशाली देशों ने अपनी क्षेत्रीय प्रभुता की मंशा के तहत युक्रेन की राजनीति में खुल कर दखल दिया और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता एवं जनतंत्र की तमाम बुर्जुआ सिद्धांतो को भुला दिया।

तो एक तरह से युक्रेन के इस संकट ने युरोप को अनचाहे ही अमेरिकी प्रभाव से मुक्त होने का एक अवसर दे दिया है। अब तक के घटनाक्रम से ऐसा लग रहा है कि युरोप इस मौके का हाथ से जाने नहीं देना चाहता। 2002 के बाद से ही युरोपीय नाटो देशों को महसूस होने लगा था कि नाटो में बने रहना उनके लिए घाटे का सौदा है। 2002 से ही इन देशों अमेरिका के साम्राज्यवादी प्रयोगों में हिस्सेदारी करनी पड़ रही है। यह कीमत उसके लिए बहुत अधिक है। युक्रेन संकट के बाद रूस द्वारा क्राईमिया को अपने देश में मिला लेने की घोषणा और फिर एक के बाद एक युक्रेन के अन्य भागों में विद्रोह और युक्रेन की वर्तमान सरकार का हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से युरोप के लिए एक साथ बहुत से काम आसान हो गए हैं। एक और इसने बड़े ही नाटकीय अंदाज में युरोप के गले में फंसी एक फांस को निकाल दिया है और 1991 में सोवियत संघ विभाजन के समय ही फसें कुछ मामलों को अपने तार्किक अंत में पहुंचा दिया है। जिस से लगने लगाा है कि आने वाले दिनो में यह युरोप और रूस की एकता की संभावना को और तीव्र करेगा। यह भी बहुत हद तक संभव है कि रूस का प्रभाव युरोप में फैले और अमेरिका के पैर कमजोर हो।

भले ही आज युक्रेन का मामला पेचिदा दिखाई दे रहा हो लेकिन इस उथलपुथल के बाद जब युरोप शांत होगा तो दुनिया दो ध्रुवों में बंट चुकी होगी। यह दो धु्रव चीन और अमेरिका या रूस और अमेरिका न हो कर अमेरिका और युरोप ही होंगे। अमेरिका के लिए यहां से यह संदेश जाता है कि युरोप को अपने मामलों को निबटाने में अमेरिका की आवश्यकता नहीं हैं।

वि. श.

(दस्तक मासिक के मई-जून अंक में प्रकाशित)

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सीरिया: पश्चिमी साजिश का शिकार

Posted by chimeki on May 14, 2014

Photo: Global Post

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सीरिया में तीन साल से चल रहे द्वंद में एक लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है और अन्य कई लाख घायल हैं। लाखों लोग ईरान और अन्य पड़ोसी देशों में शरण लेने को बाध्य हैं। 2011 में आरंभ हुए सरकार विरोधी शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को शुरूआत में ‘अरब बसंत’ के विस्तार के रूप में परिभाषित किया जा रहा था परंतु बहुत जल्द इसने गृह युद्ध का स्वरूप लेकर संपूर्ण देश को अपने प्रभाव में ले लिया। गृह युद्ध में इजरायल और उसके सहयोगी पश्चिमी एवं अरब देशों को क्षेत्र से एक दुश्मन देश को मिटा देने अथवा उसे खडिण्त करने का अवसर मिल गया और पूरी दुनिया में ‘आंतकवाद के खिलाफ जंग’ लड़ने का ऐलान करने वालों ने अपनी योजना में आतंकी संगठनों को हथियार देने से भी गुरेज नहीं किया।

ऐसा नहीं था कि आरंभ में जब सरकार विरोधी प्रर्दशन शुरू हुए तब ये पूरी तरह से पश्चिम के प्रभाव में चल रहे थे। बल्कि ये प्रदर्शन कई मायनों में ट्यूनिशिया से आरंभ हुए ‘अरब बसंत’ का ही विस्तार थे। वर्तमान राष्ट्रपति बसर अलअसद के पिता हाफिज़ अलअसद ने अपने राजनीतिक जीवनकाल में ही सीरियाई बाथ पार्टी और राष्ट्र को अपनी ‘पैतृक’ संपत्ति की तरह मानने लगे थे और सरकार में असद परिवार की भूमिका को केन्द्रीय बना दिया था। यह ठीक वैसा ही था जैसा ईराक में सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में हुआ था। ईराक की बाथ पार्टी की तरह ही सीरिया की बाथ पार्टी भी अरब समाजवादी बाथ आंदोलन/पार्टी की घटक पार्टी थी। दुनिया भर में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के प्रभाव में 1947 में आरंभ हुए इस आंदोलन का मकसद अरब देशों की एकता और ‘उदार’ समाजवाद था। लेकिन बाद में विश्व भर में समाजवादी आंदोलन के कमजोर होने के परिणाम स्वरूप बाथ आंदोलन केवल ईराक और सीरिया में सिमट कर रह गया। हालांकि इसका प्रभाव अन्य अरब देशों में भी लंबे समय तक बना रहा लेकिन इसके नेतृत्व की अवसरवादी प्रवत्ति ने इसके टुकडे़ कर दिए।

आरम्भ में बाथ आंदोलन की घटक पार्टी सीरिया की बाथ पार्टी ने सीरिया में बहुत से महत्वपूर्ण बदलव किए। आसपास के अन्य देशों के मुकाबले सीरिया में जनता को अधिक राज्य प्रायोजित सेवाएं हासिल हैं। लेकिन असद परिवार केन्द्रीत राज्य व्यवस्था ने जनता को असद सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया था। एक हद तक पश्चिम द्वारा प्रायोजित इस गृह युद्ध ने बसर असद को लोकतांत्रिक सुधार करने के दवाब से ही मुक्त कर दिया है और परिवार को सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाने, अपने विरोधियों को सत्ता से बाहर करने का अवसर प्रदान किया है।

सीरिया में पश्चिम प्रायोजित द्वंद सीरिया को आंतरिक अंतरविरोधों में उलजा कर सीरिया, ईरान, लेबनान और हमास गठबंधन को कमजोर करना है ताकि अरब देशों में पश्चिमी प्रभाव, खासतौर पर अमेरिकाइजरायल, बना रहे। साथ ही, इस का मकसद अरब देशों में रूस और चीन की ‘घुसपैठ’ को रोकना भी है। वास्तव में सीरिया का संकट इजरायल के खिलाफ उसके डटे रहने की ‘सज़ा’ है। ईरान के पत्रकार कौरोश जि़याबरी लिखते है, ‘इजरायल का मकसद सीरिया में अस्थिरता, अशांति और अराजकता को हवा देना है। शांत एवं स्थिर सीरिया इजारयल के लिए अरब देशों में अपने प्रभाव को बनाए रखने लिए गंभीर चुनौती है।’ अपनी बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए कौरोश 26 जनवरी 2012 में इजरायल के दैनिक समाचार पत्र येदीयोथ ऐरोनोथ में प्रकाशित इजरायल के पूर्व गुप्तचर प्रमुख के वक्तव्य के हवाले से बताते हैं कि सीरिया में सत्ता परिवर्तन में इजरायल का रणनैतिक हित है। यदि यह आंदोलन ईरान को भी अपनी गिरफ्त में ले लेता है तो इजरायल की बड़ी चिंता का अंत हो जाएगा।’

सीरिया में सत्ता परिवर्तन के खिलाफ रूस और चीन के विरोध के परिणाम स्वरूप अमेरिकी की अगुवाई में युरोपियन संघ को संकट का समाधान बातचीत के जरिए हासिल करने के लिए मंजूर होना पड़ा है। जिनेवा में 22 जनवरी को आयोजित अंतर्राष्ट्रीय शांति सम्मेलन से यह संकेत मिलता है सीरिया में पिछले तीन सालों से जारी द्वंद अपने शांतिपूर्ण अंत की ओर अग्रसर है। हालांकि किसी निर्णय में पहुंचने से पहले वार्ता लंबी खिंच सकती है लेकिन सीरिया सरकार और विरोधी गठबंधन के शामिल होने से परिणाम आने की संभावना को कई गुना बढ़ा दिया है। दोनों पक्ष तीन साल में पहली बार वार्ता के जरिए शांतिपूर्ण समाधान निकालने को तैयार हुए है। असद सरकार ने भी संक्रमण सरकार के गठन की विपक्ष की मांग पर अपनी सहमती जताई है।

आगामी दिनों संक्रमण कालीन सरकार के स्वरूप से स्पष्ट हो जाएगा सीरिया का भविष्य क्या होगा। 40 साल से भी अधिक समय से सत्ता में रहने वाले असद परिवार के लिए यह एक चुनौती भरा काम है। सीरियाई जनता के हितों को ताक मे रख कर सत्ता में असद परिवार की भूमिका को बनाए रखने के चलते ही इजरायल और साउदी अरब जैसे देशों को दखल देने का अवसर मिला है। जब तक ऐसे राज्य संयंत्र की संभावना नहीं बनती जो जनता की व्यापक हिस्सेदारी को सुनिश्चित कर सके तब तक सीरिया एवं अन्य अरब देशों में ऐसे संकंट के बादल मंडराते रहेंगे। सीरिया के हितैषियों के लिए यह एक चुनौती भरा काम होगी कि वे द्वंद से खंडित सीरिया की जनता के भीतर उत्साह और एक दूसरे के प्रति विश्वास को पुनः दृढ़ बना सकें।

वि.श.

(दस्तक मासिक के मार्च अंक में प्रकाशित)

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Iran-US Relationship: Twitter Diplomacy Won’t Work

Posted by chimeki on October 21, 2013

Hassan Rouhani

Hassan Rouhani

‘President Rouhani has landed in #Tehran after a super busy week in NYC. #UNGA ‘, read Iranian President Hassan Rouhani’s twitter post as he landed in Tehran. Apart from being ‘busy’, the week is surely the most important one in Iran’s history after the week in February 1979 when the last king of Iran Shah Mohammad Reza Pahlavi left and Ayatollah Khomeini returned from 14 years in exile.

In October that year passionate followers of Ayatollah Khomeini stormed into the US Embassy in Tehran and held fifty two Americans hostage. They were demanding that the US extradited the Shah to be put under trial for the crimes he had committed during his rule against the Iranians. The crisis lasted for 444 days. On 20 January 1981 Iran, after a series of behind-the-curtain-negotiations with Ronald Reagan’s team, allowed the hostages to fly back to their country. The day also coincided with Reagan’s swear in ceremony in the White House. President Reagan is said to have famously said, ‘the mullahs are our friends’. It is not often when the US takes egg on its face lightly but in this particular case it did because it could not afford to let one more country of the Middle East go the USSR way!

However, post 1990s Iran lost its relevance and was bracketed an ‘axis of evil’. Now that the US is finding its influence in world affairs being over shadowed by Russia and China it is ready to improve its relationship with the estranged country. But this time it will not be that swift as it was then.

The USSR was a communist country and the Iranian government was intrinsically against the communist ideals. It was easy for it to convince its supporters to shake hands with a former capitalist foe than to embrace a new communist friend. Although he had collaborated with communists to topple the Shah, but once he had established himself firmly in the power he crushed them tooth and nail. He went as far as to reconcile with the Shah’s legacy! VS Naipaul in his book Among the Believers has brilliantly captured the development.

Russia, once a communist country, is now a centre of Christian fundamentalism. Putin has managed a comeback on the back of conservative Russians who see in him a potential pre-revolution Russian ruler. According to an estimate Orthodox Church in Russia has influence over ten crores (100 million) voters. Putin and the Church share the same ideals and draw their inspiration from Tsarist Russia. They see future of Russia from Nicholas the First’s eyes who propagated Official Nationality based on, ‘orthodoxy, autocracy and nationality’.

In this backdrop, as long as the Imams rule the country, the Orthodox Russia will be seen closer than a secular, ‘atheist’ America. Even if we believe that political relationship are not completely based on religious proximity then also there are several other factors which suggest Iran is more comfortable flirting with Russia than with the US.

Barack Obama

Barack Obama

In the last two decades Iran and Russia have given new dimensions to their relationship. They cofounded Gas Exporting Countries Forum in 2001 which, if we are to believe experts, has potential to become OPEC like cartel of gas producing countries. Iran has also been accorded observer status in Shanghai Cooperation Organization which aims at countering the US influence in Asia.

Apart from sharing pragmatic concerns both countries are staunch critics of the US policy in Middle East, especially its policies on Israel and Palestine. In addition to this, both Russia and Iran have reservations about Saudi Arabia and its satellite emeritus.  Hence it is difficult for the US to penetrate and create space for itself.

It does not look that the USA and Iran can come closer in near future. The US has itself destroyed/ eroded the trust it used to enjoy with the Iran during the Cold War. Now there is no reason the new Iranian president can convince his people on the importance of being closer to the USA.

The US warming up to Iran is actually an anxious step and without much homework. In the long run it will make it look weaker or perhaps comic.  The US is trapped under its own making. The more it tries to break free the more it gets entangled.

V.S.

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A Case for Election Reform in America

Posted by chimeki on September 10, 2013

Barack Obama

Barack Obama

With America’s rhetoric for war on Syria becoming louder, one wonders if this is a sign of failing of American model of democracy. The polls conducting by various media houses in the US suggest that more than 60 per cent people don’t want war. They also show that people see President Barack Obama’s claim that Assad government has used chemical weapon against the Syrians a lie. Even then the war on Syria looks apparent. It is just a matter of time.

The American apologists have always projected the American model of democracy as the most successful model ever practiced. They have hailed the ‘two term only’ condition for its president as one of the best, if the not best, ways of keeping a check on presidents and not making despots of them. However the truth is that America’s system has produced more depots than all the previous communist or religious states put together have produced.

Since 1950 America is directly or indirectly involved in every war occurred in the planet. During Soviet times it was believed that wars were needed to safeguard American interest or for that matter interest of the democratic world. After the collapse of the USSR and China adopting market economy it was believed that the age of war had ended. But the last two decades have witnessed more wars and more US presidents who seem eager to go to war. Starting from senior Bush and till Barak Obama no president seems serious to leave aside the policy of war as a US policy intervention in countries which it sees as a challenge to its hegemonic aspiration.

This demands a close scrutiny of American model of democracy. If democracy, as we see it today, has to survive the US model must go. A system that gives its rulers immense power to do anything without being responsible for the will of the people cannot be argued as a democracy. The more it is run the way it is run it will certainly prove Lenin right that, it is a system where one ruler or set of rulers is replaced by another to exploit workers.

The 22nd amendment to the US constitution, which set a term limit on the presidency, has allowed its presidents to work on their own. Before the amendment a candidate feared people who could show him doors and worked hard to be rewarded the next term. This way he was checked to do right things or the things people considered right. Since the amendment was passed by the Senate the presidents had acted more carelessly. Whatever good they did they did only during their first term. Richard Nixon, for example, took America out of Vietnam War. Likewise, President Ronald Reagan began his massive economic assault on people in his second term in the office. Pushing America in war on Iraq on the first term cost Sr Bush the second term. Jr. Bush led to Afghanistan, which out of some misinformation was approved by the Americans however his war in Iraq was never sanctioned by the people. Barack Obama is proving to be the most war loving president in America’s history. In the first term he talked about peace and in the second he looks more a bloodhound.

Americans have to find out way where they do not a president to act on his own without respecting the people who has chosen him. They must demand for the election reforms. The Senate must be above president and vice versa.

V.S.

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