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सीरिया: पश्चिमी साजिश का शिकार

Posted by chimeki on May 14, 2014

Photo: Global Post

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सीरिया में तीन साल से चल रहे द्वंद में एक लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है और अन्य कई लाख घायल हैं। लाखों लोग ईरान और अन्य पड़ोसी देशों में शरण लेने को बाध्य हैं। 2011 में आरंभ हुए सरकार विरोधी शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को शुरूआत में ‘अरब बसंत’ के विस्तार के रूप में परिभाषित किया जा रहा था परंतु बहुत जल्द इसने गृह युद्ध का स्वरूप लेकर संपूर्ण देश को अपने प्रभाव में ले लिया। गृह युद्ध में इजरायल और उसके सहयोगी पश्चिमी एवं अरब देशों को क्षेत्र से एक दुश्मन देश को मिटा देने अथवा उसे खडिण्त करने का अवसर मिल गया और पूरी दुनिया में ‘आंतकवाद के खिलाफ जंग’ लड़ने का ऐलान करने वालों ने अपनी योजना में आतंकी संगठनों को हथियार देने से भी गुरेज नहीं किया।

ऐसा नहीं था कि आरंभ में जब सरकार विरोधी प्रर्दशन शुरू हुए तब ये पूरी तरह से पश्चिम के प्रभाव में चल रहे थे। बल्कि ये प्रदर्शन कई मायनों में ट्यूनिशिया से आरंभ हुए ‘अरब बसंत’ का ही विस्तार थे। वर्तमान राष्ट्रपति बसर अलअसद के पिता हाफिज़ अलअसद ने अपने राजनीतिक जीवनकाल में ही सीरियाई बाथ पार्टी और राष्ट्र को अपनी ‘पैतृक’ संपत्ति की तरह मानने लगे थे और सरकार में असद परिवार की भूमिका को केन्द्रीय बना दिया था। यह ठीक वैसा ही था जैसा ईराक में सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में हुआ था। ईराक की बाथ पार्टी की तरह ही सीरिया की बाथ पार्टी भी अरब समाजवादी बाथ आंदोलन/पार्टी की घटक पार्टी थी। दुनिया भर में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के प्रभाव में 1947 में आरंभ हुए इस आंदोलन का मकसद अरब देशों की एकता और ‘उदार’ समाजवाद था। लेकिन बाद में विश्व भर में समाजवादी आंदोलन के कमजोर होने के परिणाम स्वरूप बाथ आंदोलन केवल ईराक और सीरिया में सिमट कर रह गया। हालांकि इसका प्रभाव अन्य अरब देशों में भी लंबे समय तक बना रहा लेकिन इसके नेतृत्व की अवसरवादी प्रवत्ति ने इसके टुकडे़ कर दिए।

आरम्भ में बाथ आंदोलन की घटक पार्टी सीरिया की बाथ पार्टी ने सीरिया में बहुत से महत्वपूर्ण बदलव किए। आसपास के अन्य देशों के मुकाबले सीरिया में जनता को अधिक राज्य प्रायोजित सेवाएं हासिल हैं। लेकिन असद परिवार केन्द्रीत राज्य व्यवस्था ने जनता को असद सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया था। एक हद तक पश्चिम द्वारा प्रायोजित इस गृह युद्ध ने बसर असद को लोकतांत्रिक सुधार करने के दवाब से ही मुक्त कर दिया है और परिवार को सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाने, अपने विरोधियों को सत्ता से बाहर करने का अवसर प्रदान किया है।

सीरिया में पश्चिम प्रायोजित द्वंद सीरिया को आंतरिक अंतरविरोधों में उलजा कर सीरिया, ईरान, लेबनान और हमास गठबंधन को कमजोर करना है ताकि अरब देशों में पश्चिमी प्रभाव, खासतौर पर अमेरिकाइजरायल, बना रहे। साथ ही, इस का मकसद अरब देशों में रूस और चीन की ‘घुसपैठ’ को रोकना भी है। वास्तव में सीरिया का संकट इजरायल के खिलाफ उसके डटे रहने की ‘सज़ा’ है। ईरान के पत्रकार कौरोश जि़याबरी लिखते है, ‘इजरायल का मकसद सीरिया में अस्थिरता, अशांति और अराजकता को हवा देना है। शांत एवं स्थिर सीरिया इजारयल के लिए अरब देशों में अपने प्रभाव को बनाए रखने लिए गंभीर चुनौती है।’ अपनी बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए कौरोश 26 जनवरी 2012 में इजरायल के दैनिक समाचार पत्र येदीयोथ ऐरोनोथ में प्रकाशित इजरायल के पूर्व गुप्तचर प्रमुख के वक्तव्य के हवाले से बताते हैं कि सीरिया में सत्ता परिवर्तन में इजरायल का रणनैतिक हित है। यदि यह आंदोलन ईरान को भी अपनी गिरफ्त में ले लेता है तो इजरायल की बड़ी चिंता का अंत हो जाएगा।’

सीरिया में सत्ता परिवर्तन के खिलाफ रूस और चीन के विरोध के परिणाम स्वरूप अमेरिकी की अगुवाई में युरोपियन संघ को संकट का समाधान बातचीत के जरिए हासिल करने के लिए मंजूर होना पड़ा है। जिनेवा में 22 जनवरी को आयोजित अंतर्राष्ट्रीय शांति सम्मेलन से यह संकेत मिलता है सीरिया में पिछले तीन सालों से जारी द्वंद अपने शांतिपूर्ण अंत की ओर अग्रसर है। हालांकि किसी निर्णय में पहुंचने से पहले वार्ता लंबी खिंच सकती है लेकिन सीरिया सरकार और विरोधी गठबंधन के शामिल होने से परिणाम आने की संभावना को कई गुना बढ़ा दिया है। दोनों पक्ष तीन साल में पहली बार वार्ता के जरिए शांतिपूर्ण समाधान निकालने को तैयार हुए है। असद सरकार ने भी संक्रमण सरकार के गठन की विपक्ष की मांग पर अपनी सहमती जताई है।

आगामी दिनों संक्रमण कालीन सरकार के स्वरूप से स्पष्ट हो जाएगा सीरिया का भविष्य क्या होगा। 40 साल से भी अधिक समय से सत्ता में रहने वाले असद परिवार के लिए यह एक चुनौती भरा काम है। सीरियाई जनता के हितों को ताक मे रख कर सत्ता में असद परिवार की भूमिका को बनाए रखने के चलते ही इजरायल और साउदी अरब जैसे देशों को दखल देने का अवसर मिला है। जब तक ऐसे राज्य संयंत्र की संभावना नहीं बनती जो जनता की व्यापक हिस्सेदारी को सुनिश्चित कर सके तब तक सीरिया एवं अन्य अरब देशों में ऐसे संकंट के बादल मंडराते रहेंगे। सीरिया के हितैषियों के लिए यह एक चुनौती भरा काम होगी कि वे द्वंद से खंडित सीरिया की जनता के भीतर उत्साह और एक दूसरे के प्रति विश्वास को पुनः दृढ़ बना सकें।

वि.श.

(दस्तक मासिक के मार्च अंक में प्रकाशित)

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Iran-US Relationship: Twitter Diplomacy Won’t Work

Posted by chimeki on October 21, 2013

Hassan Rouhani

Hassan Rouhani

‘President Rouhani has landed in #Tehran after a super busy week in NYC. #UNGA ‘, read Iranian President Hassan Rouhani’s twitter post as he landed in Tehran. Apart from being ‘busy’, the week is surely the most important one in Iran’s history after the week in February 1979 when the last king of Iran Shah Mohammad Reza Pahlavi left and Ayatollah Khomeini returned from 14 years in exile.

In October that year passionate followers of Ayatollah Khomeini stormed into the US Embassy in Tehran and held fifty two Americans hostage. They were demanding that the US extradited the Shah to be put under trial for the crimes he had committed during his rule against the Iranians. The crisis lasted for 444 days. On 20 January 1981 Iran, after a series of behind-the-curtain-negotiations with Ronald Reagan’s team, allowed the hostages to fly back to their country. The day also coincided with Reagan’s swear in ceremony in the White House. President Reagan is said to have famously said, ‘the mullahs are our friends’. It is not often when the US takes egg on its face lightly but in this particular case it did because it could not afford to let one more country of the Middle East go the USSR way!

However, post 1990s Iran lost its relevance and was bracketed an ‘axis of evil’. Now that the US is finding its influence in world affairs being over shadowed by Russia and China it is ready to improve its relationship with the estranged country. But this time it will not be that swift as it was then.

The USSR was a communist country and the Iranian government was intrinsically against the communist ideals. It was easy for it to convince its supporters to shake hands with a former capitalist foe than to embrace a new communist friend. Although he had collaborated with communists to topple the Shah, but once he had established himself firmly in the power he crushed them tooth and nail. He went as far as to reconcile with the Shah’s legacy! VS Naipaul in his book Among the Believers has brilliantly captured the development.

Russia, once a communist country, is now a centre of Christian fundamentalism. Putin has managed a comeback on the back of conservative Russians who see in him a potential pre-revolution Russian ruler. According to an estimate Orthodox Church in Russia has influence over ten crores (100 million) voters. Putin and the Church share the same ideals and draw their inspiration from Tsarist Russia. They see future of Russia from Nicholas the First’s eyes who propagated Official Nationality based on, ‘orthodoxy, autocracy and nationality’.

In this backdrop, as long as the Imams rule the country, the Orthodox Russia will be seen closer than a secular, ‘atheist’ America. Even if we believe that political relationship are not completely based on religious proximity then also there are several other factors which suggest Iran is more comfortable flirting with Russia than with the US.

Barack Obama

Barack Obama

In the last two decades Iran and Russia have given new dimensions to their relationship. They cofounded Gas Exporting Countries Forum in 2001 which, if we are to believe experts, has potential to become OPEC like cartel of gas producing countries. Iran has also been accorded observer status in Shanghai Cooperation Organization which aims at countering the US influence in Asia.

Apart from sharing pragmatic concerns both countries are staunch critics of the US policy in Middle East, especially its policies on Israel and Palestine. In addition to this, both Russia and Iran have reservations about Saudi Arabia and its satellite emeritus.  Hence it is difficult for the US to penetrate and create space for itself.

It does not look that the USA and Iran can come closer in near future. The US has itself destroyed/ eroded the trust it used to enjoy with the Iran during the Cold War. Now there is no reason the new Iranian president can convince his people on the importance of being closer to the USA.

The US warming up to Iran is actually an anxious step and without much homework. In the long run it will make it look weaker or perhaps comic.  The US is trapped under its own making. The more it tries to break free the more it gets entangled.

V.S.

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