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दौड़ते वक्त सांस मुंह से लें

Posted by chimeki on July 17, 2014

children-runningआम तौर पर यह अवधारणा है कि दौड़ते वक्त मुह बंद रहना चाहिए। यह एकदम गलत अवधारणा है। दौड़ते वक्त फेफड़ों को सामान्य से बहुत अधिक आॅक्सिजन की जरूरत होती है इसलिए नाक से सांस लेना पर्याप्त नहीं होता। दौड़ते वक्त हमेशा मुंह और नाक दोनों से सांस लेना चाहिए।

मुझे शुरू में इस बात की जानकारी नहीं थी और मैं भी आम लोगों की तरह ही नाक से सांस लेता था। मैने महसूस किया कि मैं बहुत जल्दी थक जाता था। फिर मैने पेशेवर धावकों की शैली पर गौर किया। मैने देखा कि ये लोग मुंह और नाक से सांस लेते हैं। राजेश और रविकांत जो पेशेवर धावक हैं और नोएडा के रनर्सस 365 कल्ब के जुड़े हैं नेे मुझे बताया कि दौड़ते वक्त सिर्फ से सांस लेना न सिर्फ गलत है बल्कि यह स्वास्थ के लिए भी हानीकारक है। लम्बे समय तक ऐसा करने से फेफड़े कमजोर हो सकते हैं और श्वास का रोग हो सकता है। उन्होने बताया कि दौड़ की प्रमुखता वाले प्रत्येक खेल में सांस लेने का यह नियम लागू होता है। आप यदि फुटबाॅल के खिलाडि़यों को गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि वे सभी अतिरिक्त श्वास के लिए मुंह खोल कर खेलते है।

आरंभ में ऐसा करने पर गला सूखता है लेकिन क्रमशः इसकी आदत हो जाती है। मुंह खोल कर दौड़ने से जल्दी थकान नहीं होती और लम्बे समय तक दौड़ जारी रखी जा सकती है।

इसके साथ सांस लेने और छोड़ने की भी तकनीक होती है। दौड़ते वक्त मुंह को अंग्रेजी के ‘ओ’ के आकार का बनाए रखें। सांस को जल्दी जल्दी दो भाग में ले और ऐसे ही छोड़ें भी। दौड़ते वक्त आपके मुंह से फू-फू-फू-फू की ध्वनी निकलनी चाहिए।

अगली कड़ी में दौड़ने के लिए कैसे जूतें और टी-शर्ट पहने इस पर चर्चा करेगें। तब तक मुझे दीजिए इजाज़त और आप भागते रहिए क्योंकि दौड़ना सच में बहुत जरूरी है।

वि.श.

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अभी नहीं तो कभी नहीं …भाग कामरेड भाग

Posted by chimeki on July 15, 2014

kids-running1दौड़ना स्वास्थ के लिए लाभदायक है। लेकिन जब आप दौड़ना शुरू करते हैं तो यह बहुत तकलीफदेह अहसास होता है। इसकी वजह यह है कि दौड़ने से पहले तक आपको कभी यह अहसास ही नहीं होता कि आप नहीं दौड़ सकते। जब भी आप लोगों को दौड़ता देखते हैं तो आप को लगता है कि आप भी दौड़ सकते हैं। और उनसे अच्छा दौड़ सकते हैं! सामान्यतः व्यक्ति एक-दो किलोमीटर बहुत आराम से चल सकता है लेकिन जैसे ही वह दौड़ने का प्रयास करत है उसे अपनी कमजोरी का एहसास होने लगता है। सांस फूलने लगती है, कलेजा फड़फड़ाने लगता है।

मेरा मानना है कि दौड़ना एक प्रक्टिस है। शुरूआत में यह चाहे जितना ही कठिन क्यों न लगे धीरे धीरे इसकी आदत बन जाती है।

24 जनवरी 2012 के दिन जब मैंने दौड़ना शुरू किया उस समय मेरी हालत यह थी कि मैं बहुत देर तक चल भी नहीं पाता था। जयपुर लिटरेचर फैस्टीवल के दौरन मुझे पहली बार अपनी कमजोरी का अहसास हुआ। उस दिन मैं दो घंटे से भी कम चला था पर मेरे पैरों ने जवाब दे दिया। शायद बहुत समय बाद मैं उस दिन लगातार दो घंटे तक चला था। इसके बाद मैंने अपनी बनावट पर गौर करना शुरू किया। छोटी कदकाठी का होने के कारण बढ़े वजन का मुझ पर बड़ा ही मज़ाकिया असर दिखाई देता था। सर गर्दन में धंस गया था और चलते वक्त दोनो रान आपस में रगड़ खाती थीं। मेरा खड़े होने का तरीका भी एकदम असमान्य हो गया था। उस वक्त की मेरी तस्वीरें कैंसर के रोगी के एक्सरे की तरह हैं।

और हो भी क्यो न? अभी अभी मेरे एक साथी को डाॅक्टर ने चेतावनी देते हुए बताया है कि मोटापा कैंसर के बाद सबसे खतरनाक बिमारी है! आज मुझे अपनी साथी पर तरस आता है कि उसे कितनी शर्मिन्दगी होती होगी मेरे साथ चलने में।

बस उसी दिन मैंने तय कर लिया कि यदि मैने जल्द ही कुछ नहीं किया तो बहुत मुमकिन है कि मैं बाद में कुछ कर भी नहीं पाउं।

दौड़ने की पहली शर्त है धैर्य। आमतौर पर लोग पहले दिन ‘लालच’ में आकर क्षमता से अधिक दौड़ते हैं। यह एकदम गलत तरीका है। पहले कुछ दिन बहुत सावधानी बरतने की जरूरत होती है। इन्ही दिनों में इन्जरी होने की आशंका बहुत अधिक होती है। हो सके तो हर 100-200 मीटर पर रुक जाएं और अगला 200 मीटर चल कर पूरा करें। तब भी जब आपको लगता हो कि आप और दौड़ सकते हैं। पहले हफ्ते में शरीर को इन्जरी से बचाना बहुत जरूरी होता है।

आज की कड़ी के अंत में कुछ जरूरी सुझाव। यह मौसम बेहद ह्यूमिड है। इस मौसम में पसीना बहुत आता है और प्यास कम लगती है। ख्याल रखना चाहिए कि दौड़ने के बाद ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं। दूसरा, इस मौसम में इन्जरी कम होती है और वजन बहुत जल्दी घटता है। इसलिए दौड़ शुरू करने का यह सबसे अच्छा समय है।

अगली कड़ी में चर्चा करेंगे दौड़ने के लिए आवश्यक सामग्री और सांस लेने के तरीके पर। तब तक भाग कामरेड भाग।

वि.श.

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