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पत्रकारिता के खिलाफ पत्रकार

Posted by chimeki on November 18, 2016

journalism2002 नेपाल के एक साप्ताहिक अखबार जनादेश के संपादक कृष्णसेन इच्छुक की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई। दूसरे दिन तमाम नेपाली अखबारों ने इस हत्या के विरोध में अपने संपादकीय पृष्ठ को कोरा छोड़ दिया। ऐसा कर सभी अखबारों और पत्रकारों ने राजनीतिक विचारधारा उठ कर पेशे की एकता का परिचय दिया था। उनके इस कदम का मतलब यह था कि माओवादियों और सरकार की टकराहट में उनका पक्ष जो भी हो लेकिन पत्रकारिता पेशे की एकता सर्वोपरि है।

कृष्णसेन इच्छुक की हत्या के विरोध जो व्यापक विरोध हुआ उसने तत्कालीन सत्ता पक्ष को यह एहसास दिला दिया कि उसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार पर हस्ताक्षेप नहीं करना चाहिए। और उसके बाद माओवादी जनयुद्ध को कवर करने वाले पत्रकारों की हत्या अथवा उनके दमन की कोई बढ़ी खबर नेपाल में देखने को नहीं मिली। और वो भी एक निरंकुष राजतंत्र में। यहां तक कि माओवादी पार्टी का मुखपत्र माने जाने वाले जनादेश में काम करने वाले भूमिगत पत्रकारों की हत्या नहीं हुई। लेकिन जो कुछ आज के लोकतांत्रिक भारत में देखने को मिल रहा है उससे चेतना बहुत जरूरी है। रिपोटर्स विदाउट बाडर्स् की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार भारत पत्रकारिता के पेशे के लिए तीसरा सबसे खतरनाक देश है। एशियाई देशों में ये अव्वल है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान एवं इराक से भी पहले।

हाल के वर्षो में खासकर पिछले दो वर्षों में भारत में मूल पत्रकारिता का दायरा बहुत छोटा होता जा रहा है। 2014 तक भारत में पत्रकारिता में सत्ता विरोधी स्वर प्रमुख था। पिछली सरकार के जनविरोधी फैसलों को उजागर करने में पत्रकारिता का बड़ा योगदान रहा। लेकिन वर्तमान सरकार में पत्रकारिता सत्ता पक्ष की प्रोपोगेण्डा मशीन बन गई है। जो कुछ भी सरकोर वाली पत्रकारिता दिखाइ दे रही है वह ब्लाग अथवा सामाजिक संजाल जैसे ट्वीटर या फेसबुक में सिमटा दी गई है। 2011 के जनगणना की माने तो भारत में मात्र 4 प्रतिशत लोगों के पास इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटर की सुविधा है। इसी तरह मोबाइल इंटरनेट, जो अभी भी काफी मंहगा है, के जरिए फेसबुक अथवा अन्य इंटरनेट सुविधाओं का उपभोग करने वालों की संख्या अभी भी बहुत कम है। अधिकांश लोग टीवी अथवा रेडियो या समाचारपत्र जैसे पारंपरिक माध्यमों पर ही सूचना के लिए आश्रित हैं। ये माध्यम ही दुनयावी जानकारी के लिए बहुसंख्यक आबादी के स्रोत हैं।

लेकिन पिछले दो सालों में ये माध्यम तेजी से सरकारी प्रोपोगेण्डा मशीन बन गए हैं और पत्रकारिता के सरोकारों को भुला दिया है।

नोटबंदी के सरकारी फैसले के बाद जिस तरह की अराजकता और परेशानी व्याप्त है उसे सामने लाना और सरकार को इस बात के प्रति चेताना हाल में पत्रकारिता का प्रमुख कार्यभार है। लेकिन सभी समाचारपत्रों और चैनलों ने अपने इस कर्तव्यों से किनारा कर लिया है। जो एक या दो समाचारपत्र या टीवी चैनल इसे दिखा रहे हैं उन पर हमले हो रहे है। अभी पांच दिन पहले कारंवा पत्रिका के पत्रकार पर हमला हुआ। और परसों और कल फील्ड से रिपोर्टिंग कर रहे रवीश कुमार और उनकी टीम को डराने की कोशिश की गई। जिन लोगों ने यह किया वे एक पार्टी के समर्थक थे। और वे ऐसा ही करते हैं और करेंगे। ऐसे लोग बस या मेट्रों पर भी होते हैं लेकिन हम यह मानते हैं कि इन्हे सरकारी संरक्षण प्राप्त नहीं होगा इसलिए हम प्रतिवाद करते हैं, उनकी सुनते हैं अपनी सुनाते हैं। लेकिन पिछले दिनों में यह आभास हो रहा है कि पत्रकारों पर इनके हमले के खिलाफ अन्य मीडिया संस्थानों का खामोश रहना अनिष्ठ का संकेत है।

सुधीर चैधरी का डीएनए क्या इनता विकृत हो गया है कि अपने ही पेशे पर हो रहे इस अशलील आक्रमण के खिलाफ एक लाइन तक नहीं कह सकते। वे जिस कदम को ठीक मानते हैं उसके प्रति उनका पुर्वाग्रह रखना कोई गलत बात नहीं है। लेकिन अपने पेशे के प्रति इस कदर उदासीन रहना उनकी बड़ी भूल है। अर्णव गोस्वामी या दीपक चौरसिया जो भारत पर आने वाले तमाम खतरों को दूर से ही भांप लेते हैं क्या लोकतंत्र पर मंडरा रहे इस खतरे को नहीं समझ पा रहे। पिछले दिनों कारंवा के पत्रकार और इन दिनों रवीश और उनकी टीम पर हो रहे हमले दरअसल पत्रकारिता पर हमले हैं। और इसलिए भी यह वक्त पत्रकारों को अपनी विचारधारा से उठ कर सोचने का है। रवीश पर खतरा एक व्यक्ति विशेष का मामला नहीं है ये पत्रकारिता के पेशे पर दवाब है। साथ ही यह फेसबुक और ट्वीटर के पत्रकारों पर भी हमला है। इसलिए पेशे को बचाने की लड़ाई बेहद जरूरी हो गई है। विचारधारा इसके बाद।

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