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भारत के गोरखा कौन हैं

Posted by chimeki on November 26, 2017

भारत में हर अल्पसंख्यक समुदाय जो अपने अधिकार की बात करता है वह आज शक के घेरे में है। इस फेहरिस्त में अब एक नया नाम और जुड़ गया है: भाषाई रूप से अल्पसंख्यक गोरखा समुदाय का। पिछले दो सौ सालों से इस इस देश की सीमाओं की रक्षा करने के लिए यूरोप, अफ्रीका, मध्यपूर्व और खाड़ी देशों में जा कर लड़ने वाले और आजाद भारत की सभी लड़ाइयों में वीरता के उच्च तमगे प्राप्त करने वाले गोरखा लोगआज जब अपने अधिकार को लेकर दार्जिलिंग में संघर्ष कर रहे हैं तो राज्य की त्रिणमूल कांग्रस सरकार उनसे बात कर समाधान तलाशने की जगह उन्हें चीन प्रायोजित आंदोलनकारी ब्रांडकरने में लगी है।

हाल में राज्य का गृह मंत्रालय लगातार गोरखालैंड में चीन की घुसपैठको लेकर चिंता व्यक्त कर रहा है और केन्द्र को इस चिंता से अवगत करने के लिए पत्र लिख रहा है। राज्य सरकार ऐसा माहौल बना की कोशिश में है जिससे आंदोलनकारियों के घोर दमन को राष्ट्रहित में बताकर इस अति संवेदनशील राष्ट्र की आत्मा को जगाया जा सके और दमन को जायज बताया जा सके।

पृथ्क राज्य की मांग को लेकर भारत में लगातार संघर्ष हुए है और गोरखालैंड की मांग कोई अनोखी मांग नहीं है। सन 2000 के बाद भारत में छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तराखंड और तेलंगाना राज्यों का गठन हुआ। महाराष्ट्र में विदर्भ और मध्य प्रदेश में गोंडवानालैंड एवं अन्य स्थानों में भी भाषाई और अन्य आधारों में राज्यों के गठन की माग उठती रहती है जो स्वाभाविक भी है।

छोटे राज्यों के निर्माण से सत्ता का स्वरूप अधिक समावेशी बनता है और जातीय और अन्य ऐतिहासिक कारणों से पीछे रह गए लोगों को विकास की मुख्यधारा में शामिल होने का मौका मिलता है। छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड इसके उदाहरण हैं। सत्ता में लंबे समय से जारी वर्चस्व का टूटना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत होता है। गोरखालैंड आंदोलन भी सामान्यतः इसी बुनियादी समझदारी की अभिव्यक्ति है।

आज जिस भारत के नक्शे को देख कर राष्ट्रवादी लोग भावुक हो जाते हैं उस नक्शे के निर्माण में भारत के गोरखाओं का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इतिहास का अन्याय देखिए कि इस देश की स्मृतियों में उनकी इस भूमिका को भुला दिया और गोरखा को बहादुर’ ‘साब जीजैसे अपमानित करने वाले जुमलों का पर्यायवाची बना दिया गया।

इस लेखक के हाथ में आकाशवाणी के पूर्व अधिकारी स्वर्गीय मणी प्रसाद राई की एक महत्वपूर्ण कृति वीर जातिको अमर कहानीहै जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन में गोरखा समुदाय को लेखक ने अपने निजी प्रयासों और संसाधनों से दर्ज करने की कोशिश की है। 64 अध्यायों वाली इस पुस्तक में भारत के उन गोरखाओं के बारे में बताया गया है जिन्होने आजादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से योगदान किया।

पुस्तक में कप्तान रामसिंह ठाकुर के बारे में बताया गया है कि 15 अक्टूबर 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने रामसिंह ठाकुर को गुरूदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर के जन गण मनको हिन्दी में रूपांतरित कर संगीतबद्ध करने का आग्रह किया। 21 अक्टूबर 1943 को अस्थायी आजाद हिन्द सरकार के गठन के समय शपथ ग्रहण से पूर्व राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने के समय रामसिंह की धुन में कौमी तराना बजाया गया। आजाद भारत के राष्ट्रगान जन गण मनमें इसी धुन का प्रयोग किया गया है।

शायद यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि भारत के जिन भूभाग में आज गोरखा समुदाय का बाहुल्य है उनमें से अधिकांश भूभाग 1815-16 तक गोरखा साम्राज्य का हिस्सा था। धर्मशाला, देहरादून-मसूरी, शिमला और पूर्वोत्तर में दार्जिलिंग और अन्य भाग गोरखा साम्राज्य का हिस्सा थे जो एंगलो-नेपाल युद्ध के बाद अंग्रेज भारत में मिला लिए गए।

इस युद्ध में गोरखाओं की बहादुरी के कायल हुए अंग्रेजों ने हारे हुए गोरखाओं को अपनी सेना में सम्मानित स्थान दिया और 1857 के पहले स्वतंत्रता युद्ध के बाद सेना में उन्हें सिक्ख और अन्य जातियों की तरह जो इस आंदोलन में उनकी वफादार बनी रहीं अधिक सम्मान दिया जाने लगा।

इसलिए गोरखाओं को बाहर से आ कर इस क्षेत्र में बसे लोगों की तरह देखना इतिहास का मजाक उड़ाना है। यह सच है कि नेपाल के नेपालियों में भारत के प्रति अविश्वास है। हाल के दिनों में यह अविश्वास और अधिक बढ़ा है जिसके कुछ वाजिब कारण भी हैं। उस देश की राजनीति में भारत की दखलअंदाजी ने वहां के भारत के विरोधी राष्ट्रवाद को मजबूत किया है लेकिन उसी चश्मे से भारत के मूल निवासी गोरखाओं को देखना शर्मनाक है।

तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए ममता सरकार का गोरखाओं को राष्ट्र की अखण्डता का दुश्मन करार देना अशोभनीय और बेहद गैर जिम्मेदाराना है। ममता बनर्जी लगातार कहती आईं है कि उनकी सरकार निष्पक्ष है और भेदभाव नहीं करती। लेकिन बार बार गोरखा आंदोलन को चीन के साथ जोड़ना, वो भी ऐसे वक्त में जब दोकलम में चीन के साथ भारत का तनाव अपने चरम पर है, उसे एक जाति के खिलाफ खतरनाक षड्यंत्र ही कहा जाएगा।

वि. श.

(जुलाई 2017 में जनज्वार और जनमेल में हिन्दी और नेपाली में प्रकाशित)

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पत्रकारिता के खिलाफ पत्रकार

Posted by chimeki on November 18, 2016

journalism2002 नेपाल के एक साप्ताहिक अखबार जनादेश के संपादक कृष्णसेन इच्छुक की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई। दूसरे दिन तमाम नेपाली अखबारों ने इस हत्या के विरोध में अपने संपादकीय पृष्ठ को कोरा छोड़ दिया। ऐसा कर सभी अखबारों और पत्रकारों ने राजनीतिक विचारधारा उठ कर पेशे की एकता का परिचय दिया था। उनके इस कदम का मतलब यह था कि माओवादियों और सरकार की टकराहट में उनका पक्ष जो भी हो लेकिन पत्रकारिता पेशे की एकता सर्वोपरि है।

कृष्णसेन इच्छुक की हत्या के विरोध जो व्यापक विरोध हुआ उसने तत्कालीन सत्ता पक्ष को यह एहसास दिला दिया कि उसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार पर हस्ताक्षेप नहीं करना चाहिए। और उसके बाद माओवादी जनयुद्ध को कवर करने वाले पत्रकारों की हत्या अथवा उनके दमन की कोई बढ़ी खबर नेपाल में देखने को नहीं मिली। और वो भी एक निरंकुष राजतंत्र में। यहां तक कि माओवादी पार्टी का मुखपत्र माने जाने वाले जनादेश में काम करने वाले भूमिगत पत्रकारों की हत्या नहीं हुई। लेकिन जो कुछ आज के लोकतांत्रिक भारत में देखने को मिल रहा है उससे चेतना बहुत जरूरी है। रिपोटर्स विदाउट बाडर्स् की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार भारत पत्रकारिता के पेशे के लिए तीसरा सबसे खतरनाक देश है। एशियाई देशों में ये अव्वल है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान एवं इराक से भी पहले।

हाल के वर्षो में खासकर पिछले दो वर्षों में भारत में मूल पत्रकारिता का दायरा बहुत छोटा होता जा रहा है। 2014 तक भारत में पत्रकारिता में सत्ता विरोधी स्वर प्रमुख था। पिछली सरकार के जनविरोधी फैसलों को उजागर करने में पत्रकारिता का बड़ा योगदान रहा। लेकिन वर्तमान सरकार में पत्रकारिता सत्ता पक्ष की प्रोपोगेण्डा मशीन बन गई है। जो कुछ भी सरकोर वाली पत्रकारिता दिखाइ दे रही है वह ब्लाग अथवा सामाजिक संजाल जैसे ट्वीटर या फेसबुक में सिमटा दी गई है। 2011 के जनगणना की माने तो भारत में मात्र 4 प्रतिशत लोगों के पास इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटर की सुविधा है। इसी तरह मोबाइल इंटरनेट, जो अभी भी काफी मंहगा है, के जरिए फेसबुक अथवा अन्य इंटरनेट सुविधाओं का उपभोग करने वालों की संख्या अभी भी बहुत कम है। अधिकांश लोग टीवी अथवा रेडियो या समाचारपत्र जैसे पारंपरिक माध्यमों पर ही सूचना के लिए आश्रित हैं। ये माध्यम ही दुनयावी जानकारी के लिए बहुसंख्यक आबादी के स्रोत हैं।

लेकिन पिछले दो सालों में ये माध्यम तेजी से सरकारी प्रोपोगेण्डा मशीन बन गए हैं और पत्रकारिता के सरोकारों को भुला दिया है।

नोटबंदी के सरकारी फैसले के बाद जिस तरह की अराजकता और परेशानी व्याप्त है उसे सामने लाना और सरकार को इस बात के प्रति चेताना हाल में पत्रकारिता का प्रमुख कार्यभार है। लेकिन सभी समाचारपत्रों और चैनलों ने अपने इस कर्तव्यों से किनारा कर लिया है। जो एक या दो समाचारपत्र या टीवी चैनल इसे दिखा रहे हैं उन पर हमले हो रहे है। अभी पांच दिन पहले कारंवा पत्रिका के पत्रकार पर हमला हुआ। और परसों और कल फील्ड से रिपोर्टिंग कर रहे रवीश कुमार और उनकी टीम को डराने की कोशिश की गई। जिन लोगों ने यह किया वे एक पार्टी के समर्थक थे। और वे ऐसा ही करते हैं और करेंगे। ऐसे लोग बस या मेट्रों पर भी होते हैं लेकिन हम यह मानते हैं कि इन्हे सरकारी संरक्षण प्राप्त नहीं होगा इसलिए हम प्रतिवाद करते हैं, उनकी सुनते हैं अपनी सुनाते हैं। लेकिन पिछले दिनों में यह आभास हो रहा है कि पत्रकारों पर इनके हमले के खिलाफ अन्य मीडिया संस्थानों का खामोश रहना अनिष्ठ का संकेत है।

सुधीर चैधरी का डीएनए क्या इनता विकृत हो गया है कि अपने ही पेशे पर हो रहे इस अशलील आक्रमण के खिलाफ एक लाइन तक नहीं कह सकते। वे जिस कदम को ठीक मानते हैं उसके प्रति उनका पुर्वाग्रह रखना कोई गलत बात नहीं है। लेकिन अपने पेशे के प्रति इस कदर उदासीन रहना उनकी बड़ी भूल है। अर्णव गोस्वामी या दीपक चौरसिया जो भारत पर आने वाले तमाम खतरों को दूर से ही भांप लेते हैं क्या लोकतंत्र पर मंडरा रहे इस खतरे को नहीं समझ पा रहे। पिछले दिनों कारंवा के पत्रकार और इन दिनों रवीश और उनकी टीम पर हो रहे हमले दरअसल पत्रकारिता पर हमले हैं। और इसलिए भी यह वक्त पत्रकारों को अपनी विचारधारा से उठ कर सोचने का है। रवीश पर खतरा एक व्यक्ति विशेष का मामला नहीं है ये पत्रकारिता के पेशे पर दवाब है। साथ ही यह फेसबुक और ट्वीटर के पत्रकारों पर भी हमला है। इसलिए पेशे को बचाने की लड़ाई बेहद जरूरी हो गई है। विचारधारा इसके बाद।

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The New Nepal Constitution: A Losers Document?

Posted by chimeki on August 11, 2015

nepal constitutionNow that the draft constitution of Nepal is out for public scrutiny, it looks as if the nine year long exercise for constitution writing was a wasted opportunity. The draft constitution has postponed many important issues for a distant, yet unknown, future. The new constitution, the 6th in as many decades, lacks some of the core elements which have been the cause for chain of unrest, bloody and peaceful, in the Himalayan nations for more than a century now. No wonder various sections of Nepalese have already hit the streets to oppose it.

Padma Ratan Tuladhar, a credible ethnic face and prominent human rights activist, has described the new constitution as a ‘losers’ document’. This is because, the constitution makers, have ignored the aspirations of the Madheshi (people of the plains), dalits and major ethnic and religious groups in the draft. Since the the Gorkha king Prithvi Narayan Shah united most of the present Nepal, these groups have had a history of marginalization and exclusion.

Current constitution keeps the exclusion intact. For example, the current draft replaces the word ‘proportional representation’ for marginalized communities in interim constitution with ‘inclusive’ participation. This means that the communities will be ensured participation without any promised representation. It further exposes the communities to the competition where they, due to historical reasons, are in disadvantage.

Similarly on the issue of religious freedom the drafters have shown their disdain for individual’s wisdom. The new constitution states that each person shall be free to profess, practice, and preserve his/her religion according to his/her faith, and distance himself/herself from any other religion nevertheless it criminalizes the religious conversion by putting a condition i.e. it categorically states, ‘no person shall act or make others act in a manner which is contrary to public health, decency and morality, or behave or act or make others act to disturb public law and order situation, or convert a person of one religion to another religion, or disturb the religion of other people. Such an act shall be punishable by law.’ The constitution is inconsistent with the article 18 of the Universal Declaration of Human Rights which gives every human being freedom to change his religion or belief.

The above argument has to be understood in the current political and social context of Nepal. In last few years, Nepal is being sharply divided on religious lines. Post Monarchy there has been many fold increase in efforts to blunt the democratic aspirations of people by polarizing them on religious line. The political parties, including the Maoists, are unnecessarily debating the word secularism in the draft. They are infusing xenophobia in the citizens’ psyche. Even the Maoist leaders Prachand has misinterpreted the word secularism and agreed to find a ‘suitable’ replacement. In an interview to Outlook Hindi Prachanda said that he was against ‘forceful conversion because spread of Christianity in Nepal is dangerous.’ He didn’t define how.

Likewise, the constitution is also ambiguous on federalism, land reform and other issues including gender rights. These are the issues that should have not been left for future. It is widely believed that the current constituent assembly has been hijacked by the forces which were fought against to create it. Nepal has seen many violent uprisings in the past. Nepali leaders ought to understand that keeping the status quo won’t help in future either. For last nine years, the Constitution Assembly could never show that it was serious in resolving the contentious issues through serious debates. Every major compromise was achieved outside the assembly in often questionable negotiations.

Those who know about 1990 movement, also known as People Movement I, that resulted in end of absolute monarchy and making of a new constitution could see that the present exercise was no different. Then too in the name of compromise the leaders betrayed the most marginalized and exploited people. That betrayal pushed Nepal to the bloodiest civil war for a decade which ultimately broke the economy and society. It was hoped that the leaders would understand the past mistakes and address the core issues that has caused unrests in regular intervals. Unfortunately they didn’t.

Nepal today stands at square one. It has lost a good opportunity to move on the path of peaceful growth. The leaders may take a deep breath for now and think of themselves as heroes but future certainly will be not very kind to them. They have repeated the same mischief for which they have been punished time and again. It now looks obvious that their reluctance to not learn for the past would cost Nepal dearly.

VS

(Published in the Citizen, 9 August 2015)

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नेपाल का संविधान और 40 सूत्रीय मांग

Posted by chimeki on August 3, 2015

Constitution-nepal4 फरवरी 1996 को तत्कालीन संयुक्त जनमोर्चा (नेपाल) की ओर से डाॅ बाबुराम भट्टराई ने प्रधान मंत्री शेर बहादुर देउबा को 40 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा। संयुक्त मोर्चा ने यह भी घोषणा की कि इन मांगों पर यदि सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया तो वे ‘राज्यसत्ता के विरोध में सशक्त संघर्ष के रास्ते में जाने के लिए बाध्य होंगे’। 14 फरवरी 1996 को नेपाल की कम्युनिस्‍ट पार्टी (माओवादी) ने नेपाल की राज्यसत्ता के विरुद्ध जनयुद्ध की घोषणा कर दी।

नेपाल के नए संविधान (मसौदा) की 1996 के उपरोक्त मांग पत्र के साथ तुलना करने पर यह साफ हो जाता है कि नया संविधान उन मांगों को संबोधित करने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है जिसने नेपाल को 10 साल के लिए अनिश्चय, अस्थिरता और अशांति के रास्ते में डाल दिया था।

माओवादियों की 40 सूत्रीय मांग नेपाली समाज में व्याप्त उन अंतरविर्रोधों का लघु मानचित्र है जिनके हल न होने से नेपाल हमेशा एक ऐसे ज्वालामुखी के समान बना रहा है जो छोटे-छोटे अंतराल में फटता रहता है और सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का कारण बनता है।

नेपाल में एक नए संविधान का बन जाना कोई ऐतिहासिक महत्व की घटना नहीं है। 1950 के बाद से नेपाल के वर्तमान संविधान को मिलाकर कुल छह संविधान बन चुके हैं। नेपाल का सबसे पहला संविधान 1951 (अंतरिम) में बना, उसके बाद 1959, 1962, 1990 और 2007 (अंतरिम) में नेपाल में संविधान जारी हुए। इस अल्प अवधि में इतने संविधानों का जारी होना यह बताता है कि नेपाली समाज में व्याप्त अंतर्विरोधों का समाधान किए बिना शांति, स्थिरता और विकास की आशा नहीं की जा सकती। संविधान का निर्माण भावनाओं में बह कर नहीं किया जा सकता। यह किसी के अंहकार की तुष्टि का साधान नहीं है। संविधान का निर्माण वस्तुपरक स्थिति के ठोस मूल्यांकन के आधार पर ही हो सकता है। नेपाल के वर्तमान संविधान में इन सारे मूलभूत सिद्धांतों की अवहेलना की गई है। अंततः उसने उन कारकों को पुनः मान्यता प्रदान कर दी है जो नेपाल को बार-बार अराजकता, अस्थिरता और अशांति की ओर धकेल देते हैं। नेपाली समाज का छोटा मध्यम वर्ग और सम्पन्न वर्ग चाहे जितना ही ईमानदारी से शांति, स्थिरता और विकास की बात करता रहे, यह तब तक संभव ही नहीं है जब तक यह वर्ग व्याप्त अंतर्विरोधों को हल करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाता और बहुसंख्यक गरीब आबादी को यह अहसास नहीं दिलाता कि देश हित की उसकी दलीलों में उनका भी हित शामिल है।

नेपाल को एक स्वतंत्र देश से अर्ध-उपनिवेश और अब नव-उपनिवेश की स्थिति तक पहुंचाने में नेपाल पर समय-समय पर लादी गई असमान संधियां एवं समझौतों की बड़ी भूमिका है जिसमें सबसे प्रतिक्रियावादी संधि भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुई शांति और मैत्री संधि ही है। इस संधि ने नेपाल के अर्ध-औपनिवेशिक चरित्र को मजबूत किया।[1]  इसलिए 1950 के बाद नेपाल में जितने भी छोटे-बड़े आंदोलन हुए उन सबकी प्रमुख मांग इस संधि को खारिज किया जाना था। 1996 में माओवादी द्वारा प्रस्तुत 40 सूत्रीय मांग की पहली मांग इस संधि को निरस्त करना था। वर्तमान संविधान में इस दिशा में कोई ठोस आश्‍वासन नहीं है।

एक अध्ययन के अनुसार, नेपाल की 65 प्रतिशत जमीन पर 10 प्रतिशत सम्पन्न सामंत वर्ग का अधिकार है। नेपाल में 8 प्रतिशत लोग पूरी तरह से भूमिहीन हैं और 65 प्रतिशत गरीब किसानों के हिस्से में मात्र 10 प्रतिशित भूमि है।[2] इसलिए नेपाल की बुनियादी जरूरत ठोस भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू करना है। भूमि सुधार कार्यक्रम को सख्ती के साथ लागू किए बिना बहुसंख्यक जनता के हित में भूमि संसाधन का दोहन नहीं हो सकता। वर्तमान संविधान में वैज्ञानिक भूमि सुधार करने की बात तो है लेकिन भूमि के वितरण पर खामोशी है। साथ ही अनुपस्थित भू-स्वामित्व को केवल निरुत्साहित करने की बात की गई है। इस संबंध में स्पष्ट दृष्टिकोण का अभाव बहुत भ्रामक है। साथ ही 40 सूत्रीय मांग में गरीब किसानों के लिए पूर्ण रूप से कर्ज माफी की बात की गई थी लेकिन संविधान ने इस पर आंखें बंद कर ली हैं।

40 सूत्रीय मांग में गोर्खा भर्ती केन्द्रो को बंद करने की मांग की गई थी। इसका उद्देश्य उस घृणित परंपरा का अन्त करना था जिसके कारण नेपाली जनता को दूसरे देशों की जनता के आंदोलनों को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह असभ्य और मानवता के खिलाफ है। आज ही नहीं ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौर से ही ऐसा हो रहा है। 1857 में भारत में हुए अंग्रेज विरोधी संघर्ष में नेपाली सैनिकों का प्रयोग किया गया। इसके अतिरिक्त पंजाब, कश्मीर, अफगानिस्तान, लैटिन अमेरिका में भी नेपाली सैनिकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। वर्तमान संविधान इस पंरपरा को बनाए रखता है।

2005 के अध्यन के अनुसार मात्र काठमांडू में 31 हजार से अधिक संपत्तिहीन लोग हैं जो झुग्गियों में रहते हैं। पूरे नेपाल में यह संख्या कई गुणा अधिक है। 40 सूत्रीय मांग में इन लोगों के लिए उचित व्यवस्था की मांग थी। साथ ही यह भी उल्लेख है कि बिना विकल्प के इन लोगों की बेदखली नहीं होनी चाहिए। लेकिन मसौदा संविधान कानून के अनुसार बेदखली को वैधानिकता प्रधान करता है।

इसके अलावा भारत नेपाल बीच की खुली सीमा को नियंत्रित एवं व्यवस्थित करने पर भी संविधान में कुछ नहीं कहा गया है।

40 सूत्रीय मांग की ऐसी अनेक बातें हैं जिसे वर्तमान संविधान में पूर्ण रूप से निषेध कर दिया गया है। 40 सूत्रीय मांग में नेपाल की सभी भाषाओं को समान अवसर और सुविधा देने की बात है लेकिन वर्तमान संविधान में नेपाली को ही सरकारी कामकाज की भाषा का दर्जा दिया है। इस तरह लाखों गैर-नेपाली भाषाई नागरिकों को हाशिये पर धकेल दिया गया है।

माओवादियों की मांग थी कि नेपाल के सभी नागरिकों के लिए निशुल्क और वैज्ञानिक स्वास्थ सेवा एवं शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। वर्तमान मसौदा संविधान शिक्षा और स्वास्थ सेवा के निजीकरण को संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देता है। इस तरह यह शिक्षा और स्वास्थ्‍य के नाम पर होने वाली लूट को चुनौती देने तक को आपराधिक अथवा गैरकानूनी बना देता है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि 1996 में प्रस्तुत माओवादियों की 40 सूत्रीय मांग को अंततः यह संविधान खारिज कर देता है जो जनयुद्ध के शुरू होने और विस्तार करने का महत्वपूर्ण कारण था।

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[1] संधि को ठीक से समझने के लिए नेपाल के तत्कालीन प्रधान मंत्री मोहन शमशेर और भारतीय राजदूत सी पी नारायण सिंह द्वारा हस्ताक्षरित ‘लेटर आॅफ एक्सचेन्ज’ का अध्ययन आवश्यक है।

[2] बाबुराम भट्टराई, पोलिटिको-इकोनोमिक रैशनैल आॅफ पीपुल्स वाॅर इन नेपाल

वि.श.

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नेपाल में गाय : पवित्र जीव से राष्ट्रीय पशु तक

Posted by chimeki on August 3, 2015

Gaijatralनेपाल के नए संविधान में भी गाय को राष्ट्र पशु स्वीकार किया गया है। वैसे 1962 से ही नेपाल का राष्ट्रीय जानवार गाय है। यह इसलिए कि 1962 के संविधान में ही पहली बार नेपाल को राजसी हिन्दू राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया गया था। इससे पहले नेपाल में गाय एक पवित्र जानवर था। अधुनिक नेपाली राष्ट्रवाद का जन्म भी इसी समय शुरू हुआ। राजा महेन्द्र ने हिन्दू धर्म को नेपाली राष्ट्रवाद का रूप दिया और गैर हिन्दू आबादी का जबरन हिन्दूकरण करना शुरू किया। राजा महेन्द्र ने एक देश, एक वेष, एक भाषानेपाल की तमाम राष्ट्रीयताओं पर लागू किया। यह अनायास नहीं है कि नेपाली इतिहास के ठीक इसी बिन्दु पर नास्तिक माने जाने वाले कम्युनिष्ट दल नेपाली राजनीति के रंगमंच पर स्थापित होना शुरू हुए।

नेपाल के संदर्भ में गाय का सवाल मात्र एक जानवर का सवाल नहीं है बल्कि यह इतिहास के उस कालखण्ड से जुड़ा है जब वर्तमान नेपाली भू-क्षेत्र में हिन्दू रियासतें स्थापित होना शुरू हुईं। भारत में इस्लामिक सत्ताओं के विस्तार और बढ़ते प्रभाव ने हिन्दू राजाओं को पहाड़ों की और ढकेल दिया। इन लोगों ने पहाड़ों में कई छोटे छोटे राज्यों की स्थापना की। बाद में गोर्खा राज्य के राजा पृथ्वीनारायण शाह ने इन्हीं राज्यों का एकीकरणकरके आधुनिक नेपाल राज्य का निर्माण किया। गोर्खा नाम संस्कृत शब्द गौरक्षा से आया है। इसलिए जब गाय को धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र का राष्ट्रीय पशु माना जाता है तो तमाम भलमनसाहत के बावजूद हिन्दू राष्ट्र के प्रवेश का चोर दरवाजा खुला रह जाता है।

यह दलील दी जा सकती है कि नेपाली राजनीति को भारतीय ढांचे में रख कर नहीं देखना चाहिए या इसका अध्ययन भारतीय संवेदना के साथ नहीं होना चाहिए। यह भी कहा जा सकता है कि शयद नेपाल के लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता। यह सच है कि नेपाल के लोग गाय के सवाल पर वैसी बहस नहीं कर रहे हैं जैसी बहस भारतीय संविधान के निर्माण के वक्त हो रही थी। भारत की संविधान सभा में बहस करते वक्त डा अम्बेडकर कहते हैं कि हम पिछले सात दिनों से इस (गाय) पर बहस कर रहे हैं। नेपाल की संविधान सभा ने एक मिनिट भी इस पर चर्चा हुई हो ऐसा प्रमाण नहीं मिलता।

लेकिन जरूरी बात इस बात की जांच करना है कि नेपाल के संविधान निर्माता गाय को कैसे देखते हैं। जब वो गाय को राष्ट्रीय पशु कहते हैं तो गाय के कौन से गुणों को चिन्हित करते हैं। बेशक कृषि प्रधान देश में गाय एक उपयोगी पशु है। लेकिन गाय की उपयोगिता सिर्फ दूध, बैल पैदा करने और गोबर देने में नहीं है। गाय प्रोटीन (मांस) का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। यहीं वह पेंच है जिसकि पड़ताल किए बिना गाय को सवंधिान को चरने के लिए नहीं छोडा जाना चाहिए था।

नेपाली पाठ्यक्रम की पाठ्य पुस्तकों में गाय पर सामग्री का अध्ययन करने से संविधान और नीति निर्माताओं की जिस मानसिक स्थिति का संकेत मिलता वो वाकई देश के धर्मनिर्पेक्ष भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। पाठ्यक्रम में जो सामग्री है उसके अनुसार गाय राष्ट्रीय पशु है क्योंकि वह दूध देती है और हिन्दूओं के लिए पूज्य है। यदि पाठ्यक्रम यह भी संदेश होता कि गाय के दूध के साथ उसका मांस भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत है तो भी शायद गाय का विरोध नहीं करना पड़ता। गाय और हिंदू धर्म का गहरा संबंध है। एक तरह से ये दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक हैं। डा अम्बेडकर ने गौ मांस खाने वाले और न खाने वालों को छूत और अछूत की विभाजन रेखा माना है।

राष्ट्रीय प्रतीक क्या है? किसी पशु, पक्षी या चिन्ह को राष्ट्रीय घोषित करने के क्या माने होता हैं? इन सवालों के कई जवाब हो सकते हैं लेकिन सबसे तार्किक जवाब यही लगता है कि राष्ट्रीय प्रतीक या चिन्ह राष्ट्र के इतिहास और संस्कृति के वे चिन्ह होते हैं और इनका चुनाव करते समय लोग यह तय करते हैं कि वे राष्ट्र को किस संस्कृति और इतिहास के किस हिस्से से जोड़ कर देखना चाहते हैं। राष्ट्रीय प्रतीकों का चुनाव समावेश और बहिष्कार की एक साथ होने वाली प्रकृया हैं। और ठीक इन्ही बिन्दु पर देश का चरित्र स्पष्ट होता है। इसके साथ यदि नेपाल को उसके इतिहास और दक्षिण एशिया के संदर्भ से अलग करके देखा जा सकता तो भी गाय कोई बहुत गंभीर बहस को पैदा नहीं करती। लेकिन अफसोस कि नेपाल को दक्षिण एशिया और उसके इतिहास के साथ ही समझा जा सकता है। इसलिए यहां गाय एक राष्ट्रीय पशु से बड़कर एक राष्ट्रीय चुनौती है जिसने अक्सर राष्ट्रीय आपदा को जन्म दिया है।

जैसा कि उपर कहा गया है भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भी गाय पर लंबी बहस की। संविधान सभा में गौ हत्या पर निर्पेक्ष (ब्लैंकिट) प्रतिबंध लगाने की मांग भी हुई लेकिन डा अम्बेडकर ने इस प्रतिबंध के पक्ष में धार्मिक आस्था वाली दलील को अस्वीकार कर आर्थिक दलीलों को स्वीकार किया और संशोधन में यह रखा गया कि राज्य उपयोगी जानवरों की हत्या पर रोक लगाने का प्रयास करेगा। इस तरह संविधान निर्माताओं ने एक बड़ी आबादी को राहत दिलाई।

द किंग एण्ड काउः आॅन ए क्रूशीयल सिम्बल आॅफ हिन्दूआईजेशन इन नेपाल में एक्सिल माईकल्स् लिखते हैं कि नेपाल में गाय का प्रयोग कतिपय राष्ट्रीय समूहों और दुर्गम क्षेत्रों के एकीकरण और उन पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए किया गया। वे इसी निबंध में लिखते है कि शाह राजाओं और राणाओं ने नेपाल राज्य की विचारधारा को गौ हत्या पर प्रतिबंध से जोड़ कर देखा। 1854 के मुल्की ऐन अथवा सिविल कोड में कहा गया है कि, ‘कलयुग में यही एक मात्र राज्य है जहां गाय, स्त्री और ब्राह्मण की हत्या नहीं हो सकती।

1939 में जब तत्कालीन राणा प्रधान मंत्री महाराजा जुद्धा शमशेर ने कलकत्ता का भ्रमण किया तो तमाम भारतीय समाचार पत्रों ने उन की यह कह कर प्रशंसा की कि वे एक ऐसे देश के प्रतिनिधि हैं जो हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक है। हिन्दू आउटलुक नाम की पत्रिका में छपे एक लेख में जुद्धा शमेशर की प्रशंसा करते हुए लेखक ने लिखा है, ‘एक पवित्र हिन्दू की तरह महाराजा महान गौ पूजक हैं

उपरोक्त परिप्रेक्ष में गाय को इस आसानी से राष्ट्रीय पशु स्वीकार कर लेना चिंतनीय है। एक धर्मनिर्पेक्ष राज्य किसी ऐसे जानवर को राष्ट्रीय पशु की मान्यता कैसे दे सकता है जिसके हवाले से नेपाली की बहुसंख्य जनता का उत्पीड़न किया जाता रहा है। एक अध्ययन के अनुसार गौ हत्या के मामले में सारे आरोपी जनजाति, पिछड़ी मानी जाने वाली हिन्दू जातियां या अल्प संख्यक समुदाय से हैं। इसलिए गाय का राष्ट्रीय पशु हो जाना नेपाल को आज ठीक उसी बिन्दु पर खड़ा कर दे रहा है जहां से असंख्य विद्रोहों का सूत्रपात हुआ था।

वि.श.

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In Nepal PM Modi failed to break with the past

Posted by chimeki on August 6, 2014

Courtesy: Business Standart

Courtesy: Business Standard

Despite beginning his speech in Nepali, acknowledging Lumbini as Gautam Buddha’s birthplace and reuniting Jeet Bahadur with his family, Prime Minister Narendra Modi’s Nepal visit was an absolute failure in terms of everything India wanted to see him achieve. People in India as well as Nepal expected from PM Modi that he would break with the old tradition in India-Nepal relationship where Nepal always has to play younger brother role and usher it in an era of equality opportunity. Sadly, as at home he couldn’t deliver abroad.

His maiden speech in the Constituent Assembly of Nepal was worst ever speech by a visiting head of any country in any host country. It was more of a sermon than a clear cut diplomatic statement, which every one rightly expected.

PM Modi was expected to fill the holes which consecutive Indian governments had dig in in Indo-Nepal relationship but he, like his predecessor Dr. Manmohan Singh, ended up adding more!

Narendra Modi did well to begin his speech in Nepali but failed to keep the momentum. Initially it appeared that he was one who was free of big brother syndrome, which Indian leaders generally carry, but two-three sentence later he shed his mask of humility and started coaching Nepali parliamentarians on his favorite topics: religion, history, management and mostly importantly himself!

What India badly needed in Nepal was an image makeover. For whatever India does in Nepal is always seen with suspicion. Suspecting everything India does in Nepal is the default setting in a Nepali mind. So PM would have done better if he would have come out of his election mode and talked business. After all he wasn’t there to influence voters!

The first blunder that Modi made was to unnecessarily evoke gods to describe Nepal’s relevance. Doing that, he ignored the feelings of non-Hindu population of that country. He wasted many minutes of his 45-minute long speech to explain how his coming from Somnath and winning election from Kashi (Varanasi) brought him closer to Pashupati (Nepal)! Further he wrongly claimed that 125 crore Indians want to visit Pashupatinath temple!

In his enthusiasm to impress or impress upon Nepali parliamentarians, half of whom are Communists, he forgot to minus Muslims, Christians, Sikhs, Dalits and other minorities of India and Nepal from that number who are barred from entering the elite temple. In the gate of the temple it is written in bold, ‘Non-Hindus are not allowed inside the temple premise’! Moreover, even Nepalis do not relate themselves to Pashupatinath. It is Gautam Buddha who is the real national symbol in Nepal. Ask any Nepali there, the first thing he would like a tourist to see in Nepal is Lumbini, the birth place of Buddha. PM Modi would have done better by congratulating Nepal on becoming a secular democratic country.

It is again a diplomatic blunder to try teaching leaders of host countries what they should be doing. In half of his speech he did this. To add on to it, he told the members of the Constituent Assembly that they didn’t know what they were actually doing! He spoke as if those men and women didn’t understand the meaning of constitution writing. Once he even said, ‘you think you are doing this but actually you are doing that’.

The PM would have really done well had he talked about the process of Indian constitution writing. It was an opportune moment to remember Dr BR Ambedkar, the architect of Indian Constitution, and the challenges he had to overcome to write it. And, also what features of Indian constitution played important role to keep India stable and on the path of social justice. It would have definitely given the Nepali law makers some food for thought. But our PM ignorantly mixed modern constitution with the ancient Hindu texts! Rather suggesting them to have saintly and priestly mind, he could have suggested them to have scientific and rational attitude.

It makes one wonder if our PM really don’t know anything beyond the Ganges, gods, Hindu religion and of course himself. He didn’t once mention any great Nepali leader or literary figure. Compare his speech with the US President Barak Obama’s in the Indian Parliament and readers can easily spot the differences. President Obama spoke about Mahatma Gandhi and Rabindranath Tagore. He evoked both to highlight the importance of equality, human dignity and social justice. In contrast PM Modi could only stereotype Nepalis as shedding blood in India’s wars and belonging to the country of Lord Pashupatinath. President Obama genuinely recalled the roles of his predecessors in building relationship with India. PM Modi, in contrast, negated the roles played by the likes of Jawaharlal Nehru, Indira Gandhi, IK Gujral and others in bringing India and Nepal closer. It wouldn’t have left bad a taste had he talked about Jayaprakash Narayan, Chandra Shekhar, VP Singh and other Indian leaders who always associated themselves with Nepal’s democratic movements and who Nepali people still fondly remember. But no, Modi can’t do this. His ego is too big to see anything beyond himself. With this attitude, Modi will never achieve what he intends to achieve. He can never be the South Asia’s leader he aims to become and who the region badly needs.

V.S.

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‘Pauper’ Koirala heads cabinet of millionaires

Posted by chimeki on May 13, 2014

Sushil_Koirala

Courtesy: Wikimedia

Nepal’s Prime Minister Sushil Koirala is a ‘pauper’ in the cabinet of the richest ministers. He is the fourth prime minister from the Koirala dynasty, yet, he owns no immovable property. His movable properties include just three set of mobile phones!

74 year old Koirala has no house in his name and has lived all his life in a shared accommodation. He has no bank account too and earlier this week he gave back his travel allowance of USD 650, which is equivalent to Nepali Rupees 63,427, to the country’s treasury!

But the ministers in the cabinet he leads are not such modest. They are rich and qualify to compete for a place in the Forbes list.

Bamdev Gautam, a communist and three times Home Minister, has properties worth more than few millions. He has booked a flat for rupees 50 lacs on his wife Tulsi’s name in Vegas City in Kathmandu. His daughter-in-law owns a 5 thousand square feet plot in an upmarket area of the capital city. He has also saved more than one crore rupees in his and son’s bank accounts. If calculated in market price, the minister’s property, which includes 350 grams of gold, can exceed 100 crore mark!

Finance Minister Dr. Ram Sharan Mahat is a gold mine. Besides a two story house and a flat in the capital his property includes 950 grams of gold and 2 kg silver. Probably more than what the country produces through outdated placer mining technique every year!

Both the ministers have proudly declared dowry received as one of their sources of income. Similarly, other ministers too have properties in millions of rupees. Education Minister Chitra Lekha Yadav has land and plots in 15 places including Lalitpur and Kathmandu. She also has 88 lac rupees in her bank account.

Chitra Lekha is closely followed by Infrastructure Minister Bimalendra Nidhi, 600 gram gold and 45 lac cash, and Forest Minister Mahesh Acharya 450 gram gold and 65 lacs in cash. Other ministers too have equal or more property.

In austerity, Sushil Koirala outscores not only his cabinet colleagues but also all the former prime ministers of Republic Nepal.

Incidentally, all his predecessors were communists. Although, Jhala Nath Khanal and Madhav Kumar Nepal of the UML held long experience of the parliamentary democracy but other two, Prachanda and Baburam Bhattarai of the UCPNM, had criticized parliamentary politics for more than two decades. And yet as soon as they came to power they did exactly what they said they stand against.  

Prachanda was nicknamed Rado Comrade for he wore Rado watch and had a great taste for suits and ties. Later, he discovered enthusiasm for Helicopters. During election campaigns in November he would fly to the distances as near as 35 kilometers! Post People’s War, Prachanda lives in a house which he has rented for more than one lac rupees per month! In his party meeting he is often criticized for his luxurious lifestyle. Once his son Prakash Dahal went for the Everest expedition for which government of Nepal ‘donated’ 2 crores.

Baburam Bhattarai was never directly blamed on any charge related to financial dishonesty but during his stint as the prime minister his wife Hasila Yami was often in news for wrong reasons. She was accused of financial dishonesty and favoritism. Once Matrika Yadav, a comrade in arms turned foe, had famously said, ‘Baburam Bhattarai eats his food with a spoon’.

In this period of leadership crunch, Sushil Koirala’s modesty has given Nepali people a leader who they can relate to. But Nepal needs more than an ascetic. He has to prove that he can lead his country out of the crisis it is stuck in for long. The first Constituent Assembly (CA) failed to give a new constitution and second is moving nowhere. First three months of the second CA went without a proper sitting. The important issues are still unresolved and there seems to be no consensus among parties on these.

The second big challenge he faces is to bring Kiran led Communist Party of Nepal- Maoist in negotiating table. Without doing so it will not be possible to guarantee real peace in Nepal. Although Nepal is a Left majority country, nevertheless, it always works well when it is led by the Right. Call it an irony, Nepal’s Left has always needed a supporting Right to move ahead. This is exactly what people want from Sushil Koirala.

(First published in the Citizen on 23 March 2014. Click here to read the article as it was published)

V.S.

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Bhattarai Defeated, Prachanda In Full Control Of UCPN(M)

Posted by chimeki on May 8, 2014

baburamThe national convention of the United Communist Party of Nepal (Maoist) held in Biratnagar ended in a humiliating defeat for its influential leader Dr Baburam Bhattarai. The convention, which was aimed at strengthening the party by resolving the differences between its two big leaders Pushpa Kamal Dahal aka Prachanda and Baburam Bhattarai only aggravated the situation and exposed, once again, fissures in the party. Bhattarai has been completely sidelined and it is now certain that Prachanda will continue to enjoy the absolute authority in the party.

Many of Bhattarai’s old friends and associates left him in the lurch to join the ultimate winner of the years’ old battle for party’s control. Prachanda once again proved that when it comes to settling scores with his rivals he is as merciless as his idol Jung Bahadur Rana of Nepal.

After the second Constituent Assembly election last November, in which the party performed poorly, Bhattarai’s loyalists have been pressurizing Prachanda to step down from the top post. Often Bhattarai used public space to make his point.. His opinion that there was a need of new force, expressed in Kantipur Daily, was seen as a direct challenge to Prachanda’s authority.

Bhattarai also tried to forge alliance with another powerful but disgruntled leader Narayan Kaji Shrestha to win majority in the party’s central committee. Had he succeeded the alliance would have balanced the power and forced Prachanda to heed to Bhattarai’s demand. But Shreshta, a newcomer, proved himself to be too weak to keep a check on his loyalists.

In the convention Prachanda proposed the Central Committee, CC, that he will always keep him in majority. In the new 99 member CC there are less than 30 members from Bhattarai and Shrestha factions! After a long time Prachanda has gained an upper hand in the party. This is reflecting in his body language too. In a press conference after the convention, he spoke with the confidence of a supreme leader. He told journalists that ‘he will give important position to Bhattarai’.

Later, speaking at the inaugural ceremony of party’s mouthpiece Prasthan, Prachanda told the gathering that he had promoted Bhattarai to the party’s highest committee with the view that it would benefit party but it proved to be a mistake. Prahanda further humiliated Bhattarai by telling people that the old communist leaders and cadres had advised him not to elevate Bhattarai beyond district committee!

The sudden turn of the event had come as a shock to Bhattarai and his loyalists. In June 2012 the UCPNM split vertically. The party watchers thought that the development would make Bhattarai stronger for had long represented the line of multi-party democracy and peaceful struggle for socialism against hardliners’ line of ‘people’s revolt’ to establish socialism.

Initially both Prachanda and Bhattarai saw the split as a boon as it gave them the opportunity to take party out of the ‘People’s War’ mode. The immediately held Hetauda convention endorsed the line of ‘peaceful road to Socialism in Nepal’. The party declared that its basic goal was to promote economic growth.

The convention also led to the formation of Chief Justice Khil Raj Regmi’s caretaker or impartial government to hold Constituent Assembly election. The party had imagined a bigger victory in the election. However the result showed that it had exaggerated its strengthen. The party lost badly and ended up being the number 3 party in the Constituent Assembly.

Since then Bhattarai and Prachanda never saw eye to eye. Bhattarai never missed opportunity to show Prachanda his place. Bhattarai thought that Prachanda had lost his appeal amongst the cadre and it was matter of time when curtain would fell on him. However Bhattarai poorly judged his own strength in the party. No doubt he is more acceptable to the urban population of Nepal than Prachanda but organizationally he is very weak. He failed to realise that the split has weakened him further for there was no one to support him organizationally. Previously, Mohan Baidya ‘Kiran’ had come to his rescue whenever Prachanda wanted to ‘penalize’ him for his ‘mistake’.

Wisely, judging the way the wind was blowing his known loyalists like Dinanath Sharma and Ram Karki left him to side with Prachanda.

By reading Bhattarai statements after the convention it can be said that he understands that his is the lost case. There is no way Bhattarai can challenge Prachanda. Even if he tries, it would not be consequential and only make Prachanda’s work easy. He must have realised that hitherto Prachanda kept him in good term to resist hardliners. With the hardliners, Bhattarai’s relevance in the party too had gone.

V.S.

(First published in the Citizen, 8 May 2014)

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क्यों हारे माओवादी

Posted by chimeki on March 8, 2014

Courtesy: BBC News

Courtesy: BBC News

नेपाल संविधान सभा चुनाव 2013 के अब तक आए परिणामों से यह बात तय है कि पिछली संविधान सभा की सबसे बड़ी पार्टी एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ेगा. हालांकि माओवादी पार्टी अपनी ‘हार’ को स्वीकार करने से कतरा रही है, लेकिन अब वह उस स्थिति में नहीं है कि दवाब डालकर कोई समझौता करने के लिए दूसरी बड़ी पार्टियों नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) को मजबूर कर सके.

चुनाव में धांधली का आरोप लगाकर हार के गम को गटका तो जा सकता है, लेकिन पार्टी के भविष्य को लेकर उठने वाले सवालों से बचा नहीं जा सकता. यदि धांधली का उसका दावा सही भी है, तो भी कम से कम माओवादी पार्टी को परिणाम को खारिज करने को कोई नैतिक अधिकार नहीं है. इस बार के संविधान सभा चुनाव की जल्दबाजी माओवादी पार्टी को थी. पार्टी के प्रधानमंत्री ने पिछली संविधान सभा को भंग किया, पार्टी के ही अध्यक्ष ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में चुनावी सरकार के गठन में सबसे अहम भूमिका निभाई. यहां तक कि इस सरकार के गठन का प्रस्ताव प्रचण्ड का ही था. इसी पार्टी ने चुनाव बहिष्कार करने वाले समूह की हर मांग की अनदेखी कर उन्हें चुनाव में शामिल होने से रोका. पार्टी की मान्यता यह रही कि यदि मोहन वैद्य ‘किरण’ के नेतृत्व वाली पार्टी ने चुनाव में हिस्सा लिया, तो उसके वोट प्रतिशत में सेंध लगेगी.

चुनाव परिणाम को जितना अप्रत्याशित दिखाने का प्रयास किया जा रहा है, उतना अप्रत्याशित वह है नहीं. माओवादी पार्टी की आंतरिक बैठकों में बार-बार यह बात होती रही कि पार्टी पहाड़ी क्षेत्रों में अपने पुराने प्रदर्शन को नहीं दोहरा पाएगी. पार्टी कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय किया गया कि पहाड़ी क्षेत्र से अधिक तराई पर केन्द्रित होकर चुनाव लड़ा जाए. इसकी वजह यह थी कि पिछले पांच सालों में तराई का मधेस आंदोलन छिन्न-भिन्न हो गया था या कहें कर दिया गया था और पार्टी खुद को मधेसी आंदोलन का जायज उत्तराधिकारी मानकर चल रही थी. पार्टी के कई दिग्गज नेताओं ने पुराने क्षेत्र को अलविदा कहकर तराई से नामाकंन भरा.

अति उत्साह में वह भूल गई कि 1990 से तराई नेपाली कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है और मधेस आंदोलन के अधिकांश नेता कांग्रेस से ही निकलकर आए हैं. जनयुद्ध के काल में भी तराई में माओवादी पार्टी अपनी तमाम कोशिश के बावजूद कभी पैर नहीं जमा सकी थी. इसलिए मधेस आंदोलन के खत्म हो जाने पर वहां कि जनता ने पुरानी परखी हुई पार्टी को ही वोट देना उचित समझा.

उधर पहाड़ी क्षेत्र में जो जनयुद्ध का आधार था, माओवादी पार्टी की लोकप्रियता तेजी के साथ कम हुई. जनयुद्ध के क्रम में शहादत देने वाली इस क्षेत्र की जनता ने बहुत जल्द ही यह समझ लिया कि पार्टी का नेतृत्व नेपाली क्रांति को संविधान सभा से आगे ले जाना नहीं चाहता. पांच सालों में पार्टी के नेतृत्व ही जो तस्वीर उस के सामने बनी वह उस तस्वीर से बिलकुल अलग थी जो उसने जनयुद्ध के समय देखी थी.

साथ चलने, खाने और हंसने-रोने वाला नेतृत्व जनता के समीप जाने से भी कतराने लगा था. नेता सिर्फ उन्ही दुर्गम क्षेत्रों में जाते थे, जहां तक उनका हेलिकाॅप्टर उन्हें ले जाता. अपने संसदीय क्षेत्रों से अधिक नेताओं ने विदेशी भ्रमण किए, जहां वे हमेशा सपरिवार ही जाते थे. इसी जनता ने ऐसा दवाब बनाया कि पार्टी दो हिस्सों में विभाजित हो गई.

जनयुद्ध के लक्ष्य को हासिल करने के दावे के साथ पार्टी के एक बड़े हिस्से ने प्रचण्ड की अध्यक्षता वाली पार्टी को त्याग दिया. इस विभाजन ने पहाड़ी क्षेत्र से एकीकृत माओवादी पार्टी के पैर उखाड़ दिए. पुराने दौर में पार्टी का गढ़ माने जाने वाले रोल्पा के थवाग गांव में एक भी मत न पड़ना पार्टी के कमजोर हो जाने का सबसे बड़ा सबूत है.

इन दो कारणों के अलावा पार्टी की हार का एक और कारण भी है. पिछले समय में पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था. पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णय दक्षिण के पड़ोसी को ध्यान में लेकर लिए जा रहे थे. प्रधानमंत्री पद पर बाबुराम भट्टराई के कार्यकाल में भारत और अन्य देशों के साथ ऐसे समझौते हुए, जो खुद पार्टी की लाइन के विपरीत थे. ये सभी समझौते पार्टी में बिना चर्चा किए लिए गए. कई निर्णयों का पार्टी की मीटिंगों में व्यापक विरोध भी हुआ. जनसेना के शिविरों को नेपाली सेना को सौपें जाने के निर्णय के खिलाफ तो स्वयं पार्टी के कार्यकताओं में मशाल जुलूस निकालकर विरोध किया था.

चुनाव से ऐन पहले पार्टी के टिकट बंटवारे की प्रक्रिया में भी पार्टी के नियमों का पालन नहीं किया गया. पुराने कार्यकर्ताओं की कीमत पर पैसे और रसूख वाले नए लोगों को टिकट दिए गए. सैकड़ों पार्टी कार्यकर्ताओं को चुनाव से पहले ही पार्टी ने नाराज हो गए और चुनाव में किसी भी तरह की सक्रिय भूमिका से खुद को अलग कर लिया.

साथ ही टिकट बंटवारे की अलोकतांत्रिक प्रक्रिया ने पार्टी के अंदर तमाम गुट-उपगुट को पैदा किया, जो अन्य पार्टी के प्रत्याशी से अधिक अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी को हराने के लिए उत्सुक थे. पार्टी नेतृत्व यह भूल गया कि नेपाल में कार्यकर्ता वोट देता है, जनता नहीं. नेपाल का बहुसंख्य वोटर किसी न किसी पार्टी का सदस्य होता है, इसलिए कार्यकर्ता को नाराज करना हमेशा महंगा पड़ता है.

दूसरी तरफ इस बार के चुनाव परिणाम भारत की कूटनीतिक विफलता भी है. प्रचण्ड के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी के कमजोर होने से मोहन वैद्य ‘किरण’ की लाइन ‘स्वतः’ सही साबित हो जाएगी. नेपाल की राजनीति में हाल में कमजोर हुआ भारत विरोधी स्वर एक बार फिर मुखर हो जाएगा और जल्द ही प्रचण्ड एक बार फिर घोर भारत विरोधी नारों के साथ कार्यकताओं को सम्बोेधित करते नजर आयेंगे. इसके अलावा भारत के माओवादियों को भी इस परिणाम से वैचारिक साहस अवश्य प्राप्त होगा. इस पार्टी के अंदर भी वे आवाजें हाशिए पर चली जाएंगी, जो नेपाल का हवाला देकर संसदीय राजनीति की प्रासंगिकता को साबित करने में लगी थीं. बहुत मुमकिन है कि प्रचण्ड समर्थक इस हार का ठीकरा बाबुराम भट्टराई के सर पर फोड़ें और उन्हे पार्टी से चलता होना पड़े.

थोड़ा सा पीछे जाकर देखें कि संविधान सभा का विघटन बाबुराम के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए हुआ था और इसे बहाना बनाकर हार के लिए उन्हें दोषी ठहराया जा सकता है. बाबुराम के जाने से पार्टी के अंदर भारत समर्थक पक्ष कमजोर हो जाएगा. सबसे दिलचस्प बात है कि किरण समूह के पार्टी से अलग होने के बाद बाबुराम पहले से ही कमजोर हैं. पिछले समय में वैचारिक स्तर पर भीषण मतांतर के बावजूद किरण ने हमेशा बाबुराम के खिलाफ किसी भी कार्रवाही का विरोध किया था. अब जबकि उनके खेमे के लोग चुनाव में हार चुके होंगे, तो उनका वैसे भी कोई खास उपयोगिता पार्टी के लिए नहीं होगी.

मोहन वैद्य ‘किरण’ के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी के बारे में जिन लोगों को यह लग रहा है कि चुनाव का बहिष्कार करने के चलते नेपाल की यह माओवादी पार्टी अप्रासंगिक हो जाएगी, उन्हें एक बार फिर सोचने की जरूरत है. उदार लोकतंत्र का सबसे जरूरी सबक यह है कि विरोधी का सबसे अच्छा स्थान संसद है. संसद से बाहर विरोधी अधिक ताकतवर साबित होता है.

किरण माओवादी पार्टी को निषेध कर चुनाव करने के फलस्वरूप नेपाल की राजनीति में वह सबसे बड़ी ताकत बन गई है. साथ ही, आने वाले दिनों में प्रचण्ड से टूटकर इस पार्टी में शामिल होने की प्रक्रिया को तीव्रता मिलेगी और लोकतांत्रिक बदलाव के तमाम दावों की हवा निकल जाएगी. प्रचण्ड की हार वास्तव में भारत की कूटनीति की एक और पराजय है. ऐसा लगता है कि भारत को गलती करने में मजा आता है. फिर दक्षिण एशिया में तो उसने जहां कहीं भी हाथ डाला है, चीजों को बुरी तरह फंसा दिया है. श्रीलंका, मालद्वीव, बांगलादेश और अब नेपाल भारत की कूटनीति के दिवालियेपन के सबूत हैं.

प्रचण्ड के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए आगे का रास्ता लगभग बंद है. वह लौटकर फिर से जनयुद्ध का रास्ता नहीं ले सकती और न ही इस पराजय के बाद खुद को एक रख सकती है. जैसा कि जीत के अतिविश्वास में पार्टी ने अपने ही काडरों को टिकट नहीं दिया और 2008 के बाद पार्टी से जुड़े अधिकांश रसूखदार लोगों को अपने ही कार्यकर्ताओं को विश्वास में लिए बिना टिकट दिया गया.

अब जबकि परिणाम आ गए हैं पार्टी में विद्रोह की आशंका बन रही है. जल्द ही पार्टी कई टुकड़ों में बंट सकती है, लेकिन इससे भी पहले वे लोग जो जीत की आशा के साथ पार्टी में शामिल हुए थे वे पार्टी को अलविदा कह सकते हैं. साथ ही, यदि प्रचण्ड पर हार की नैतिक जिम्मेदारी डालने का प्रयास होता है, तो हो सकता है वे ऐसी मांग करने वालों को पार्टी से खुद ही अलग कर दें.

नेपाल के राजनीतिक भविष्य का अनुमान लगाना हमेशा से ही जोखिम भरा रहा है, लेकिन एक बात तय है कि आने वाले दिनों में वहां का राजनीतिक संकट और गहराएगा. एक बड़ी पार्टी का इस तरह कमजोर होना नेपाल के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए भले ही अच्छा संकेत न हो, लेकिन सामाजिक बदलाव की राजनीति करने वालों के ध्रुवीकरण करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

एकीकृत माओवादी पार्टी की हार ने नेपाली जनता के सामने फिर एक बार स्पष्ट कर दिया है कि आमूल परिवर्तन के उसके लक्ष्य के लिए संसदीय रास्ता बहुत दूर तक साथ नहीं दे सकता है और जब तक नेपाल में भारत परस्त पार्टियों का दबदबा है, तब तक बदलाव की उसकी आशा रेगिस्तान में मृग-मरिचिका के समान है. हर बार आधे अधूरे बदलाव ने उसे वहीं लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से वह शुरुआत करती है. 1950 से लोकतंत्र और सार्वभौमिकता की लड़ाई लड़ रही नेपाल की एक बार फिर छली गई. यह पराजय संघर्ष की उसकी जीजिविषा को खत्म करती है या तेज यह तो भविष्य तय करेगा, लेकिन यह बात तय है कि उसकी लड़ाई का अगला अध्याय एकीकृत माओवादी पार्टी की हार के साथ आरंभ हो गया है.

(23 नवंबर 2013 को जनपथ और जनज्वार में प्रकाशित )

वि.श.

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Nepal: Back to Square One

Posted by chimeki on December 4, 2013

With the defeat of the Maoist party in Nepal’s Constituent Election the hope for a peaceful-democratic solution of its political and social crises too has suffered a dent. Although the results can hardly be considered as surprising, the outcome will, for sure, have a long term impact on the transformational politics of the Himalayan country. The Nepali Congress and Communist Party of Nepal (UML) emerging as the first and the second largest party once again sent Nepal back to square one. This might not impact the making of the Constitution, rather it may even accelerate the process. However, the results will be a setback to those who thought that a Maoist victory through democratic means would bring about a radical transformation of the society.

The arrival of the Maoist in Nepal’s political map was a watershed event. Ten years of ‘People’s War’ thoroughly changed the power equation at the grass-root level. The movement brought in front the issues hitherto considered irrelevant in the country’s political manoeuvring.

However, post 2013 CA election the political situation has gone back to that of the 1990s because it is the same two parties which had then played the major role in the drafting of the Constitution have taken the lead this time too. And there is no reason to believe they have changed their views in the period between 1990 and 2013. Unlike the Constituent Assembly of 2008, the current one is far from being called a representative Assembly. The facts so far available suggest that the women’s representation in the current Assembly has come down to 10 under FPTP which was 29 in 2008. Overall, the Constituent Assembly of 2008 had 47, 196, 192, 191 representatives from dalits, madhesis, janajatis and women respectively. The madhesi parties, at present scenario, will have no more than 40 seats.

With Maoists losing badly their agenda too will be put on the back seat. Oneo f their major demands was that of the land reform. During the people’s war the Maoists redistributed the land to the poor under the slogan ‘land to the tiller’. This was generally considered a step in the right direction because this was essential for economic development of any kind. After joining the mainstream the Maoists tried to legalise the redistribution process but failed due to lack of political support. On the contrary in the name of abiding by the Comprehensive Peace Agreement, signed between the Maoists and the Seven Party Alliance, they were even forced to give back land ceased from the big landlords. While doing so the Maoists had assured that once the Constitution is written they would ensure revolutionary redistribution of the land. It is generally agreed that without the land reform Nepal will never be able to increase productivity.

According to the available data, 26 per cent of the Nepalese population is landless. Moreover, 10 per cent rich peasants of Nepal own 65 per cent of the Nepal’s total agricultural land.

The next important question that the Maoists tried to address was the question of federalism. Nepal, although a small country situated between two giant neighbours, India and China, consists of many nationalities. The Maoists have proposed creation of 11 autonomous provinces based on ethnic identity, language, economic interrelations, infrastructure development, availability of natural resources and administrative accessibility.  Had they succeeded, Nepal would have moved into an era of inclusivity.

Now that the parties which have often discarded the idea of Constituent Assembly for Nepal have become the largest and the second largest parties the whole idea of an inclusive constitution is shattered. The Nepali Congress and the UML, which was then the biggest party in the collation called United Left Front,  which led the 1990’s movement against the absolute Monarchy have gained almost a two-third majority in the current assembly. Then also these two parties broadly negotiated the constitution’s clauses with then King Birendra. To clear any doubt what so ever, the former Prime Minister and senior leader of UML Madhav Nepal has already suggested that the 1990’s constitution might be issued without the clause for monarchy in it! More or less this is also the position of Nepali Congress.

In this complex time, if the two big parties allow themselves to be swayed by numbers then they are not only ignoring the people’s aspiration but also sowing seeds of future troubles. It is now fallen onto the Nepali Congress and the UML to show that they are committed to the aspiration of Nepalese people for failing to do so will not be healthy for the future of the fledgling democracy. Though the Maoists did not repeat their performance but their agenda of inclusive and participatory democracy is still valid. Likewise the major demands of a revolutionary or land reform and representative federalism shouldn’t also be ignored.

There are several reasons for the Maoists defeat. They lost because they tried to negate the consensual politics. They could not hold hands and walk together. Or perhaps they lost because they did not listen to their own constituency. And if the Nepali Congress and UML act as the Maoists did, they too might meet the same fate in the next Constituent Assembly election!

V.S.

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