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नेपाल का संविधान और 40 सूत्रीय मांग

Posted by chimeki on August 3, 2015

Constitution-nepal4 फरवरी 1996 को तत्कालीन संयुक्त जनमोर्चा (नेपाल) की ओर से डाॅ बाबुराम भट्टराई ने प्रधान मंत्री शेर बहादुर देउबा को 40 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा। संयुक्त मोर्चा ने यह भी घोषणा की कि इन मांगों पर यदि सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया तो वे ‘राज्यसत्ता के विरोध में सशक्त संघर्ष के रास्ते में जाने के लिए बाध्य होंगे’। 14 फरवरी 1996 को नेपाल की कम्युनिस्‍ट पार्टी (माओवादी) ने नेपाल की राज्यसत्ता के विरुद्ध जनयुद्ध की घोषणा कर दी।

नेपाल के नए संविधान (मसौदा) की 1996 के उपरोक्त मांग पत्र के साथ तुलना करने पर यह साफ हो जाता है कि नया संविधान उन मांगों को संबोधित करने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है जिसने नेपाल को 10 साल के लिए अनिश्चय, अस्थिरता और अशांति के रास्ते में डाल दिया था।

माओवादियों की 40 सूत्रीय मांग नेपाली समाज में व्याप्त उन अंतरविर्रोधों का लघु मानचित्र है जिनके हल न होने से नेपाल हमेशा एक ऐसे ज्वालामुखी के समान बना रहा है जो छोटे-छोटे अंतराल में फटता रहता है और सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का कारण बनता है।

नेपाल में एक नए संविधान का बन जाना कोई ऐतिहासिक महत्व की घटना नहीं है। 1950 के बाद से नेपाल के वर्तमान संविधान को मिलाकर कुल छह संविधान बन चुके हैं। नेपाल का सबसे पहला संविधान 1951 (अंतरिम) में बना, उसके बाद 1959, 1962, 1990 और 2007 (अंतरिम) में नेपाल में संविधान जारी हुए। इस अल्प अवधि में इतने संविधानों का जारी होना यह बताता है कि नेपाली समाज में व्याप्त अंतर्विरोधों का समाधान किए बिना शांति, स्थिरता और विकास की आशा नहीं की जा सकती। संविधान का निर्माण भावनाओं में बह कर नहीं किया जा सकता। यह किसी के अंहकार की तुष्टि का साधान नहीं है। संविधान का निर्माण वस्तुपरक स्थिति के ठोस मूल्यांकन के आधार पर ही हो सकता है। नेपाल के वर्तमान संविधान में इन सारे मूलभूत सिद्धांतों की अवहेलना की गई है। अंततः उसने उन कारकों को पुनः मान्यता प्रदान कर दी है जो नेपाल को बार-बार अराजकता, अस्थिरता और अशांति की ओर धकेल देते हैं। नेपाली समाज का छोटा मध्यम वर्ग और सम्पन्न वर्ग चाहे जितना ही ईमानदारी से शांति, स्थिरता और विकास की बात करता रहे, यह तब तक संभव ही नहीं है जब तक यह वर्ग व्याप्त अंतर्विरोधों को हल करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाता और बहुसंख्यक गरीब आबादी को यह अहसास नहीं दिलाता कि देश हित की उसकी दलीलों में उनका भी हित शामिल है।

नेपाल को एक स्वतंत्र देश से अर्ध-उपनिवेश और अब नव-उपनिवेश की स्थिति तक पहुंचाने में नेपाल पर समय-समय पर लादी गई असमान संधियां एवं समझौतों की बड़ी भूमिका है जिसमें सबसे प्रतिक्रियावादी संधि भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुई शांति और मैत्री संधि ही है। इस संधि ने नेपाल के अर्ध-औपनिवेशिक चरित्र को मजबूत किया।[1]  इसलिए 1950 के बाद नेपाल में जितने भी छोटे-बड़े आंदोलन हुए उन सबकी प्रमुख मांग इस संधि को खारिज किया जाना था। 1996 में माओवादी द्वारा प्रस्तुत 40 सूत्रीय मांग की पहली मांग इस संधि को निरस्त करना था। वर्तमान संविधान में इस दिशा में कोई ठोस आश्‍वासन नहीं है।

एक अध्ययन के अनुसार, नेपाल की 65 प्रतिशत जमीन पर 10 प्रतिशत सम्पन्न सामंत वर्ग का अधिकार है। नेपाल में 8 प्रतिशत लोग पूरी तरह से भूमिहीन हैं और 65 प्रतिशत गरीब किसानों के हिस्से में मात्र 10 प्रतिशित भूमि है।[2] इसलिए नेपाल की बुनियादी जरूरत ठोस भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू करना है। भूमि सुधार कार्यक्रम को सख्ती के साथ लागू किए बिना बहुसंख्यक जनता के हित में भूमि संसाधन का दोहन नहीं हो सकता। वर्तमान संविधान में वैज्ञानिक भूमि सुधार करने की बात तो है लेकिन भूमि के वितरण पर खामोशी है। साथ ही अनुपस्थित भू-स्वामित्व को केवल निरुत्साहित करने की बात की गई है। इस संबंध में स्पष्ट दृष्टिकोण का अभाव बहुत भ्रामक है। साथ ही 40 सूत्रीय मांग में गरीब किसानों के लिए पूर्ण रूप से कर्ज माफी की बात की गई थी लेकिन संविधान ने इस पर आंखें बंद कर ली हैं।

40 सूत्रीय मांग में गोर्खा भर्ती केन्द्रो को बंद करने की मांग की गई थी। इसका उद्देश्य उस घृणित परंपरा का अन्त करना था जिसके कारण नेपाली जनता को दूसरे देशों की जनता के आंदोलनों को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह असभ्य और मानवता के खिलाफ है। आज ही नहीं ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौर से ही ऐसा हो रहा है। 1857 में भारत में हुए अंग्रेज विरोधी संघर्ष में नेपाली सैनिकों का प्रयोग किया गया। इसके अतिरिक्त पंजाब, कश्मीर, अफगानिस्तान, लैटिन अमेरिका में भी नेपाली सैनिकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। वर्तमान संविधान इस पंरपरा को बनाए रखता है।

2005 के अध्यन के अनुसार मात्र काठमांडू में 31 हजार से अधिक संपत्तिहीन लोग हैं जो झुग्गियों में रहते हैं। पूरे नेपाल में यह संख्या कई गुणा अधिक है। 40 सूत्रीय मांग में इन लोगों के लिए उचित व्यवस्था की मांग थी। साथ ही यह भी उल्लेख है कि बिना विकल्प के इन लोगों की बेदखली नहीं होनी चाहिए। लेकिन मसौदा संविधान कानून के अनुसार बेदखली को वैधानिकता प्रधान करता है।

इसके अलावा भारत नेपाल बीच की खुली सीमा को नियंत्रित एवं व्यवस्थित करने पर भी संविधान में कुछ नहीं कहा गया है।

40 सूत्रीय मांग की ऐसी अनेक बातें हैं जिसे वर्तमान संविधान में पूर्ण रूप से निषेध कर दिया गया है। 40 सूत्रीय मांग में नेपाल की सभी भाषाओं को समान अवसर और सुविधा देने की बात है लेकिन वर्तमान संविधान में नेपाली को ही सरकारी कामकाज की भाषा का दर्जा दिया है। इस तरह लाखों गैर-नेपाली भाषाई नागरिकों को हाशिये पर धकेल दिया गया है।

माओवादियों की मांग थी कि नेपाल के सभी नागरिकों के लिए निशुल्क और वैज्ञानिक स्वास्थ सेवा एवं शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। वर्तमान मसौदा संविधान शिक्षा और स्वास्थ सेवा के निजीकरण को संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देता है। इस तरह यह शिक्षा और स्वास्थ्‍य के नाम पर होने वाली लूट को चुनौती देने तक को आपराधिक अथवा गैरकानूनी बना देता है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि 1996 में प्रस्तुत माओवादियों की 40 सूत्रीय मांग को अंततः यह संविधान खारिज कर देता है जो जनयुद्ध के शुरू होने और विस्तार करने का महत्वपूर्ण कारण था।

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[1] संधि को ठीक से समझने के लिए नेपाल के तत्कालीन प्रधान मंत्री मोहन शमशेर और भारतीय राजदूत सी पी नारायण सिंह द्वारा हस्ताक्षरित ‘लेटर आॅफ एक्सचेन्ज’ का अध्ययन आवश्यक है।

[2] बाबुराम भट्टराई, पोलिटिको-इकोनोमिक रैशनैल आॅफ पीपुल्स वाॅर इन नेपाल

वि.श.

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नेपाल में गाय : पवित्र जीव से राष्ट्रीय पशु तक

Posted by chimeki on August 3, 2015

Gaijatralनेपाल के नए संविधान में भी गाय को राष्ट्र पशु स्वीकार किया गया है। वैसे 1962 से ही नेपाल का राष्ट्रीय जानवार गाय है। यह इसलिए कि 1962 के संविधान में ही पहली बार नेपाल को राजसी हिन्दू राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया गया था। इससे पहले नेपाल में गाय एक पवित्र जानवर था। अधुनिक नेपाली राष्ट्रवाद का जन्म भी इसी समय शुरू हुआ। राजा महेन्द्र ने हिन्दू धर्म को नेपाली राष्ट्रवाद का रूप दिया और गैर हिन्दू आबादी का जबरन हिन्दूकरण करना शुरू किया। राजा महेन्द्र ने एक देश, एक वेष, एक भाषानेपाल की तमाम राष्ट्रीयताओं पर लागू किया। यह अनायास नहीं है कि नेपाली इतिहास के ठीक इसी बिन्दु पर नास्तिक माने जाने वाले कम्युनिष्ट दल नेपाली राजनीति के रंगमंच पर स्थापित होना शुरू हुए।

नेपाल के संदर्भ में गाय का सवाल मात्र एक जानवर का सवाल नहीं है बल्कि यह इतिहास के उस कालखण्ड से जुड़ा है जब वर्तमान नेपाली भू-क्षेत्र में हिन्दू रियासतें स्थापित होना शुरू हुईं। भारत में इस्लामिक सत्ताओं के विस्तार और बढ़ते प्रभाव ने हिन्दू राजाओं को पहाड़ों की और ढकेल दिया। इन लोगों ने पहाड़ों में कई छोटे छोटे राज्यों की स्थापना की। बाद में गोर्खा राज्य के राजा पृथ्वीनारायण शाह ने इन्हीं राज्यों का एकीकरणकरके आधुनिक नेपाल राज्य का निर्माण किया। गोर्खा नाम संस्कृत शब्द गौरक्षा से आया है। इसलिए जब गाय को धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र का राष्ट्रीय पशु माना जाता है तो तमाम भलमनसाहत के बावजूद हिन्दू राष्ट्र के प्रवेश का चोर दरवाजा खुला रह जाता है।

यह दलील दी जा सकती है कि नेपाली राजनीति को भारतीय ढांचे में रख कर नहीं देखना चाहिए या इसका अध्ययन भारतीय संवेदना के साथ नहीं होना चाहिए। यह भी कहा जा सकता है कि शयद नेपाल के लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता। यह सच है कि नेपाल के लोग गाय के सवाल पर वैसी बहस नहीं कर रहे हैं जैसी बहस भारतीय संविधान के निर्माण के वक्त हो रही थी। भारत की संविधान सभा में बहस करते वक्त डा अम्बेडकर कहते हैं कि हम पिछले सात दिनों से इस (गाय) पर बहस कर रहे हैं। नेपाल की संविधान सभा ने एक मिनिट भी इस पर चर्चा हुई हो ऐसा प्रमाण नहीं मिलता।

लेकिन जरूरी बात इस बात की जांच करना है कि नेपाल के संविधान निर्माता गाय को कैसे देखते हैं। जब वो गाय को राष्ट्रीय पशु कहते हैं तो गाय के कौन से गुणों को चिन्हित करते हैं। बेशक कृषि प्रधान देश में गाय एक उपयोगी पशु है। लेकिन गाय की उपयोगिता सिर्फ दूध, बैल पैदा करने और गोबर देने में नहीं है। गाय प्रोटीन (मांस) का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। यहीं वह पेंच है जिसकि पड़ताल किए बिना गाय को सवंधिान को चरने के लिए नहीं छोडा जाना चाहिए था।

नेपाली पाठ्यक्रम की पाठ्य पुस्तकों में गाय पर सामग्री का अध्ययन करने से संविधान और नीति निर्माताओं की जिस मानसिक स्थिति का संकेत मिलता वो वाकई देश के धर्मनिर्पेक्ष भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। पाठ्यक्रम में जो सामग्री है उसके अनुसार गाय राष्ट्रीय पशु है क्योंकि वह दूध देती है और हिन्दूओं के लिए पूज्य है। यदि पाठ्यक्रम यह भी संदेश होता कि गाय के दूध के साथ उसका मांस भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत है तो भी शायद गाय का विरोध नहीं करना पड़ता। गाय और हिंदू धर्म का गहरा संबंध है। एक तरह से ये दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक हैं। डा अम्बेडकर ने गौ मांस खाने वाले और न खाने वालों को छूत और अछूत की विभाजन रेखा माना है।

राष्ट्रीय प्रतीक क्या है? किसी पशु, पक्षी या चिन्ह को राष्ट्रीय घोषित करने के क्या माने होता हैं? इन सवालों के कई जवाब हो सकते हैं लेकिन सबसे तार्किक जवाब यही लगता है कि राष्ट्रीय प्रतीक या चिन्ह राष्ट्र के इतिहास और संस्कृति के वे चिन्ह होते हैं और इनका चुनाव करते समय लोग यह तय करते हैं कि वे राष्ट्र को किस संस्कृति और इतिहास के किस हिस्से से जोड़ कर देखना चाहते हैं। राष्ट्रीय प्रतीकों का चुनाव समावेश और बहिष्कार की एक साथ होने वाली प्रकृया हैं। और ठीक इन्ही बिन्दु पर देश का चरित्र स्पष्ट होता है। इसके साथ यदि नेपाल को उसके इतिहास और दक्षिण एशिया के संदर्भ से अलग करके देखा जा सकता तो भी गाय कोई बहुत गंभीर बहस को पैदा नहीं करती। लेकिन अफसोस कि नेपाल को दक्षिण एशिया और उसके इतिहास के साथ ही समझा जा सकता है। इसलिए यहां गाय एक राष्ट्रीय पशु से बड़कर एक राष्ट्रीय चुनौती है जिसने अक्सर राष्ट्रीय आपदा को जन्म दिया है।

जैसा कि उपर कहा गया है भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भी गाय पर लंबी बहस की। संविधान सभा में गौ हत्या पर निर्पेक्ष (ब्लैंकिट) प्रतिबंध लगाने की मांग भी हुई लेकिन डा अम्बेडकर ने इस प्रतिबंध के पक्ष में धार्मिक आस्था वाली दलील को अस्वीकार कर आर्थिक दलीलों को स्वीकार किया और संशोधन में यह रखा गया कि राज्य उपयोगी जानवरों की हत्या पर रोक लगाने का प्रयास करेगा। इस तरह संविधान निर्माताओं ने एक बड़ी आबादी को राहत दिलाई।

द किंग एण्ड काउः आॅन ए क्रूशीयल सिम्बल आॅफ हिन्दूआईजेशन इन नेपाल में एक्सिल माईकल्स् लिखते हैं कि नेपाल में गाय का प्रयोग कतिपय राष्ट्रीय समूहों और दुर्गम क्षेत्रों के एकीकरण और उन पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए किया गया। वे इसी निबंध में लिखते है कि शाह राजाओं और राणाओं ने नेपाल राज्य की विचारधारा को गौ हत्या पर प्रतिबंध से जोड़ कर देखा। 1854 के मुल्की ऐन अथवा सिविल कोड में कहा गया है कि, ‘कलयुग में यही एक मात्र राज्य है जहां गाय, स्त्री और ब्राह्मण की हत्या नहीं हो सकती।

1939 में जब तत्कालीन राणा प्रधान मंत्री महाराजा जुद्धा शमशेर ने कलकत्ता का भ्रमण किया तो तमाम भारतीय समाचार पत्रों ने उन की यह कह कर प्रशंसा की कि वे एक ऐसे देश के प्रतिनिधि हैं जो हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक है। हिन्दू आउटलुक नाम की पत्रिका में छपे एक लेख में जुद्धा शमेशर की प्रशंसा करते हुए लेखक ने लिखा है, ‘एक पवित्र हिन्दू की तरह महाराजा महान गौ पूजक हैं

उपरोक्त परिप्रेक्ष में गाय को इस आसानी से राष्ट्रीय पशु स्वीकार कर लेना चिंतनीय है। एक धर्मनिर्पेक्ष राज्य किसी ऐसे जानवर को राष्ट्रीय पशु की मान्यता कैसे दे सकता है जिसके हवाले से नेपाली की बहुसंख्य जनता का उत्पीड़न किया जाता रहा है। एक अध्ययन के अनुसार गौ हत्या के मामले में सारे आरोपी जनजाति, पिछड़ी मानी जाने वाली हिन्दू जातियां या अल्प संख्यक समुदाय से हैं। इसलिए गाय का राष्ट्रीय पशु हो जाना नेपाल को आज ठीक उसी बिन्दु पर खड़ा कर दे रहा है जहां से असंख्य विद्रोहों का सूत्रपात हुआ था।

वि.श.

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