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भारतीय मध्यम वर्ग और पाकिस्तानी कलाकार

Posted by chimeki on October 6, 2016

पाकिस्तान में सिनेमा हॉल में भारतीय फिल्म

पाकिस्तानी सिनेमा हॉल में भारतीय फिल्म

भारत में पाकिस्तानी कलाकारों पर चल रही बहस ने एक बार फिर भारत के मध्यम वर्ग के कनफ्यूजन को सामने ला दिया है। आजादी के बाद से अब तक यह वर्ग अपनी गति को समझ पाने में नाकाम रहा है। पुरानी घड़ी के पेन्डोलम की तरह भारतीय मध्यम वर्ग दांय-बांय हिलता रहा लेकिन कहीं ठहर नहीं पाया।

उसके सपने का भारत आर्थिक रूप से संपन्न है लेकिन दूसरी ओर उसने संस्कृति के नाम एक ऐसे अलगाववादी रास्ते को पकड़ लिया है जो भारत में उपलब्ध संसाधनों को देखते हुए उसे समृद्धि की चकाचौंद दिखाने के लिए अपर्याप्त है।

वर्तमान समय में राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि का जरिया वैश्विक व्यापार है। इसके बिना आर्थिक समृद्धि की कल्पना मात्र असंभव है। लेकिन भारतीय मध्यम वर्ग जो दुनिया का सबसे निर्धनतम मध्यम वर्ग है एक खतरनाक अलगाववादी विचारधारा की जकड़ में कैद है। धर्म आधारित राष्ट्रवाद राष्ट्रीय समृद्धि के लिए आवश्यक वैश्विक संबंधों के लिए बड़ा खतरा है और इस कारण तमान देशभक्तिीपूर्ण नारों के बावजूद यह राष्ट्रीय हित के विपरीत एक राष्ट्रघाती विचारधारा है। विश्व में जहां कहीं इसका प्रयोग हुआ वहां आर्थिक समृद्धि के पैमाने पर यह प्रयोग बुरी तरह असफल रहा। यह बात ईरान के मुल्लाओं से लेकर म्यंमार के जून्टा शासन को भी समझ आ चुकी है। लेकिन भारतीय मध्यम वर्ग अभी भी इसे अपने हित में मान कर चल रहा है।

पाकिस्तानी कलाकारों का भारतीय फिल्मों में काम करना पाकिस्तान से अधिक भारतीय अर्थतंत्र के लिए फायदेमंद है। पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों के प्रचार के लिए इन कलाकारों का होना ज़रूरी है। उनकी बदोलत ये फिल्में पाकिस्तान में अच्छा व्यापार करती है और यह देश के फिल्म उद्योग के लिए फयदेमंद सौदा है।

अंग्रेजी समाचार पत्र इण्यिन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल पाकिस्तान में हर साल 50 के आसपास बॉलीवुड pakistan_indian_2फिल्मों का प्रदर्शन होता है। ये फिल्में करोड़ो का व्यापार करती है। पाकिस्तान, भारतीय फिल्मों का दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार है। 2006 में लगभग 40 साल बाद पाकिस्तान ने भारतीय फिल्मों पर लगे प्रतिबंद को हटाया। आमिर खान अभिनीत ‘थ्री इडीअट’ ने पाकिस्तान में 5 करोड़ का व्यापार किया, शाहरूख खान की ‘माई नेम इज़ खान’ ने 5.25 करोड़ का और सलमान खान की फिल्म ‘बॉडीगार्ड’ ने 6 करोड़ का व्यापार किया। इसके बाद आईं तमाम फिल्मों ने भी अच्छा व्यापार किया। वर्ष 2007 में प्रतिबंध के बाद पाकिस्तान में पहली फिल्म जॉन अब्राहम की ‘गोल’ थी जो 7 स्क्रीन में दिखाई गई। बाद की ‘थ्री इडीअट’ 22 स्क्रीन में और ‘डॉन टू’ 38 स्क्रीन में।

भारतीय फिल्मों ने भी पाकिस्तान फिल्म उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण काम किया। अच्छी फिल्मों ने दर्शकों में फिल्म देखने की आदत का विकास किया और 2006 से अब तक पाकिस्तानी फिल्म उद्योग 300 गुणा बढ़ा।

ऐसा नहीं है कि मात्र पाकिस्तानी कलाकार ही भारतीय सिनेमा में काम करते है। भारत के कई नामी सिने कलाकार भी पाकिस्तानी फिल्मों में काम पा रहे है। एक तरह से ये आदान प्रदान दोनों ही देशों के अर्थिक हित में है।

इसलिए यह आवश्यक है कि भारतीय मध्यम वर्ग अपनी आँखों में लगे धर्माधारित राष्ट्रवादी चश्में को हटा कर देश की आर्थिक उन्नती पर विचार करे क्योंकि देश की आर्थिक समृद्धि उसके हित में है। यह उसकी बढ़ती अनिश्चितता और तनाव के अंत की पहली शर्त है।

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