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युक्रेनः नारंगी क्रांति से रूसी बंसत तक

Posted by chimeki on June 29, 2014

Courtesy: China Daily

Courtesy: China Daily

युक्रेन का संकट 20वीं सदी में अपने प्रभाव को स्थापित करने के लिए युरोपीय देशों में होने वाले राजनीतिक उठापटक का वर्तमान संस्करण है। इस संकट ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान एकाधिकारवादी पूंजीवाद अथवा साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था अपने अंतर्विरोधों को तथाकथित राजनयिक लोकाचार एवं वार्ता के जरिए हल करने में असफल हो चुकी है। अंततः 19वीं और 20वीं सदी की उसी युद्ध उन्माद और भाषा का सहारा लेना पड़ रहा है जिसके अस्तित्व को नकारना पिछले दो दशक और खास तौर पर 2002 के बाद अकादमिक और राजनीतिक विमर्श में एक फैशन था।

पिछले दो दशकों में अफगानिस्तान और ईराक में अमेरिका के नेतृत्व वाले उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के हमले और बलात् सत्ता परिवर्तन एवं युरोप, अफ्रिका एवं एशिया के देशों में उसके द्वारा प्रायोजित ‘रंगीन’ क्रांतियां और ‘बसंत’ का हवाला देकर न जाने कितनी बार यह दिखाया-बताया जाता रहा था कि अंतर साम्राज्यवादी होड़ या प्रतिस्पर्धा अतीत की बात है और यह दौर ‘मिलाकर’ चलने का है। लेकिन युक्रेन के घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पूंजीवादी व्यवस्था अपने अंतर्विरोधों को शांतिपूर्ण तरीके से हल करने में असमर्थ है। यह व्यवस्था अपने मूल में अंतर्विरोधों का एक ऐसा सामूच्य है जहां संतुलन अप्रकृत है और टकराव नैसर्गिक।

1951 में जोसफ स्टालिन ने ‘सोवियत संघ की आर्थिक समस्याएं’ में जिस बात को बड़े साफ तौर पर लिखा था युक्रेन का घटनाक्रम उस बात की शानदार पुष्टि है। स्टालिन ने लिखा थाः ‘(विश्व युद्ध के बाद) बाहर से देखने में लगता है कि ‘सब कुछ ठीक चल रहा है’, अमेरिका पश्चिम युरोप, जपान और अन्य पूंजीवादी देशों को पाल रहा है, जर्मीनी(पश्चिमी), ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और जपान उसकी गिरफ्त में हैं और वे उसके हर आदेश को मानने के लिए विवश हैं। परंतु ऐसा मानना भूल होगी कि ‘अनन्त काल’ तक ‘सब कुछ ठीक चलता’ रहेगा और ये देश अमेरिका के प्रभुत्व और उत्पीड़न बर्दाशत करते रहेंगे।’

युक्रेन में जारी संकट और उसके समानंतर चलते घटनाक्रम स्टालिन की ‘भविष्यवाणी’ के दिन के करीब आ जाने के है। क्राइमिया में रूस के कदम पर भले ही युरोप में अमेरिका के सहयोगी नाटो देशों ने विरोध जताया हो लेकिन रूस के खिलाफ अमेरिका द्वारा सुझाए ‘कड़े’ कदमों को न अपना अथवा अपना में देर कर युरोप के देशों ने यह साफ कर दिया है कि युरोप के अंतरिक मामलों में अमेरिका की दखलअंदाजी के दिन लद गए हैं और युरोप अमेरिका से मुक्त होने के लिए रूस से कार्यगत एकता करने को भी तैयार है। युक्रेन के संकट का तत्कालिक समाधान जो भी निकले दीर्घकालीन तौर पर यह युरोप के भूराजनीतिक मंच से अमेरिका की विदाई का ही संकेत है।

युक्रेन का वर्तमान संकट, जो वहां की निर्वाचित सरकार की बेदखली से आरंभ हुआ, एक तरह से नवंबर 2004 और जनवरी 2005 के मध्य में हुई ‘नारंगी’ क्रांति की तार्किक परिणीती ही है। 21 नवंबर 2004 को राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों की घोषणा से ठीक पहले युक्रेन में विरोध प्रदर्शन आरंभ हो गए थे। प्रदर्शनकारियों का मानना था कि रूस के पक्षधर माने जाने वाले विकटर यानूकोविच के पक्ष में चुनाव में बड़े पैमाने में धांधली की गई है। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व युरोपीय संघ के प्रति नर्म रुख रखने वाले और रूस के विरोधी माने जाने वाले विकटर यूशचेन्को कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों के दवाब में 26 दिसंबर 2004 को युक्रेन की सर्वोच्च अदालत ने पुनः मनगणना का आदेश दिया और 52 प्रतिशत मतों के साथ विकटर यूशचेन्को राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित कर दिए गए। इस के साथ ही युक्रेन की ‘नारंगी’ क्रांति का भी अंत हो गया।

नवंबर 2004 में जब सरकार विरोधी प्रदर्शन व्यापक हुए तो लग रहा था कि युक्रेन में विदेशी तकतों मुख्य रूप से रूस के प्रभाव के अंत की शुरूआत है। रूस के लिए यह उस खतरे की आहट थी जिसे वह लालच और भय का प्रयोग कर सोवियत संघ के विघटन के बाद से अब तक टालता रहा था। 1990 में सोवियत संघ के विभाजन के बाद स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आने वाला युक्रेन रूस के लिए युरोप का सेतु है जिस पर से युरोपीय बाजार में रूस प्रकृतिक गैस का व्यापार करता है। इस सुविधा के लिए रूस युक्रेन को न केवल सस्ता गैस उपलब्ध कराता है बल्कि वहां के शासक वर्ग धन मुहैया करा कर अपने पक्ष में बनाए भी रखता है। दूसरी और युक्रेन सामरिक एवं रणनीतिक दृष्टी से भी रूस के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण देश है। क्राइमिया में रूस का प्रसिद्ध बैल्क फ्लीट समुद्री बेढ़ा है जिसे रूस द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अपने क्षेत्र में नाटो के प्रभाव के विस्तार को रोकने के लिए आवश्यक मानता आया है।  ठीक इसी तरह युक्रेन नाटो के लिए ऐसा क्षेत्र है जिसे अपने प्रभाव में करने से वहां रूस पर पूरी तरह हावी हो सकता है। युक्रेन में अपने प्रभाव का विस्तार कर वह रूस के व्यापारिक मार्ग पर अपना कब्जा जमाने की मंशा रखता है।

1990 के बाद पूर्व सोवियत देशों-गणराज्यों में नाटो के तेजी से विस्तार किया है। यह उस आश्वासन के खिलाफ है जो नाटो देशों ने सोवियत संघ विघटन के बाद रूस को दिया था जिसमें यह सहमति व्यक्त की गई थी कि नाटो ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जो क्षेत्र में रूस के प्रभाव एवं स्वतंत्र अस्तित्व के लिए खतरा हो। यह एक प्रकार से तर्कपूर्ण भी था क्योकि तब यह माना जा रहा था कि सोवियत संघ के विघटन के बाद युरोप में नाटो की भूमिका भी स्वतः कम हो जाएगी। 1949 में इस संगठन के निर्माण का मकसद युरोप एवं अन्य युरोप और अमेरिका के प्रभाव वाले देशों में सोवियत संघ के विस्तार को रोकना था। लेकिन 1990 के बाद जल्द ही यह बात साफ हो गई कि सोवियत संघ के विघटन के बाद भी नाटो अपने प्रभाव क्षेत्र को विस्तार देने की मंशा रखता है। यह बात नाटो के लिए इसलिए भी जरूरी थी कि वह सोवियत संघ का विघटन मात्र न चाह कर रूस को ही पूरी तरह कमजोर कर देना चाहता था ताकि भविष्य में उसे इस देश से किसी भी तरह की चुनौती न मिल सके। पिछले समय में रूस की नाराजगी के बावजूद, विघटन के बाद स्वतंत्र अस्तित्व में आए 14 देशों में से तीन देशों एस्टोनिया, लाटविया और लुथानिया, ने नाटो की सदस्यता ली।

पिछले कुछ समय से युरोप में नाटो और युरोपीय संघ के विस्तार को रोकने के लिए रूस ने युरेशिया आर्थिक संगठन को गठन किया और इसे मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। इस संगठन का घोषित लक्ष्य पूर्व सोवियत संघ देशों को एक मंच में लाना है। रूस में प्रकृतिक गैस की प्रचुरता और तेल के भण्डार रूस के इस प्रयोग की सफलता की गारंटी है। पिछले दशक में गैस और तेल की ताकत के सहारे रूस ने न सिर्फ नए क्षेत्रों जैसे चीन और लातिन अमेरिका में अपना विस्तार किया है बल्कि विघटन के बाद उसकी पकड़ से दूर हो चुके देशों को भी अपने करीब लाने में सफलता पाई है। इस कारण युरेशिया आर्थिक संगठन न केवल युरोपीय संघ बल्कि नाटो के लिए भी एक चुनौती है। एशिया एवं अफ्रिका के देशों में इस के विस्तार की आशंका-संभावना ने अमेरिका के विश्व प्रभुत्व के मंसूबों को ही कमजोर कर दिया है। युक्रेन को अपने साथ मिला कर नाटो को एक बड़ी जीत की उम्मीद थी।

वर्ष 2004 से युक्रेन में तेजी से बदलते घटनाक्रम ने रूस के लिए यह स्पष्ट कर दिया था कि जल्द ही युक्रेन भी नाटो के साथ मिल जाएगा। युक्रेन 15 स्वतंत्र देशों में रूस के बाद सबसे बड़ा देश है। 1990 में स्वतंत्र होने के साथ ही युक्रेन की सत्ता की बागडोर आलगार्क अथवा ऐसे समुदाय के हाथ में आई जिन्होने सोवयितकालीन उद्योग को अपने राजनीतिक प्रभाव के जरिए हासिल किया था और रातोरात हजारों करोड़ की सम्पत्ति के वारिस बन गए थे। सोवियत विभाजन के बाद स्वतंत्र अस्तिव में आए 15 देशों में यह आम है। राजनीति इस समुदाय के लिए अपनी पूंजी को सुरक्षित रखने और देश की लूट को जारी रखने का जरिया है। इस वर्ग ने युक्रेन के भूराजनीतिक महत्व का अपने हितों को साधने में बखूबी इस्तेमाल किया। कभी युरोपीय संघ की और झुक कर तो कभी रूस से हाथ मिला कर अपने हितों को साधने के लिए युरोप भर में युक्रेन का आलगार्क समुदाय बदनाम है।

पिछले कुछ वर्षो में युक्रेन के इस शासन वर्ग के भीतर के अंतर्विरोध सतह पर आने लगे थे और वह रूस के पक्षधर और युरोपिय युनियन के पक्ष धरों के बीच में बंट गया था। यह बटवारा किसी प्रकार के ‘देश प्रेम’ प्ररित नहीं था और न ही यह राष्ट्रीय और दलाल पूंजीपतियों के बीच का अंतर्विरोध था। बल्कि यह युक्रेन के रूस और युरोपिय संघ एवं नाटो के दलालों का अंतर्विरोध है। इस अंतर्विरोध ने युरोपिय संघ और अमेरिका को देश की राजनीति में सक्रिय दखल की जमीन प्रदान की।

हालांकि वर्ष 2005 की ‘नारंगी क्रांति’ युक्रेनी लोगों के अपने शासक वर्ग के प्रति रोष की अभिव्यक्ति थी लेकिन विकल्पहीनता के दौर में इसका नेतृत्व युरोपीय संघ के पक्षधरों के हाथ में ही रहा। उसने लोगों के भीतर इस बात का संप्रेष्ण करने में सफलता पाई की युक्रेन की समस्याओं का समाधान युरोपीय संघ में शामिल होने में है। 2005 में नए शासक वर्ग ने सत्ता हाथ में लेते ही युरोपीय संघ की में शामिल होने की इच्छा प्रकट की और युरोपीय संघ ने इस बात का समर्थन किया। रूस ने तभी यह स्पष्ट कर दिया था कि युक्रेन का यह कदम क्षेत्र में रूसी हितों के खिलाफ है और अपने हितों की रक्षा के लिए वह सक्रिय हस्तक्षेप का विकल्प खुला रखेगा। इसके बाद दवाब बनाने के लिए रूस ने युक्रेन पर गैस को बाजार मुल्य पर खरीदने, जो उसके द्वारा अदा किए जाने वाले मूल्य से दुगना था, और बकाया रकम पर जुर्माना लगाने की बात की। युक्रेन को अपने साथ करने की जल्दबाजी में युरोपीय संघ ने इस कर्ज को पटाने की जिम्मेदारी अपने उपर ले ली। युरोपीय संघ ने उस पर ऐसी शर्ते मानने का दवाब भी बनाया जोे युक्रेन को ग्रीस की तरह बना देता और वहां की जनता को मिलने वाली सुविधाओं को आॅस्टेरिटी अथवा मितव्ययिता के नाम पर खत्म कर देता।

युरोप की इस योजना पर उस वक्त पानी फिर गया जब 2010 के चुनाव में युक्रेन की जनता ने युरोपीय संघ की पक्षधर पार्टी को  पराजित कर दिया। यह युरोपीय संघ और खास कर अमेरिका के लिए बड़ा जटका था। इस के बाद साम-दाम का ऐसा खेल आरंभ हुआ जिसने हाल तक आते आते युक्रेन के टुकडे़ कर दिए। इन चार वर्षो में विश्व के शक्तिशाली देशों ने अपनी क्षेत्रीय प्रभुता की मंशा के तहत युक्रेन की राजनीति में खुल कर दखल दिया और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता एवं जनतंत्र की तमाम बुर्जुआ सिद्धांतो को भुला दिया।

तो एक तरह से युक्रेन के इस संकट ने युरोप को अनचाहे ही अमेरिकी प्रभाव से मुक्त होने का एक अवसर दे दिया है। अब तक के घटनाक्रम से ऐसा लग रहा है कि युरोप इस मौके का हाथ से जाने नहीं देना चाहता। 2002 के बाद से ही युरोपीय नाटो देशों को महसूस होने लगा था कि नाटो में बने रहना उनके लिए घाटे का सौदा है। 2002 से ही इन देशों अमेरिका के साम्राज्यवादी प्रयोगों में हिस्सेदारी करनी पड़ रही है। यह कीमत उसके लिए बहुत अधिक है। युक्रेन संकट के बाद रूस द्वारा क्राईमिया को अपने देश में मिला लेने की घोषणा और फिर एक के बाद एक युक्रेन के अन्य भागों में विद्रोह और युक्रेन की वर्तमान सरकार का हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से युरोप के लिए एक साथ बहुत से काम आसान हो गए हैं। एक और इसने बड़े ही नाटकीय अंदाज में युरोप के गले में फंसी एक फांस को निकाल दिया है और 1991 में सोवियत संघ विभाजन के समय ही फसें कुछ मामलों को अपने तार्किक अंत में पहुंचा दिया है। जिस से लगने लगाा है कि आने वाले दिनो में यह युरोप और रूस की एकता की संभावना को और तीव्र करेगा। यह भी बहुत हद तक संभव है कि रूस का प्रभाव युरोप में फैले और अमेरिका के पैर कमजोर हो।

भले ही आज युक्रेन का मामला पेचिदा दिखाई दे रहा हो लेकिन इस उथलपुथल के बाद जब युरोप शांत होगा तो दुनिया दो ध्रुवों में बंट चुकी होगी। यह दो धु्रव चीन और अमेरिका या रूस और अमेरिका न हो कर अमेरिका और युरोप ही होंगे। अमेरिका के लिए यहां से यह संदेश जाता है कि युरोप को अपने मामलों को निबटाने में अमेरिका की आवश्यकता नहीं हैं।

वि. श.

(दस्तक मासिक के मई-जून अंक में प्रकाशित)

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