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भारत के गोरखा कौन हैं

Posted by chimeki on November 26, 2017

भारत में हर अल्पसंख्यक समुदाय जो अपने अधिकार की बात करता है वह आज शक के घेरे में है। इस फेहरिस्त में अब एक नया नाम और जुड़ गया है: भाषाई रूप से अल्पसंख्यक गोरखा समुदाय का। पिछले दो सौ सालों से इस इस देश की सीमाओं की रक्षा करने के लिए यूरोप, अफ्रीका, मध्यपूर्व और खाड़ी देशों में जा कर लड़ने वाले और आजाद भारत की सभी लड़ाइयों में वीरता के उच्च तमगे प्राप्त करने वाले गोरखा लोगआज जब अपने अधिकार को लेकर दार्जिलिंग में संघर्ष कर रहे हैं तो राज्य की त्रिणमूल कांग्रस सरकार उनसे बात कर समाधान तलाशने की जगह उन्हें चीन प्रायोजित आंदोलनकारी ब्रांडकरने में लगी है।

हाल में राज्य का गृह मंत्रालय लगातार गोरखालैंड में चीन की घुसपैठको लेकर चिंता व्यक्त कर रहा है और केन्द्र को इस चिंता से अवगत करने के लिए पत्र लिख रहा है। राज्य सरकार ऐसा माहौल बना की कोशिश में है जिससे आंदोलनकारियों के घोर दमन को राष्ट्रहित में बताकर इस अति संवेदनशील राष्ट्र की आत्मा को जगाया जा सके और दमन को जायज बताया जा सके।

पृथ्क राज्य की मांग को लेकर भारत में लगातार संघर्ष हुए है और गोरखालैंड की मांग कोई अनोखी मांग नहीं है। सन 2000 के बाद भारत में छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तराखंड और तेलंगाना राज्यों का गठन हुआ। महाराष्ट्र में विदर्भ और मध्य प्रदेश में गोंडवानालैंड एवं अन्य स्थानों में भी भाषाई और अन्य आधारों में राज्यों के गठन की माग उठती रहती है जो स्वाभाविक भी है।

छोटे राज्यों के निर्माण से सत्ता का स्वरूप अधिक समावेशी बनता है और जातीय और अन्य ऐतिहासिक कारणों से पीछे रह गए लोगों को विकास की मुख्यधारा में शामिल होने का मौका मिलता है। छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड इसके उदाहरण हैं। सत्ता में लंबे समय से जारी वर्चस्व का टूटना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत होता है। गोरखालैंड आंदोलन भी सामान्यतः इसी बुनियादी समझदारी की अभिव्यक्ति है।

आज जिस भारत के नक्शे को देख कर राष्ट्रवादी लोग भावुक हो जाते हैं उस नक्शे के निर्माण में भारत के गोरखाओं का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इतिहास का अन्याय देखिए कि इस देश की स्मृतियों में उनकी इस भूमिका को भुला दिया और गोरखा को बहादुर’ ‘साब जीजैसे अपमानित करने वाले जुमलों का पर्यायवाची बना दिया गया।

इस लेखक के हाथ में आकाशवाणी के पूर्व अधिकारी स्वर्गीय मणी प्रसाद राई की एक महत्वपूर्ण कृति वीर जातिको अमर कहानीहै जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन में गोरखा समुदाय को लेखक ने अपने निजी प्रयासों और संसाधनों से दर्ज करने की कोशिश की है। 64 अध्यायों वाली इस पुस्तक में भारत के उन गोरखाओं के बारे में बताया गया है जिन्होने आजादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से योगदान किया।

पुस्तक में कप्तान रामसिंह ठाकुर के बारे में बताया गया है कि 15 अक्टूबर 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने रामसिंह ठाकुर को गुरूदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर के जन गण मनको हिन्दी में रूपांतरित कर संगीतबद्ध करने का आग्रह किया। 21 अक्टूबर 1943 को अस्थायी आजाद हिन्द सरकार के गठन के समय शपथ ग्रहण से पूर्व राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने के समय रामसिंह की धुन में कौमी तराना बजाया गया। आजाद भारत के राष्ट्रगान जन गण मनमें इसी धुन का प्रयोग किया गया है।

शायद यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि भारत के जिन भूभाग में आज गोरखा समुदाय का बाहुल्य है उनमें से अधिकांश भूभाग 1815-16 तक गोरखा साम्राज्य का हिस्सा था। धर्मशाला, देहरादून-मसूरी, शिमला और पूर्वोत्तर में दार्जिलिंग और अन्य भाग गोरखा साम्राज्य का हिस्सा थे जो एंगलो-नेपाल युद्ध के बाद अंग्रेज भारत में मिला लिए गए।

इस युद्ध में गोरखाओं की बहादुरी के कायल हुए अंग्रेजों ने हारे हुए गोरखाओं को अपनी सेना में सम्मानित स्थान दिया और 1857 के पहले स्वतंत्रता युद्ध के बाद सेना में उन्हें सिक्ख और अन्य जातियों की तरह जो इस आंदोलन में उनकी वफादार बनी रहीं अधिक सम्मान दिया जाने लगा।

इसलिए गोरखाओं को बाहर से आ कर इस क्षेत्र में बसे लोगों की तरह देखना इतिहास का मजाक उड़ाना है। यह सच है कि नेपाल के नेपालियों में भारत के प्रति अविश्वास है। हाल के दिनों में यह अविश्वास और अधिक बढ़ा है जिसके कुछ वाजिब कारण भी हैं। उस देश की राजनीति में भारत की दखलअंदाजी ने वहां के भारत के विरोधी राष्ट्रवाद को मजबूत किया है लेकिन उसी चश्मे से भारत के मूल निवासी गोरखाओं को देखना शर्मनाक है।

तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए ममता सरकार का गोरखाओं को राष्ट्र की अखण्डता का दुश्मन करार देना अशोभनीय और बेहद गैर जिम्मेदाराना है। ममता बनर्जी लगातार कहती आईं है कि उनकी सरकार निष्पक्ष है और भेदभाव नहीं करती। लेकिन बार बार गोरखा आंदोलन को चीन के साथ जोड़ना, वो भी ऐसे वक्त में जब दोकलम में चीन के साथ भारत का तनाव अपने चरम पर है, उसे एक जाति के खिलाफ खतरनाक षड्यंत्र ही कहा जाएगा।

वि. श.

(जुलाई 2017 में जनज्वार और जनमेल में हिन्दी और नेपाली में प्रकाशित)

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Nepal Constitution Under the Shadow of the Military

Posted by chimeki on October 5, 2016

Over a week has passed since seven policemen and an infant were killed during a Tharu agitation in Tikapur in nepalworkerNepal. It was followed by riots and army deployment in the area. After 10 years the Nepalese Army is out of the barracks to enforce law and order.

Although Nepal today is a Republic, not a bit seems to have changed in the government’s approach towards crisis in Nepal. It’s still looking south for direction. Instead of making a serious effort to reach out to disgruntled groups the Nepal government seems to be in a hurry to promulgate the Constitution in ‘time’ under the military’s shadow. Suddenly extended Constituent Assembly sittings are being held.

The proposed constitution has opened old wounds which have bled Nepal since the 1950s. Lack of foresight coupled with superficial attempts to resolve it has, like always, only deepened the crisis. The standard crisis management method so far has been: first, suppress democratic aspirations, then negotiate and at the end create a bigger problem to make the first look minor or at least unworthy of any serious attention.

Just a brief recall: to counter parliamentarians, erstwhile King Birendra let the Maoists spread through the country, and even held secret talks with them. Later to control the Maoists, King Gyanendra held secret negotiations with China and other European countries and gave them full opportunity to influence Nepal’s internal politics. Then, to make the King listen, the parliamentary parties struck a deal with the Maoists. And in 2006, to subdue the Maoists, the Nepal government under late GP Koirala extended support to the Madhesi Movement.

The current crisis in Nepal too is the result of a lack of wisdom, and levels of connivance, in the current leadership of the ruling parties. In the last three months the Nepali politicians have made two fundamental errors which have fueled mass unrest. First, arose from the belief that the leaders of the United Communist Party of Nepal (Maoists) and Bijaya Kumar Gachhadar of the Madhesi Janadhikar Forum, Democratic still hold credibility in their constituencies. Second, they couldn’t correctly foresee the people’s anger. They believed that with the Maoists and the Forum on their side they would make people accept the constitution without much trouble.

It is a fact that the second Constituent Assembly is hardly as representative of the will of Nepalese people as was the first. The representation of indigenous, Madhesi and dalits-minority has almost come to naught in the present Constituent Assembly. It is definitely a setback.

The parties which had been ruling Nepal for last three decades and were by large responsible for whatever Nepal is today, are in the majority and have forcibly revised several important decisions of the previous Assembly. The unrest today is a result of those revisions. Along with this the Maoists also completely capitulated on every positive issue they once stood for. Such as secularism, ethnic based federalism and land reform. In all, the 2nd Constituent Assembly has given a constitution minus the spirit of the 2006 Comprehensive Peace Agreement and several other agreements and understandings with the Madhesi and other ethnic and poor people of Nepal. In fact, it gave the same constitution which had been proven outdated for Nepal long ago.

Hence, when the ruling government of the Congress and UML bet on Prachanda and Gachhadar to make people believe their intentions they made a very poor choice. Prachanda and Gachhadar have long lost their credibility. The Madhesi people don’t see Gachhadar as their representative leader. Similarly, Prachanda too doesn’t have the support of people beyond a tiny faction in and outside his party. The parties should have considered the fact that Prachanda lost the election from Kathmandu and marginally won from Siraha. It is only a ‘miracle’ that for the last three years he is at the helm of the UCPNM leadership. For long he has managed to remain at the top only as a compromised choice of rival factions in the party. Both Gachhadar and Prachanda are the leaders who everyone in their parties want to see fail. Their failure guarantees survival as well as resurrection of many other leaders.

Hence, the stamp of these two leaders on the new constitution was not acceptable. Their agreement on the draft only justified people’s fear that they were about to be fooled once again. The result: for the last two weeks Nepal is shut. Curfew is imposed in several parts and gradually the military is taking the lead role. Can a constitution promulgated in this situation give the lasting peace Nepal has been looking for since the 1950s?

(Published in the Citizen, 2 September 2015)

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The New Nepal Constitution: A Losers Document?

Posted by chimeki on August 11, 2015

nepal constitutionNow that the draft constitution of Nepal is out for public scrutiny, it looks as if the nine year long exercise for constitution writing was a wasted opportunity. The draft constitution has postponed many important issues for a distant, yet unknown, future. The new constitution, the 6th in as many decades, lacks some of the core elements which have been the cause for chain of unrest, bloody and peaceful, in the Himalayan nations for more than a century now. No wonder various sections of Nepalese have already hit the streets to oppose it.

Padma Ratan Tuladhar, a credible ethnic face and prominent human rights activist, has described the new constitution as a ‘losers’ document’. This is because, the constitution makers, have ignored the aspirations of the Madheshi (people of the plains), dalits and major ethnic and religious groups in the draft. Since the the Gorkha king Prithvi Narayan Shah united most of the present Nepal, these groups have had a history of marginalization and exclusion.

Current constitution keeps the exclusion intact. For example, the current draft replaces the word ‘proportional representation’ for marginalized communities in interim constitution with ‘inclusive’ participation. This means that the communities will be ensured participation without any promised representation. It further exposes the communities to the competition where they, due to historical reasons, are in disadvantage.

Similarly on the issue of religious freedom the drafters have shown their disdain for individual’s wisdom. The new constitution states that each person shall be free to profess, practice, and preserve his/her religion according to his/her faith, and distance himself/herself from any other religion nevertheless it criminalizes the religious conversion by putting a condition i.e. it categorically states, ‘no person shall act or make others act in a manner which is contrary to public health, decency and morality, or behave or act or make others act to disturb public law and order situation, or convert a person of one religion to another religion, or disturb the religion of other people. Such an act shall be punishable by law.’ The constitution is inconsistent with the article 18 of the Universal Declaration of Human Rights which gives every human being freedom to change his religion or belief.

The above argument has to be understood in the current political and social context of Nepal. In last few years, Nepal is being sharply divided on religious lines. Post Monarchy there has been many fold increase in efforts to blunt the democratic aspirations of people by polarizing them on religious line. The political parties, including the Maoists, are unnecessarily debating the word secularism in the draft. They are infusing xenophobia in the citizens’ psyche. Even the Maoist leaders Prachand has misinterpreted the word secularism and agreed to find a ‘suitable’ replacement. In an interview to Outlook Hindi Prachanda said that he was against ‘forceful conversion because spread of Christianity in Nepal is dangerous.’ He didn’t define how.

Likewise, the constitution is also ambiguous on federalism, land reform and other issues including gender rights. These are the issues that should have not been left for future. It is widely believed that the current constituent assembly has been hijacked by the forces which were fought against to create it. Nepal has seen many violent uprisings in the past. Nepali leaders ought to understand that keeping the status quo won’t help in future either. For last nine years, the Constitution Assembly could never show that it was serious in resolving the contentious issues through serious debates. Every major compromise was achieved outside the assembly in often questionable negotiations.

Those who know about 1990 movement, also known as People Movement I, that resulted in end of absolute monarchy and making of a new constitution could see that the present exercise was no different. Then too in the name of compromise the leaders betrayed the most marginalized and exploited people. That betrayal pushed Nepal to the bloodiest civil war for a decade which ultimately broke the economy and society. It was hoped that the leaders would understand the past mistakes and address the core issues that has caused unrests in regular intervals. Unfortunately they didn’t.

Nepal today stands at square one. It has lost a good opportunity to move on the path of peaceful growth. The leaders may take a deep breath for now and think of themselves as heroes but future certainly will be not very kind to them. They have repeated the same mischief for which they have been punished time and again. It now looks obvious that their reluctance to not learn for the past would cost Nepal dearly.

VS

(Published in the Citizen, 9 August 2015)

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नेपाल का संविधान और 40 सूत्रीय मांग

Posted by chimeki on August 3, 2015

Constitution-nepal4 फरवरी 1996 को तत्कालीन संयुक्त जनमोर्चा (नेपाल) की ओर से डाॅ बाबुराम भट्टराई ने प्रधान मंत्री शेर बहादुर देउबा को 40 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा। संयुक्त मोर्चा ने यह भी घोषणा की कि इन मांगों पर यदि सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया तो वे ‘राज्यसत्ता के विरोध में सशक्त संघर्ष के रास्ते में जाने के लिए बाध्य होंगे’। 14 फरवरी 1996 को नेपाल की कम्युनिस्‍ट पार्टी (माओवादी) ने नेपाल की राज्यसत्ता के विरुद्ध जनयुद्ध की घोषणा कर दी।

नेपाल के नए संविधान (मसौदा) की 1996 के उपरोक्त मांग पत्र के साथ तुलना करने पर यह साफ हो जाता है कि नया संविधान उन मांगों को संबोधित करने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है जिसने नेपाल को 10 साल के लिए अनिश्चय, अस्थिरता और अशांति के रास्ते में डाल दिया था।

माओवादियों की 40 सूत्रीय मांग नेपाली समाज में व्याप्त उन अंतरविर्रोधों का लघु मानचित्र है जिनके हल न होने से नेपाल हमेशा एक ऐसे ज्वालामुखी के समान बना रहा है जो छोटे-छोटे अंतराल में फटता रहता है और सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का कारण बनता है।

नेपाल में एक नए संविधान का बन जाना कोई ऐतिहासिक महत्व की घटना नहीं है। 1950 के बाद से नेपाल के वर्तमान संविधान को मिलाकर कुल छह संविधान बन चुके हैं। नेपाल का सबसे पहला संविधान 1951 (अंतरिम) में बना, उसके बाद 1959, 1962, 1990 और 2007 (अंतरिम) में नेपाल में संविधान जारी हुए। इस अल्प अवधि में इतने संविधानों का जारी होना यह बताता है कि नेपाली समाज में व्याप्त अंतर्विरोधों का समाधान किए बिना शांति, स्थिरता और विकास की आशा नहीं की जा सकती। संविधान का निर्माण भावनाओं में बह कर नहीं किया जा सकता। यह किसी के अंहकार की तुष्टि का साधान नहीं है। संविधान का निर्माण वस्तुपरक स्थिति के ठोस मूल्यांकन के आधार पर ही हो सकता है। नेपाल के वर्तमान संविधान में इन सारे मूलभूत सिद्धांतों की अवहेलना की गई है। अंततः उसने उन कारकों को पुनः मान्यता प्रदान कर दी है जो नेपाल को बार-बार अराजकता, अस्थिरता और अशांति की ओर धकेल देते हैं। नेपाली समाज का छोटा मध्यम वर्ग और सम्पन्न वर्ग चाहे जितना ही ईमानदारी से शांति, स्थिरता और विकास की बात करता रहे, यह तब तक संभव ही नहीं है जब तक यह वर्ग व्याप्त अंतर्विरोधों को हल करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाता और बहुसंख्यक गरीब आबादी को यह अहसास नहीं दिलाता कि देश हित की उसकी दलीलों में उनका भी हित शामिल है।

नेपाल को एक स्वतंत्र देश से अर्ध-उपनिवेश और अब नव-उपनिवेश की स्थिति तक पहुंचाने में नेपाल पर समय-समय पर लादी गई असमान संधियां एवं समझौतों की बड़ी भूमिका है जिसमें सबसे प्रतिक्रियावादी संधि भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुई शांति और मैत्री संधि ही है। इस संधि ने नेपाल के अर्ध-औपनिवेशिक चरित्र को मजबूत किया।[1]  इसलिए 1950 के बाद नेपाल में जितने भी छोटे-बड़े आंदोलन हुए उन सबकी प्रमुख मांग इस संधि को खारिज किया जाना था। 1996 में माओवादी द्वारा प्रस्तुत 40 सूत्रीय मांग की पहली मांग इस संधि को निरस्त करना था। वर्तमान संविधान में इस दिशा में कोई ठोस आश्‍वासन नहीं है।

एक अध्ययन के अनुसार, नेपाल की 65 प्रतिशत जमीन पर 10 प्रतिशत सम्पन्न सामंत वर्ग का अधिकार है। नेपाल में 8 प्रतिशत लोग पूरी तरह से भूमिहीन हैं और 65 प्रतिशत गरीब किसानों के हिस्से में मात्र 10 प्रतिशित भूमि है।[2] इसलिए नेपाल की बुनियादी जरूरत ठोस भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू करना है। भूमि सुधार कार्यक्रम को सख्ती के साथ लागू किए बिना बहुसंख्यक जनता के हित में भूमि संसाधन का दोहन नहीं हो सकता। वर्तमान संविधान में वैज्ञानिक भूमि सुधार करने की बात तो है लेकिन भूमि के वितरण पर खामोशी है। साथ ही अनुपस्थित भू-स्वामित्व को केवल निरुत्साहित करने की बात की गई है। इस संबंध में स्पष्ट दृष्टिकोण का अभाव बहुत भ्रामक है। साथ ही 40 सूत्रीय मांग में गरीब किसानों के लिए पूर्ण रूप से कर्ज माफी की बात की गई थी लेकिन संविधान ने इस पर आंखें बंद कर ली हैं।

40 सूत्रीय मांग में गोर्खा भर्ती केन्द्रो को बंद करने की मांग की गई थी। इसका उद्देश्य उस घृणित परंपरा का अन्त करना था जिसके कारण नेपाली जनता को दूसरे देशों की जनता के आंदोलनों को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह असभ्य और मानवता के खिलाफ है। आज ही नहीं ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौर से ही ऐसा हो रहा है। 1857 में भारत में हुए अंग्रेज विरोधी संघर्ष में नेपाली सैनिकों का प्रयोग किया गया। इसके अतिरिक्त पंजाब, कश्मीर, अफगानिस्तान, लैटिन अमेरिका में भी नेपाली सैनिकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। वर्तमान संविधान इस पंरपरा को बनाए रखता है।

2005 के अध्यन के अनुसार मात्र काठमांडू में 31 हजार से अधिक संपत्तिहीन लोग हैं जो झुग्गियों में रहते हैं। पूरे नेपाल में यह संख्या कई गुणा अधिक है। 40 सूत्रीय मांग में इन लोगों के लिए उचित व्यवस्था की मांग थी। साथ ही यह भी उल्लेख है कि बिना विकल्प के इन लोगों की बेदखली नहीं होनी चाहिए। लेकिन मसौदा संविधान कानून के अनुसार बेदखली को वैधानिकता प्रधान करता है।

इसके अलावा भारत नेपाल बीच की खुली सीमा को नियंत्रित एवं व्यवस्थित करने पर भी संविधान में कुछ नहीं कहा गया है।

40 सूत्रीय मांग की ऐसी अनेक बातें हैं जिसे वर्तमान संविधान में पूर्ण रूप से निषेध कर दिया गया है। 40 सूत्रीय मांग में नेपाल की सभी भाषाओं को समान अवसर और सुविधा देने की बात है लेकिन वर्तमान संविधान में नेपाली को ही सरकारी कामकाज की भाषा का दर्जा दिया है। इस तरह लाखों गैर-नेपाली भाषाई नागरिकों को हाशिये पर धकेल दिया गया है।

माओवादियों की मांग थी कि नेपाल के सभी नागरिकों के लिए निशुल्क और वैज्ञानिक स्वास्थ सेवा एवं शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। वर्तमान मसौदा संविधान शिक्षा और स्वास्थ सेवा के निजीकरण को संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देता है। इस तरह यह शिक्षा और स्वास्थ्‍य के नाम पर होने वाली लूट को चुनौती देने तक को आपराधिक अथवा गैरकानूनी बना देता है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि 1996 में प्रस्तुत माओवादियों की 40 सूत्रीय मांग को अंततः यह संविधान खारिज कर देता है जो जनयुद्ध के शुरू होने और विस्तार करने का महत्वपूर्ण कारण था।

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[1] संधि को ठीक से समझने के लिए नेपाल के तत्कालीन प्रधान मंत्री मोहन शमशेर और भारतीय राजदूत सी पी नारायण सिंह द्वारा हस्ताक्षरित ‘लेटर आॅफ एक्सचेन्ज’ का अध्ययन आवश्यक है।

[2] बाबुराम भट्टराई, पोलिटिको-इकोनोमिक रैशनैल आॅफ पीपुल्स वाॅर इन नेपाल

वि.श.

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नेपाल में गाय : पवित्र जीव से राष्ट्रीय पशु तक

Posted by chimeki on August 3, 2015

Gaijatralनेपाल के नए संविधान में भी गाय को राष्ट्र पशु स्वीकार किया गया है। वैसे 1962 से ही नेपाल का राष्ट्रीय जानवार गाय है। यह इसलिए कि 1962 के संविधान में ही पहली बार नेपाल को राजसी हिन्दू राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया गया था। इससे पहले नेपाल में गाय एक पवित्र जानवर था। अधुनिक नेपाली राष्ट्रवाद का जन्म भी इसी समय शुरू हुआ। राजा महेन्द्र ने हिन्दू धर्म को नेपाली राष्ट्रवाद का रूप दिया और गैर हिन्दू आबादी का जबरन हिन्दूकरण करना शुरू किया। राजा महेन्द्र ने एक देश, एक वेष, एक भाषानेपाल की तमाम राष्ट्रीयताओं पर लागू किया। यह अनायास नहीं है कि नेपाली इतिहास के ठीक इसी बिन्दु पर नास्तिक माने जाने वाले कम्युनिष्ट दल नेपाली राजनीति के रंगमंच पर स्थापित होना शुरू हुए।

नेपाल के संदर्भ में गाय का सवाल मात्र एक जानवर का सवाल नहीं है बल्कि यह इतिहास के उस कालखण्ड से जुड़ा है जब वर्तमान नेपाली भू-क्षेत्र में हिन्दू रियासतें स्थापित होना शुरू हुईं। भारत में इस्लामिक सत्ताओं के विस्तार और बढ़ते प्रभाव ने हिन्दू राजाओं को पहाड़ों की और ढकेल दिया। इन लोगों ने पहाड़ों में कई छोटे छोटे राज्यों की स्थापना की। बाद में गोर्खा राज्य के राजा पृथ्वीनारायण शाह ने इन्हीं राज्यों का एकीकरणकरके आधुनिक नेपाल राज्य का निर्माण किया। गोर्खा नाम संस्कृत शब्द गौरक्षा से आया है। इसलिए जब गाय को धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र का राष्ट्रीय पशु माना जाता है तो तमाम भलमनसाहत के बावजूद हिन्दू राष्ट्र के प्रवेश का चोर दरवाजा खुला रह जाता है।

यह दलील दी जा सकती है कि नेपाली राजनीति को भारतीय ढांचे में रख कर नहीं देखना चाहिए या इसका अध्ययन भारतीय संवेदना के साथ नहीं होना चाहिए। यह भी कहा जा सकता है कि शयद नेपाल के लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता। यह सच है कि नेपाल के लोग गाय के सवाल पर वैसी बहस नहीं कर रहे हैं जैसी बहस भारतीय संविधान के निर्माण के वक्त हो रही थी। भारत की संविधान सभा में बहस करते वक्त डा अम्बेडकर कहते हैं कि हम पिछले सात दिनों से इस (गाय) पर बहस कर रहे हैं। नेपाल की संविधान सभा ने एक मिनिट भी इस पर चर्चा हुई हो ऐसा प्रमाण नहीं मिलता।

लेकिन जरूरी बात इस बात की जांच करना है कि नेपाल के संविधान निर्माता गाय को कैसे देखते हैं। जब वो गाय को राष्ट्रीय पशु कहते हैं तो गाय के कौन से गुणों को चिन्हित करते हैं। बेशक कृषि प्रधान देश में गाय एक उपयोगी पशु है। लेकिन गाय की उपयोगिता सिर्फ दूध, बैल पैदा करने और गोबर देने में नहीं है। गाय प्रोटीन (मांस) का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। यहीं वह पेंच है जिसकि पड़ताल किए बिना गाय को सवंधिान को चरने के लिए नहीं छोडा जाना चाहिए था।

नेपाली पाठ्यक्रम की पाठ्य पुस्तकों में गाय पर सामग्री का अध्ययन करने से संविधान और नीति निर्माताओं की जिस मानसिक स्थिति का संकेत मिलता वो वाकई देश के धर्मनिर्पेक्ष भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। पाठ्यक्रम में जो सामग्री है उसके अनुसार गाय राष्ट्रीय पशु है क्योंकि वह दूध देती है और हिन्दूओं के लिए पूज्य है। यदि पाठ्यक्रम यह भी संदेश होता कि गाय के दूध के साथ उसका मांस भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत है तो भी शायद गाय का विरोध नहीं करना पड़ता। गाय और हिंदू धर्म का गहरा संबंध है। एक तरह से ये दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक हैं। डा अम्बेडकर ने गौ मांस खाने वाले और न खाने वालों को छूत और अछूत की विभाजन रेखा माना है।

राष्ट्रीय प्रतीक क्या है? किसी पशु, पक्षी या चिन्ह को राष्ट्रीय घोषित करने के क्या माने होता हैं? इन सवालों के कई जवाब हो सकते हैं लेकिन सबसे तार्किक जवाब यही लगता है कि राष्ट्रीय प्रतीक या चिन्ह राष्ट्र के इतिहास और संस्कृति के वे चिन्ह होते हैं और इनका चुनाव करते समय लोग यह तय करते हैं कि वे राष्ट्र को किस संस्कृति और इतिहास के किस हिस्से से जोड़ कर देखना चाहते हैं। राष्ट्रीय प्रतीकों का चुनाव समावेश और बहिष्कार की एक साथ होने वाली प्रकृया हैं। और ठीक इन्ही बिन्दु पर देश का चरित्र स्पष्ट होता है। इसके साथ यदि नेपाल को उसके इतिहास और दक्षिण एशिया के संदर्भ से अलग करके देखा जा सकता तो भी गाय कोई बहुत गंभीर बहस को पैदा नहीं करती। लेकिन अफसोस कि नेपाल को दक्षिण एशिया और उसके इतिहास के साथ ही समझा जा सकता है। इसलिए यहां गाय एक राष्ट्रीय पशु से बड़कर एक राष्ट्रीय चुनौती है जिसने अक्सर राष्ट्रीय आपदा को जन्म दिया है।

जैसा कि उपर कहा गया है भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भी गाय पर लंबी बहस की। संविधान सभा में गौ हत्या पर निर्पेक्ष (ब्लैंकिट) प्रतिबंध लगाने की मांग भी हुई लेकिन डा अम्बेडकर ने इस प्रतिबंध के पक्ष में धार्मिक आस्था वाली दलील को अस्वीकार कर आर्थिक दलीलों को स्वीकार किया और संशोधन में यह रखा गया कि राज्य उपयोगी जानवरों की हत्या पर रोक लगाने का प्रयास करेगा। इस तरह संविधान निर्माताओं ने एक बड़ी आबादी को राहत दिलाई।

द किंग एण्ड काउः आॅन ए क्रूशीयल सिम्बल आॅफ हिन्दूआईजेशन इन नेपाल में एक्सिल माईकल्स् लिखते हैं कि नेपाल में गाय का प्रयोग कतिपय राष्ट्रीय समूहों और दुर्गम क्षेत्रों के एकीकरण और उन पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए किया गया। वे इसी निबंध में लिखते है कि शाह राजाओं और राणाओं ने नेपाल राज्य की विचारधारा को गौ हत्या पर प्रतिबंध से जोड़ कर देखा। 1854 के मुल्की ऐन अथवा सिविल कोड में कहा गया है कि, ‘कलयुग में यही एक मात्र राज्य है जहां गाय, स्त्री और ब्राह्मण की हत्या नहीं हो सकती।

1939 में जब तत्कालीन राणा प्रधान मंत्री महाराजा जुद्धा शमशेर ने कलकत्ता का भ्रमण किया तो तमाम भारतीय समाचार पत्रों ने उन की यह कह कर प्रशंसा की कि वे एक ऐसे देश के प्रतिनिधि हैं जो हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक है। हिन्दू आउटलुक नाम की पत्रिका में छपे एक लेख में जुद्धा शमेशर की प्रशंसा करते हुए लेखक ने लिखा है, ‘एक पवित्र हिन्दू की तरह महाराजा महान गौ पूजक हैं

उपरोक्त परिप्रेक्ष में गाय को इस आसानी से राष्ट्रीय पशु स्वीकार कर लेना चिंतनीय है। एक धर्मनिर्पेक्ष राज्य किसी ऐसे जानवर को राष्ट्रीय पशु की मान्यता कैसे दे सकता है जिसके हवाले से नेपाली की बहुसंख्य जनता का उत्पीड़न किया जाता रहा है। एक अध्ययन के अनुसार गौ हत्या के मामले में सारे आरोपी जनजाति, पिछड़ी मानी जाने वाली हिन्दू जातियां या अल्प संख्यक समुदाय से हैं। इसलिए गाय का राष्ट्रीय पशु हो जाना नेपाल को आज ठीक उसी बिन्दु पर खड़ा कर दे रहा है जहां से असंख्य विद्रोहों का सूत्रपात हुआ था।

वि.श.

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आईएसआईएस का आकर्षण

Posted by chimeki on August 3, 2015

isis1980 के दशक से शुरू हुए भूमण्डलीकरण ने बहुत तेजी से असामनता को जन्म दिया है और साथ ही इस असामनता ने विद्रोह की बड़ी संभावनाओं को पैदा किया। अमेरिका और युरोप में मध्यम वर्ग तेजी से कमजोर हुआ और वैसी ही स्थिति फिर से पैदा हुई जिसने युरोप को पिछली सदी में पहले और दूसरे विश्व यु़द्ध की ओर डकेल दिया था।

दूसरी ओर भूमण्लीकरण ने दुनिया भर के देशों को आपस में अभूतपूर्व रूप से जोड़ दिया है। आज एक देश में होने वाली मामूली से मामूली घटना भी अन्य देशों में कहीं व्यापक रूप से असर डालती है। ऐसे में विश्व स्तर में जन उभार की संभावनाएं पूराने विद्रोहों से बहुत बड़ी हो जाती है। यह जरूरी हो जाता है कि विश्व स्तर में ही एक ऐसा महौल बनाया जाए जो यथास्थिति को ही बनाए रखने के लिए जनता को मानसिक रूप से तैयार रखे।

1990 के बाद अमेरिका और युरोप में तेजी से नए प्रकार के आंदोलनों का सिलसिला आरंभ हुआ। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की योजनाओं के खिलाफ लोग सड़को में उतर आए। युरोप, लातिनी अमेरिका और अन्य देशों में वे राजनीतिक दल मजबूत हुए जो भूमण्डलीकरण की खिलाफत कर रहे थे। साथ ही कई दलों ने अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए अपने कार्यक्रम में बदलाव किए और जनता को यह जताने की कोशिश की कि वे अमेरिका द्वारा प्रयोजित भूमण्डलीकृत अर्थव्यवस्था के खिलाफ हैं। रूस और चीन ने भूमण्डलीकरण के विकल्प के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

ऐसे में ये जरूरी था कि जनता को किसी ऐसे खतरे का एहसास कराया जाए जिससे वो इसी व्यवस्था और ‘लोकतंत्र’ को बनाए रखने के लिए ‘सहमत’ रहे। इसी योजना के तहत पहले अल कायदा और अब आईएसआईएस यानि इस्लामिक स्टेट आॅफ ईराक एण्ड सीरिया दुनिया के क्षितिज में उभर कर आएं।

इसका मतलब यह कहना नहीं है कि आईएस और अलकायदा पूरी तरह से सम्राज्यवादी देशों के षड़यत्र के परिणाम हैं। और यह भी नहीं कि इन संगठनों की अपनी कोई राजनीतिक समझ नहीं है। यदि ऐसा होता तो यह एक छोटे दायरे में ही सिमट कर रह जाते और जनता को अपनी ओर आकर्षित करने में असमर्थ हो जाते। बल्कि जहां ये समूह शुरू में सक्रिय हुए वहां ऐतिहासिक कारणों से ऐसे अंतरविरोध मौजूद थे जिनसे अमेरिका और युरोप के साम्राज्यवादी देशों को आंतरिक मामलों में हस्ताक्षेप का मौका दिया।

हांलाकि कि ये संगठन अपने सार में घोर प्रतिकृयावादी ही हैं जो इतिहास के चक्र को किसी ’सुनहरे’ अतीत की ओर मोड़ देना चाहते हैं लेकिन इन संगठनों ने खुद को अमेरिकी और युरोपीय साम्राज्यवाद के शत्रु की तरह दिखा पाने में सफलता प्राप्त की है। यही वह प्रमुख कारण भी है जिसने विश्व भर के युवाओं को इन संगठनों की ओर तेजी से आकर्षित भी किया है। हाल में जो खबरे आईं हैं उनसे यह साफ है कि जो लोग आईएस से जुड़े हैं उनका मकसद ऐसे समाज के निर्माण में अपनी भागीदारी देना है जो न्यायपूर्ण है। ऐसे युवाओं का बहुसंख्यक हिस्सा ऐसे देशों से है जहां वे अलगाव महसूस करते हैं।

आईएस की राजनीति के बारे में स्पष्ट सूचना का आभाव है। लेकिन यह बात अब बहुत साफ है कि अमेरिका और इजरायल ने अपने युरोपीय सहयोगी देशों की सहमति में ही आईएस को सीरिया की असद सरकार के खिलाफ युद्ध के लिए प्रोत्साहन दिया ताकि वे ईराक, सीरिया और आसपास के अन्य देशों में अपनी विरोधी शक्तियों को काबू में कर सकें।

दार्शनिक हिगेल ने बहुत पहले ही कहा था कि इतिहास का सबसे बड़ा सबक यह है कि इतिहास से कोई सबक नहीं लेता। साम्राज्यवाद की सबसे बड़ी कमजोरी होती है कि उसमें दूरदृष्टि का आभाव होता है। यही कारण है कि वह समय को अपने इर्दगिर्द रोके रखना चाहता है। अल कायदा और आईएस का गठन और विस्तार के पीछे छिपे कारण जो भी हों लेकिन दोनों ही संगठन खुद को अमेरिकी और युरापीय साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रस्तुत करते हैं। इसलिए वे तब तक तो साथ चल सकते हैं जब तक उनके और उनको समर्थन देने वाले देशों के आपसी हित में कोई टकराव नहीं होता। लेकिन जैसे ही साझा हित पूरा हो जाता है दोनों अलग अलग खेमों में विभाजित हो जाते हैं। यही इस प्रक्रिया की तार्किक परिणीती भी हैं।

हर संगठन अपने विकास में लगातार स्वायत्त होने की प्रक्रिया में रहता है। बिना स्वायत्ता के वह अपने अस्तित्व की आवश्यकता को स्थापित नहीं कर सकता है। स्वयं हमारे देश भारत में ही सत्ता कई बार अंतरविरोधों को हल करने के लिए जिन उपायों को प्रस्तुत करती है वे एक समय बाद स्वायत्त होने की प्रक्रिया में क्रमशः अपने ‘जन्मदाता’ के विरोध में खड़े होते जाते हैं। पंजाब में भिण्डरवाला के नेतृत्व में खालिस्तान आंदोलन अकालियों को कमजोर करने का एक उपाय था और श्री लंका में लिट्टे के नेतृत्व वाला आंदोलन भी ऐसे ही कारणों से आगे बढ़ा। लेकिन दोनों ही की कीमत अंततः भारत को चुकानी पड़ी थी। अमेरिका को भी देर सबेर अपने कृत की ऐसी ही कीमत चुकानी पड़ेगी और उसे अपनी राजनीति को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

दूसरी ओर आईएस और अलकायदा की राजनीति में जो प्रतिक्रियावादी तत्व आज प्रमुख हैं उनका एक प्रक्रिया में गौण होना भी उतना ही स्वभाविक है। आने वाले दिनों में इनके भीतर मौजूद साम्राज्यवाद विरोधी तत्व इसकी दिशा को आवश्यक रूप से प्रगतिशील राजनीति की ओर मोड़ेंगे। और इस बात की संभावना से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता कि यह क्षेत्र 21वीं सदी में समाजवादी आधार क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत नहीं होगा।

वि.श.

(दस्तक के जून-जुलाई अंक में प्रकाशित)

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Narendra Modi in Nepal

Posted by chimeki on April 29, 2015

Courtesy: Business Standart

Courtesy: Business Standart

It takes centuries to build a national identity and less than few months to lose it completely. This is a lesson that the people of Nepal are to learn very soon. Nepal, because of its geo-political location, has been always a place of political and diplomatic maneuverings for the regional powers but never before was it done so openly and brazenly as it is being done now.

Under Narendra Modi India has become dangerously assertive in Nepal. Since he took over as the prime minister of India he had made it clear that India would actively involve itself in the affairs of South Asia. The method would vary country-wise. In Nepal, he is trying to launch a powerful assault on the Nepali identity by evoking the Hindu identity. Interestingly, there is a complete lack of concern among the Nepali politicians and academia who, until recently, would jump the gun over anything they perceived as a threat to Nepal’s sovereignty and nationality.

While he talks Gandhi and secularism to his Western audience, his regular conjuration of the Hindu identity in Nepal has become a matter of serious deliberation among the concerned Nepal watchers. Post 2002 Gujarat communal carnage, Mr Modi projected himself as the man of development in India and abroad, but for Nepali people, he has become a religious zealot, a crusader who felt it his duty to make them conscious of their religion.

Mr Modi has betrayed his obsession with Nepal quite often in the last few months. His fixation with Nepal is hardly a secret now. In his first visit to Bhutan he mistakenly referred the Bhutanese parliamentarians as the Nepali law makers. Later he praised Nepal in his maiden Independence Day speech to the nation.

In between these two references he toured Nepal and offered prayers in the Pashupatinath temple. The photograph where his forehead is smeared in the temple’s holy ash created a sensation in the country. Even the hardcore nationalists saw it as a signal from India to have a good relationship. When he spoke in the Nepal’s Constitution Assembly, the first head of any state to do it in recent memories, he repeatedly evoked shared Hindu identity by the people of the two countries.

Taking the step further, he planned a road trip to Nepal in November this year to attend the 18th SAARC Summit. Thankfully it didn’t happen. Mr Modi’s itinerary included Janakpur, a town considered to be the birth place of Ramayan’s Sita, Muktinath and Lumbani. He had plans to address the people in all the three places.

Nepal and Identity:

Birth of Nepal as a nation-state coincided with the expansion of the British Raj in India. In the south of Nepal, the two powers constantly disputed over trade and border issues in the last and the first decades of the 18th and 19th centuries. Finally, in 1814 the more than two-decade-long tension culminated in a fully fledged war. The Anglo Nepalese War of 1814-16 in which Nepal suffered a humiliating defeat sealed the fate of Nepal for more than a century and a half. That defeat also made Nepal extremely conscious of its existence. Over the years Nepal’s foreign policy and relationship were moulded with a specific aim of protecting its existence. That was the reason, many believe, Nepal whole heartedly supported all British moves in Asia and the world.

During the first war of Independence in India in 1857, Nepal played a very crucial role in reestablishing English supremacy in the region. Then Prime Minister of Nepal Jung Bahadur Rana, who established the Rana autocracy or Ranacracy in Nepal, personally led the Gurkha army to crush the armed uprising in Lucknow and other parts of Northern India. Karl Marx called Jung Bahadur Rana ‘the English dog-man’. Even after the rebellion was thoroughly crushed, the Rana regime continued to aid the British establishment in India. Thereafter, the Ranas would not allow any anti-British activities from Nepal. In the following years Nepal was the source of a large number of Gurkha recruits and slaves for the English rulers. The successive Rana rulers continued to aid the British with Gurkha soldiers in the missions in Burma, Afghanistan, China, Malta, Cyprus, Malaya and Tibet. In the two world wars more than 2 lakh Gurkha soldiers fought along the British lines. During World War II there were 112000 Gurkha soldiers in the British Army, the highest ever.

Post British rule in Asia, precisely after India got freedom, when India’s new rulers set the task of assimilating as many independent states as possible into India’s fold, Nepal had to wake up to the new political reality. The hastily concluded Peace and Friendship Treat of 1950 with the new Indian government has signs of a desperate attempt by the then Nepali rulers to switch loyalty. Although the Rana rule ended soon after the treaty was signed, the treaty remained in effect. It still is. Since then this treaty is the core around which Nepali politics moves. The political trend in Nepal is that every political party would criticize the treaty when she is in opposition or leading an armed movement and go mum as soon as it would come to power or become part of the system.

The suspicion for India grew after Sikkim became the 22nd state of India in 1975. Many in Nepal saw it as a forceful annexation. This event added a new word in the Nepali political lexis, Sikkimikaran or Sikkimization. The merger made Nepali people more attached to their Nepali identity.

In the coming years, this attachment to identity first developed into cynicism and then transformed into socialism. The socialists in Nepal become the flag bearer of sovereignty and Nepali identity. This transformation happened due to the recognition and support Nepal got from the socialist China. China offered Nepal an olive branch to stand on its own, for itself against its mighty southern neighbor which, for many Nepalese, had followed the British legacy of expansionism and assertion.

Since 1950, there have been many attempts, deliberate or unintentional, to dilute the Nepali identity by the Hindu fundamentalists from the both sides of the border. Like today many Indian leaders had tried to influence Nepali masses by evoking common religious belief in the past too. However, Nepal for long remained unmoved from these assaults. In the last 60 years, Nepal has successful defied the Hindutva agenda of blending Nepali identity with the larger Hindu identity. Nepali people had always challenged the hegemonic rhetoric of its southern neighbor. Also, whenever they felt that the leaders or the kings couldn’t be trusted in safeguarding the sovereignty of the country they had come out to protest. Often these protests have led to big political changes.

On the other hand, the kings too found it necessary for their own survival to keep the Nepali identity separate from the broader Hindu identity. Often they fuelled nationalistic sentiments to check growing Indian interventions in the country’s sovereign affairs. The first king of Nepal Prithvi Narayan Shah warned his subjects from crossing the border and mixing with the Indian population. Later, the Rana rulers consciously chose not to be seen as an extension of India. However, from the second half of the 20th century, the idea of state-sponsored Nepali nationalism was challenged by the new and more inclusive form of nationalism i.e. socialist nationalism.

Nationalism(s) in Nepal

From 1950, there emerged contesting views of nationalism in Nepal. One view reflected the state sponsored top-down nationalism based on national pride centered on the Shah Monarchy and Hindu (not Hindutva) ideals while other view advocated bottom-up nationalism based on class unity of the marginalized and toiling masses. The former was intrinsically anti-woman, anti-dalit, anti-religious minorities and also against the people of Tarai (plains) known generally as the Madheshi. The latter view defined nationalism in Nepal’s context as the unity of all the exploited people and demanded restructuring of Nepal based on the principles of socialism and democracy.

After a prolonged struggle the people of Nepal succeeded in uprooting the monarchy in 2008. The first Constituent Assembly saw the largest number of representation of hitherto suppressed minorities, nationalities, gender and castes. It looked as if Nepal was on the threshold of resolving the contradictions it had been in since the emergence of modern Nepal. However the first Constitutional Assembly failed to write a constitution in the stipulated time and had to be dissolved. The second Constitutional Assembly, which came into existence in November last year, is not as representative as the first. The number of women, dalits, Madheshis and other marginalized communities and minorities has come down to one third of the previous number. Nevertheless, the people still hoped for a better Constitution than they had previously.

However, things have been changing fast in Nepal since the Baratiya Janta Party came to power in India. This has also coincided with the weakening of the nationalist consciousness among the Nepali people. Nationalistic feeling subsided because people feel cheated by the nationalist leaders. There is a feeling that the leaders cultivate nationalistic sentiments to further their self interests. It is not long ago when the Maoists were seen as the watchdog of national sovereignty. But they too proved to be the same old wine with a new label. It was during the premiership of the Maoist leader Dr Baburam Bhattarai that Nepal signed the worst bilateral trade agreement, the Bilateral Investment Promotion and Protection Agreement (BIPPA), with India. Several studies have already proved that these agreements have always harmed the interests of the weaker economies. Besides, the Maoists have shown reluctance to speak on India’s growing intervention in Nepal. In the name of pragmatism, they dared not offend India’s goodwill.

Not long ago the Maoists would stop Indian motor vehicles from crossing to Nepal calling it the right of sovereign people. There were nationalists who burnt posters of Indian film stars and politicians they thought had hurt the Nepali sentiments. These leaders are now completely silent over the most ill-timed intervention by the head of India. The passivity is bound to cost Nepal very much.

The question of nationality is still relevant for the neo-colonized countries and nationalities. Although, it is considered an obsolete idea to emphasize on nationality and identity at the cost of the larger class question nevertheless the weakening of socialist movements across the world and rising assault of capitalist imperialism has made it inevitable to fall back to the Marxist line which, along with the class question, addresses the question of nationalism in the newly colonized or neo-colonized countries of the world. For these nationalities, as Lenin would see in various forms of struggles, the nationalist or identity struggle is a process of crystallizing the class struggle. In the last decades of the last century, the socialists in many countries of the world creatively blended the Marxist class line with the issue of nationalism and were not only able to win over the large masses of people but also sustain their power for a longer period.

The Maoists in Nepal must remember Lenin’s warning when he said, “The bourgeoisie ‘want’ to curtail the class struggle, to distort and narrow the conception and blunt its sharp edge.”  Narendra Modi seems to be doing exactly this. He is trying to blunt the edges of the volatile class struggle in India and Nepal with a narrow nationalistic sentiment based on Hindu supremacy. The nationalists in Nepal, including the Maoists, must remember that nationalism is ultimately an idea. It cannot be saved, by stopping foreign goods and vehicles from crossing the border, shutting cinema halls playing foreign movies and other such rituals, useless the idea itself is saved.

V.S.

(Published at Sanhati.com on December 13, 2014)

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Nepal Peace Process on Track

Posted by chimeki on April 29, 2015

Nepal Peace ProcessIn Nepal, the constitution writing process is back on track. On September 2, the big three parties, Nepali Congress, UML, UCPN-Maoist, have agreed to engage with Mohan Baidya ‘Kiran’ led Communist Party of Nepal-Maoist. The CPN-M is the biggest party outside the Constituent Assembly and has been proposing an all party conference to resolve the contentious issues of the Constituent Assembly. It has warned of consequences for the government if it tries to ignore its alliance.

The breakthrough has come just four days before the deadline set by the working calendar of the Constituent Assembly to build a consensus on all disputed issues. On 5 April, the Constituent Assembly had formed the Constitutional Political Dialogue and Consensus Committee under UCPN-M leader Dr Baburam Bhattarai and mandated it to underline the bone of contention among the parties in and outside the Constituent Assembly. On May 16, the committee sent a list of 145 points related to the constitution writing process that, it said, needed addressing. Accordingly, the committee held talks with 45 parties outside the Constituent Assembly on 7 and 8 July to put on record their demands. However, the CPN-M, which, along with 33 other parties, had boycotted the second Constituent Assembly election held in November last year, refused to sit for talks saying that it didn’t recognize the new Constituent Assembly. It demanded a direct talk among the parties and all the stakeholders in Nepal.

Since then the writing process had stuck in limbo. It looked as if the Sushil Koirala government had made up its mind to bypass CPN-M and parties outside the Constituent Assembly while working on the constitution. Had it happened it would have set a wrong precedent.

Since last November, the political landscape in Nepal has completely changed. There have emerged alternative voices in every major political party. In the CPN-M, one strong voice is represented by Netra Bikram Chand ‘Biplab’, a charismatic young leader with an influencing following. The party which, till recently, had claimed to be above factionalism is facing an existential crisis. Biplab has serious reservations on the line taken by the party leadership since the second Constituent Assembly election. He has attacked the leadership for not being able to formulate concrete line in the changed scenario. He believes that the line of the party chairman Kiran and other senior leaders, which tells that the Constituent Assembly is still relevant, has exhausted and the party should change its course of action. In a recently concluded meeting of the central committee, Biplab had presented an alternative proposal challenging the Chairman’s.

Biplab’s proposal to the party is: go back to the People’s War. His emphasis is on getting out of the peace process and going underground. He has strongly rejected Kiran’s argument for a peaceful struggle until the time is mature for a ‘people’s revolt’. He is of belief that there is no scope for peaceful struggle for Socialism in Nepal and that line of ‘People’s revolt’ is the excuse of the status quoist forces in the party! Biplab seems ready to say goodbye to fellow comrades if they don’t make amendments in the party’s present line. If this happens, the peace process in Nepal will certainly collapse. The leaders must understand that the consequences of the collapse will not be Biplab’s sole doing instead more responsibility will be of the government.

For better part of its term, the government had seldom shown seriousness in fulfilling its commitment to the Nepalese people of giving them a new constitution. The peace process which began 8 years ago often looked an unending exercise. The Constituent Assembly is yet to present the first draft of the constitution! Experts believe that the real process will begin after the first draft is made public because only then people will actually join the debate which has been going on behind the curtain for all these years.

The agreement to hold talk with the CPNM is a welcome step. It sends a clear message that the government is serious for a meaningful and constructive dialogue with all the voices without caring much for their size and standing. It is also a message to Biplab and his supporters that their fear that there is no scope for peaceful and democratic solution of Nepal’s problem is without merit.

V.S.

(Published in The Citizen)

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गुडगांव की गौरव इंटरनेशनल में तोड़फोड़ : रिपोर्ट

Posted by chimeki on March 3, 2015

अस्पताल में भर्ती समीचन्द के साथ पत्नी सान्जा

अस्पताल में भर्ती समीचन्द के साथ पत्नी सान्जा

14 फरवरी 2015 के दिन गुडगांव के उद्योग विहार स्थित गौरव इंटरनेशनल, रिचा ग्लोबल एवं अन्य गारमेंट कंपनियों के 5 हजार से अधिक श्रमिकों ने कंपनी के प्रबंधन के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन किया। अपने एक साथी समीचंद पर प्रबंधन के लोगों द्वारा किए गए जानलेवा हमले के विरोध में हुए इस स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन को दबाने के लिए पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा जिससे इलाके में भगदड़ मच गई। पुलिस का दावा है कि श्रमिकों ने 100 से अधिक वाहनों से तोड़फोड़ की, जला दिया और आसपास की कंपनियों को भरी नुक्सान पहुंचाया। वहीं फैक्ट्री के मजदूरों का कहना है कि प्रबंधन के लोगों ने अपने कृत्य को छिपाने के लिए खुद के गुंडों से तोड़फोड़ कराई है ताकि श्रमिकों को फंसा कर समीचंद पर हुए कातिलाना हमले को छिपाया जा सके।

बहुत ही कम अखबारों की सुर्खी बने इस मामले ने गुडगांव प्रशासन को पूरी तरह से हिला कर रख दिया है। स्थानीय पुलिस से लेकर सीआईडी, सभी हिंसा के कारण तलाशने में जुट गए हैं। यह रिपोर्ट लिखे जाने तक पुलिस ने समीचंद के साथ हुई मारपीट में शामिल 7 लोगों को हिरासत में ले था और मुख्य आरोपी कंपनी का पर्सनल मैनेजर आर. एस. यादव ने अग्रिम जमानत ले ली है।

समीचंद पर हमला और उसके बाद

10 फरवरी की सुबह जब सारा देश दिल्ली चुनाव के नतीजों का बेसब्री से इंतजार कर रहा था और रुझान आने लगे थे ठीक उसी वक्त गौरव इंटरनेशल कंपनी में काम करने वाला समीचंद अपनी शिफ्ट के लिए घर से निकला था। पिछले दो दिन से उसे बुखार था इसलिए वह धीरे धीरे चला रहा था। उसकी पत्नी सान्जा जो उसी कंपनी में काम करती है उसके साथ ही निकली थी लेकिन बिमार समीचंद पीछे छूट गया था।  कंपनी पहुंचने पर गेट पर तैनात गार्ड ने समीचंद को भीतर आने से रोक दिया। वह कोई 5 मिनट लेट था। समीचंद का कहना है कि वह पहली बार देर से पहुंचा था इसलिए उसने अपने फिनिंशिग मैनेजर राठौड से बात करने की कोशिश की। जब गार्ड ने उसे ऐसा नहीं करने दिया तो उसने मांग की कि या तो वह उसका लेट लगा दे या मैनेजर को बुला कर उसका हिसाब करवा दे। उसके ऐसा कहते ही गार्ड उसके साथ गालीगलौज करने लगा।

समीचंद और गार्ड की तकरार देख कर गार्ड सुपरवाईजर धर्मवीर और गार्ड संतोष भी गेट पर पहुंच गए और समीचंद को घर वापस चले जाने की धमकी देने लगे। कंपनी का पर्सनल मैनेजर आर.एस. यादव जो अपने कैबिन से यह सब देख-सुन रहा था बाहर आ गया और चिल्लाते हुए गार्ड से कहने लगा, ’इसे अंदर ले चलो अभी इसका हिसाब कर देते हैं’। गार्ड रूम के अंदर आर.एस. यादव, धर्मवीर, अनिल, संतोष और ड्रायवर प्रह्लाद ने समीचंद की तब तक पिटाई की जब तक कि वह बेहोश नहीं हो गया। वह चीखता रहा कि उसके चार बच्चे हैं और उसे जाने दिया जाए पर पीटनों वालों पर इस बात का कोई असर नहीं हुआ। इस दौरान सान्जा को किसी ने बताया कि उसके पति को गार्ड रूम लोग मार रहे है तो वह भी वहां पहुंच गई और दरबाजा खटखटाने लगी। जब समीचंद बेहोश हो गया तो आर.एस. यादव और अन्य समीचंद और उसकी बीवी उनके घर कापसहेड़ा छोड़ आए। सान्जा बताती है कि वह रो रो कर उन लोगों से अस्पताल ले जाने की मांग करती रही लेकिन वे लोग नहीं माने।

गौरव इंटरनेशनल और रिचा ग्लोबल गुड़गांव की रिचा ग्रुप की कंपनिया है जो इस क्षेत्र की सबसे बड़ी गारमेन्ट (कपड़ा) कंपनी है। यहां हजारों मजदूर काम करते हैं और अमरीका, युरोप, आॅस्ट्रेलिया एवं कनाडा की सभी बड़े ब्रांड रिचा ग्रुप से से माल खरीदते हैं। यह कंपनी उप्पल परिवार द्वारा संचालित है।

समीचंद पर इस हमले के बाद जो खेल शुरू हुआ उसकी मिसाल सिर्फ गुड़गांव में ही देखने को मिल सकती है। कानून, पैसा और मीडिया समीचंद की जान की कीमत में अपना अपना हिस्सा तलाशने लगे।

समीचंद का भाई शेखर बेहोश समीचंद को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले गया। जहां कुछ देर बाद कुछ समय के लिए समीचंद को होश आ गया। डाक्टर की रिपोर्ट में पसली के टूटने और आंतरिक स्त्राव बताए जाने के बावजूद उसे दर्द की दवा देकर रात 11 बजे अस्पताल से छुट्टी कर दी गई। रात भर समीचंद दर्द से तड़पता रहा। सुबह 5 बजे शेखर समीचंद को फिर सफदरजंग ले गया और उसे भर्ती करवाया।

शेखर बताता है कि 11 फरवरी के दिन समीचंद को देखने आर.एस. यादव, मोहन, धर्मवीर और प्रह्लाद अस्पताल आए थे और रू. 15000 ले कर समझौता करने की धमकी दी थी। वह बताता है कि आर.एस. यादव का सहायक मोहन उसे बार बार धमकी देता रहा कि समझौता कर लो वर्ना गुड़गांव में काम करना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन शेखर ने भाई की जान पर समझौता करने से इंकार कर दिया।

12 फरवरी की सुबह शेखर तड़पते हुए समीचंद को आॅटो में लेकर गुड़गांव के उद्योग विहार थाने गया। शेखर का कहना है कि वहां मौजूद एक पुलिस वाले ने फोन कर कंपनी के कुछ लोगों को बुला लिया और यह कहता हुआ बाहर चला गया कि ‘आपस में निपट लो’। शेखर वहां से निकल कर निकल आया और समीचंद को गुड़गांव के ईएसआईएस अस्पताल में भर्ती कर दिया। पुलिस ने शेखर को यह नहीं बताया कि उसने उसकी शिकायत का क्या किया।

इस बीच 12 फरवरी के ही दिन गौरव इंटरनेशनल और आसपास की कंपनियों के मजदूरों को जब दो दिन तक समीचंद की कोई खबर नहीं मिली तो वे भड़क गए। कंपनी गेट के सामने प्रबंधन के खिलाफ मजदूरों ने धर्ना दिया और आर.एस. यादव के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। उनकी मांग थी कि प्रबंधन समीचंद की स्थिति की सही जानकारी मजदूरों को दे।

कंपनी के प्रबंधन ने मजदूरों की जायज मांग नहीं मानी बल्कि उल्टा पुलिस को बुला लिया। पुलिस ने आते ही बिना किसी चेतावनी के मजदूरों को पीटना शुरू कर दिया। अचानक हुई पुलिस कर्रवाही से मजदूर सकते में आए गए और चारो तरफ अफरातफरी मच गई। पुलिस ने बेरहमी से स्त्री-पुरुष मजदूरों को पीटा। कई मजदूर घायल हुए और उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ति करवाया गया। अस्पताल में भर्ति एक मजदूर ने बताया कि पुलिस ने क्षेत्र को चारो तरफ से बंद कर दिया था जिससे मजदूरों निकल नहीं पाए।

बताया जा रहा है कि 12 फरवरी के दिन समीचंद की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने कंपनी के दो गार्डो को गिरफ्तार किया था लेकिन रिचा ग्रुप के प्रसर्नल मैनेजर डागर ने उन्हे शाम को ही छुड़ा लिया।

दूसरे दिन अखबारों ने इस घटना को पुलिस और प्रबंधन के पक्ष से ऐसे प्रकाशित किया मानों कंपनी और आसपास हुई तोड़फोड़ के लिए समीचंद और उसकी बीवी ही जिम्मेदार हैं। यहां तक कि जब लोगों को लग रहा था कि समीचंद की मौत हो गई है तो किसी भी अखबार ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि सच्चाई क्या हैं। जो खबर पुलिस उन्हे दे रही थी वहीं समाचार अखबारों में प्रकाशित हो रहा था।
जब 14 फरवरी को गुड़गांव के मजदूर एकता मंच के कार्यकर्ताओं ने पुलिस पर दवाब बनाया तो पुलिस ने एफआईआर लिखे जाने की सूचना दी और कार्यवाही का आश्वासन दिया है। पुलिस ने आर.एस. यादव, धर्मवीर और अनिल के खिलाफ दफा 323, 342 और 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज की है जो अपराध को देखते हुए बहुत मामूली धाराएं हैं। अब खबर यह आ रही है कि पुलिस इन्हीं कार्यकर्ताओं से पूछताछ कर रही है।

ज्ञात हो कि गौरव इंटरनेशलन में मारपीट का यह पहला मामला नहीं है। इस पहले भी मजदूरों के साथ मारपीट, महिला कर्मचारी के साथ अनुचित व्यवहार की खबरें प्रकाश में आती रहीं हैं।

समकालीन तीसरी दुनिया के मार्च 2015 अंक में प्रकाशित

वि.श.

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डाॅ. तुलसी राम : व्यक्तित्व

Posted by chimeki on February 22, 2015

dr-tulsiramडाॅ. तुलसी राम ने अपने विचारों से बहुत से लोगों को प्रभावित किया। वे एक ऐसी शख्सियत थे जिनके साथ चंद पलों की मुलाकात लोगों के जीवन को ऐसे प्रभावित कर देती थी जैसा प्रभाव बहुत थोड़े लोग ही डाल पाते हैं। अब जब वे नहीं रहे तो उन्हे याद करते हुए मुझे 2003-2004 का जाड़ा याद आ रहा है जब मैंने उन्हें पहली बार सुना था। मैं काॅलेज में था और ‘संवाद’ नाम की एक संस्था में नौकरी भी करता था। वह मेरी पहली नौकरी थी। नौकरी का आकर्षण था कि मुझे अक्सर बाहर घूमने को मिलता था।

2002 में गुजरात में हुए मुस्लिम हत्याकाण्ड के बाद हमारी पीढ़ी के लिए भी, जिसने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद के उन्माद को नहीं देखा था, सांप्रदायिकता महत्वपूर्ण विषय बन गया था। इस संदर्भ में दिल्ली की ‘अनहद’ संस्था द्वारा एक वर्कशाॅप का आयोजन किया गया था जिसमें ‘संवाद’ की ओर से मैं शामिल हुआ था। दिल्ली में किसी वर्कशाॅप का यह मेरा पहला अनुभव था। इससे पहले भी यहां आना हुआ था लेकिन केवल रैली और काॅलेज के प्रायोजित भ्रमणों में। यह वर्कशाॅप निजामुद्दीन के पास एनसीसी ग्राउण्ड में आयोजित की गई थी।

वर्कशाॅप में तमाम वक्ताओं में डाॅ तुलसी राम ही थे जिनकी बातों ने मेरे अंदर कौतूहल पैदा किया जो लंबे समय तक साथ रहा। उनका व्याख्यान दूसरे या तीसरे दिन के किसी सत्र में था लेकिन वह मेरे मस्तिष्क में हमेशा के लिए एक निशान बना गया। इसका कारण था कि उन्होंने बहुत ही साफ शब्दों में बता दिया था कि हिन्दू होते हुए किसी का इंसान बने रहना नामुमकिन है।

मुझे यह याद आता है कि सत्र के अंत में मैंने डाॅ अंबेडकर और समाजवाद के बीच के अंतर्विरोध पर जानना चाहा था। उन्होने धैर्य के साथ बताया कि अंबेडकर ने अपना राजनीतिक जीवन समाजवादियों के साथ ही आरंभ किया था और उस समय के समाजवादियों की वैचारिक कमजोरियों के कारण उनसे अलग हो गए थे। बाद में उन्होंने एक अलग मार्ग तलाशते हुए राजनीति की लेकिन समाजवाद की आधारभूत मान्यताओं से वे आजीवन सहमत रहे। उन्होंने यह भी समझाया कि अंबेडकर भारत में जनवादी आंदोलन की वह बुनियाद है जिस पर समाजवाद की इमारत को खड़ा किया जाना है।

इसके अलावा जो बात मेरे दिमाग में बैठ गई वह यह कि तमाम अनर्गल दावों के बावजूद सच्चाई यह है कि हिंदू धर्म और हिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बिना हिंसा के हिंदू धर्म का अस्तित्व मात्र नहीं रह सकता। यह एक ऐसी बात थी जो ‘गुड हिन्दु-बैड हिन्दु’ वाले सरलीकरण के उलट थी। हिंदू धर्म और हिन्दुत्व एक ही है- मेरी यह समझदारी डाॅ. तुलसी राम की देन है।

डाॅ तुलसी राम ने हिंदू धर्म के प्रतीकों, ग्रंथों तथा मान्यताओं के हवाले से उस दिन मेरे आगे यह स्पष्ट कर दिया था कि इस धर्म में ईश्वर के आगे तक लोग बराबर नहीं है, कि इस धर्म के ईश्वरों और रक्षकों का सुख आधुनिक सभ्यता की तमाम मान्यताओं से विपरीत के कृत्यों में है और इस धर्म के ईश्वर असमानता के सबसे बड़े संरक्षक है।

इस भेंट से पहले मेरे विचार बहुत ही कांट्राडिक्ट्री अथवा अंतर्विरोधी थे। मैं सभी धर्मो में अंततः अच्छाई को स्वीकारता था और धर्म को अफीम भी कहता था। पुराने संस्कार रट लिए गए भौतिकवाद पर भारी थे। बाद के दिनों में क्रमशः भौतिकवादी दृष्टिकोण मजबूत हुआ। क्योंकि अभी तक कोई मनौवैज्ञानिक संकट उत्पन्न नहीं हुआ है इसलिए अभी भी आत्मपरीक्षण बांकी है। मेरे न जाने कितने दोस्त जीवन में संकट आते ही अपनी शिक्षा को संस्कारों के हवनकुण्ड में डाले जा रहे हैं और इन्हें देख कर मैं भी भयभीत रहता हूं कि कहीं मैं भी ‘सामाजिक’ और ‘आध्यात्मिक’ ‘दबाव’ की दुहाई देकर ऐसा कुछ न कहने-करने लगूं। लेकिन यह बाद की बात है।

दिल्ली से जबलपुर लौटते हुए और डाॅ. तुलसी राम को बार बार दोहराते हुए मैं ओशो, विवेकानंद, महात्मा गांधी, राधाकृष्णन और तमाम पाखण्डों से मुक्त हो चुका था। अचानक मेरे जीवन में गणेश रायबोले सबसे अधिक जरूरी मित्र हो गए थे क्योंकि दुनिया को देखने का उनका नजरिया भी डाॅ. तुलसी राम की तरह है। इसके बाद गणेश रायबोले से मेरी दोस्ती पक्की हो गई और सीखने-समझने का क्रम चालू है। डाॅ. तुलसी राम दोस्ती भी कराते थे।

तो डाॅ. तुलसीराम के जरिए मैंने सीखा कि हिंदू होते हुए इंसान नहीं रहा जा सकता है। हिंदू धर्म एक अर्थ में जातिवाद का धार्मिक आवरण है जो जातिवाद को (अ)नैतिकता प्रदान करता है। ऐसे में हिंदू होते हुए किसी का काॅमरेड बने रहने का दावा पाखण्ड से अधिक कुछ नहीं हो सकता। आज भी जब तमाम दोस्त हिंदू धर्म की आलोचना को पर्सनल लेने लगते हैं, जब हिंदुओं की क्रूरताओं को मुस्लिम प्रतिरोध के साथ बैलेंस करते हैं, जब आदिवासियों और दलित समुदाय के बीच ईसाइयत के प्रसार को औपनिवेशिकरण कहते हुए ‘फोर्स्‍ड कन्वरज़न’ को रोके जाने की मांग करते हैं तो उनकी मूर्खता पर हंसी नहीं गुस्सा आता है। इस्लाम और ईसाइयत स्वीकारना यदि किसी पीडि़त समूदाय को राहत देता है तो इसे प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिए। हिंदू धर्म को त्यागना उत्पीडि़त जनता का साहसिक विद्रोह है। कम से कम ‘हिंदू मरेंगे तो नहीं।’ हिंदू धर्म में पैदा होना न होना किसी के वश में नहीं है लेकिन हिंदू रहना, हिंदू जीना और हिंदू मर जाना देश की उत्पीडि़त जनता के साथ विश्वासघात है।

डाॅ. तुलसी राम सिखाते हैं कि भारत में सामाजिक बराबरी के लिए हिंदू धर्म के संस्कारों और विचारों का नाश जरूरी शर्त है। इसकी शुरूआत प्रगतिशीलों से होनी चाहिए। सिर्फ सेल्फ-सर्टिफाई करने से काम नहीं चलेगा। एक काॅमरेड के लिए सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि, ‘मैं जाति में विश्वास नहीं करता, मैं धर्म को नहीं मानता’ बल्कि व्यापक जनसमुदाय के साथ एकता के बारे में यदि वे गंभीर हैं तो उन्हें साबित करना ही होगा कि वे हिंदू नहीं हैं। वर्ना ऐसे कितने प्रगतिशील काॅमरेड हमारे साथ ही हैं जो कुण्डली मिलाकर ही अपने बच्चों की शादी करते हैं और जब कभी किसी काॅमरेड का प्रेम विवाह होता है तो किसी ‘दैवीय हस्ताक्षेप’ से उनका जीवनसाथी उनकी ही जाति का होता है। जाति और हिन्दू धर्म के मुक्त होने से ही भारत में अंतरवर्गीय एकता का आधार निर्माण होगा जो श्रमजीवी जनता के विभाजन कोे रोकेगा क्योंकि जाति, श्रम का ही नहीं ‘श्रमिकों का भी विभाजन है।’

वि.श.

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