Posted by chimeki on December 23, 2016
सैफ अली खान और करीन कपूर ने अपने बेटे का तैमूर रखा तो भारत में कोहराम मच गया। विवादास्पद लेखक तारिक फतह ने करीन और सैफ की यह कह कर आलोचना की कि इस नाम से भारतीय भावनाएं आहत होती हैं। कारण: तैमूर एक क्रूर सम्राट था जिसने लाखों लोगों का कत्ल किया। तारिक के लिए भारत का अर्थ एक खास धर्म के लोगों से है जिसे ‘समझदार’ लोगों ने तुरत पकड़ लिया। लोग यह भी कहते हैं कि तैमूर विजित लोगों को मार कर नरकंकालों का पिरामिड बनाता है। यह कितना सच है इस बात की कोई खास जानकारी कम से कम इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है। जो उपलब्ध है वह दुष्प्रचार याने प्रोपोगेण्डा है।
प्रोपोगेण्डा का राजनीति मकसद होता है। यह विवेकहीन कुतर्को पर आधारित होता जिसका मकसद लोागों को भ्रमित कर राजनीतिक लाभ हासिल करना होता है। तो भी सवाल उठता है कि तैमूर से संबंधित सही इतिहास का पता कैसे चल सकता है जबकि कोई खास लिखत प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
उज्बेकिस्तान में तैमूर राष्ट्रीय हीरो है। यूरोप के पुनर्जागरण काल में कई प्रसिद्ध लेखको ने तैमूर को नायक का दर्जा दिया। उसकी खास वजह यह थी कि यूरोप के राजा उसे अपना सहयोगी मानते थे क्योंकि उसने अधिकतर मुस्लिम सम्राज्यों को पराजित किया था।
भारत में हाल तक तैमूर को मुगल राजाओं के पूर्वज के रूप में ही याद किया जाता है और दिल्ली में तैमूर नगर भी है। बीबीसी हिन्दी के लिए एक लेख में इतिहासकार राजीव लोचन का दवा है कि तैमूर ने ”हिन्दुओं को ढूंढ ढूंढ कर कत्ल करने का आदेश दिया’। इस के बावजूद उपलब्ध सामग्री तैमूर के कत्लेआम का कोई ठोस प्रमाण नहीं देती। राजीव लोचन के लेख में संदर्भ नहीं हैं। विद्वानों का कहना है कि हिन्दू शब्द नया है। धर्मग्रंथों में इसका उल्लेख तक नहीं है। इसलिए ‘हिन्दुओं को ढूंढ ढूंढ कर कत्ल करने’ का आदेश देने की बात सतही लगती है। और यदि ऐसा है भी तो उस समय सिंधु नदी के पार रहने वालों को हिन्दू कहा जाता था तो यह किसी धर्म विशेष के कत्लेआम का आदेश तो नहीं ही होगा।
तैमूर की जो पेंटिंग इंटरनेट पर उपलब्ध है उनमें उसके आसपास कोई भी कंकालों का मकबरा नहीं दिखाई
देता। किसी पेंटिंग में वह दिवाभोज का आयोजक है और कहीं दिवाने खास में गुफ्तगू में व्यस्त और कहीं कहीं युद्ध की झांकी। चंगेज खान और कुछ हद तक स्टालीन की तरह ही तैमूर का इतिहास भी उसके विरोधियों ने अधिक लिखा इसलिए थोड़ी नाइंसाफी का स्पेस भी रह जाता है। कहा जाता है कि उसने भी एक आत्मकथा जैसा कुछ लिखा था लेकिन उसे प्रमाणिक नहीं माना जाता। तो ऐसे में तैमूर नाम पर विवाद खड़ा करना और सैफ या करीना को कठघरे में खड़ा करना एक पाखंड से अधिक कुछ नहीं है।
पत्रकार अरविन्द शेष ने एक जगह टिप्पणी की है कि तैमूर नाम को एक खास पूर्वाग्रह के साथ जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। उसका एक अर्थ लौहा भी होता है।
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