We are often reminded that no one is perfect, yet in our offices and homes, we are expected to be flawless. Even though it is said that participation is more important than winning, at the end of the day, we are judged by our achievements, not by our enthusiasm. The pressure to outperform others is weighing heavily on us.
What if I told you that being imperfect and making mistakes repeatedly—even if those mistakes lead to catastrophes of unimaginable scale and profound misery—is absolutely fine? What if I told you that feeling guilt over destroying lives and ruining families is unnecessary? What if I told you that the worse you do to others, the greater respect you gather, and that this brings you closer to the Ultimate, an image of God? What if I claimed that to err is, in fact, divine?
I am sure you won’t believe me. But just look closely at God’s methods. His ways are no different from those of Mr. Mohan Kumar, who repairs my computer. Mr. Mohan removes a wire from the motherboard, cleans it, and fits it back in. It doesn’t work. He removes another wire from the socket, cleans it, and puts it back. He does this with every wire inside the CPU. By evening, as he prepares to leave, my computer finally flickers. Three small LED lights start to twinkle, and the fan begins to hum.
“Ho gaya, sir,” he declares, wiping his hands on a towel.
“What was it?” I ask.
“It was a fault in a wire,” he shrugs nonchalantly.
“Still,” I expect more details.
“Just a wire issue, don’t worry about it. I’m already very late,” he replies and heads off.
Occasionally, Mr. Mohan declares, “Motherboard badalna padega.” I know he doesn’t have all the answers. He knows he doesn’t know. Yet he continues to work on it, striving to make sense of the situation, trying not to repeat old mistakes, yet making the same ones all over again.
This is exactly how God functions. He created Adam in His image. Adam and Eve lived in a place that was brand new, just five days older than they were. Since God had created everything without foresight of what would come, by the time of Noah, everything had become so messed up that He had to, like Mr. Mohan, after many acts of cleaning and reconnecting wires, declare, “Motherboard badalna padega,” and send Noah on a long voyage while He contemplated His next plan.
Just when we thought everything was okay, only after 400 years, things had become so messed up again that He had to send Abraham to shake things up a bit. After Abraham He introduced Moses.
This Moses repair also wasn’t definitive, which is why Jesus, the antivirus, was created. Now Muslims tell us that Jesus didn’t work either, so God sent Prophet Mohammed. Even after the Prophet, things haven’t quite changed, have they?
My purpose in recounting this story, which you already know, is to highlight the main takeaway from our holy books: these texts have countless interpretations, but all past interpretations miss the major point God wants to emphasize: not only does God make mistakes, but He is also obsessed with repeating them again and again.
Today, humanity may be wiser than God because His imagination seems to have reached a dead end. If we still seek His guidance, it likely won’t yield results. It is said that nothing is certain, but one thing is clear: God never had a solution. If we have reached this far, it is not due to God’s will but rather the will of the people who, knowing that the Father is flawed, did their best to survive, occasionally using God’s scriptures to discipline others, fully aware that they are of little use.
So, God is not solving our problems. Involving Him in our issues may only exacerbate them—much like the NGO feminists in India, whose solution to the problems faced by Indian wives is simply to get a divorce. Similarly, if we approach God with our problems, He might just ask one of us to build a boat and leave.
VS
To err is divine
Posted by chimeki on October 3, 2024
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दिलीप मंडल किधर?
Posted by chimeki on August 5, 2023

दिलीप मंडल जी को वो सहूलियत है जो बहुत कम लोगों के पास होती है: वो किसी विचार को नहीं ढोते किंतु विचार उनको ढोते हैं. उनकी एक तय मंजिल है जहां पहुंचने के लिए वो विचारों की बसें लगातार बदलते रहते हैं. फिलहाल वो संविधान, सामाजिक न्याय, उत्पीड़ित समाजों की एकता और इंसाफ की बस से उतर कर हिंदुत्व के बुलडोजर में सफर कर रहे हैं.
दिलीप जी लगातार यह याद करवाते हैं कि दलित और पिछड़े लोगों के लिए सही विचारधारा अवसरवाद है. वो इस मामले में कांशीराम का हवाला भी देते हैं. लेकिन मूल बात है कि जबकि कांशीराम का “अवसरवाद” राजनीतिक नेतृत्व लेने की एक टैक्टिस है, दिलीप जी कांशीराम की मान्यता की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर “अवसरवाद” को स्ट्रेटजिक बना देते हैं. उनका “अवसरवाद” स्थाई है. इस तरह उनका “अवसरवाद” दलित और दमित लोगों को सामूहिक रूप से संगठित हो कर स्वयं और संपूर्ण समाज के रूपांतरण करने से वंचित करता है और उत्पीड़ित लोगों को सत्ताधारियों के आचरणानुसार पीछे-पीछे चलने के लिए प्रेरित करने वाला है.
हाल में जिस तरह के साहित्य को उन्होंने प्रोत्साहन दिया है या लिखा है, वो इसकी एक मिसाल है. उदारहण के लिए, प्रिंट वेबसाइट में प्रकाशित एक आलेख में सिंधिया राजवंश का बचाव यह कह कर किया गया है कि उपनिवेश शासन के खिलाफ 1857 की क्रांति के साथ उनकी धोखेबाजी रणनीतिक थी. उन्होंने उपनिवेश शासन के साथ सिंधिया राजवंश की साठगाठ को 19वीं सदी में मराठाओं और पेशवाओं की काल्पनिक टकराहट के रूप में पेश किया है. इस प्रकार वो साठगाठ को पेशावा शासन को खत्म करने की मराठा राजनीति के रूप में रखते हैं. लेकिन पूछा जाना ही चाहिए फिर ऐसा क्या था जिसने पेशवा शासन के अंत के बाद भी मराठा राजाओं को अंग्रेजों के साथ उपनिवेश काल के अंत तक भी बनाए रखा?
कॉलेजियम के बहाने न्यायपालिका के खिलाफ बीजेपी के हमलों के भी बचाव में दिलीप जी आ गए हैं. वो मासूम नहीं हैं कि न समझते हों कि कॉलेजियम को आधार बना कर न्यायपालिका के खिलाफ बीजेपी का हमला किसी सामाजिक न्याय के उद्देश्य के लिए नहीं है, बल्कि हिंदू राष्ट्र के निर्माण के अपने रास्ते में वो न्यायपालिका को बड़ा रोड़ा देख रही है. अपनी तमाम लेगेसी खामियों के बावजूद न्यायपालिका ही एक मात्र ऐसी संस्था है जो सरकार को मनमानी करने से रोकने की क्षमता रखती है. हाल के कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की निरंकुशता पर लगाम लगाने का संक्षिप्त ही सही लेकिन प्रयास किया है (ईडी निदेशक के कार्यकाल विस्तार, मणीपुर हिंसा, आदि). लेकिन दिलीप जी द्वारा न्यायपालिका पर हमला न्यायपालिका में सुधार ला कर इसे और प्रगतिशील और समावेशी बनाने के लिए नहीं है बल्कि वो इसे बीजेपी के हितार्थ कमजोर करते हैं.
इस बीच वो दलित-मुस्लिम एकता का दिखावा भी त्याग चुके हैं और “व्यापक हिंदू एकता” की आरएसएस की मान्यता के प्रचारक हो गए हैं. एससी आरक्षण में मुस्लिम और ईसाइयों को शामिल करने की बात का जिस प्रकार वो विरोध कर रहे हैं वो संघ के साथ उनकी बढ़ती निकटता को दिखाता है. एससी आरक्षण में मुस्लिमों का विरोध करते हुए दिलीप जी बुद्ध धर्म और सिख धर्म को हिंदू धर्म का हिस्सा भी बता रहे हैं. यह कोई नई व्याख्या नहीं है बल्कि यह आरएसएस का पुराना एजेंडा है. इसका एक उदाहरण है कि संघ के बड़े नेता इंद्रेश कुमार ने सितंबर 2017 में तीन दिवसीय “अन्तर्राष्ट्रीय इक्ष्वाकु वंशीय सम्मेलन” का आयोजन करवाया था. वहां उन्होंने जोर दे कर कहा था कि महावीर, बुद्ध और गुरुनानक, ये सभी इक्ष्वाकु वंशीय हैं. यानी ये सभी एक ही सनातन धर्म की अलग-अलग शाखाएं हैं.
यहां इस बात पर जोर देने की जरूरत नहीं है कि आर्थिक नीतियों में वो पूंजीवाद के वैसे ही समर्थक हैं जैसा आरएसएस है. आरएसएस शुरू से ही पूंजीवाद का समर्थक रहा है. लेकिन जिस दौर के पूंजीवाद का आरएसएस समर्थक है उस दौर का पूंजीवाद क्रांतिकारी नहीं है, बल्कि वो फासीवादी हो चुका है. और इसलिए आरएसएस का पूंजीवादी एक संकीर्ण, क्रोनी, नस्लवादी और उपनिवेशवादी पूंजीवाद है. दिलीप जी जब अडानी का, राष्ट्रीय उद्योगों में विदेशी निवेश का और कृषि में कारपोरेट घुसपैठ का समर्थन कर रहे होते हैं तो वो पुराने दौर के क्रांतिकारी पूंजीवाद का नहीं, जो समंतवाद के खिलाफ एक प्रगति थी, बल्कि पेरासाइट, मनवताद्रोही, नस्लवादी और धर्मांध पूंजीवाद का समर्थन कर रहे होते हैं. संक्षिप्त में कहें तो वो नवउपनिवेशवाद के अपोलोजिस्ट अथवा समर्थक हैं. वो अपनी बांहे फैला कर उस बदनाम उपनिवेशवाद की दूसरी वापसी का इंतजार कर रहे हैं जिसने दुनिया की तमाम महान सभ्यताओं को, मेहनतकश लोगों को बर्बाद कर दिया था.
लेकिन दिलीप मंडल का यह वैचारिक स्खलन अनायस नहीं है. उनका यह दोष उस वैचारिक परंपरा की सीमा के चलते है जो खटारा हो चुकी बस को ड्राइवर बदल कर चलाना चाहती है. अभी एक मौके पर दिलीप जी ने लिखा था कि बीजेपी ब्राह्मण-बनिया पार्टी से बदल कर ओबीसी पार्टी हो गई है. इसके उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि बीजेपी के 38 केंद्रीय पदाधिकारियों में से 8 को छोड़ कर सभी ओबीसी हैं. वो बीजेपी में आए इस बदलाव को “दूसरा लोकतांत्रिक उभार” कहते हैं. इस व्याख्या से वो भारतीय इतिहास के एक दर्दनाक सच पर परदा डाल रहे हैं जो यह है कि यह बहुजन राजनीति का दूसरा उभार नहीं है बल्कि यह बहुजन राजनीति का हिंदूकरण हो जाने का संकेत है. जबकि पहले उभार में “मिले मुलायम-कांशाराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम” यानी दलित-बहुजन-अल्पसंख्यक एकता ने देश को एक हद तक राजनीतिक फासीवाद से बचाया था, वहीं इस दूसरे उभार में बहुजन-द्विज की एकता अल्पसंख्यक समाज के नरसंहार को तेजी से करीब ला रही है.
भारत का दलित समाज एक क्रांतिकारी समाज है. भारतीय दलित समाज में वे सारी विशेषताएं हैं जो उसे समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण का अगुआ बनाती है. पिछली सदी में यहां के दलित समाज का तीव्र राजनीतिकरण हुआ. उसने अपनी एक अलग पहचान भी बनाई जो एक हद तक दलित राष्ट्रीयता का ही भ्रूण रूप है. इसके साथ ही उसने मुस्लिम, सिख और अन्य अल्पसंख्यकों को साथ लाने जैसे कई राजनीतिक प्रयोग भी किए. लेकिन उसके भीतर क्रमशः यह समझ भी पैदा हो रही है कि वर्तमान राजनीतिक सत्ता में सांकेतिक हिस्सेदारी ऐतिहासिक रूप से जारी उत्पीड़न का मूल हल नहीं है. यही वो खतरा है जिससे भारत की सरकारें और उनके समर्थक भयभीत रहते हैं. इस खतरे के खिलाफ उनके दो हथियार हैं: दलित समाज का हिंदूकरण और वाम विचारधारा पर बेबुनियाद हमला. दिलीप मंडल जी इन दोनों कामों को कुशलता से कर रहे हैं.
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तालिबान : भू-राजनीतिक परदे के पीछे
Posted by chimeki on September 22, 2021

अफगानिस्तान में अगस्त 15 की तालिबानी क्रांति के बाद इस विषय पर लेखों की बाढ़ आ गई है. चूंकि मूल भारतीय लेखन, खासकर हिंदी और अंग्रेजी में, भारतीय सिनेमा की भांति भावनात्मक लेक्चर अधिक होता है जिसमें किसी घटनाक्रम को उसके मूल संदर्भ में प्रस्तुत करने की बजाए अपने-अपने यूटोपिया से उसकी तुलना की जाती है, इसलिए तालिबान के सत्तारोहण को भी एक आभासी फ्रेमवर्क में रख कर अफगानिस्तान में उसके आने को नए-नए मायने दिए जा रहे हैं लेकिन इन सब के सार में एक ही बात है कि तालिबान के आने से अफगानिस्तान पीछे चला गया है.
“रिसर्च मेथडोलॉजी” के सवाल पर भी पश्चिमी सिफारिशों से काम लिया जा रहा जिसमें एकाध अपवाद को छोड़ दिया जाए तो मूल चिंता इसी पर केंद्रित होती है कि तालिबान की मजबूती के पीछे उसे मिला चीन, रूस और पाकिस्तान सहित मुस्लिम देशों का समर्थन है. कई लोग तो यह भी दावा कर रहे हैं कि अमरीका ही तालिबान की वापसी के पीछे है. कभी-कभार पूर्व अफगानी सरकार में व्याप्त घोर भ्रष्टाचार पर भी बात होती है लेकिन सिर्फ याद दिलाने के अंदाज में.
इस तरह के विश्लेषण में मूल बात को पूरी तरह से गायब कर दिया जाता है कि आखिर क्यों अफगानिस्तान में सैकड़ों सामंत और युद्ध सरदारों होने के बावजूद जनता ने तालिबान को अमरीका उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व सौंपा? क्यों वहां की जनता उसे लड़ाके और धन उपलब्ध कराती रही? इसे समझने के लिए मूल रूप से अफगानिस्तान की सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है क्योंकि यही वह धरातल है जिसने तालिबान के लिए जरूरी लड़ाकों और संसाधन की कमी को कम होने नहीं दिया.
तालिबान से पहले अफगानिस्तान में किनके पास सत्ता थी?
अफगानिस्तान में 1990 से पहले एक संक्षिप्त समय के छोड़ दिया जाए तो मूल रूप से वह सामंतियों का संघ या फेडेरेशन ही रहा. आंतरिक रूप से यह भूभाग कई हिस्सों में बटा था जिनका शासन कबिलाई मुखिया करते थे. 19वीं शताब्दी में अंग्रेज उपनिवेशवाद ने ऊपर से क्रांति का पहला प्रयोग करते हुए केंद्रीकृत शासन देने का प्रयास किया. यह प्रयोग विफल साबित हुआ और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों को पाछे हटना पड़ा. बाद के दौर में ऐसे ही प्रयास बार बार-बार हुए लेकिन केंद्रीय शासन व्यवस्था का सपना पूरा नहीं हो सका और अफगानिस्तन की मूल सत्ता संरचना वैसी ही बनी रही जैसी पहले थी. इस सत्ता संरचना का बोझ सबसे अधिक सामंतों के अधीन रह रहे भूमिहीन किसान और अन्य निचले तबके या लोवर स्ट्राटा पर पड़ रहा था. उनके पास क्रूर सामंती उत्पीड़न को स्वीकार करने के सिवा और कोई चारा नहीं था.
1970 के दशक में इन सामंतियों ने अपने इलाकों में अफीम की खेती करनी शुरू की जिससे धीरे-धीरे कृषि उत्पादन पूरी तरह धराशाई हो गया और पुरानी कृषि में पारंगत कृषकों की एक बड़ी आबादी को अपने इलाकों से विस्थापित होने पड़ा. साथ ही, उन देशों के लिए, जो अफगानिस्तान में अपना प्रभाव विस्तार करना चाहते थे, इस देश का सामंती ढांचा अवरोध खड़ा कर रहा था. कारोबार या किसी नीति को लागू कराने की मंजूरी केंद्रीय शासन से लेना ही पर्याप्त नहीं था बल्कि सामंती मालिकों की मंजूरी भी उतनी ही जरूरी थी.
1973 में राजा मोहम्मद जाहिर शाह को अपदस्थ कर दिया गया. 1933 से 1973 तक चले उनके शासन को आज पश्चिमी विद्वान आधुनिकीकरण के प्रयासों के लिए याद करते हैं लेकिन मूलतः शाह का शासन सामंती ढांचे को ही बचाए रख कर स्वयं को बचाए रख सका था. अपने-अपने इलाकों में सामंतियों की निरंकुशता बेलगाम जारी रही. शाह के संवैधानिक सुधारों का युद्ध सरदारों की निरंकुशता पर कोई असर नहीं पड़ा बल्कि भू-मालिकों, मुल्लाओं और कबिलाई मुखियाओं के बहुमत वाली संसद पुराने संबंधों में किसी भी तरह के सुधारों में बाधा ही बन गई.
1970 में, पुराने उपनिवेशवाद के सत्ता सुधार में विफल हो जाने के बाद, सोवियत रूस ने अफगानिस्तान में इतिहास की टूटी श्रृंख्ला को जोड़ने की कोशिश की. उसने भी ऊपर से क्रांति का रास्ता चुना यह भूल कर कि पहले के ऐसे सभी प्रयासों का क्या हश्र हुआ है. 1973 में जाहिर शाह को अपदस्थ कर अफगान सेना के रूस समर्थक हिस्से और कम्युनिस्ट पार्टी पिपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान या पीडीपीए की मदद से मोहम्मद दाऊद खान देश के मुखिया बन गए और अफगानिस्तान को गणतंत्र घोषित कर दिया गया. 1978 में एक सैन्य कू के बाद सत्ता पर पीडीपीए का पूर्ण रूप से कब्जा हो गया. पीडीपीए ने भी सामाजिक सुधारों को ऊपर से लागू किया.
असंतुष्ट सामंती सरदारों के लिए स्वाभाविमानी अफगानी जनता के सामने पीडीपीए को रूस की कठपुतली सरकार के रूप में चित्रित करना कठीन नहीं था और राष्ट्रीय भावना और इस्लामिक कट्टरपंथ के कॉकटेल ने जल्द ही केंद्रीय सरकार के खिलाफ हिंसक विद्रोह का रूप धारण कर लिया जिसकी परिणति 1994 में पीडीपीए के शासन के अंत में हुई. लेकिन चूंकि विद्रोही मुजाहिद्दीनों का मुख्य लक्ष्य अपने पुरानी सामंती विशेषाधिकारों को पुनः प्राप्त करना था इसलिए पीडीपीए सरकार के विघटन के तुरंत बाद ही वे आपसी युद्ध में उलझ गए और देश एक बार फिर अस्थिरता के दौर में चला गया. इसी अस्थिरता का जवाब तालिबान ने तलाशा. और ऐसा कहना कतई अतिश्योक्ति नहीं है कि अफगानिस्तान में पूंजीवादी आधुनिकता तालिबान के कंधों पर सवार हो कर आएगी. फिलहाल वहां की आधुनिकता का पैरहन पश्चिमी कोट-पैंट को देखने की हमारी आंखों की आदत को चुभता है लेकिन लिबास दोयम है, माल असली है यानी खाटी पूंजीवादी.
तालिबान और केंद्रीय शासन का सपना
तालिबान अपने मूल स्वाभाव में अफगानिस्तान में केंद्रीय शासन की एक सदी पुरानी आकांक्षा की अभिव्यक्ति है. तालिबान अपने लिबास के भीतर उस समस्या का समाधान है जिसने अफगानिस्तान को आधुनिकता और पूंजीवादी विकास की ओर अग्रसर होने से रोके रखा है. अपने धार्मिक लिबास में तालिबान अफगानिस्तानी जनता को एथनिक लॉयलटी की आदिम बेड़ियों से मुक्त कर उसके मनोविज्ञान में पूंजीवादी राष्ट्रवाद (इस्लामिक छौंक वाला) की भावना की स्थापना कर रहा है. मूलतः तालिबान सामंतवाद विरोधी जनता का प्रतिनिधि संगठन है. इसके सदस्य भूमिहीन-गरीब पृष्ठभूमि से आते हैं. स्वयं इसके संस्थापक मुल्ला उमर का जन्म भूमिहीन गरीब परिवार में हुआ था जिसका अफगान की राजनीति से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था.
किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर एंटोनिओ ग्युस्तोज्जी (Antonio Giustozzi) ने 2019 में प्रकाशित अपनी किताब दि तालिबान एट वॉर (युद्ध में तालिबान) में तालिबानी समर्थकों और लड़ाकों की सामाजिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करने के लिए सैंकड़ों समर्थकों और लड़ाकों का इंटरव्यू किया. हालांकि पुस्तक में पश्चिमी पूर्वाग्रहों का अंबार है लेकिन इसके बावजूद वह यह स्वीकार करते हैं कि लगभग सभी समर्थकों और लड़ाकों ने, जिनसे उन्होंने बात की, इस बात से इनकार किया कि तालिबानी नौजवानों को जबरन या धमका कर भर्ती करते हैं.
पश्चिमी घुड़की (snub) के साथ ग्युस्तोज्जी कहते हैं कि तालिबान स्थानीय राजनीति को खूब अच्छी तरह से समझते हैं और सामाजिक और जातीय तकरार को भूनाना जानते हैं. एक जगह वह लिखते हैं, “किसी गांव के कमजोर कबिले का तालिबान का समर्थन बन जाना राजनीति गठबंधन के उसी पैटर्न की पुनरावृत्ति है जो 1980 में थी या शायद उससे भी बहुत पहले.”
1996 में जब तालिबान ने सत्ता पर कब्जा किया तो उसने सिनेमा हॉल, रात भर नशे में सराबोर रहने वाले पब हाउस, अमीरों के लिए मसाज सेंटर या स्पा नहीं खोले, बल्कि उसने एक ऐसे शासन वयवस्था का मॉडल अफगानी जनता को दिया जो उनके लिए आरंभिक स्तर पर ही सही, सामंती अत्याचारों से मुक्ती का रास्ता खोलता था. और पहली बार ऐसा नीचे से ऊपर की ओर हो रहा था. एथनिक आदिम लॉयलटी से बंधे ग्रामीण नौजवान जो पहले सामंतों की मिलिशिया में खटा करते थे, तालिबान के वफादार हो गए थे. सामंतवाद की जड़ कटने लगी थी.
2001 में अमरीका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और तालिबान को काबुल से हटना पड़ा. अमरीका ने हामिद करजई के नेतृत्व में संक्रमणकालीन सरकार का गठन किया. सत्ता में आते ही इस सरकार ने देश के पुराने एलीटों को यानी सामंतों और युद्ध सरदारों को पुनः वे विशेषाधिकार दिला दिए जो तालिबान ने छीन लिए थे. पुराने दौर का सामंती उत्पीड़न दुबारा आरंभ हो गया. अफीम और नशे का कारोबार जिसे तालिबानी सरकार ने कुचल दिया था, इन युद्ध सरदारों ने फिर शुरू कर दिया और अफगानिस्तान एक बार फिर अफीम का सबसे बड़ा स्रोत देश बन गया. और एक बार फिर तालिबान के वापस आने की जमीन तैयार हो गई. यहां बैठे हम लोगों ने नहीं बल्कि अफगान की जनता ने तालिबानियों का शासन देखा था. हमारे तथाकथित सौंदर्य बोध या एस्थेटिक सेंस में भले तालिबान हिंसक नजर आते हैं लेकिन अफगान की जनता के लिए वे शांति और इंसाफ की गारंटी हैं.
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भगवान राम का भारतीय होना आरएसएस के लिए जरूरी क्यों है
Posted by chimeki on July 15, 2020

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भगवान राम और उनकी अयोध्या को लेकर हाल में जो बयान दिया है उससे भारतीय हिंदुओं का कट्टरपंथी और नस्लवादी तबका और उसके हितों को ऊर्जा देने वाले मीडिया का एक हिस्सा बेचैन और कंफ्यूज हो गया है.
कंफ्यूजन की सबसे बड़ी वजह है कि कम्युनिस्ट ओली ने राम के अस्तित्व को खारिज नहीं बल्कि राम की सांस्कृतिक परंपरा को भारतीय हिंदुओं से झपटने की कोशिश की है. अंग्रेजी में इसे कोऑप्ट करना कहते हैं. (वह खारिज करते तो खेल सरल होता और होमग्राउंड पर होता) बेचैनी और कंफ्यूजन ने इस तबके के भीतर गहरे तक मौजूद नस्लवादी अहंकार को फिर सतह पर ला दिया है.
ओली का वह बयान यूं था : “हम अब भी मानते हैं कि हम लोगों ने भारत के राजकुमार राम को सीता दी. भारत के नहीं हमने अयोध्या के राजकुमार को सीता दी थी. अयोध्या जो बीरगंज के पश्चिम की ओर एक गांव है. वह आज बनाई गई (नकली) अयोध्या नहीं है. वहां (भारत के यूपी) की अयोध्या भीषण विवाद में है. हमारी वाली पर कोई विवाद ही नहीं है. अयोध्या बीरगंज के पश्चिम में है, वाल्मीकि आश्रम नेपाल में है और जब दशरथ को संतान नहीं हुई तो उनके लिए पुत्रेष्टी यज्ञ कराने वाले पंडित जी रिडी (पाल्पा जिले में हैं) के थे. और इसलिए ना उनकी संतान राम भारत की है, ना अयोध्या भारत में है.”
बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर अन्य बातों के अलावा यह जरूर कहा कि “प्रधानमंत्री की अभिव्यक्ति का इरादा किसी की भावना या मत को ठेस पहुंचाना नहीं था”, लेकिन जैसा भारतीय मीडिया बता रहा है नेपाल ने ओली के बयान को वापस नहीं लिया है बल्कि विदेश मंत्रालय ने अपने बयान से इस मामले को और अधिक विस्तार दिया है.
उस महत्वपूर्ण बयान में लिखा है, “श्रीराम के बारे में कई सारे मिथ और संदर्भ हैं और प्रधानमंत्री रामायण में वर्णित सांस्कृतिक भूगोल पर भावी शोध और अध्ययन के महत्व को रेखांकित कर रहे थे”.
फिर भी इस बयान को नेपाल की ह्युमिलिटी ही कहना चाहिए क्योंकि भावना को ठेस पहुंचाकर ओली की पार्टी को वोट का घाटा नहीं होने जा रहा था (नेपाल ने इस बारे में उपरोक्त बयान के अलावा कुछ नहीं कहा है लेकिन आजतक वहां के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली के नाम से झूठी खबरें चला रहा है).
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने जिस “भावी शोध और अध्ययन के महत्व” की बात की है, भारत में वह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. वर्तमान राजनीतिक परिवेश में वह धीमी जरूर हुई है लेकिन उसका महत्व कम नहीं हुआ है.
प्रोफेसर एच. डी. संकालिया उसी अकादमिक परंपरा का महत्वपूर्ण स्तंभ हैं. रामायण ग्रंथ में बताये गए नगरों अयोध्या, लंका, दंडकारण्य आदि, पर उनका बहुत शानदार अध्ययन है (अपने एक लेक्चर “रामायण: मिथ ऑर रिएलिटी” में उन्होंने अनुमान लगाया है कि रावण की लंका मध्य प्रदेश के वर्तमान शहर जबलपुर के आसपास कहीं हो सकती है. एक और बात जो उनका लेक्चर पढ़ने से मेरे मन में आती है वह यह कि वर्तमान श्रीलंका को रामायण की लंका बताना विस्तारवादी मानसिकता से प्रेरित हो सकता है).
इसी तरह वानरराज बाली की राजधानी किष्किंधा को भी उन्होंने काल्पनिक बताया है. अयोध्या के बारे में उनका तर्क है कि वह किष्किंधा और लंका की तरह ही कुषाण और गुप्त काल में यानी 100 ईसवी और 400 ईसवी के बीच बसी होगी.
आगे बढ़ने से पहले एक मजेदार बात. भारत के बाद नेपाल में आरएसएस की सबसे ज्यादा शाखाएं हैं, तो उन शाखाओं के प्रमुखों से यदि पूछा जाए कि उनका ओली के कथन पर क्या स्टैन्ड है तो वे क्या कहेंगे? मतलब अगर वे कहें कि ओली झूठे हैं, तो विरोधी उन पर विस्तारवादी होने की तोहमत मढ़ देंगे और यदि वे कहें कि ओली सही हैं, तो वृहद आरएसएस की परंपरा से स्वयं को काटने जैसी बात होगी. इससे आगे बढ़कर यदि कह दें कि दोनों की सही हैं तो उनके राम ऐतिहासिक पुरुष से मिथक बन जाएंगे और संघ के पाठ्यक्रम में रोमिला थापर को भी स्थान मिल जाएगा.
स्कूल के दिनों में एक उपन्यास पढ़ा था जिसमें एक चीनी युवती माओ त्सेतुंग की क्रांति के बाद भारत आ जाती है और बाद में विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़ जाती है. उस युवती को यह देख कर मन में बड़ा क्षोभ होता है कि भारत में बुद्ध की आंखें बड़ी-बड़ी हैं. उसे याद आता है कि चीन में बुद्ध की आंखें छोटी होती हैं. वह सोचती है कि यदि वहां भी बुद्ध की आंखें बड़ी बनायी जातीं तो क्या चीनी लोग बुद्ध को स्वीकार करते?
राम अयोध्या में हुए हों या नेपाल के बीरगंज में, इससे कैफ़ी आज़मी को, जिनके राम को छह दिसंबर को दूसरा बनवास मिला था भले फर्क ना पड़ता हो, लेकिन सावरकर को छटपटाहट जरूर होती है क्योंकि सावरकर को मानने वालों के लिए राम का भारतीय होना (और तो और उत्तर भारतीय होना) बहुत जरूरी है. उनकी संकीर्ण सोच एक भूगोल विशेष और नस्ल विशेष की परिधि में कैद है जिससे बाहर सोचना उनके बस की बात है ही नहीं. वे इससे बाहर सोचेंगे तो पाएंगे कि वे जहां फंसे हुए हैं वह भारत का न वर्तमान है और न ही उसका भविष्य बल्कि एक अतीत है. वह भी ऐसा अतीत जो बहुत हद तक काल्पनिक है. वह एक ऐसा अतीत है जिसकी पुनरावृत्ति भारत के लिए ही नहीं, दक्षिण एशिया सहित दुनिया भर के लिए घातक है.
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नेपाल में ओली-प्रचंड संघर्ष के पीछे एमसीसी की क्रोनोलॉजी को समझिए
Posted by chimeki on July 3, 2020

नेपाल में सत्तारूढ़ नेकपा के दो अध्यक्षों- प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्मकमल दाहाल प्रचंड- की लड़ाई एक निर्णायक मोड़ में पहुंच गई है. पार्टी में ओली तेजी से अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं. दो दिन पहले तक ओली के वफादार माने जा रहे नेता पाला बदल कर प्रचंड खेमे में आ गए हैं. प्रचंड से ओली और फिर ओली से प्रचंड खेमे में आने वाले एक महत्वपूर्ण नेता गृहमंत्री राम बहादुर थापा बादल भी हैं. वह बुधवार की सुबह ओली की बुलाई बैठक में शामिल थे. गुरूवार को प्रचंड की बैठक में शामिल हुए थे. (यहां सिर्फ सहूलियत के लिए प्रचंड खेमा कहा जा रहा है. वास्तव में वह तीन शीर्ष नेताओं- माधव कुमार नेपाल, झलनाथ खनाल और प्रचंड- का खेमा है. ये तीनों नेता नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री हैं. इस खेमे के चौथे नेता हैं वामदेव गौतम. गौतम पूर्व उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री हैं.
इससे पहले मैंने लिखा था कि ओली और प्रचंड की लड़ाई पार्टी के दो नेताओं या दो गुटों की लड़ाई नहीं है बल्कि यह नेपाल में चल रही चीन-अमेरिका खींचतान का राजनीतिक चेहरा है. इस लड़ाई की मूल वजह अमेरिका-नेपाल के बीच प्रस्तावित मिलेनियम चैलेंज कारपोरेशन (एमसीसी) समझौता है जो अमेरिका के नेतृत्व में चीन को घेरने की हिंद-प्रशांत रणनीति का हिस्सा है. ओली खेमा, जिसका हिस्सा नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली भी हैं, एमसीसी को संसद में पारित करवाना चाहते हैं और प्रचंड पक्ष इसका विरोध कर रहा है, हालांकि प्रचंड खेमा ओली के विरोध के पीछे समझौते के अलावा भी कई कारण गिनाता है. मिसाल के लिए, प्रचंड खेमे का आरोप है कि दो पार्टियों के बीच एकता के वक्त जो प्रतिबद्धताएं से ओली ने की थीं वह उनसे पीछे हट गए हैं. इन प्रतिबद्धताओं में से एक थी कि ओली और प्रचंड बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद संभालेंगे.
ऐसा नहीं है कि ओली और प्रचंड के बीच हमेशा से ही टकराहट थी. 2014 में केपी शर्मा ओली तत्कालीन नेकपा एमाले के अध्यक्ष बने थे उसके बाद अक्टूबर 2015 में प्रचंड के नेतृत्व वाली एकीकृत नेकपा (माओवादी) के समर्थन से वह पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने. दिसंबर 2017 में हुए आम निर्वाचन में ओली और प्रचंड की पार्टियों ने गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा और दो-तिहाई बहुमत लाकर सरकार बनाई. मई में 2018 में दोनों पार्टियों का विलय हो गया. एकता के बाद एक समय ऐसा भी था जब दोनों नेता एक तरफ होते थे और अन्य नेता दूसरी तरफ, लेकिन जल्द ही ऐसा लगने लगा कि ओली का मकसद प्रचंड को किनारे लगाना है.
मिसाल के लिए, दिसंबर 2018 में ओली की मुख्य भूमिका में नेपाल में एशिया पैसिफिक या एशिया प्रशांत शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें 45 देशों ने भाग लिया. इस आयोजन की तैयारी और संबंधित गतिविधियों से प्रचंड को दूर रखा गया. इस कार्यक्रम को सफलता के साथ आयोजित करने के बाद विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने अमेरिका का दौरा किया और बिना अन्य नेताओं को विश्वास में लिए एमसीसी को देश में लागू करने का वचन दे आए. यहीं से पार्टी के अंदर शुरू हुआ एमसीसी विवाद. याद रखने वाली एक बात यह है कि एमसीसी को सबसे पहले सितंबर 2017 में नेपाली कांग्रेस की सरकार ने प्रस्तावित किया था और उस सरकार का हिस्सा प्रचंड के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी भी थी.
अब क्रोनोलॉजी…
दिसंबर 2018 को विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने अमेरिका भ्रमण के अवसर पर कांग्रेस के शासन में प्रस्तावित एमसीसी को आगे ले जाने का वादा अमेरिका के विदेश मंत्री से किया. बताया जाता है कि ऐसा करते वक्त उन्होंने पार्टी के दूसरे अध्यक्ष प्रचंड से परामर्श भी नहीं किया था.
जनवरी 2019 में प्रचंड ने जैसे को तैसा की तर्ज़ पर ओली और ज्ञवाली से चर्चा किए बगैर वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप के खिलाफ बयान दे डाला. यह बयान प्रचंड और ओली विवाद का पहला सार्वजनिक संकेत था. वेनेजुएला के विद्रोही नेता खुआन गोइदो ने 24 जनवरी को स्वयं को वेनेजुएला का राष्ट्रपति घोषित कर लिया था और अमेरिका ने तुरंत उन्हें मान्यता दे दी थी. नेपाल में प्रचंड ने अमेरिका के इस कृत्य को आंतरिक मामले में हस्तक्षेप बताते हुए एक वक्तव्य जारी कर दिया. पार्टी की ओर से जारी वक्तव्य में उन्होंने अमेरिका के हस्तक्षेप को स्वतंत्र और संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया और कहा कि गोइदो को राष्ट्रपति की मान्यता देना निर्वाचित राष्ट्रपति निकोलस मादूरो के खिलाफ बड़ा षड्यंत्र है. प्रचंड के इस बयान के बाद ओली की सरकार को अमेरिका की डांट सुननी पड़ी. अमेरिका ने नेपाल के राजदूत को तलब कर प्रचंड के बयान के लिए स्पष्टीकरण मांगा. ओली ने बयान को “जीभ का फिसल जाना” कह कर प्रचंड को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाया. लेकिन प्रचंड अपने बयान से पीछे नहीं हटे.
12 जून 2019 को ओली के खिलाफ सार्वजनिक रूप से प्रचंड ने दूसरी बार विद्रोह किया. एक कार्यक्रम में प्रचंड ने मीडिया काउंसिल बिल का यह कह कर विरोध किया कि यह बिल सरकार ने बिना आवश्यक तैयारी के संसद में पेश किया है. उनसे पहले 23 मई को पार्टी के शीर्ष नेता वामदेव गौतम, 31 मई को एशिया मानव अधिकार परिषद और 11 जून को नेपाली पत्रकार परिसंघ ने इस बिल का विरोध किया था. सभी का मानना है कि यह बिल मीडिया पर सेंसरशिप लगाने का प्रयास है.
18 अगस्त को ओली भी खुल कर मैदान में उतर आए और घोषणा कर दी कि वह अगले आम निर्वाचन के बाद ही प्रधानमंत्री पद छोड़ेंगे.
23 अगस्त को एक कार्यक्रम में प्रचंड ने ओली को फिर निशाने पर लिया. इस बात का इशारा करते हुए कि ओली दूसरों की मेंहनत और बलिदान के कारण सत्ता के शीर्ष पर विराजमान हैं, प्रचंड ने एक कार्यक्रम में उनका नाम बिना लिए कहा कि नेपाल के कम्युनिस्ट राजा-महाराजाओं की तरह व्यवहार करते हैं. अन्य देश के कम्युनिस्ट बलिदान देते हैं और जनता के साथ जुड़ते हैं लेकिन नेपाल के कम्युनिस्ट सत्ता में आते ही राजा-महाराजा जैसे हो जाते हैं.
सितंबर 2019 में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने नेपाल की तीन दिवसीय यात्रा की. उन्होंने सत्तारूढ़ पार्टी के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की और इस दौरान चीन ने कई बयान जारी किए जिनमें से एक बयान ने एमसीसी समर्थकों को चौंका दिया. प्रचंड से मुलाकात के बाद जारी उस बयान में चीन के कहा था कि प्रचंड ने आश्वासन दिया है कि “गुट-निरपेक्ष नीति पर नेपाल का मजबूत विश्वास है और वह तथाकथित हिंद-प्रशांत रणनीति को खारिज करता है, वह चीन के विकास में अवरोध डालने वाले प्रयासों का विरोध करता है और उसका हमेशा से मानना रहा है कि चीन का विकास नेपाल के विकास के लिए अवसर है और वह चीन के सफल अनुभव से सीख लेने की इच्छा रखता है.”
इसके बाद के दिनों में पार्टी के अंदर और बाहर एमसीसी का विरोध तीव्र होता चला गया. इसके समर्थन और विपक्ष में, संसद के अंदर और संसद से बाहर के राजनीतिक दल, छात्र और बुद्धीजीवी मैदान में उतर आए.
29 जनवरी से 2 फरवरी के 2020 के बीच चली नेकपा की पूर्ण बैठक में पार्टी में वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल के नेतृत्व में एमसीसी का अध्ययन करने के लिए तीन सदस्यीय कार्यदल का गठन हुआ. 21 फरवरी को कार्यदल ने अपनी रिपोर्ट केपी ओली और प्रचंड को सौंप दी. रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि सरकार एमसीसी को मंजूर न करे.
फिर क्या था? इसके बाद से आर-पार की लड़ाई शुरू हो गई है. चूंकि इस समझौते को पारित करने की अंतिम तिथि यानी 30 जून नजदीक आ रही थी, ओली और समझौते के पक्षधर डेस्परेट हो गए.
20 अप्रैल को दूसरे दलों से एकता कर पार्टी में खुद की स्थिति मजबूत बनाने के लिए ओली ने राजनीतिक दल कानून को संशोधित करने वाला अध्यादेश जारी कराया. इससे पार्टी तोड़ कर नई पार्टी गठन करना आसान हो जाता, लेकिन विरोध के बाद इसे उन्होंने वापस ले लिया.
30 अप्रैल को ओली ने अपनी पार्टी में सेंधमारी के उद्देश्य से पार्टी सचिवालय की बैठक में यह कहते हुए कि कोरोना महामारी खत्म होते ही वह पद से हट जाएंगे, वरिष्ठ नेता वामदेव गौतम को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव सामने रखा. कुछ देर के लिए लगा कि ओली ने मैदान मार लिया है लेकिन ऐसा नहीं हुआ और जैसे-जैसे एमसीसी पारित करने की अंतिम मियाद पास आने लगी दोनों खेमों के बीच भिड़ंत भी तीव्र होने लगी और ओली पक्ष समर्थन के लिए विपक्ष की तरफ ताकने लगा.
16 मई को कोरोना लॉकडाउन के बीच पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने संसदीय दलों की बैठक में एमसीसी को जल्दी से पारित करने की बात कहते हुए ओली को समर्थन देने का इशारा किया. उनकी इस मांग के जवाब में एमसीसी पर बने झलनाथ खनाल वाली तीन सदस्यीय कार्यदाल के सदस्य रहे सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद और पूर्व मंत्री भीम रावल ने 18 मई को संसद में आरोप लगाया कि एमसीसी को “चोर बाटो” (चोर दरवाजे) से पारित करने की कोशिश हो रही है यानी विपक्ष से चोरी छिपे गठबंधन करके, जिसके जवाब में ओली ने कहा कि ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि वह “मूल बाटो” (मुख्य दरवाजे) से पारित होगा.
इस बीच 8 मई को भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने पिथौरागढ़ जिले में बनी एक नई सड़क का उद्घाटन किया. जिस जमीन पर यह सड़क बनी है उस पर वर्षों से नेपाल अपना दावा करता रहा है. (इस विवाद को समझने के लिए वरिष्ठ पत्रकार और नेपाल के मामलों के जानकार आनंद स्वरूप वर्मा का जनपथ में हाल में प्रकाशित लेख पढ़ना अच्छा होगा.) भारत का यह कदम ओली के लिए वरदान बन कर आया और एमसीसी से गिर रही अपनी राष्ट्रवादी छवि को भारत विरोधी हुंकार लगाकर फिर संभालने की कोशिश की. भारतीय मीडिया ने उनको जितना कोसा नेपाल में वह उतने फूलते गए. संसद में विवादित भूभाग को नेपाल का हिस्सा दिखाने वाला नक्शा पारित हुआ तो एक पल के लिए नेपाल ओलीमय हो गया, लेकिन फिर शोर थम गया, ओली की हवा निकल गई और लोग एमसीसी का विरोध करने सड़कों और सोशल मीडिया पर लौट आए.
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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और प्रचंड के बीच जारी झगड़े के पीछे क्या है?
Posted by chimeki on July 2, 2020
नेपाल में सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के दो अध्यक्षों, प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल प्रचंड, के बीच लंबे समय से जारी रस्साकशी 30 जून को जारी पार्टी की स्थायी कमिटी की बैठक में खुल कर सामने आ गई. बैठक में प्रचंड ने प्रधानमंत्री ओली से अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने कहा. समाचार वेबसाइट रातोपाटी ऑनलाइन ने बताया है कि उनकी मांग को बैठक में मौजूद 17 नेताओं का समर्थन था. (पार्टी की स्थायी समिति में 45 सदस्य हैं.) वेबसाइट के मुताबिक प्रचंड की बगावत के बाद ओली अपने करीबी नेताओं और मंत्रियों से मीटिंग कर रहे हैं, जिनमें वह बगावत से निबटने की योजना तैयार कर रहे हैं.
28 जून को कम्युनिस्ट नेता मदन भंडारी की जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में ओली ने “खुलासा” किया था कि भारत उनकी सरकार को गिराने का प्रयास कर रहा है. इस तरह उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से प्रचंड सहित पार्टी में अपने विरोधियों पर भारत परस्त होने का आरोप लगाया था. उस कार्यक्रम में ओली ने कहा था, “यदि कोई समझता है कि नक्शा छापने के कारण सरकार बदल जाएगी तो उसे पुराने दिनों की गलतफहमियों से ऊपर उठने की जरूरत है. प्रधानमंत्री के पद पर बैठे रहने का मेरा मन नहीं है लेकिन अगर मैं हट गया तो फिर नेपाल के पक्ष में बोलने की हिम्मत कोई नहीं करेगा.” बाद में प्रचंड ने स्थायी कमिटी की बैठक में ओली को घेरते हुए कहा कि उनकी ऐसी अभिव्यक्ति से भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंध खराब होंगे.
हालांकि ज्यादातर जानकार मानते हैं कि दोनों नेताओं के बीच तनाव के पीछे दो कारण महत्वपूर्ण हैं. एक, दोनों पार्टियों (माओवादी और एमाले) के बीच मई 2018 में हुई एकता में की गई प्रतिबद्धता को ओली द्वारा पूरा न करना और दो, मिलेनियम चैलेंज कारपोरेशन (एमसीसी).
प्रचंड और उनके समर्थक दावा करते हैं कि दोनों पार्टियों के बीच एकता के वक्त पार्टियों के नेताओं के बीच सहमति हुई थी कि ओली और प्रचंड आधे-आधे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष रहेंगे यानी जब ओली प्रधानमंत्री होंगे तो प्रचंड पार्टी के अध्यक्ष होंगे और जब प्रचंड प्रधानमंत्री बनेंगे तो ओली पार्टी के अध्यक्ष बन जाएंगे. हालांकि बाद में ओली इस सहमति से पीछे हट गए और भारत की वजह से यानी अंग्रेजी में थैंक्स टू इंडिया, नेपाल की राजनीति में उनका दबदबा अधिक हो गया था कि प्रचंड नई पार्टी में उनके खिलाफ खुलकर विद्रोह भी नहीं कर सके.
इसके अलावा नई पार्टी में प्रचंड की वैसी धाक भी नहीं थी जिसकी उन्हें आदत रही है. नई पार्टी के शीर्ष नेता प्रचंड पर विश्वास करने में कतराते हैं क्योंकि प्रचंड जब माओवादी थे तो उनकी पार्टी इन नेताओं को “दलाल पूंजीपति वर्ग के प्रतिनिधि” कहती थी. माओवादी जनयुद्ध के दौरान माओवादी पार्टी और एमाले के कार्यकर्ताओं में अक्सर झड़पें होती थीं इसलिए निचले स्तर पर भी दोनों पार्टियों के नेताओं में आपसी विश्वास का आभाव है. 2010 में तो प्रचंड ने एमाले के वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए काठमांडू की सड़कों में भीषण आंदोलन किया था. ऐसी ही कई और वजहों से एकता होने के बाद भी पार्टी की कमिटियों और मोर्चों की बैठकें नहीं हो पा रही हैं, इनके पदों का सैटलमैंट तक नहीं हुआ है. इसके अलावा खुद प्रचंड के साथ एकता में आए कई बड़े नेताओं ने भी पाला बदलने के संकेत दिए हैं. इन कारणों से प्रचंड को अब तक केपी शर्मा ओली की मनमानी के आगे झुकना पड़ा रहा था.
लेकिन हाल के दिनों में, खासकर कोरोना और एमसीसी के चलते, ओली का “भारत विरोधी राष्ट्रवाद” कमजोर होने लगा है. हालांकि भारत के साथ हाल में हुए कालापानी-लिपुलेक विवाद ने उस राष्ट्रवाद में थोड़ी जान भर दी थी लेकिन वह अस्थायी साबित हुई.
ओली के राष्ट्रवाद की असल चुनौती एमसीसी है जिसे नेपाल के जानेमाने पत्रकार और जानकार अमेरिका की हिंद-प्रशांत योजना का हिस्सा मानते हैं. हालांकि नेपाल सरकार का ओली पक्ष इसे विशुद्ध रूप से विकास साझेदारी बताता है. एमसीसी के तहत अमेरिका नेपाल को 50 करोड़ डॉलर का ब्याज रहित अनुदान देगा जिसे नेपाल सरकार दोनों के बीच सहमति वाली परियोजनाओं में खर्च करेगी. इस साझेदारी को लागू करने की शर्त है कि इसका अनुमोदन संसद को करना होगा. चूंकि विवाद संसद से सड़क तक चल रहा है इसलिए ओली अब तक इसे संसद से पास नहीं करा सके हैं.
एमसीसी को सही परिप्रेक्ष में रखने वाले सबसे पहले नेपाली पत्रकारों में से एक रोहेज खतिवडा ने मुझे बताया है कि एमसीसी को हिंद-प्रशांत नीति से जोड़ कर देखने की अच्छी-खासी वजहें हैं. उनका कहना है कि एमसीसी के विरोधी ही नहीं बल्कि नेपाल में अमेरिकी राजदूत रैंडी बैरी सहित अमेरिकी के कई बड़े अधिकारियों ने इसे हिंद-प्रशांत नीति का हिस्सा कहा है. काठमांडू प्रेस में प्रकाशित एक लेख में खतिवडा ने चुटकी लेते हुए लिखा है, “क्या मजेदार बात है कि नेपाल में एमसीसी का विरोध करने वालों और अमेरिकी अधिकारियों की बात आपस में मिलती है.”
तो एमसीसी को अमेरिका की हिंद-प्रशांत नीति के साथ मिला कर देखा ही पड़ता है. हिंद-प्रशांत नीति पर बहुत कुछ लिखा जा सकता लेकिन यहां सिर्फ इतना ही कि अमेरिका की अगुवाई वाले इस गठजोड़ में जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत सहित कई देश हैं. ये सभी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का विरोध करते हैं. नेपाल में एमसीसी लागू होने का मतलब है कि नेपाल भी इस गठजोड़ में शामिल हो जाएगा. गठजोड़ में शामिल होने का मतलब है कि तटस्थता की अपनी नीति को छोड़ देगा. यही असल में एमसीसी विवाद की जड़ है. ओली, जो खुद को भारत विरोधी दिखाते हैं, असल में वह नेपाल में भारत के सबसे बड़े सहयोगी हैं. एमसीसी में शामिल होने की उनकी जिद, भारत के हित में है फिर चाहे वह इसे भारत विरोधी बन कर ही क्यों न पूरी करें. भारतीय मीडिया, जिसे वैसे भी अंतर्राष्ट्रीय मामलों की, खासकर पड़ोस के मामलों की मामूली जानकारी भी नहीं होती, ओली के इस पक्ष से परिचित नहीं है और भारत को भी ओली की इस छवी को कायम रखने में ही अपना हित नजर आ रहा होगा.
इसलिए ओली और प्रचंड के बीच जो टकराव चल रहा है वह सिर्फ इन दो नेताओं की टक्कर का मामला नहीं है बल्कि यह नेपाल की भूराजनीति और चीन के साथ उसके संबंध को लंबे कालखंड के लिए बदल सकता है.
नेपाल में जारी अमेरिका-चीन युद्ध में भारत कहां खड़ा है?
भारत में हम अक्सर यह मानकर चलते हैं कि आसपड़ोस में ऐसा कोई देश नहीं है जो किसी न किसी विदेशी ताकत के इशारे पर काम नहीं कर रहा है. हम मानते हैं कि पाकिस्तान पहले अमेरिका परस्त था लेकिन अब चीन परस्त हो गया है. नेपाल, बंगलादेश, भूटान, श्रीलंका और अन्य देशों के बारे में भी हमारी ऐसी ही रायें होती हैं. वैसे ही नेपाल के लोग भारत को अमेरीका का प्रॉक्सी मानते हैं.
नरेन्द्र मोदी के शासन में उनकी यह मान्यता मजबूत हुई है क्योंकि भारत ने अपनी विदेश नीति पर पड़ा स्वायत्तता और स्वतंत्रता का छद्म आवरण उठा लिया है. मोदी के कार्यकाल में भारत ने गुट निरपेक्ष आंदोलन और सार्क जैसे समूह को डिफंक्ट बना दिया है और स्वयं को अमेरिका की हिंद-प्रशांत नीति के साथ मजबूती से नत्थी कर लिया है. यही कारण है कि अमेरिका अब नेपाल में अपने प्रॉक्सी के बिना सीधा हस्तक्षेप करने की स्थिति में आ गया है.
जब अमेरिका एमसीसी योजना लेकर आ रहा था तो मुझे, पुराने अनुभवों के आधार पर, लगा रहा था कि भारत को इतना सीधा हस्तक्षेप कभी पसंद नहीं आएगा क्योंकि भारत ने हमेशा नेपाल में अमेरिका की ऐसी घुसपैठों का विरोध किया था. लेकिन मुझे तब बहुत हैरान हुई जब मोदी सरकार ने ऐसा होने दिया. इसकी एक सबसे बड़ी सीख तो यह है कि मोदी का भारत बाहर से चाहे जो दिखावा करता हो- नेपाल में आर्थिक नाकेबंदी करना, अनुच्छेद 370 हटाना, सर्जिकल स्ट्राइक आदि- लेकिन भीतर से उसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीजों को हल करने के आत्मविश्वास की गहरी कमी है. मोदी अच्छे वक्त के शानदार प्रधानमंत्री तो हो सकते हैं लेकिन संकटकालीन अवस्था के लिए वह एक खराब प्रधानमंत्री साबित हुए हैं और भारत का उन पर विश्वास करते रहना उसके दीर्घकालीन हितों के लिए खतरनाक हो सकता है. कोविड-19 संकट में सरकार की लचर भूमिका और चीन के साथ ताजा विवाद से इसकी पुष्टि होती है. डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ऐसा नहीं था. सिंह के कार्यकाल में कम से कम पड़ोसियों के मामलें में भारत चीजों को स्वयं हल करना चाहता था और कई बार उसने किया भी था.
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Away from home, dreaming of freedom
Posted by chimeki on November 26, 2017

Zulfikar and Fatima, photo by Kausiki Sharma
For Fatima Siyal Shah, a Pakistani Sindhi refugee in Delhi, her husband Zulfiqar Shah is the world. “Often, I wish I could go back to my land but then I look at him and think, what he would do without me,” she says. Sitting cross-legged on a borrowed bed and assembled bedding in a small dingy room in Delhi’s Sultanpuri, she talks about missing her family in Pakistan but cannot think of going back. “My conscience doesn’t allow me to leave him,” she says.
(The article was first published in Tehelka magazine. To read the full article click here)
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भारत के गोरखा कौन हैं
Posted by chimeki on November 26, 2017
भारत में हर अल्पसंख्यक समुदाय जो अपने अधिकार की बात करता है वह आज शक के घेरे में है। इस फेहरिस्त में अब एक नया नाम और जुड़ गया है: भाषाई रूप से अल्पसंख्यक गोरखा समुदाय का। पिछले दो सौ सालों से इस इस देश की सीमाओं की रक्षा करने के लिए यूरोप, अफ्रीका, मध्यपूर्व और खाड़ी देशों में जा कर लड़ने वाले और आजाद भारत की सभी लड़ाइयों में वीरता के उच्च तमगे प्राप्त करने वाले गोरखा लोगआज जब अपने अधिकार को लेकर दार्जिलिंग में संघर्ष कर रहे हैं तो राज्य की त्रिणमूल कांग्रस सरकार उनसे बात कर समाधान तलाशने की जगह उन्हें ‘चीन प्रायोजित आंदोलनकारी ब्रांड‘ करने में लगी है।
हाल में राज्य का गृह मंत्रालय लगातार गोरखालैंड में चीन की ‘घुसपैठ’ को लेकर चिंता व्यक्त कर रहा है और केन्द्र को इस चिंता से अवगत करने के लिए पत्र लिख रहा है। राज्य सरकार ऐसा माहौल बना की कोशिश में है जिससे आंदोलनकारियों के घोर दमन को राष्ट्रहित में बताकर इस अति संवेदनशील राष्ट्र की आत्मा को जगाया जा सके और दमन को जायज बताया जा सके।
पृथ्क राज्य की मांग को लेकर भारत में लगातार संघर्ष हुए है और गोरखालैंड की मांग कोई अनोखी मांग नहीं है। सन 2000 के बाद भारत में छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तराखंड और तेलंगाना राज्यों का गठन हुआ। महाराष्ट्र में विदर्भ और मध्य प्रदेश में गोंडवानालैंड एवं अन्य स्थानों में भी भाषाई और अन्य आधारों में राज्यों के गठन की माग उठती रहती है जो स्वाभाविक भी है।
छोटे राज्यों के निर्माण से सत्ता का स्वरूप अधिक समावेशी बनता है और जातीय और अन्य ऐतिहासिक कारणों से पीछे रह गए लोगों को विकास की मुख्यधारा में शामिल होने का मौका मिलता है। छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड इसके उदाहरण हैं। सत्ता में लंबे समय से जारी वर्चस्व का टूटना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत होता है। गोरखालैंड आंदोलन भी सामान्यतः इसी बुनियादी समझदारी की अभिव्यक्ति है।
आज जिस भारत के नक्शे को देख कर राष्ट्रवादी लोग भावुक हो जाते हैं उस नक्शे के निर्माण में भारत के गोरखाओं का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इतिहास का अन्याय देखिए कि इस देश की स्मृतियों में उनकी इस भूमिका को भुला दिया और गोरखा को ‘बहादुर’ ‘साब जी’ जैसे अपमानित करने वाले जुमलों का पर्यायवाची बना दिया गया।
इस लेखक के हाथ में आकाशवाणी के पूर्व अधिकारी स्वर्गीय मणी प्रसाद राई की एक महत्वपूर्ण कृति ‘वीर जातिको अमर कहानी’ है जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन में गोरखा समुदाय को लेखक ने अपने निजी प्रयासों और संसाधनों से दर्ज करने की कोशिश की है। 64 अध्यायों वाली इस पुस्तक में भारत के उन गोरखाओं के बारे में बताया गया है जिन्होने आजादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से योगदान किया।
पुस्तक में कप्तान रामसिंह ठाकुर के बारे में बताया गया है कि 15 अक्टूबर 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने रामसिंह ठाकुर को गुरूदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर के ‘जन गण मन’ को हिन्दी में रूपांतरित कर संगीतबद्ध करने का आग्रह किया। 21 अक्टूबर 1943 को अस्थायी आजाद हिन्द सरकार के गठन के समय शपथ ग्रहण से पूर्व राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने के समय रामसिंह की धुन में कौमी तराना बजाया गया। आजाद भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ में इसी धुन का प्रयोग किया गया है।
शायद यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि भारत के जिन भूभाग में आज गोरखा समुदाय का बाहुल्य है उनमें से अधिकांश भूभाग 1815-16 तक गोरखा साम्राज्य का हिस्सा था। धर्मशाला, देहरादून-मसूरी, शिमला और पूर्वोत्तर में दार्जिलिंग और अन्य भाग गोरखा साम्राज्य का हिस्सा थे जो एंगलो-नेपाल युद्ध के बाद अंग्रेज भारत में मिला लिए गए।
इस युद्ध में गोरखाओं की बहादुरी के कायल हुए अंग्रेजों ने हारे हुए गोरखाओं को अपनी सेना में सम्मानित स्थान दिया और 1857 के पहले स्वतंत्रता युद्ध के बाद सेना में उन्हें सिक्ख और अन्य जातियों की तरह जो इस आंदोलन में उनकी वफादार बनी रहीं अधिक सम्मान दिया जाने लगा।
इसलिए गोरखाओं को बाहर से आ कर इस क्षेत्र में बसे लोगों की तरह देखना इतिहास का मजाक उड़ाना है। यह सच है कि नेपाल के नेपालियों में भारत के प्रति अविश्वास है। हाल के दिनों में यह अविश्वास और अधिक बढ़ा है जिसके कुछ वाजिब कारण भी हैं। उस देश की राजनीति में भारत की दखलअंदाजी ने वहां के भारत के विरोधी राष्ट्रवाद को मजबूत किया है लेकिन उसी चश्मे से भारत के मूल निवासी गोरखाओं को देखना शर्मनाक है।
तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए ममता सरकार का गोरखाओं को राष्ट्र की अखण्डता का दुश्मन करार देना अशोभनीय और बेहद गैर जिम्मेदाराना है। ममता बनर्जी लगातार कहती आईं है कि उनकी सरकार निष्पक्ष है और भेदभाव नहीं करती। लेकिन बार बार गोरखा आंदोलन को चीन के साथ जोड़ना, वो भी ऐसे वक्त में जब दोकलम में चीन के साथ भारत का तनाव अपने चरम पर है, उसे एक जाति के खिलाफ खतरनाक षड्यंत्र ही कहा जाएगा।
वि. श.
(जुलाई 2017 में जनज्वार और जनमेल में हिन्दी और नेपाली में प्रकाशित)
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तैमूर नाम पर विवाद क्यों ?
Posted by chimeki on December 23, 2016
सैफ अली खान और करीन कपूर ने अपने बेटे का तैमूर रखा तो भारत में कोहराम मच गया। विवादास्पद लेखक तारिक फतह ने करीन और सैफ की यह कह कर आलोचना की कि इस नाम से भारतीय भावनाएं आहत होती हैं। कारण: तैमूर एक क्रूर सम्राट था जिसने लाखों लोगों का कत्ल किया। तारिक के लिए भारत का अर्थ एक खास धर्म के लोगों से है जिसे ‘समझदार’ लोगों ने तुरत पकड़ लिया। लोग यह भी कहते हैं कि तैमूर विजित लोगों को मार कर नरकंकालों का पिरामिड बनाता है। यह कितना सच है इस बात की कोई खास जानकारी कम से कम इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है। जो उपलब्ध है वह दुष्प्रचार याने प्रोपोगेण्डा है।
प्रोपोगेण्डा का राजनीति मकसद होता है। यह विवेकहीन कुतर्को पर आधारित होता जिसका मकसद लोागों को भ्रमित कर राजनीतिक लाभ हासिल करना होता है। तो भी सवाल उठता है कि तैमूर से संबंधित सही इतिहास का पता कैसे चल सकता है जबकि कोई खास लिखत प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
उज्बेकिस्तान में तैमूर राष्ट्रीय हीरो है। यूरोप के पुनर्जागरण काल में कई प्रसिद्ध लेखको ने तैमूर को नायक का दर्जा दिया। उसकी खास वजह यह थी कि यूरोप के राजा उसे अपना सहयोगी मानते थे क्योंकि उसने अधिकतर मुस्लिम सम्राज्यों को पराजित किया था।
भारत में हाल तक तैमूर को मुगल राजाओं के पूर्वज के रूप में ही याद किया जाता है और दिल्ली में तैमूर नगर भी है। बीबीसी हिन्दी के लिए एक लेख में इतिहासकार राजीव लोचन का दवा है कि तैमूर ने ”हिन्दुओं को ढूंढ ढूंढ कर कत्ल करने का आदेश दिया’। इस के बावजूद उपलब्ध सामग्री तैमूर के कत्लेआम का कोई ठोस प्रमाण नहीं देती। राजीव लोचन के लेख में संदर्भ नहीं हैं। विद्वानों का कहना है कि हिन्दू शब्द नया है। धर्मग्रंथों में इसका उल्लेख तक नहीं है। इसलिए ‘हिन्दुओं को ढूंढ ढूंढ कर कत्ल करने’ का आदेश देने की बात सतही लगती है। और यदि ऐसा है भी तो उस समय सिंधु नदी के पार रहने वालों को हिन्दू कहा जाता था तो यह किसी धर्म विशेष के कत्लेआम का आदेश तो नहीं ही होगा।
तैमूर की जो पेंटिंग इंटरनेट पर उपलब्ध है उनमें उसके आसपास कोई भी कंकालों का मकबरा नहीं दिखाई
देता। किसी पेंटिंग में वह दिवाभोज का आयोजक है और कहीं दिवाने खास में गुफ्तगू में व्यस्त और कहीं कहीं युद्ध की झांकी। चंगेज खान और कुछ हद तक स्टालीन की तरह ही तैमूर का इतिहास भी उसके विरोधियों ने अधिक लिखा इसलिए थोड़ी नाइंसाफी का स्पेस भी रह जाता है। कहा जाता है कि उसने भी एक आत्मकथा जैसा कुछ लिखा था लेकिन उसे प्रमाणिक नहीं माना जाता। तो ऐसे में तैमूर नाम पर विवाद खड़ा करना और सैफ या करीना को कठघरे में खड़ा करना एक पाखंड से अधिक कुछ नहीं है।
पत्रकार अरविन्द शेष ने एक जगह टिप्पणी की है कि तैमूर नाम को एक खास पूर्वाग्रह के साथ जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। उसका एक अर्थ लौहा भी होता है।
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The City of Happiness
Posted by chimeki on December 1, 2016
Dear Mr. Turnbull,
I am very happy to write to you and I am sure you too are happy there.
Ever since the Emperor has declared showing disgust, pain, remorse, sympathy and all such old human feelings a crime we all have become very happy.
Let me confess to you that initially I was quite unsure of this Royal Proclamation and I thought this wouldn’t work. But one day when my son got a good beating from the Spread Happiness Armed Force for showing disgust while standing in the long ATM queue, I realized that this one is a coup. I can’t tell you how happy I am today to see my initial inhibition proved wrong.
I learnt that your mother passed away last week. I am glad happy to hear that. And I am sure that she must have died happily. Your father must have been very happy man now and her happy demise would have added to his happiness. You too must have been very happy too to see your mother gone who, you told, loved you very much.
How is your son? Has he got a job? Here, my son is still hanging around happily without a job since the lockout. His wife, overcome with happiness, has filed for a divorce and left the house happily. I am much old now to tell my grandchildren how fortunate they are to live in this happy time where they don’t have to go to schools as I have no money to pay fees and buy them books.

Now I learn that the Emperor has ordered to prefix Happy with every citizen’s name and soon we will be issued new Aadhar Cards. So Mr Turnbull, are you ready to be called Mr Happy John Turnbull. I am sure you are. And I am so glad happy too that I will be called Happy Joe Smith. In our neighborhood people have already started adding Happy in their nameplates. There is nothing better than being happy all the time.
Oh God, I was about to forget telling you that I have bought a pair of smileys. My wife and I wear it all the time. First I thought, this plastic smile wouldn’t work but when the shopkeeper told me that even the ministers of our Emperor wear it all the time I decided to try them. You know what the shopkeeper even changed my 2000 rupee note which I was not able to use since my bank issued it last year. Now my wife and I put the smileys on our faces all the time. Only when we have to speak or eat we get them off but never for longer. Anyway we don’t have much to share these days. In our city this thing is a hit. On roads and on metros every second person is seen wearing it. Wearing it is good for the jaws too. The strain that comes from smiling all time is gone. I read in the newspaper the Happy Times that soon our government will be selling it through the PDS in subsidized rates. What an idea. I just want to forewarn you that don’t sleep or go in front of the mirror with it for you will think yourself an intruder.
At last we have seen happiness. I wish my parents were alive today to see this happy time. I am sure they would have died with this overdose of happiness.
Hail the Emperor,
Happily yours,
Happy Joe Smith
Happy Homes
Happy Street No. 2
The City of Happiness
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